नागर खण्ड · अध्याय 278
द्वादश आदित्य एवं याज्ञवल्क्य का वृत्तांत
श्लोक 1 (skanda.6.278.1)
सूत उवाच ये चान्ये भास्करा स्तत्र संति ब्राह्मणसत्तमाः हाटकेश्वरजे क्षेत्रे याज्ञवल्क्यप्रतिष्ठिताः
sūta uvāca ye cānye bhāskarā statra saṁti brāhmaṇasattamāḥ hāṭakeśvaraje kṣetre yājñavalkyapratiṣṭhitāḥ
सूत जी ने कहा — हे ब्राह्मणसत्तमो, हाटकेश्वर क्षेत्र में याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापित अन्य भास्कर (सूर्य) भी वहाँ विद्यमान हैं।
श्लोक 2 (skanda.6.278.2)
यस्तान्पूजयते भक्त्या हृदि कृत्वाऽभिवांछितान् सप्तम्यां चैव सप्तम्यां लभते नात्र संशयः
yastānpūjayate bhaktyā hṛdi kṛtvā'bhivāṁchitān saptamyāṁ caiva saptamyāṁ labhate nātra saṁśayaḥ
जो कोई भक्तिपूर्वक हृदय में अभीष्ट धारण कर उनकी पूजा करता है, वह प्रत्येक सप्तमी को निःसंदेह उसे प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 3 (skanda.6.278.3)
ऋषय उचुः एक एव स्थितः सूर्यो दृश्यते च नभस्तले तत्कथं द्वादशैते च तत्र क्षेत्रे प्रतिष्ठिताः कस्मिन्काले तथा कृत्ये किमर्थं सूतनन्दन
ṛṣaya ucuḥ eka eva sthitaḥ sūryo dṛśyate ca nabhastale tatkathaṁ dvādaśaite ca tatra kṣetre pratiṣṭhitāḥ kasminkāle tathā kṛtye kimarthaṁ sūtanandana
ऋषियों ने कहा — आकाश में तो एक ही सूर्य स्थित दिखाई देते हैं; फिर ये बारह उस क्षेत्र में कैसे प्रतिष्ठित हुए? हे सूतनन्दन, किस काल में, किस कार्य से, किस प्रयोजन से?
श्लोक 4 (skanda.6.278.4)
सूत उवाच आसीत्पूर्वं कृतिर्नाम शुनःशेपसमुद्भवः
sūta uvāca āsītpūrvaṁ kṛtirnāma śunaḥśepasamudbhavaḥ
सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में शुनःशेप से उत्पन्न कृति नामक एक ऋषि थे।
श्लोक 5 (skanda.6.278.5)
तस्य पुत्रः शुनः पुत्रो बभूव मुनिसत्तमः चारायणः सुतस्तस्य वभूव मुनिसत्तमः
tasya putraḥ śunaḥ putro babhūva munisattamaḥ cārāyaṇaḥ sutastasya vabhūva munisattamaḥ
उनके पुत्र मुनिसत्तम शुनःपुत्र हुए; उनके पुत्र मुनिसत्तम चारायण हुए।
श्लोक 6 (skanda.6.278.6)
कस्यचित्त्वथ कालस्य ब्रह्मा लोक पितामहः सावित्रीशापनिर्दग्धो ह्यवतीर्णो धरातले
kasyacittvatha kālasya brahmā loka pitāmahaḥ sāvitrīśāpanirdagdho hyavatīrṇo dharātale
कुछ समय बाद लोकपितामह ब्रह्मा, सावित्री के शाप से दग्ध होकर, पृथ्वीतल पर अवतरित हुए।
श्लोक 7 (skanda.6.278.7)
गायत्री च यदा विप्रास्तेनोढा यज्ञकर्मणि प्राक्स्थितां च परित्यज्य सर्वदेवसमागमे कालात्ययो भवेन्नैव सावित्र्यागमने स्थिरे
gāyatrī ca yadā viprāstenoḍhā yajñakarmaṇi prāksthitāṁ ca parityajya sarvadevasamāgame kālātyayo bhavennaiva sāvitryāgamane sthire
हे विप्रो, जब यज्ञकर्म में गायत्री का विवाह उन्होंने किया — क्योंकि सावित्री को पहले ही छोड़कर, समस्त देवताओं के एकत्र हो जाने पर, सावित्री के आने की प्रतीक्षा में शुभ मुहूर्त बीत न जाए...
