अवन्ती खण्ड · अध्याय 4
वैश्वानरोत्पत्ति-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.4.1)
व्यास उवाच। योऽसौ कपाल उत्पन्नो नरोनाम धनुर्धरः। किमेवं सोऽधुना जात उत्पत्तौ विश्वकर्मणः
vyāsa uvāca| yo'sau kapāla utpanno naronāma dhanurdharaḥ| kimevaṁ so'dhunā jāta utpattau viśvakarmaṇaḥ
व्यास ने कहा—जो नर नामक धनुर्धर कपाल में उत्पन्न हुआ था, वह विश्वकर्मा ब्रह्मा की सृष्टि के आरम्भ में ही अब इस प्रकार कैसे उत्पन्न हुआ?
श्लोक 2 (skanda.5.4.2)
कथं रुद्रेण जनितः प्रभुणा बुद्धिपूर्वकम्। विष्णुना वा भगवता ब्रह्मणा भाव भेदतः
kathaṁ rudreṇa janitaḥ prabhuṇā buddhipūrvakam| viṣṇunā vā bhagavatā brahmaṇā bhāva bhedataḥ
क्या वह प्रभु रुद्र द्वारा बुद्धिपूर्वक उत्पन्न किया गया? या भगवान् विष्णु द्वारा, या भावभेद से ब्रह्मा द्वारा?
श्लोक 3 (skanda.5.4.3)
केन कस्मात्समुत्पन्नः शंकराच्युतब्रह्मणाम्। ब्रह्मा हिरण्यगर्भो यो यो जातश्च चतुर्मुखः
kena kasmātsamutpannaḥ śaṁkarācyutabrahmaṇām| brahmā hiraṇyagarbho yo yo jātaśca caturmukhaḥ
वह शंकर, अच्युत अथवा ब्रह्मा—इनमें से किसके तथा किससे उत्पन्न हुआ? और यह भी बताइए कि हिरण्यगर्भ चतुर्मुख ब्रह्मा किस प्रकार उत्पन्न हुए।
श्लोक 4 (skanda.5.4.4)
अद्भुतं पंचमं वक्त्रं कथं तस्याप्युपस्थितम्। स तस्थौ भगवान्ब्रह्मा कथं रुद्रे मनोऽदधत्
adbhutaṁ paṁcamaṁ vaktraṁ kathaṁ tasyāpyupasthitam| sa tasthau bhagavānbrahmā kathaṁ rudre mano'dadhat
उनका वह अद्भुत पंचम मुख भी किस प्रकार प्रकट हुआ? भगवान् ब्रह्मा किस प्रकार स्थित रहे, और उन्होंने रुद्र में मन कैसे लगाया?
श्लोक 5 (skanda.5.4.5)
मूढात्मना नरो येन हंतुं स प्रहितो हरम्
mūḍhātmanā naro yena haṁtuṁ sa prahito haram
...जिससे मोहग्रस्त होकर नर को हर के वध के लिए भेजा गया।
श्लोक 6 (skanda.5.4.6)
सनत्कुमार उवाच। महेश्वरहरी एतौ द्वावेव सति तिष्ठतः। तयोरविदितं नास्ति सिद्धासिद्धं महात्मनोः
sanatkumāra uvāca| maheśvaraharī etau dvāveva sati tiṣṭhataḥ| tayoraviditaṁ nāsti siddhāsiddhaṁ mahātmanoḥ
सनत्कुमार ने कहा—महेश्वर और हरि, ये दोनों ही सदा सत्तारूप में स्थित रहते हैं; इन दोनों महात्माओं के लिए सिद्ध या असिद्ध कुछ भी अज्ञात नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.5.4.7)
ब्रह्मणः पंचमं वक्त्रं यत्तदासीन्महात्मनः। तस्यैव मानसः सोग्निः शिरसा तेन वै धृतः
brahmaṇaḥ paṁcamaṁ vaktraṁ yattadāsīnmahātmanaḥ| tasyaiva mānasaḥ sogniḥ śirasā tena vai dhṛtaḥ
ब्रह्मा का जो पंचम मुख था, वह उन महात्मा के अपने ही मन से उत्पन्न अग्नि था, जिसे उन्होंने अपने शिर पर धारण किया।
श्लोक 8 (skanda.5.4.8)
यो नरो ब्रह्मणः प्रोक्तः सोऽप्यग्निस्तस्य मानसः। दधार तं महादेवः कृत्वांगुल्यंतरांतरे
yo naro brahmaṇaḥ proktaḥ so'pyagnistasya mānasaḥ| dadhāra taṁ mahādevaḥ kṛtvāṁgulyaṁtarāṁtare
ब्रह्मा से उत्पन्न कहा गया जो नर था, वह भी उनका मानस अग्नि ही था; महादेव ने उसे अपनी अंगुलियों के बीच धारण किया।
श्लोक 9 (skanda.5.4.9)
पूर्वं दृष्ट्वा समुत्पत्ति मेवं तस्य महान्नरः। तस्मात्कपालमंगुल्यां घट्टमानमजायत
pūrvaṁ dṛṣṭvā samutpatti mevaṁ tasya mahānnaraḥ| tasmātkapālamaṁgulyāṁ ghaṭṭamānamajāyata
पूर्व में अपनी इस उत्पत्ति को देखकर, वह महान् नर उसी अग्नि से उत्पन्न हुआ, जो अंगुली से रगड़ खाकर कपाल के रूप में प्रकट हुई थी।
श्लोक 10 (skanda.5.4.10)
स तं हत्वा शरेणाजौ ब्रह्मणो निहितं रजः। मुमोह रजसा सत्त्वं यदृच्छा कृत्प्रभुर्यतः
sa taṁ hatvā śareṇājau brahmaṇo nihitaṁ rajaḥ| mumoha rajasā sattvaṁ yadṛcchā kṛtprabhuryataḥ
युद्ध में उसे बाण से मारकर, ब्रह्मा में स्थित उस रजोगुण को रुद्र ने रजोगुण से ही मोहित कर दिया, क्योंकि वे स्वेच्छाचारी प्रभु हैं।
श्लोक 11 (skanda.5.4.11)
व्यास उवाच। कथमग्निः समुत्पन्नो योनिः सर्वेण धारितः। विस्तरेण तदाचक्ष्व भगवन्मुनिवंदित
vyāsa uvāca| kathamagniḥ samutpanno yoniḥ sarveṇa dhāritaḥ| vistareṇa tadācakṣva bhagavanmunivaṁdita
व्यास ने कहा—अग्नि किस प्रकार उत्पन्न हुई, जो सबके द्वारा धारण की जाने वाली योनि है? हे मुनिवन्दित भगवन्, वह विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 12 (skanda.5.4.12)
सनत्कुमार उवाच। अव्यक्तादीन्ससर्जादावंडं हि तदजायत। जज्ञे सौवर्णवर्णाभो ब्रह्मा लोकपितामहः
sanatkumāra uvāca| avyaktādīnsasarjādāvaṁḍaṁ hi tadajāyata| jajñe sauvarṇavarṇābho brahmā lokapitāmahaḥ
सनत्कुमार ने कहा—प्रारम्भ में अव्यक्त आदि की सृष्टि करके तब वह अण्ड उत्पन्न हुआ; उससे सुवर्णवर्ण लोकपितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए।
श्लोक 13 (skanda.5.4.13)
स्वयंभूः स तपस्तप्त्वा दिव्यं वर्षशतं महत्। स तपःस्थो व्याजहार भूर्भुवःस्वरिति श्रुतीः
svayaṁbhūḥ sa tapastaptvā divyaṁ varṣaśataṁ mahat| sa tapaḥstho vyājahāra bhūrbhuvaḥsvariti śrutīḥ
स्वयंभू ब्रह्मा ने सौ महान् दिव्य वर्षों तक तपस्या की; तपस्या में स्थित रहते हुए उन्होंने भूः, भुवः, स्वः—इन श्रुतियों का उच्चारण किया।
श्लोक 14 (skanda.5.4.14)
श्रुतियोगात्तु मनसः पश्चादग्निरजायत। अधोमुखः पपाताग्निः पृथिवीं निर्दहन्यदा
śrutiyogāttu manasaḥ paścādagnirajāyata| adhomukhaḥ papātāgniḥ pṛthivīṁ nirdahanyadā
उन श्रुतियों के मन के साथ संयोग से तत्पश्चात् अग्नि उत्पन्न हुई; वह अग्नि अधोमुख होकर पृथ्वी को जलाती हुई गिरने लगी।
