नागर खण्ड · अध्याय 223
श्राद्धार्ह-अनर्ह ब्राह्मण एवं पुत्रादि का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.223.1)
भर्तृयज्ञ उवाच श्राद्धार्हैर्ब्राह्मणैः कार्यं श्राद्धं दर्शे तु पार्वणम् विपरीतं न कर्तव्यं श्राद्धमेकं कथंचन
bhartṛyajña uvāca śrāddhārhairbrāhmaṇaiḥ kāryaṁ śrāddhaṁ darśe tu pārvaṇam viparītaṁ na kartavyaṁ śrāddhamekaṁ kathaṁcana
भर्तृयज्ञ ने कहा — अमावस्या को पार्वण श्राद्ध श्राद्ध के योग्य ब्राह्मणों द्वारा ही करना चाहिए; इसके विपरीत कभी भी एक [अकेला] श्राद्ध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.6.223.2)
जारजातापविद्धाद्यैर्यो नरः श्राद्धमाचरेत् ब्राह्मणैस्तु न संदेहस्तच्छ्राद्धं व्यर्थतां व्रजेत्
jārajātāpaviddhādyairyo naraḥ śrāddhamācaret brāhmaṇaistu na saṁdehastacchrāddhaṁ vyarthatāṁ vrajet
जो मनुष्य व्यभिचार से उत्पन्न, त्यक्त आदि [दोषयुक्त] ब्राह्मणों से श्राद्ध कराता है, उसका वह श्राद्ध निःसंदेह व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.223.3)
आनर्त उवाच भयं मे सुमहज्जातमत्र यत्परिकीर्तितम् जारजातापविद्धैस्तु यच्छ्राद्धं व्यर्थतां व्रजेत्
ānarta uvāca bhayaṁ me sumahajjātamatra yatparikīrtitam jārajātāpaviddhaistu yacchrāddhaṁ vyarthatāṁ vrajet
अनर्त ने कहा — यह सुनकर मुझे बड़ा भय हुआ, कि व्यभिचारजात तथा त्यक्त ब्राह्मणों से किया गया श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.6.223.4)
मनुना द्वादश प्रोक्ताः किल पुत्रा महामते अपुत्राणां च पुत्रत्वं ये कुर्वंति सदैव हि
manunā dvādaśa proktāḥ kila putrā mahāmate aputrāṇāṁ ca putratvaṁ ye kurvaṁti sadaiva hi
हे महामते! मनु ने बारह प्रकार के पुत्र बताए हैं, जो निःसंतानों के लिए सदा पुत्र का कार्य करते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.223.5)
औरसः क्षेत्रजश्चैव क्रयक्रीतश्च पालितः प्रतिपन्नः सहोढश्च कानीनश्चापि सत्तम
aurasaḥ kṣetrajaścaiva krayakrītaśca pālitaḥ pratipannaḥ sahoḍhaśca kānīnaścāpi sattama
हे सत्तम! औरस, क्षेत्रज, क्रय से खरीदा हुआ, पालित, प्रतिपन्न, सहोढ तथा कानीन —
श्लोक 6 (skanda.6.223.6)
तथान्यौ कुण्डगोलौ च पुत्रावपि प्रकीर्तितौ
tathānyau kuṇḍagolau ca putrāvapi prakīrtitau
तथा कुंड और गोल नामक दो अन्य पुत्र भी बताए गए हैं।
श्लोक 7 (skanda.6.223.7)
शिष्यश्च रक्षितो मृत्योस्तथाश्वत्थो वनांतिगः किमेते नैव कथिता यत्त्वमेवं प्रजल्पसि
śiṣyaśca rakṣito mṛtyostathāśvattho vanāṁtigaḥ kimete naiva kathitā yattvamevaṁ prajalpasi
शिष्य, मृत्यु से बचाया हुआ [रक्षित], तथा अश्वत्थ [वन में त्यागकर पुनः पाया गया] — क्या ये सब [योग्य पुत्रों में] नहीं गिने गए, कि आप इस प्रकार कह रहे हैं?