श्लोक 8 (skanda.6.278.8)
ततस्तस्य समादेशाद्गायत्री गोपकन्यका शक्रेण च समानीता दिव्यलक्षणलक्षिता
tatastasya samādeśādgāyatrī gopakanyakā śakreṇa ca samānītā divyalakṣaṇalakṣitā
...तब उन्हीं के आदेश से इन्द्र द्वारा गोप-कन्या गायत्री, जो दिव्य लक्षणों से युक्त थी, लाई गई।
श्लोक 9 (skanda.6.278.9)
गोपकन्यां च तां ज्ञात्वा गोश्च वक्त्रेण पद्मजः प्रवेश्याकर्षयामास गुह्येन च ततः परम्
gopakanyāṁ ca tāṁ jñātvā gośca vaktreṇa padmajaḥ praveśyākarṣayāmāsa guhyena ca tataḥ param
उसे गोप-कन्या जानकर, पद्मजन्मा ब्रह्मा ने उसे गाय के मुख से प्रवेश कराकर तत्पश्चात उसके गुह्य भाग से बाहर निकाला।
श्लोक 10 (skanda.6.278.10)
ब्राह्मणानां गवां चैव कुलमेकं द्विधा स्थितम् एकत्र मन्त्रास्तिष्ठंति हविरेकत्र संस्थितम्
brāhmaṇānāṁ gavāṁ caiva kulamekaṁ dvidhā sthitam ekatra mantrāstiṣṭhaṁti havirekatra saṁsthitam
ब्राह्मणों और गौओं का कुल एक ही है, केवल दो भागों में विभाजित है — एक में मंत्र स्थित हैं, दूसरे में हवि।
श्लोक 11 (skanda.6.278.11)
तेन तां ब्राह्मणीं कृत्वा पश्चात्तस्याः परिग्रहम् गृह्योक्तविधिना चक्रे पुरःस्थोऽपि पितामहः
tena tāṁ brāhmaṇīṁ kṛtvā paścāttasyāḥ parigraham gṛhyoktavidhinā cakre puraḥstho'pi pitāmahaḥ
इस प्रकार उसे ब्राह्मणी बनाकर, वहीं उपस्थित पितामह ने गृह्यसूत्रोक्त विधि से उसका पाणिग्रहण किया।
श्लोक 12 (skanda.6.278.12)
पत्नीशालोपविष्टायां ततस्तस्यां द्विजोत्तमाः सावित्री समनुप्राप्ता देवपत्नीभिरावृता
patnīśālopaviṣṭāyāṁ tatastasyāṁ dvijottamāḥ sāvitrī samanuprāptā devapatnībhirāvṛtā
हे द्विजोत्तमो, जब वह पत्नीशाला में विराजमान थी, तभी देवपत्नियों से घिरी हुई सावित्री वहाँ आ पहुँचीं।
श्लोक 13 (skanda.6.278.13)
ततस्तां सा समालोक्य रशनासमलंकृताम् दौर्भाग्यदुःखमापन्ना शशाप च विधिं ततः
tatastāṁ sā samālokya raśanāsamalaṁkṛtām daurbhāgyaduḥkhamāpannā śaśāpa ca vidhiṁ tataḥ
तब उन्हें कंकण आदि से अलंकृत देखकर, दुर्भाग्य के दुःख से व्याकुल होकर, उन्होंने विधि (ब्रह्मा) को शाप दिया।
श्लोक 14 (skanda.6.278.14)
सावित्र्युवाच यस्मात्त्वया परित्यक्ता निर्दोषाहं पितामह पितामहोऽसि मे नूनमद्यप्रभृति संगमे
sāvitryuvāca yasmāttvayā parityaktā nirdoṣāhaṁ pitāmaha pitāmaho'si me nūnamadyaprabhṛti saṁgame
सावित्री ने कहा — हे पितामह, चूँकि आपने मुझ निर्दोष को त्याग दिया है, अतः आज से आप मेरे संगम में निश्चय ही केवल एक 'पितामह' मात्र रह जाएँगे।