श्लोक 15 (skanda.5.4.15)
पाणिभ्यां ब्रह्मणा सोग्निर्भूमेरूर्ध्वं निवेशितः। ततो दक्षिणहस्तेन वेद्यामग्निः प्रणीयते
pāṇibhyāṁ brahmaṇā sognirbhūmerūrdhvaṁ niveśitaḥ| tato dakṣiṇahastena vedyāmagniḥ praṇīyate
ब्रह्मा ने अपने दोनों हाथों से उस अग्नि को पृथ्वी के ऊपर सीधा स्थापित किया; तत्पश्चात् दाहिने हाथ से अग्नि को वेदी पर प्रतिष्ठित किया जाता है।
श्लोक 16 (skanda.5.4.16)
पुरापतन्नधोज्वाल ऊर्ध्वज्वालो यदा धृतः। उत्तानश्च कृतो यस्माद्ब्रह्मणा निर्मितो मिथः
purāpatannadhojvāla ūrdhvajvālo yadā dhṛtaḥ| uttānaśca kṛto yasmādbrahmaṇā nirmito mithaḥ
पूर्व में वह नीचे की ओर ज्वालायुक्त होकर गिर रही थी; जब उसे ऊपर की ओर ज्वालायुक्त कर धारण किया गया, तब वह ब्रह्मा द्वारा परस्पर संगति से सीधी बनाई गई।
श्लोक 17 (skanda.5.4.17)
ज्वालाभिः प्रज्वलन्नूर्ध्वं सर्वशब्दस्फुलिंगवान्। हिरण्यवर्णं ब्रह्माणं तदोवाचानिरुत्कटः
jvālābhiḥ prajvalannūrdhvaṁ sarvaśabdasphuliṁgavān| hiraṇyavarṇaṁ brahmāṇaṁ tadovācānirutkaṭaḥ
ज्वालाओं सहित ऊपर की ओर प्रज्वलित होती हुई, समस्त ध्वनियों और चिनगारियों से युक्त वह अत्यन्त उग्र अग्नि तब स्वर्णवर्ण ब्रह्मा से बोली।
श्लोक 18 (skanda.5.4.18)
किमर्थं तु त्वया देव भूमिभक्षं निवारितम्। बुभुक्षयाहमाविष्ट आहारो मे प्रदीयताम्
kimarthaṁ tu tvayā deva bhūmibhakṣaṁ nivāritam| bubhukṣayāhamāviṣṭa āhāro me pradīyatām
'हे देव, तुमने पृथ्वी को भक्षण करने से मुझे क्यों रोका है? मैं भूख से पीड़ित हूँ; मुझे आहार दो।'
श्लोक 19 (skanda.5.4.19)
एवमुक्तोऽग्नये ब्रह्मा स्वरोमाणि जुहाव सः। कृशश्चखाद अग्निस्तु सर्वरोमाणि ब्रह्मणः
evamukto'gnaye brahmā svaromāṇi juhāva saḥ| kṛśaścakhāda agnistu sarvaromāṇi brahmaṇaḥ
इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा ने अपने रोमों की आहुति अग्नि में दी; परन्तु कृश बनी वह अग्नि ब्रह्मा के सभी रोमों को खा गई।
श्लोक 20 (skanda.5.4.20)
अब्रवीच्च न मे तृप्तिर्न च मे देहनिर्वृतिः। त्वचं जुहाव ब्रह्मा च चखादाग्निस्त्वचं तदा
abravīcca na me tṛptirna ca me dehanirvṛtiḥ| tvacaṁ juhāva brahmā ca cakhādāgnistvacaṁ tadā
और उसने कहा—'मुझे तृप्ति नहीं हुई, न ही मेरे शरीर को संतोष हुआ।' तब ब्रह्मा ने अपनी त्वचा की आहुति दी, और अग्नि ने उस त्वचा को भी खा लिया।
श्लोक 21 (skanda.5.4.21)
अब्रवीत्तं तदा वह्निस्तृप्तिर्नास्ति ममेति हि। जुहाव स्वानि मांसानि त्वचोत्कृत्य प्रजापतिः
abravīttaṁ tadā vahnistṛptirnāsti mameti hi| juhāva svāni māṁsāni tvacotkṛtya prajāpatiḥ
तब अग्नि ने उनसे कहा—'मुझे सचमुच तृप्ति नहीं हुई है।' तब प्रजापति ने त्वचा को काटकर अपना मांस अर्पित किया।
श्लोक 22 (skanda.5.4.22)
अब्रवीच्च न मे तृप्तिर्न च मे देहनिर्वृतिः। जुहाव ब्रह्मा चास्थीनि तान्यश्नात्स बुभुक्षितः
abravīcca na me tṛptirna ca me dehanirvṛtiḥ| juhāva brahmā cāsthīni tānyaśnātsa bubhukṣitaḥ
और उसने कहा—'मुझे तृप्ति नहीं हुई, न ही मेरे शरीर को संतोष हुआ।' तब ब्रह्मा ने अपनी हड्डियाँ अर्पित कीं, और भूखी अग्नि ने उन्हें भी खा लिया।
श्लोक 23 (skanda.5.4.23)
ततो धात्रा हुताशाय कृतो देहो विधातुकः। तमदेहमथो दृष्ट्वा ब्रह्माणमवदच्च सः
tato dhātrā hutāśāya kṛto deho vidhātukaḥ| tamadehamatho dṛṣṭvā brahmāṇamavadacca saḥ
तब हुताशन के लिए सृष्टि-समर्थ एक देह विधाता द्वारा रची गई; और तब देहरहित हुए ब्रह्मा को देखकर उस अग्नि ने ब्रह्मा से कहा।
श्लोक 24 (skanda.5.4.24)
अहो ब्रह्मन्न मे तृप्तिर्न च मे देहनिर्वृतिः। कुद्धेण ब्रह्मणा सोऽग्निर्हुंकारेण द्विधा कृतः
aho brahmanna me tṛptirna ca me dehanirvṛtiḥ| kuddheṇa brahmaṇā so'gnirhuṁkāreṇa dvidhā kṛtaḥ
'हे ब्रह्मन्, मुझे अब भी तृप्ति नहीं हुई, न ही शरीर को संतोष हुआ है।' यह सुनकर क्रुद्ध हुए ब्रह्मा ने हुंकार से उस अग्नि को दो भागों में विभक्त कर दिया।
श्लोक 25 (skanda.5.4.25)
आहतू रुदतावग्नी आहारार्थं प्रजापतिम्। हुंकारेण पुनर्ब्रह्मा द्विधैकैकं चकार वै
āhatū rudatāvagnī āhārārthaṁ prajāpatim| huṁkāreṇa punarbrahmā dvidhaikaikaṁ cakāra vai
आहत हुई वे दोनों अग्नियाँ आहार के लिए प्रजापति से रोने लगीं; ब्रह्मा ने पुनः हुंकार से उन दोनों में से प्रत्येक को दो-दो भागों में विभक्त कर दिया।
श्लोक 26 (skanda.5.4.26)
त्रयस्तेषां रुदंति स्म रुदन्ह्येको ह्यसंवृतः। क्रुद्धेन ब्रह्मणा व्यास हुंकारेणैव ताडितः
trayasteṣāṁ rudaṁti sma rudanhyeko hyasaṁvṛtaḥ| kruddhena brahmaṇā vyāsa huṁkāreṇaiva tāḍitaḥ
उनमें से तीन जोर से रोने लगीं, जबकि एक असंवृत होकर रोता ही रहा; हे व्यास, क्रुद्ध हुए ब्रह्मा के हुंकार से वह पुनः आहत हुआ।
श्लोक 27 (skanda.5.4.27)
रोरूयमाणे चाग्नौ तु पुनर्ब्रह्मा कृपान्वितः। प्राह कामाभिभूतानां भुंक्ष्व त्वं देहधातुकम्
rorūyamāṇe cāgnau tu punarbrahmā kṛpānvitaḥ| prāha kāmābhibhūtānāṁ bhuṁkṣva tvaṁ dehadhātukam
अग्नि के अत्यन्त क्रन्दन करने पर पुनः दयायुक्त हुए ब्रह्मा ने कहा—'कामवश हुए प्राणियों के देहधातु का तुम भोग करो।'
श्लोक 28 (skanda.5.4.28)
स कालस्तस्य कामस्य सा वृत्तिः संप्रकल्पिता। अकाराग्निं सन्निविष्टं दृष्ट्वा मनसि मानसः
sa kālastasya kāmasya sā vṛttiḥ saṁprakalpitā| akārāgniṁ sanniviṣṭaṁ dṛṣṭvā manasi mānasaḥ
उस काम की वह वृत्ति और काल इस प्रकार निश्चित किया गया। अपने मन में स्थित उस अग्नि को देखकर...