श्लोक 8 (skanda.6.223.8)
भर्तृयज्ञ उवाच सत्यमेतन्महाभाग सर्वे ते धर्मतः सुताः परं युगत्रये प्रोक्ता न कलौ कलुषापहाः
bhartṛyajña uvāca satyametanmahābhāga sarve te dharmataḥ sutāḥ paraṁ yugatraye proktā na kalau kaluṣāpahāḥ
भर्तृयज्ञ ने कहा — हे महाभाग! यह सत्य है, वे सभी धर्मतः पुत्र माने गए हैं; किंतु यह विधान तीन युगों के लिए कहा गया है, कलियुग में वे पापनाशक नहीं हैं।
श्लोक 9 (skanda.6.223.9)
तदर्थं तेषु सन्तानं तावन्मात्रं युगेयुगे सत्त्वाढ्यानां च लोकानां न कलौ चाल्पमेधसाम्
tadarthaṁ teṣu santānaṁ tāvanmātraṁ yugeyuge sattvāḍhyānāṁ ca lokānāṁ na kalau cālpamedhasām
इसलिए ये प्रत्येक युग में उतने ही मात्र में मान्य हैं; सत्वगुण से समृद्ध लोगों के लिए, न कि कलियुग के अल्पबुद्धि लोगों के लिए।
श्लोक 10 (skanda.6.223.10)
कलावेव समाख्यातो व्यवहारः प्रपा तदः अल्पसत्त्वा यतो लोकास्तेन चैष विधिः स्मृतः
kalāveva samākhyāto vyavahāraḥ prapā tadaḥ alpasattvā yato lokāstena caiṣa vidhiḥ smṛtaḥ
कलियुग में तो केवल व्यवहार [के आधार पर विधि] बताई गई है, क्योंकि इसमें लोग अल्पसत्व वाले हैं, इसीलिए यह विधान स्मरण किया गया है।
श्लोक 11 (skanda.6.223.11)
अत्र यः संकरं कुर्याद्योनेस्तस्य फलं शृणु ब्राह्मण्यां ब्राह्मणात्पुत्रो ब्रह्मघ्नः संप्रजायते
atra yaḥ saṁkaraṁ kuryādyonestasya phalaṁ śṛṇu brāhmaṇyāṁ brāhmaṇātputro brahmaghnaḥ saṁprajāyate
जो कोई इस [नियम में] वर्ण-संकर करता है, उसका फल सुनो — ब्राह्मणी से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न पुत्र [यदि अनुचित रीति से उत्पन्न हो तो] ब्रह्महत्यारा बन जाता है।
श्लोक 12 (skanda.6.223.12)
सर्वाधमानामधमो यो वारड इति स्मृतः
sarvādhamānāmadhamo yo vāraḍa iti smṛtaḥ
जो सबसे अधम माना गया है, वह 'वारड' कहा गया है।
श्लोक 13 (skanda.6.223.13)
क्षत्रियाच्च तथा सूतो वैश्यान्मागध एव च शूद्रात्तथांत्यजः प्रोक्तस्तेनैते वर्जिताः सुताः
kṣatriyācca tathā sūto vaiśyānmāgadha eva ca śūdrāttathāṁtyajaḥ proktastenaite varjitāḥ sutāḥ
क्षत्रिय से [अनुचित संतान] सूत कहलाता है, वैश्य से मागध, तथा शूद्र से अंत्यज कहा गया है — इसीलिए ये पुत्र वर्जित हैं।
श्लोक 14 (skanda.6.223.14)
एतेषामपि निर्दिष्टाः सप्त राजन्सुपुत्रकाः पंच वंशविनाशाय पूर्वेषां पातनाय च
eteṣāmapi nirdiṣṭāḥ sapta rājansuputrakāḥ paṁca vaṁśavināśāya pūrveṣāṁ pātanāya ca
हे राजन्! इनमें भी सात प्रकार के सुपुत्र निर्दिष्ट हैं, तथा पाँच प्रकार वंश के विनाश और पूर्वजों के पतन के कारण हैं।
श्लोक 15 (skanda.6.223.15)
औरसः प्रतिपन्नश्च क्रीतः पालित एव च शिष्यश्च दत्तजीवश्च तथाश्वत्थश्च सप्तमः
aurasaḥ pratipannaśca krītaḥ pālita eva ca śiṣyaśca dattajīvaśca tathāśvatthaśca saptamaḥ
औरस, प्रतिपन्न, क्रीत, पालित, शिष्य, दत्तजीव तथा सातवाँ अश्वत्थ —
श्लोक 16 (skanda.6.223.16)
पुंनाम्नो नरकाद्घोराद्रक्षंति च सदा हि ते पतन्तं पुरुषं तत्र तेन ते शोभनाः स्मृताः
puṁnāmno narakādghorādrakṣaṁti ca sadā hi te patantaṁ puruṣaṁ tatra tena te śobhanāḥ smṛtāḥ
— ये सदा 'पुम्' नामक घोर नरक में गिरते हुए पुरुष की रक्षा करते हैं; इसीलिए ये शुभ माने गए हैं।
श्लोक 17 (skanda.6.223.17)
क्षेत्रजश्च सहोढश्च कानीनः कुण्डगोलकौ पंचैते पातयंतिस्म पितॄन्स्वर्गगतानपि
kṣetrajaśca sahoḍhaśca kānīnaḥ kuṇḍagolakau paṁcaite pātayaṁtisma pitṝnsvargagatānapi
क्षेत्रज, सहोढ, कानीन, तथा कुंड और गोल — ये पाँच स्वर्गस्थ पितरों को भी नीचे गिरा देते हैं।
श्लोक 18 (skanda.6.223.18)
एतस्मात्कारणाच्छ्राद्धं जारजातस्य तद्वृथा
etasmātkāraṇācchrāddhaṁ jārajātasya tadvṛthā
इसी कारण जारज [व्यभिचार से उत्पन्न] का श्राद्ध व्यर्थ होता है।