श्लोक 15 (skanda.6.278.15)
मनुष्याणां भवेत्कृत्यमन्यनारीपरिग्रहः एतत्त्वया कृतं यस्मान्मा नुषस्त्वं भविष्यसि
manuṣyāṇāṁ bhavetkṛtyamanyanārīparigrahaḥ etattvayā kṛtaṁ yasmānmā nuṣastvaṁ bhaviṣyasi
'अन्य स्त्री का ग्रहण साधारण मनुष्यों का कृत्य है; आपने यह किया है, अतः आप भी (उन्हीं के समान) मनुष्यत्व को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 16 (skanda.6.278.16)
कामार्तश्च विशेषेण मम वाक्यादसंशयम्
kāmārtaśca viśeṣeṇa mama vākyādasaṁśayam
'तथा मेरे वचन से निःसंदेह विशेष रूप से काम से पीड़ित रहेंगे।'
श्लोक 17 (skanda.6.278.17)
एवमुक्त्वा तु सावित्री त्यक्त्वा तं यज्ञमंडपम् गिरेः शिखरमारूढा तपश्चक्रे महत्ततः
evamuktvā tu sāvitrī tyaktvā taṁ yajñamaṁḍapam gireḥ śikharamārūḍhā tapaścakre mahattataḥ
ऐसा कहकर सावित्री ने उस यज्ञमंडप को त्यागकर पर्वत के शिखर पर चढ़कर वहाँ महान तप किया।
श्लोक 18 (skanda.6.278.18)
पितामहोऽपि तच्छापाच्चारायणनिवेशने अवतीर्णो धरापृष्ठे कालेन महता ततः
pitāmaho'pi tacchāpāccārāyaṇaniveśane avatīrṇo dharāpṛṣṭhe kālena mahatā tataḥ
पितामह भी उस शाप के कारण, दीर्घकाल बाद, चारायण के घर में पृथ्वीतल पर अवतरित हुए।
श्लोक 19 (skanda.6.278.19)
स यदा यौवनं भेजे मानुषं च पुरा स्थितः तथातथा च तापेन कामोत्थेन प्रपीड्यते
sa yadā yauvanaṁ bheje mānuṣaṁ ca purā sthitaḥ tathātathā ca tāpena kāmotthena prapīḍyate
पूर्वकाल में मनुष्य-रूप में स्थित होकर जब उन्होंने यौवन प्राप्त किया, तब वे उत्तरोत्तर काम से उत्पन्न ताप से पीड़ित होने लगे।
श्लोक 20 (skanda.6.278.20)
ततोऽसौ वीक्षते नारीं कन्यां वाथ तपस्विनीम् अविकल्पमना भेजे रूपसौभाग्यगर्वितः
tato'sau vīkṣate nārīṁ kanyāṁ vātha tapasvinīm avikalpamanā bheje rūpasaubhāgyagarvitaḥ
तब वे जिस भी स्त्री को देखते — चाहे कन्या हो या तपस्विनी — रूप और सौभाग्य के गर्व से युक्त होकर बिना संकोच उसका सेवन कर लेते।
श्लोक 21 (skanda.6.278.21)
ततस्तं ब्यसनार्तं च दृष्ट्वा चारायणो मुनिः स्वयं निःसारयामास प्रकोपेन निजाश्रमात्
tatastaṁ byasanārtaṁ ca dṛṣṭvā cārāyaṇo muniḥ svayaṁ niḥsārayāmāsa prakopena nijāśramāt
तब उन्हें इस व्यसन से पीड़ित देखकर मुनि चारायण ने स्वयं क्रोधित होकर उन्हें अपने आश्रम से निकाल दिया।
श्लोक 22 (skanda.6.278.22)
स च पित्रा परित्यक्तो भ्रममाणस्ततस्ततः चमत्कारपुरं प्राप्तः शाकल्यो यत्र तिष्ठति
sa ca pitrā parityakto bhramamāṇastatastataḥ camatkārapuraṁ prāptaḥ śākalyo yatra tiṣṭhati