श्लोक 29 (skanda.5.4.29)
हुंकाराग्निः प्रजज्वाल किमेतदिति चाब्रवीत्। ब्रह्मा तमाह त्वमपि यथेष्टां वृत्तिमाश्रय
huṁkārāgniḥ prajajvāla kimetaditi cābravīt| brahmā tamāha tvamapi yatheṣṭāṁ vṛttimāśraya
हुंकार-अग्नि प्रज्वलित होकर बोली—'यह क्या है?' ब्रह्मा ने उससे कहा—'तुम भी अपनी इच्छानुसार वृत्ति का आश्रय लो।'
श्लोक 30 (skanda.5.4.30)
देवमध्ये बहिर्वापि मुनीनामाश्रमेषु च। इत्येवमुक्तस्तेनाशु वृत्तिमेतामरोचयत्
devamadhye bahirvāpi munīnāmāśrameṣu ca| ityevamuktastenāśu vṛttimetāmarocayat
'चाहे देवताओं के मध्य, या बाहर, अथवा मुनियों के आश्रमों में।' इस प्रकार कहे जाने पर उसने तत्काल इस वृत्ति को स्वीकार कर लिया।
श्लोक 31 (skanda.5.4.31)
अहमेवं प्रदास्यामि पुनः पुनरुवाच ह। यस्मादेष द्वितीयोग्निर्हुंकारात्समजायत
ahamevaṁ pradāsyāmi punaḥ punaruvāca ha| yasmādeṣa dvitīyognirhuṁkārātsamajāyata
'मैं इस प्रकार ही यह प्रदान करूँगा'—ऐसा उन्होंने बार-बार कहा; चूँकि यह द्वितीय अग्नि हुंकार से उत्पन्न हुई थी...
श्लोक 32 (skanda.5.4.32)
साभिमानोऽपमानो वा हुंकारो यत्र कथ्यते। सा च वृत्तिर्ममादेशाद्बुभुक्षाशांतये तव
sābhimāno'pamāno vā huṁkāro yatra kathyate| sā ca vṛttirmamādeśādbubhukṣāśāṁtaye tava
'...जिसमें अभिमान अथवा अपमान प्रकट होता है, वह हुंकार ही मेरी आज्ञा से तुम्हारी क्षुधाशान्ति की वृत्ति होगी।'
श्लोक 33 (skanda.5.4.33)
इकाराग्निं समाहूय ब्रह्मा वचनमब्रवीत्। भवतोग्ने त्वियं वृत्तिरन्नं भुक्तं दहेरिति
ikārāgniṁ samāhūya brahmā vacanamabravīt| bhavatogne tviyaṁ vṛttirannaṁ bhuktaṁ daheriti
इकार नामक अग्नि को बुलाकर ब्रह्मा ने कहा—'हे अग्ने, तुम्हारी यह वृत्ति होगी कि तुम भुक्त अन्न को पचाओ।'
श्लोक 34 (skanda.5.4.34)
उकाराग्निं समाहूय ब्रह्मा वचनमब्रवीत्। यत्पृथिव्यां गुरुध्यानं भगवंस्तत्समाश्रय
ukārāgniṁ samāhūya brahmā vacanamabravīt| yatpṛthivyāṁ gurudhyānaṁ bhagavaṁstatsamāśraya
उकार नामक अग्नि को बुलाकर ब्रह्मा ने कहा—'हे भगवन्, पृथ्वी पर जो गुरुध्यान है, उसी का आश्रय लो।'
श्लोक 35 (skanda.5.4.35)
अहं च ते विधास्यामि स्थानमाहारमेव च। इत्युक्तः स तु तेनाग्निर्यत्पृथिव्यां शिलाचयः
ahaṁ ca te vidhāsyāmi sthānamāhārameva ca| ityuktaḥ sa tu tenāgniryatpṛthivyāṁ śilācayaḥ
'और मैं तुम्हारे लिए स्थान तथा आहार दोनों की व्यवस्था करूँगा।' इस प्रकार कहे जाने पर वह अग्नि पृथ्वी पर पाषाणों के समूह में जा बसी।
श्लोक 36 (skanda.5.4.36)
यतोऽग्निर्व्यास तेनोक्तो गिरौ दुर्गे महामुने। उकाराग्निः स चाप्येष समुद्रे वडवामुखः
yato'gnirvyāsa tenokto girau durge mahāmune| ukārāgniḥ sa cāpyeṣa samudre vaḍavāmukhaḥ
इसीलिए, हे व्यास महामुने, वह अग्नि पर्वत के दुर्गम स्थानों में निवास करने वाली कही गई; और यही उकार-अग्नि समुद्र में वडवामुख भी है।
श्लोक 37 (skanda.5.4.37)
सोऽपि भिन्नः समाहूतो ब्रह्मणा स्थानलिप्सया। त्वं चक्षुः सर्वलोकस्य ब्रह्मा वचनमब्रवीत्
so'pi bhinnaḥ samāhūto brahmaṇā sthānalipsayā| tvaṁ cakṣuḥ sarvalokasya brahmā vacanamabravīt
उसे भी विभक्त कर, स्थान प्रदान करने की इच्छा से ब्रह्मा ने बुलाकर कहा—'तुम सम्पूर्ण जगत् के नेत्र बनोगे।'
श्लोक 38 (skanda.5.4.38)
तस्मात्त्वं संस्कृतां वाणीं द्विजातीनां प्रकाशय। दैवी पुण्या हि पापांश्च आयुष्यं हंत्यसंस्कृता
tasmāttvaṁ saṁskṛtāṁ vāṇīṁ dvijātīnāṁ prakāśaya| daivī puṇyā hi pāpāṁśca āyuṣyaṁ haṁtyasaṁskṛtā
'इसलिए तुम द्विजातियों की संस्कारयुक्त वाणी को प्रकाशित करो; क्योंकि दैवी और पुण्यमयी वाणी भी यदि असंस्कृत हो, तो पाप तथा आयु दोनों का नाश करती है।'
श्लोक 39 (skanda.5.4.39)
तस्माद्द्विजातेर्विज्ञेया वाणी पुण्या प्रकाशिता। वाक्च माता द्विजातीनां मुखे सा संप्रतिष्ठिता
tasmāddvijātervijñeyā vāṇī puṇyā prakāśitā| vākca mātā dvijātīnāṁ mukhe sā saṁpratiṣṭhitā
इसलिए द्विजाति की वह पवित्र, संस्कारयुक्त वाणी ही जानने योग्य है; वाणी ही द्विजातियों की माता है, जो मुख में प्रतिष्ठित रहती है।
श्लोक 40 (skanda.5.4.40)
अनृताक्षरविन्यासादमंगल्या ह्यसंस्कृता। वक्तारं हंत्यतो ह्यग्निः सदा संस्कृतकृद्द्विजः
anṛtākṣaravinyāsādamaṁgalyā hyasaṁskṛtā| vaktāraṁ haṁtyato hyagniḥ sadā saṁskṛtakṛddvijaḥ
मिथ्या अक्षरों के अव्यवस्थित प्रयोग से असंस्कृत वाणी अमंगलकारी होती है; वह वक्ता का नाश करती है, इसलिए अग्नि सदा संस्कार करने वाला द्विज है।
श्लोक 41 (skanda.5.4.41)
आहूय भूयोऽकाराग्निं प्रजापतिरचक्षुषम्। वाग्वेदवाणीमवदत्सोपि संमीलितेक्षणः
āhūya bhūyo'kārāgniṁ prajāpatiracakṣuṣam| vāgvedavāṇīmavadatsopi saṁmīlitekṣaṇaḥ
पुनः नेत्रहीन अकार अग्नि को बुलाकर प्रजापति ने वेदवाणी कही, और वह भी नेत्र मूँदे रहा।
श्लोक 42 (skanda.5.4.42)
ब्रह्माणमाह वह्निस्तु वाचोहं मुखमस्मि हे। स्थानं मम प्रयच्छस्व सर्वतेजोवरं परम्
brahmāṇamāha vahnistu vācohaṁ mukhamasmi he| sthānaṁ mama prayacchasva sarvatejovaraṁ param
अग्नि ने ब्रह्मा से कहा—'मैं वाणी का मुख हूँ। मुझे समस्त तेजों में श्रेष्ठ, सर्वोत्तम स्थान प्रदान करो।'
श्लोक 43 (skanda.5.4.43)
ब्रह्मा तमाह यस्मात्त्वं तेजःस्थानं समीहसे। तस्मात्तेजोमयं यत्ते रविस्थानं भविष्यति
brahmā tamāha yasmāttvaṁ tejaḥsthānaṁ samīhase| tasmāttejomayaṁ yatte ravisthānaṁ bhaviṣyati
ब्रह्मा ने उससे कहा—'चूँकि तुम तेज का स्थान चाहते हो, इसलिए तुम्हारा तेजोमय स्थान सूर्य होगा।'
श्लोक 44 (skanda.5.4.44)
यस्मात्तेजः प्रपश्यंति चक्षुर्भवति दुर्बलम्। तस्मात्तत्तेजसा युक्तं पश्येदनिमिषं क्वचित्
yasmāttejaḥ prapaśyaṁti cakṣurbhavati durbalam| tasmāttattejasā yuktaṁ paśyedanimiṣaṁ kvacit
'चूँकि उस तेज को देखने से नेत्र दुर्बल हो जाता है, इसलिए वह तेजयुक्त होकर कहीं-कहीं अनिमेष दृष्टि से देखे।'
श्लोक 45 (skanda.5.4.45)
इकारमथ संभिन्नमग्निमाह पितामहः। सौम्यदृष्ट्या तु ब्रह्माणं समुदीक्षमुपागतम्
ikāramatha saṁbhinnamagnimāha pitāmahaḥ| saumyadṛṣṭyā tu brahmāṇaṁ samudīkṣamupāgatam
तब पितामह ने विभक्त इकार अग्नि को सम्बोधित किया, जो सौम्य दृष्टि से ब्रह्मा की ओर देखता हुआ आया था।
श्लोक 46 (skanda.5.4.46)
यस्माच्छीघ्रं महासत्त्व सौम्यदृष्टिरिहागतः। तस्माद्दास्याम्यहं स्थानं सर्वभूतमनोरमम्
yasmācchīghraṁ mahāsattva saumyadṛṣṭirihāgataḥ| tasmāddāsyāmyahaṁ sthānaṁ sarvabhūtamanoramam
'हे महासत्त्व, चूँकि तुम सौम्य दृष्टि लेकर शीघ्र यहाँ आए हो, इसलिए मैं तुम्हें सर्वप्राणिमनोहर स्थान दूँगा।'
श्लोक 47 (skanda.5.4.47)
संशीतात्मा शीतरश्मिश्चंद्रमास्त्वं भविष्यसि। सर्वतेजोधिको दिव्यः सौम्यः परमभासुरः
saṁśītātmā śītaraśmiścaṁdramāstvaṁ bhaviṣyasi| sarvatejodhiko divyaḥ saumyaḥ paramabhāsuraḥ
'शीतल स्वभाव वाले, शीतल किरणों वाले, तुम चन्द्रमा बनोगे; समस्त तेजों में अधिक, दिव्य, सौम्य तथा परम भास्वर।'
श्लोक 48 (skanda.5.4.48)
तरुस्थः सर्वतेजांसि तेजसाऽभिभविष्यसि। इत्युक्त्वा तं विसृज्याथ उकाराग्निमथाह्वयत
tarusthaḥ sarvatejāṁsi tejasā'bhibhaviṣyasi| ityuktvā taṁ visṛjyātha ukārāgnimathāhvayata
'वृक्षों में स्थित रहकर तुम अपने तेज से समस्त तेजों को अभिभूत करोगे।' ऐसा कहकर उसे विदा कर, उन्होंने तब उकार अग्नि को बुलाया।
श्लोक 49 (skanda.5.4.49)
इहैहीतीति शिरसि समादाय न्यवेशयत्। तत्रस्थं पंचमं वक्त्रं ऊर्ध्वमेतत्प्रजायते
ihaihītīti śirasi samādāya nyaveśayat| tatrasthaṁ paṁcamaṁ vaktraṁ ūrdhvametatprajāyate
'यहाँ आओ'—ऐसा कहकर उन्होंने उसे शिर पर धारण कर स्थापित किया; वहाँ स्थित वही पंचम मुख इस प्रकार ऊपर प्रकट हुआ।
श्लोक 50 (skanda.5.4.50)
स एवं रूपवानग्निरुकाराग्निः प्रतिष्ठितः। तस्मादग्निश्च सूर्यश्च एकमेतौ विनिर्दिशेत्
sa evaṁ rūpavānagnirukārāgniḥ pratiṣṭhitaḥ| tasmādagniśca sūryaśca ekametau vinirdiśet
इस प्रकार वह रूपवान् उकार अग्नि प्रतिष्ठित हुई; इसीलिए अग्नि और सूर्य—इन दोनों को एक ही मानना चाहिए।
श्लोक 51 (skanda.5.4.51)
भवाग्निरूपं परमं ब्रह्माणमिदमब्रवीत्। ममापि रुचिरं स्थानं प्रयच्छस्व यथा स्वयम्
bhavāgnirūpaṁ paramaṁ brahmāṇamidamabravīt| mamāpi ruciraṁ sthānaṁ prayacchasva yathā svayam
भव के उस परम अग्निरूप ने ब्रह्मा से यह कहा—'मुझे भी अपनी इच्छानुसार एक रुचिकर स्थान प्रदान करो।'
श्लोक 52 (skanda.5.4.52)
ब्रह्मा तमाह कतमं स्थानं ते रोचतेऽनल। अग्निस्तं प्रत्युवाचेदं स्थानं कथय मे परम्
brahmā tamāha katamaṁ sthānaṁ te rocate'nala| agnistaṁ pratyuvācedaṁ sthānaṁ kathaya me param
ब्रह्मा ने उससे कहा—'हे अनल, तुम्हें कौन-सा स्थान रुचता है?' अग्नि ने उन्हें उत्तर दिया—'वह परम स्थान आप ही बताइए।'
श्लोक 53 (skanda.5.4.53)
स्थानं नैवास्ति ते भव्यं ततो ह्येवं भविष्यति। अत्र ते स्थातुमिच्छास्ति यदि संस्थास्यते त्विह
sthānaṁ naivāsti te bhavyaṁ tato hyevaṁ bhaviṣyati| atra te sthātumicchāsti yadi saṁsthāsyate tviha
'तुम्हारे योग्य कोई विशिष्ट स्थान है ही नहीं; इसलिए ऐसा होगा—यदि तुम्हारी यहाँ रहने की इच्छा है, तो तुम यहीं स्थापित हो जाओगे।'
श्लोक 54 (skanda.5.4.54)
लोके नित्यं समाचार लोकसंस्थितिहेतुकः। संभवार्थमिहास त्वं निजसत्त्वपराक्रमः