पिता द्वारा त्यागे जाने पर वे इधर-उधर भटकते हुए चमत्कारपुर पहुँचे, जहाँ शाकल्य निवास करते थे।
श्लोक 23 (skanda.6.278.23)
नाम्ना ब्राह्मणशार्दूलो नागरो वेदपारगः वृतः शिष्य सहस्रेण वेदविद्यां प्रचारयन्
nāmnā brāhmaṇaśārdūlo nāgaro vedapāragaḥ vṛtaḥ śiṣya sahasreṇa vedavidyāṁ pracārayan
...ब्राह्मणश्रेष्ठ, नागर, वेदपारंगत, सहस्र शिष्यों से घिरे, वेदविद्या का प्रचार करते हुए।
श्लोक 24 (skanda.6.278.24)
अथ तं स प्रणम्योच्चैः शिष्यत्वं समुपागतः वेदाध्ययनसंपन्नो बभूवाथ चिरादपि
atha taṁ sa praṇamyoccaiḥ śiṣyatvaṁ samupāgataḥ vedādhyayanasaṁpanno babhūvātha cirādapi
तब उन्हें उच्च स्वर में प्रणाम कर वे शिष्यत्व को प्राप्त हुए, तथा दीर्घकाल बाद वेदाध्ययन-सम्पन्न हो गए।
श्लोक 25 (skanda.6.278.25)
एतस्मिन्नेव काले नु आनर्ताधिपतिः स्वयम् आगतस्तिष्ठते यत्र जलशायी हरिः स्वयम्
etasminneva kāle nu ānartādhipatiḥ svayam āgatastiṣṭhate yatra jalaśāyī hariḥ svayam
उसी समय आनर्ताधिपति स्वयं वहाँ आए, जहाँ स्वयं जलशायी हरि विराजमान हैं।
श्लोक 26 (skanda.6.278.26)
चातुर्मास्यव्रतं तेन गृहीतं तत्पुरस्तदा प्रार्थितस्तु ततो विप्राः शाकल्यस्तैन भूभुजा
cāturmāsyavrataṁ tena gṛhītaṁ tatpurastadā prārthitastu tato viprāḥ śākalyastaina bhūbhujā
उन्होंने वहाँ चातुर्मास्य-व्रत ग्रहण किया; तब उस राजा ने विप्र शाकल्य से प्रार्थना की।
श्लोक 27 (skanda.6.278.27)
शांतिकं पौष्टिकं नित्यं त्वया कार्यं ममालये यावत्तिष्ठाम्यहं चात्र प्रसादः क्रियतामिति
śāṁtikaṁ pauṣṭikaṁ nityaṁ tvayā kāryaṁ mamālaye yāvattiṣṭhāmyahaṁ cātra prasādaḥ kriyatāmiti
'जब तक मैं यहाँ रहूँ, तब तक शांतिक-पौष्टिक कर्म आप मेरे भवन में नित्य करें — यह कृपा कीजिए।'
श्लोक 28 (skanda.6.278.28)
बाढमित्येव स प्रोक्त्वा दाक्षिण्येन द्विजोत्तमाः एकैकं प्रेषयामास स्वशिष्यं तस्य मंदिरे
bāḍhamityeva sa proktvā dākṣiṇyena dvijottamāḥ ekaikaṁ preṣayāmāsa svaśiṣyaṁ tasya maṁdire
हे द्विजोत्तमो, 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर सौजन्यवश उन्होंने अपने-अपने शिष्य को एक-एक कर उसके भवन में भेजा।
श्लोक 29 (skanda.6.278.29)
स शांतिकं विधायाथ दत्त्वाशीः पार्थिवस्य च संप्राप्य दक्षिणां तस्मात्पुनरेति च तं द्विजम्
sa śāṁtikaṁ vidhāyātha dattvāśīḥ pārthivasya ca saṁprāpya dakṣiṇāṁ tasmātpunareti ca taṁ dvijam
वह शांतिक कर्म कर, राजा को आशीर्वाद देकर, दक्षिणा प्राप्त कर, उन्हीं गुरु के पास पुनः लौट आता।