loke nityaṁ samācāra lokasaṁsthitihetukaḥ| saṁbhavārthamihāsa tvaṁ nijasattvaparākramaḥ
'लोक में सदा लोक की स्थिति के हेतुरूप आचरण करो; अपने सत्त्व और पराक्रम सहित सृष्टि के प्रयोजन के लिए यहीं रहो।'
श्लोक 55 (skanda.5.4.55)
यदिह त्वं महाज्वालाभाभिः कलितशोभनः। प्राप्स्यसे सर्व जंतूनां भासुरत्वमनुत्तमम्। न ह्येष धर्मश्चैवाद्यो मायामोहितकाम्यया
yadiha tvaṁ mahājvālābhābhiḥ kalitaśobhanaḥ| prāpsyase sarva jaṁtūnāṁ bhāsuratvamanuttamam| na hyeṣa dharmaścaivādyo māyāmohitakāmyayā
'यदि तुम यहाँ महाज्वालाओं की आभा से सुशोभित रहोगे, तो समस्त प्राणियों में अनुपम तेजस्विता प्राप्त करोगे; परन्तु यह आदि धर्म नहीं है, यह तो मायामोहित कामना से उत्पन्न है।'
श्लोक 56 (skanda.5.4.56)
इत्युक्ते ब्रह्मणा सोऽग्निः प्रजज्वाल सहस्रशः। अनंतज्वालाभि ततो नानावर्णादिभिः श्रितः
ityukte brahmaṇā so'gniḥ prajajvāla sahasraśaḥ| anaṁtajvālābhi tato nānāvarṇādibhiḥ śritaḥ
ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर वह अग्नि सहस्रों रूपों में प्रज्वलित हो उठी; तत्पश्चात् अनन्त ज्वालाओं तथा नाना वर्णों से युक्त होकर...
श्लोक 57 (skanda.5.4.57)
अकारेकार ऊकारो ब्रह्मा तमथ दृष्टवान्। नैवासौ शाम्यतां याति वह्निर्भूयो व्यवर्धत
akārekāra ūkāro brahmā tamatha dṛṣṭavān| naivāsau śāmyatāṁ yāti vahnirbhūyo vyavardhata
अकार, इकार, ऊकार रूपों में ब्रह्मा ने तब उसे देखा; वह अग्नि शान्त नहीं हो रही थी, अपितु और भी बढ़ती जा रही थी।
श्लोक 58 (skanda.5.4.58)
व्याप्तं भवाग्निना सर्वं तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा। ज्वालाभिरुपरि क्षिप्तं दृष्ट्वात्मानं समंततः
vyāptaṁ bhavāgninā sarvaṁ tiryagūrdhvamadhastathā| jvālābhirupari kṣiptaṁ dṛṣṭvātmānaṁ samaṁtataḥ
भव की उस अग्नि से आड़े, ऊपर तथा नीचे—सभी ओर व्याप्त हुआ सम्पूर्ण जगत्; अपने आपको भी चारों ओर उसकी ज्वालाओं से घिरा देखकर...
श्लोक 59 (skanda.5.4.59)
चिंतयंतं तु ब्रह्माणं भीतं चैव विशेषतः। शिरस्यंजलिमाधाय तुष्टावाथ प्रणम्य तम्
ciṁtayaṁtaṁ tu brahmāṇaṁ bhītaṁ caiva viśeṣataḥ| śirasyaṁjalimādhāya tuṣṭāvātha praṇamya tam
...ब्रह्मा चिन्तामग्न और विशेष रूप से भयभीत होकर, शिर पर अंजलि जोड़कर, प्रणाम करते हुए उसकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 60 (skanda.5.4.60)
तेजोनिधिं च सर्वेशं ज्ञातुमिच्छन्प्रजापतिः। निरुक्तसूक्तराहस्यैर्ऋग्यजुःसामभाषितैः
tejonidhiṁ ca sarveśaṁ jñātumicchanprajāpatiḥ| niruktasūktarāhasyairṛgyajuḥsāmabhāṣitaiḥ
उस तेजोनिधि सर्वेश्वर को जानने की इच्छा से प्रजापति ने ऋक्, यजुः और साम के निरुक्त, सूक्त तथा रहस्यों द्वारा उसकी स्तुति की।
श्लोक 61 (skanda.5.4.61)
ब्रह्मोवाच। सप्ततेजो नमस्तेऽस्तु परस्य परमात्मने। अद्भुतानां प्रतिश्रोत्रे तेजसा निधये नमः
brahmovāca| saptatejo namaste'stu parasya paramātmane| adbhutānāṁ pratiśrotre tejasā nidhaye namaḥ
ब्रह्मा ने कहा—हे सप्ततेज, परम के परमात्मा, आपको नमस्कार; अद्भुतों के श्रोता, तेज के निधि, आपको नमस्कार।
श्लोक 62 (skanda.5.4.62)
बीजं यो विश्वभावानां संमोहनविमोहनम्। अंधकारो युगावर्तकाले काले च दुःसह
bījaṁ yo viśvabhāvānāṁ saṁmohanavimohanam| aṁdhakāro yugāvartakāle kāle ca duḥsaha
आप ही विश्व के समस्त भावों के बीज हैं, संमोहन और विमोहन दोनों रूप हैं; युगपरिवर्तन के काल में असह्य अन्धकार भी आप ही हैं।
श्लोक 63 (skanda.5.4.63)
ऊर्ध्ववक्त्र नमस्तेस्तु सत्त्वात्मक धरात्मक। ज्वलज्ज्वालोत्पन्नजल जलजेश जलेचर
ūrdhvavaktra namastestu sattvātmaka dharātmaka| jvalajjvālotpannajala jalajeśa jalecara
हे ऊर्ध्ववक्त्र, सत्त्वात्मक, धरात्मक, आपको नमस्कार; हे ज्वलज्ज्वालोत्पन्नजल, जलजेश, जलेचर, आपको नमस्कार।
श्लोक 64 (skanda.5.4.64)
जलजोत्फुल्लपत्राक्ष जलदेव हुताशन। कृष्णकांते कृष्णमार्ग स्वर्गमार्गप्रदायक
jalajotphullapatrākṣa jaladeva hutāśana| kṛṣṇakāṁte kṛṣṇamārga svargamārgapradāyaka
हे जलज-विकसित-पत्र के समान नेत्रों वाले, हे जलदेव, हे हुताशन; हे कृष्णकान्त, कृष्णमार्ग, स्वर्गमार्ग के दाता।
श्लोक 65 (skanda.5.4.65)
यज्ञाहुतिसमाचार यज्ञरूप नमोनमः। स्वर्णगर्भ शमीगर्भ जय देव सनातन
yajñāhutisamācāra yajñarūpa namonamaḥ| svarṇagarbha śamīgarbha jaya deva sanātana
हे यज्ञाहुति-आचारी, यज्ञस्वरूप, बारम्बार नमस्कार; हे स्वर्णगर्भ, शमीगर्भ, हे सनातन देव, आपकी जय हो।
श्लोक 66 (skanda.5.4.66)
तमोहार महाहार स्वाप्रिय तमोहर। प्रदीप्तरोचिर्देवेश चित्रभानो नमोस्तु ते
tamohāra mahāhāra svāpriya tamohara| pradīptarocirdeveśa citrabhāno namostu te
हे तमोहार, महाहार, स्वाप्रिय, तमोहर; हे प्रदीप्तरोचि देवेश, हे चित्रभानु, आपको नमस्कार हो।
श्लोक 67 (skanda.5.4.67)
वैश्वानरानलोदग्र ऊर्ध्वपावक सर्वग विभावसो महाभाग कृष्णवर्त्मन्नमोनमः
vaiśvānarānalodagra ūrdhvapāvaka sarvaga vibhāvaso mahābhāga kṛṣṇavartmannamonamaḥ
हे वैश्वानरानलोदग्र, ऊर्ध्वपावक, सर्वग—[इसके आगे मूल पाठ में अंश त्रुटित/अस्पष्ट है]—हे विभावसु, महाभाग, कृष्णवर्त्मन्, बारम्बार नमस्कार।
श्लोक 68 (skanda.5.4.68)
सनत्कुमार उवाच। एवं स्तुतस्तदा सोग्निर्विरंचिमब्रवीद्वचः। तुष्टोऽहं भवतो ब्रह्मन्भावकर्म प्रसिध्यति
sanatkumāra uvāca| evaṁ stutastadā sognirviraṁcimabravīdvacaḥ| tuṣṭo'haṁ bhavato brahmanbhāvakarma prasidhyati
सनत्कुमार ने कहा—इस प्रकार स्तुति किए जाने पर उस अग्नि ने विरंचि से यह वचन कहा—'हे ब्रह्मन्, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; तुम्हारा सृष्टि-कार्य सिद्ध होगा।'
श्लोक 69 (skanda.5.4.69)
एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा नमस्कृत्याब्रवीत्पुनः। ज्ञातुमिच्छाम्यहं देव को हि त्वं भगवानिति
evamuktastadā brahmā namaskṛtyābravītpunaḥ| jñātumicchāmyahaṁ deva ko hi tvaṁ bhagavāniti
इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा ने प्रणाम कर पुनः कहा—'हे देव, मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं, हे भगवन्?'
श्लोक 70 (skanda.5.4.70)
अब्रवीत्सोऽथ ब्रह्माणं पुरुषस्त्वं प्रजापतिः। अज्ञेयं परमं रूपं तेन योग्येन पश्य मे
abravītso'tha brahmāṇaṁ puruṣastvaṁ prajāpatiḥ| ajñeyaṁ paramaṁ rūpaṁ tena yogyena paśya me
तब उसने ब्रह्मा से कहा—'हे पुरुष, तुम प्रजापति हो; उस योग्य दृष्टि से मेरे अज्ञेय परम रूप का दर्शन करो।'
श्लोक 71 (skanda.5.4.71)
अथापश्यत्स दिव्येन भगवंतं सनातनम्। सर्वज्ञं विधिकर्तारमीश्वरं सदसत्परम्
athāpaśyatsa divyena bhagavaṁtaṁ sanātanam| sarvajñaṁ vidhikartāramīśvaraṁ sadasatparam
तब उन्होंने दिव्य दृष्टि से उस सनातन भगवान् को देखा, जो सर्वज्ञ, विधिकर्ता, सत्-असत् से परे ईश्वर हैं।
श्लोक 72 (skanda.5.4.72)
ज्वलनं गगनं भूमिं दृश्यादृश्यं परं पदम्। भूतं भव्यं भविष्यं च जगत्स्थावरजंगमम्। सदैव कुरुते देवो भुंक्ते सर्वं यतः प्रभुः
jvalanaṁ gaganaṁ bhūmiṁ dṛśyādṛśyaṁ paraṁ padam| bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyaṁ ca jagatsthāvarajaṁgamam| sadaiva kurute devo bhuṁkte sarvaṁ yataḥ prabhuḥ
अग्नि, आकाश, पृथ्वी, दृश्य-अदृश्य, परम पद; भूत, भविष्य और वर्तमान, स्थावर-जंगम जगत्—यह सब वे देव सदैव रचते हैं, और प्रभु होने से सबका भोग करते हैं।
श्लोक 73 (skanda.5.4.73)
अतिसंभूतिभव्येन स्तोत्रेणाथ प्रजापतिः। तुष्टाव देवं प्रकृतं पुराणमजमव्ययम्
atisaṁbhūtibhavyena stotreṇātha prajāpatiḥ| tuṣṭāva devaṁ prakṛtaṁ purāṇamajamavyayam
तत्पश्चात् प्रजापति ने अत्यन्त उत्कृष्ट एवं मंगलमय स्तोत्र से उस पुराण, अज, अव्यय, यथार्थस्वरूप देव की स्तुति की।
श्लोक 74 (skanda.5.4.74)
ततोऽतिरक्तवर्णं च दृष्ट्वा देवः प्रजापतिः। विश्वतोबाहुचरणं विश्वतोऽग्निशिरोमुखम्
tato'tiraktavarṇaṁ ca dṛṣṭvā devaḥ prajāpatiḥ| viśvatobāhucaraṇaṁ viśvato'gniśiromukham
तत्पश्चात् प्रजापति देव ने उस अत्यन्त रक्तवर्ण, सर्वत्र भुजा-चरणों वाले, सर्वत्र अग्निमय मुख-शिरों वाले रूप को देखा।
श्लोक 75 (skanda.5.4.75)
व्यक्ताव्यक्तप्रणेतारं प्रणमञ्छिरसा स्वयम्। पश्यतेऽथ नमस्तेऽस्तु तुभ्यं विश्वभवात्मने
vyaktāvyaktapraṇetāraṁ praṇamañchirasā svayam| paśyate'tha namaste'stu tubhyaṁ viśvabhavātmane
व्यक्त-अव्यक्त के प्रणेता को स्वयं शिर झुकाकर, उन्हें देखते हुए उन्होंने कहा—'हे विश्वभवात्मन्, आपको नमस्कार हो।'
श्लोक 76 (skanda.5.4.76)
पृथिवी वायुराकाशं यच्चान्यद्भुवनत्रयम्। लोकालोकेश्वरं चैव जगत्स्थावरजंगमम्
pṛthivī vāyurākāśaṁ yaccānyadbhuvanatrayam| lokālokeśvaraṁ caiva jagatsthāvarajaṁgamam
'पृथ्वी, वायु, आकाश तथा त्रिभुवन में जो कुछ और भी है; लोक-अलोक के ईश्वर तथा स्थावर-जंगम जगत्—यह सब आप ही हैं।'
श्लोक 77 (skanda.5.4.77)
तत्त्वसर्गं भूतसर्गं भावसर्गं तथैव च। ब्रह्मतेजोमयात्मानं संपश्यंश्चक्षुषा स्वतः
tattvasargaṁ bhūtasargaṁ bhāvasargaṁ tathaiva ca| brahmatejomayātmānaṁ saṁpaśyaṁścakṣuṣā svataḥ
'तत्त्वसृष्टि, भूतसृष्टि तथा भावसृष्टि'—इस प्रकार ब्रह्मतेजोमय आत्मा को अपने ही नेत्रों से देखते हुए...