श्लोक 30 (skanda.6.278.30)
शाकल्याय च तां दत्त्वा दक्षिणां निजमंदिरे जगाम नित्यमेवं हि व्यवहारो व्यवस्थितः
śākalyāya ca tāṁ dattvā dakṣiṇāṁ nijamaṁdire jagāma nityamevaṁ hi vyavahāro vyavasthitaḥ
वह दक्षिणा शाकल्य को देकर अपने घर लौट जाता; इस प्रकार यह व्यवहार नित्य चलता रहा।
श्लोक 31 (skanda.6.278.31)
अन्यस्मिन्नहनि प्राप्ते शाकल्येन विसर्जितः शांत्यर्थं याज्ञवल्क्यस्तु पार्थिवस्यनिवेशनम्
anyasminnahani prāpte śākalyena visarjitaḥ śāṁtyarthaṁ yājñavalkyastu pārthivasyaniveśanam
एक अन्य दिन शाकल्य ने शांति हेतु याज्ञवल्क्य को राजभवन भेजा।
श्लोक 32 (skanda.6.278.32)
तस्य भूपस्य रूपाढया मंथरास्ति विलासिनी रात्रौ च कामिता तेन कामाढयेन सुकामिनी
tasya bhūpasya rūpāḍhayā maṁtharāsti vilāsinī rātrau ca kāmitā tena kāmāḍhayena sukāminī
उस राजा की मंथरा नामक अत्यंत रूपवती विलासिनी थी; रात्रि में कामासक्त उस राजा ने उस सुकामिनी के साथ रमण किया था।
श्लोक 33 (skanda.6.278.33)
भावैर्वात्स्यायनप्रोक्तैः समालिंगनपूर्वकैः स तया विविधैः कृत्तो मयूरपदकादिभिः शरीरे चाधरे चैव तथा मणिप्रवालकैः
bhāvairvātsyāyanaproktaiḥ samāliṁganapūrvakaiḥ sa tayā vividhaiḥ kṛtto mayūrapadakādibhiḥ śarīre cādhare caiva tathā maṇipravālakaiḥ
वात्स्यायन-कथित विविध भावों से, आलिंगन आदि से, मयूरपद आदि विविध चिह्नों से उसके शरीर और अधर पर, तथा मणि-प्रवाल आभूषणों से भी वे चिह्नित हुए थे।
श्लोक 34 (skanda.6.278.34)
संप्राप्तोऽध्ययनार्थाय यावच्छाकल्यसन्निधौ तावत्संप्रेषितस्तेन शांत्यर्थं भूपमंदिरे
saṁprāpto'dhyayanārthāya yāvacchākalyasannidhau tāvatsaṁpreṣitastena śāṁtyarthaṁ bhūpamaṁdire
अध्ययन हेतु शाकल्य के समीप वे (याज्ञवल्क्य) पहुँचे ही थे कि उन्हें शांतिक हेतु राजभवन भेज दिया गया।
श्लोक 35 (skanda.6.278.35)
सोऽपि संप्रेषितस्तेन गत्वा तं पार्थिवालयम् शांतिकं च ततश्चक्रे यथोक्तविधिना द्विजाः
so'pi saṁpreṣitastena gatvā taṁ pārthivālayam śāṁtikaṁ ca tataścakre yathoktavidhinā dvijāḥ
हे विप्रो, उनके द्वारा भेजे जाने पर वे भी उस राजभवन में जाकर यथोक्त विधि से शांतिक कर्म करने लगे।
श्लोक 36 (skanda.6.278.36)
शांतिकस्यावसाने तु प्रगृह्य कलशोदकम् पंचांगैः कल्पितं रुद्रैः स्वयमेवाभिमंत्रितैः
śāṁtikasyāvasāne tu pragṛhya kalaśodakam paṁcāṁgaiḥ kalpitaṁ rudraiḥ svayamevābhimaṁtritaiḥ
शांतिक कर्म के अंत में, स्वयं ही अभिमंत्रित पंचांग-सहित रुद्र-मंत्रों से कलश-जल ग्रहण कर...