श्लोक 78 (skanda.5.4.78)
यत्किंचिद्वस्तुजातं हि तत्सर्वमचरं चरम्। एवं स्तुतः स तु तदा अनादिर्भगवान्प्रभुः
yatkiṁcidvastujātaṁ hi tatsarvamacaraṁ caram| evaṁ stutaḥ sa tu tadā anādirbhagavānprabhuḥ
'जो कुछ भी वस्तुसमूह है, चर या अचर, वह सब आप ही हैं।' इस प्रकार स्तुति किए जाने पर वे अनादि भगवान् प्रभु...
श्लोक 79 (skanda.5.4.79)
अथेशः प्राह ब्रह्माणं त्वया दृष्टं यथातथम्। सृजेदानीं प्रजाः सर्वाः स च त्वं विनयान्वितः
atheśaḥ prāha brahmāṇaṁ tvayā dṛṣṭaṁ yathātatham| sṛjedānīṁ prajāḥ sarvāḥ sa ca tvaṁ vinayānvitaḥ
तब ईश्वर ने ब्रह्मा से कहा—'तुमने मुझे यथार्थ रूप में देखा है; अब विनययुक्त होकर तुम समस्त प्रजाओं की सृष्टि करो।'
श्लोक 80 (skanda.5.4.80)
कर्ताहमनुकर्ता त्वं लोकानां स्थितिकारणे। कुरुष्वैतत्तथा भाव्यं मया पूर्वं विनिर्मितम्
kartāhamanukartā tvaṁ lokānāṁ sthitikāraṇe| kuruṣvaitattathā bhāvyaṁ mayā pūrvaṁ vinirmitam
'लोकों की स्थिति के हेतु में मैं कर्ता हूँ, तुम अनुकर्ता हो; जैसा मेरे द्वारा पूर्व में निर्मित हुआ है, वैसा ही करो।'
श्लोक 81 (skanda.5.4.81)
इत्युक्तो देवदेवेन ब्रह्मा वचनमब्रवीत्। नमस्तेऽस्तु महादेव भव शर्व नमोऽस्तु ते
ityukto devadevena brahmā vacanamabravīt| namaste'stu mahādeva bhava śarva namo'stu te
देवाधिदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा ने कहा—'हे महादेव, आपको नमस्कार; हे भव, हे शर्व, आपको नमस्कार।'
श्लोक 82 (skanda.5.4.82)
त्वत्प्रसादात्प्रजासर्गं कुर्वतो मे महेश्वर। सखायं प्राप्तुमिच्छामि त्वया दत्तं जगत्पते
tvatprasādātprajāsargaṁ kurvato me maheśvara| sakhāyaṁ prāptumicchāmi tvayā dattaṁ jagatpate
'हे महेश्वर, आपकी कृपा से प्रजासृष्टि करते हुए, हे जगत्पते, मैं आपके द्वारा दिया गया एक सखा प्राप्त करना चाहता हूँ।'
श्लोक 83 (skanda.5.4.83)
महेश्वर उवाच। ध्यायतः पुत्रकामस्य स्रष्टु कामस्य ते यतः। कल्पितं भविता देव मदुत्पत्तिं यदीप्स्यसि
maheśvara uvāca| dhyāyataḥ putrakāmasya sraṣṭu kāmasya te yataḥ| kalpitaṁ bhavitā deva madutpattiṁ yadīpsyasi
महेश्वर ने कहा—'हे देव, चूँकि तुम पुत्र की कामना से, सृष्टि की कामना से ध्यान करते हो, इसलिए यदि तुम मेरी उत्पत्ति चाहते हो, तो वह संकल्पित हो जाएगी।'
श्लोक 84 (skanda.5.4.84)
पुत्रत्वं प्राप्य हीशस्ते छेत्स्यामि पंचमं शिरः। तत्र चोत्पादयिष्यामि नरनारायणावुभौ
putratvaṁ prāpya hīśaste chetsyāmi paṁcamaṁ śiraḥ| tatra cotpādayiṣyāmi naranārāyaṇāvubhau
'हे ईश, पुत्रभाव को प्राप्त कर मैं तुम्हारे पंचम शिर को काट डालूँगा; और वहीं से नर और नारायण दोनों को उत्पन्न करूँगा।'
श्लोक 85 (skanda.5.4.85)
ब्रह्मोवाच। कथं नारायणो देवस्तपसा मन्यते स नः। कीर्तयस्व सखा धन्यः स नः पूज्यो भविष्यति
brahmovāca| kathaṁ nārāyaṇo devastapasā manyate sa naḥ| kīrtayasva sakhā dhanyaḥ sa naḥ pūjyo bhaviṣyati
ब्रह्मा ने कहा—'देव नारायण तपस्या द्वारा हमें किस रूप में मानते हैं? उनका वर्णन कीजिए, वे धन्य सखा हैं; वे हमारे पूज्य होंगे।'
श्लोक 86 (skanda.5.4.86)
अथापश्यत्ततो ब्रह्मा तेजसा हरिमच्युतम्। तं सर्वगमनं गम्यं शिवं नारायणात्मकम्
athāpaśyattato brahmā tejasā harimacyutam| taṁ sarvagamanaṁ gamyaṁ śivaṁ nārāyaṇātmakam
तब ब्रह्मा ने उस तेज द्वारा अच्युत हरि को देखा, जो सर्वगमन के गन्तव्य, शिव तथा नारायणस्वरूप हैं।
श्लोक 87 (skanda.5.4.87)
महेश्वरस्य तेजोर्ध्वं संतं नारायणं प्रभुम्। चकार व्याहरन्नार्तं श्रीरूपं शक्तिसाम्यतः
maheśvarasya tejordhvaṁ saṁtaṁ nārāyaṇaṁ prabhum| cakāra vyāharannārtaṁ śrīrūpaṁ śaktisāmyataḥ
महेश्वर ने अपने तेज के ऊपर विद्यमान प्रभु नारायण को, भावुक वाणी में, अपने समान शक्तिवाला श्रीरूप प्रकट किया।
श्लोक 88 (skanda.5.4.88)
अंगुल्या संस्पृशन्देवो ब्रह्माणमब्रवीद्वचः। ब्रह्मंस्ते परमं धाम ऋषिर्नारायणानुगः
aṁgulyā saṁspṛśandevo brahmāṇamabravīdvacaḥ| brahmaṁste paramaṁ dhāma ṛṣirnārāyaṇānugaḥ
अंगुली से स्पर्श करते हुए देव ने ब्रह्मा से कहा—'हे ब्रह्मन्, यह जो नारायण का अनुगामी ऋषि है, यही तुम्हारा परम धाम है।'
श्लोक 89 (skanda.5.4.89)
भविता लोकरक्षार्थं श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम्। नारायण महावीर्य शक्तिरेषा मदीयिका
bhavitā lokarakṣārthaṁ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām| nārāyaṇa mahāvīrya śaktireṣā madīyikā
'लोकरक्षा के लिए यह समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ होगा; हे महावीर्य नारायण, यह मेरी ही शक्ति है।'
श्लोक 90 (skanda.5.4.90)
इत्युक्त्वा भगवान्देवस्तमग्निं पाणिनाऽग्रहीत्। दक्षहस्तांगुलिनखमध्यस्थं समचीकरत्
ityuktvā bhagavāndevastamagniṁ pāṇinā'grahīt| dakṣahastāṁgulinakhamadhyasthaṁ samacīkarat
ऐसा कहकर भगवान् देव ने उस अग्नि को हाथ में लिया, तथा दाहिने हाथ की अंगुली के नखमध्य में स्थापित कर उसे समान कर दिया।
श्लोक 91 (skanda.5.4.91)
इति सत्कृत्य सततं नरं चैव महेश्वरः। ब्रह्मणो दर्शयित्वाथ तत्रैवांतरधीयत
iti satkṛtya satataṁ naraṁ caiva maheśvaraḥ| brahmaṇo darśayitvātha tatraivāṁtaradhīyata
इस प्रकार नर का भी निरन्तर सत्कार करते हुए महेश्वर ने उसे ब्रह्मा को दिखाकर तत्क्षण वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 92 (skanda.5.4.92)
अथाब्रवीत्ततो ब्रह्मा अग्निं तं तु युगक्षये। स्पृशन्दक्षिणवामाभ्यां सांत्वयन्निव तं गिरा
athābravīttato brahmā agniṁ taṁ tu yugakṣaye| spṛśandakṣiṇavāmābhyāṁ sāṁtvayanniva taṁ girā
तत्पश्चात् ब्रह्मा ने युगक्षय के समय उस अग्नि को दाहिने-बाएँ हाथों से स्पर्श करते हुए, मानो वाणी से सान्त्वना देते हुए कहा।
श्लोक 93 (skanda.5.4.93)
भृगुश्चैवांगिराः पुत्रौ भवितारौ न संशयः। अत्रैव मम भवतां वंशे विख्यातकर्मणौ
bhṛguścaivāṁgirāḥ putrau bhavitārau na saṁśayaḥ| atraiva mama bhavatāṁ vaṁśe vikhyātakarmaṇau
'भृगु और अंगिरा, निःसंशय, यहीं इसी हमारे वंश में, विख्यातकर्मा दो पुत्र होंगे।'
श्लोक 94 (skanda.5.4.94)
द्विधा संभज्य तेनाग्निं सृष्टेर्यज्ञो भविष्यति। भवंतौ तिष्ठतस्तत्र पृथिव्यां दानमाश्रितौ
dvidhā saṁbhajya tenāgniṁ sṛṣṭeryajño bhaviṣyati| bhavaṁtau tiṣṭhatastatra pṛthivyāṁ dānamāśritau
'उस अग्नि को दो भागों में विभक्त कर सृष्टि का यज्ञ सम्पन्न होगा; तुम दोनों वहाँ पृथ्वी पर दानाश्रित होकर स्थित रहोगे।'
श्लोक 95 (skanda.5.4.95)
ब्रह्मणाऽग्नी समेतौ तु ब्रह्माणमनुनोदितौ। तस्मादेवं विधातव्यौ निर्मथ्य विधिपूर्वकम्
brahmaṇā'gnī sametau tu brahmāṇamanunoditau| tasmādevaṁ vidhātavyau nirmathya vidhipūrvakam
ब्रह्मा द्वारा संयुक्त हुई वे दोनों अग्नियाँ, ब्रह्मा द्वारा ही प्रेरित होकर, इस प्रकार विधिपूर्वक मन्थन द्वारा उत्पन्न करने योग्य ठहरीं।
श्लोक 96 (skanda.5.4.96)
अतोऽश्वत्थे शमीगर्भे संयोगस्तत्र पठ्यते। भार्गवांगिरसश्चैव द्विविधो दैव उच्यते
ato'śvatthe śamīgarbhe saṁyogastatra paṭhyate| bhārgavāṁgirasaścaiva dvividho daiva ucyate
इसीलिए अश्वत्थ तथा शमी वृक्ष में उनका संयोग कहा गया है; भार्गव तथा आंगिरस—इस प्रकार दैव अग्नि दो प्रकार की कही जाती है।
श्लोक 97 (skanda.5.4.97)
तस्मात्सुतहितः श्रेष्ठश्चतुर्थ इति कथ्यते। एवं व्यास समुत्पन्नो नरोऽसौ पूर्वजन्मनि
tasmātsutahitaḥ śreṣṭhaścaturtha iti kathyate| evaṁ vyāsa samutpanno naro'sau pūrvajanmani
इसलिए जो पुत्रों के लिए हितकारी है, वह श्रेष्ठ चतुर्थ कहा जाता है। हे व्यास, इस प्रकार वह नर पूर्वजन्म में उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 98 (skanda.5.4.98)
एवं तु ब्रह्मणो वक्त्रं पञ्चमं समपद्यत
evaṁ tu brahmaṇo vaktraṁ pañcamaṁ samapadyata
इस प्रकार ब्रह्मा का वह पंचम मुख उत्पन्न हुआ।
श्लोक 99 (skanda.5.4.99)
एतद्यो बुध्यते देव तेजःसर्गमनुत्तमम्। ब्रह्मणो याति सालोक्यं शांतो दांतो जितेन्द्रियः
etadyo budhyate deva tejaḥsargamanuttamam| brahmaṇo yāti sālokyaṁ śāṁto dāṁto jitendriyaḥ
हे देव, जो इस अनुपम तेजःसृष्टि को समझता है, वह शान्त, दान्त तथा जितेन्द्रिय होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक 100 (skanda.5.4.100)
एतद्योग्निसमुद्भवं पशुपतेर्माहात्म्यसंसूचकं वह्नेः साधुमतिः शृणोति सततं यः श्रद्धया भावितम्। यो व्यास द्विजदेवताप्रमुखतः संश्रावयेद्भक्तितः सोऽत्यर्थं भवभावितः शिवपुरे संपूज्यते दैवतैः
etadyognisamudbhavaṁ paśupatermāhātmyasaṁsūcakaṁ vahneḥ sādhumatiḥ śṛṇoti satataṁ yaḥ śraddhayā bhāvitam| yo vyāsa dvijadevatāpramukhataḥ saṁśrāvayedbhaktitaḥ so'tyarthaṁ bhavabhāvitaḥ śivapure saṁpūjyate daivataiḥ
हे व्यास, जो सद्बुद्धि पुरुष अग्नि की इस उत्पत्ति-कथा को, जो पशुपति के माहात्म्य की सूचक है, सदा श्रद्धापूर्वक सुनता है, तथा जो भक्तिपूर्वक इसे द्विजों और देवताओं के समक्ष सुनाता है, वह अत्यन्त भवभावित पुरुष शिवपुर में देवताओं द्वारा सम्मानित होता है।