श्लोक 37 (skanda.6.278.37)
साक्षतं सुमनोयुक्तं समादाय गतस्ततः संतिष्ठते नृपो यत्र आनर्तो त्रतसंयुतः
sākṣataṁ sumanoyuktaṁ samādāya gatastataḥ saṁtiṣṭhate nṛpo yatra ānarto tratasaṁyutaḥ
...अक्षत और पुष्प सहित लेकर वे वहाँ गए, जहाँ व्रतयुक्त आनर्त राजा स्थित थे।
श्लोक 38 (skanda.6.278.38)
द्यामालेखीति मंत्रं स प्रोच्चार्य विधिपूर्वकम् छंदर्षिसहितं चैव यावत्क्षिपति मस्तके तावन्निरीक्षितस्तेन नखलेखाविकर्तितः
dyāmālekhīti maṁtraṁ sa proccārya vidhipūrvakam chaṁdarṣisahitaṁ caiva yāvatkṣipati mastake tāvannirīkṣitastena nakhalekhāvikartitaḥ
छन्द-ऋषि सहित 'द्यामालेखि' मंत्र का विधिपूर्वक उच्चारण कर वे उसे राजा के मस्तक पर छिड़कने ही वाले थे, तभी नखों से खरोंचे हुए चिह्न से युक्त वह राजा उन्हें दिखाई दिया।
श्लोक 39 (skanda.6.278.39)
खंडितेनाधरेणैव ततोऽभूद्दुर्मना नृपः
khaṁḍitenādhareṇaiva tato'bhūddurmanā nṛpaḥ
अपना ही अधर खंडित देखकर राजा तभी अप्रसन्न हो गया।
श्लोक 40 (skanda.6.278.40)
विटप्रायं तु तं दृष्ट्वा मलिनांबरधारिणम् तं प्रोवाच विहस्योच्चै देहि विप्राऽक्षताञ्जलम्
viṭaprāyaṁ tu taṁ dṛṣṭvā malināṁbaradhāriṇam taṁ provāca vihasyoccai dehi viprā'kṣatāñjalam
उन्हें विट के समान, मलिन वस्त्रधारी देखकर, हँसते हुए उच्च स्वर में उसने कहा — 'हे विप्र, अपनी अक्षत-अंजलि उस लकड़ी को अर्पित करो...'
श्लोक 41 (skanda.6.278.41)
मंदुरायां स्थितं यच्च काष्ठमेतत्प्रदृश्यते याज्ञवल्क्यस्ततो दृष्ट्वा सकोपस्तमुपाद्रवत्
maṁdurāyāṁ sthitaṁ yacca kāṣṭhametatpradṛśyate yājñavalkyastato dṛṣṭvā sakopastamupādravat
'...जो अश्वशाला में खड़ी दिखाई दे रही है।' यह देखकर याज्ञवल्क्य क्रोधित होकर उसकी ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 42 (skanda.6.278.42)
क्षिप्त्वा तत्र जलं विप्राः साक्षतं गृहमागमत् अगृह्य दक्षिणां तस्य पार्थिवस्य यथास्थिताम्
kṣiptvā tatra jalaṁ viprāḥ sākṣataṁ gṛhamāgamat agṛhya dakṣiṇāṁ tasya pārthivasya yathāsthitām
हे विप्रो, अक्षत सहित उस पर जल छिड़ककर, उस राजा से यथावत रखी दक्षिणा लिए बिना ही वे घर लौट गए।
श्लोक 43 (skanda.6.278.43)
एतस्मिन्नंतरे तस्य धवकाष्ठस्य सर्वतः निष्क्रांता विविधाः शाखाः पल्लवैः समलंकृताः
etasminnaṁtare tasya dhavakāṣṭhasya sarvataḥ niṣkrāṁtā vividhāḥ śākhāḥ pallavaiḥ samalaṁkṛtāḥ
इसी बीच उस धव-काष्ठ से चारों ओर विविध शाखाएँ निकल आईं, कोमल पत्तों से सुशोभित।
श्लोक 44 (skanda.6.278.44)
तद्दृष्ट्वा विस्मितः सोऽथ आनर्ताधिपतिर्नृपः पश्चात्तापं परं चक्रे धिङ्मयैवमनुष्ठितम्
taddṛṣṭvā vismitaḥ so'tha ānartādhipatirnṛpaḥ paścāttāpaṁ paraṁ cakre dhiṅmayaivamanuṣṭhitam
यह देखकर विस्मित हुए वे आनर्ताधिपति राजा अत्यंत पश्चाताप करने लगे — 'धिक्कार है मुझे, जो मैंने ऐसा किया!'
श्लोक 45 (skanda.6.278.45)
स नूनं विबुधः कोऽपि विप्ररूपेण संगतः येनेदृशः प्रभावोऽयं तस्य मंत्रस्य संस्थितः
sa nūnaṁ vibudhaḥ ko'pi viprarūpeṇa saṁgataḥ yenedṛśaḥ prabhāvo'yaṁ tasya maṁtrasya saṁsthitaḥ
'यह निश्चय ही कोई देवता ब्राह्मण-रूप में आया होगा, जिससे उसके मंत्र का ऐसा प्रभाव स्थित है।'
श्लोक 46 (skanda.6.278.46)
यद्यहं प्रतिगृह्णामि तस्य मन्त्रोदितं जलम् जरामरणहीनस्तु तद्भवाभि न संशयः
yadyahaṁ pratigṛhṇāmi tasya mantroditaṁ jalam jarāmaraṇahīnastu tadbhavābhi na saṁśayaḥ
'यदि मैं उसका वह मंत्रोक्त जल स्वीकार कर लूँ, तो निश्चय ही मैं जरा-मरण-रहित हो जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं।'
श्लोक 47 (skanda.6.278.47)
एवं चिंतयतस्तस्य तद्दिनं विस्मितस्य च पार्थिवस्य द्विजश्रेष्ठा जातं वर्षशतोपमम्
evaṁ ciṁtayatastasya taddinaṁ vismitasya ca pārthivasya dvijaśreṣṭhā jātaṁ varṣaśatopamam
हे द्विजश्रेष्ठो, इस प्रकार सोचते हुए उस विस्मित राजा के लिए वह दिन सौ वर्षों के समान हो गया।
श्लोक 48 (skanda.6.278.48)
दिवसे तु समाक्रांते कथंचित्तस्य भूपतेः विभावरी क्षयं याति कथंचिन्नैव शारदी
divase tu samākrāṁte kathaṁcittasya bhūpateḥ vibhāvarī kṣayaṁ yāti kathaṁcinnaiva śāradī
उस राजा का वह दिन किसी प्रकार बीत तो गया, किन्तु शरद ऋतु की वह रात्रि किसी भी प्रकार क्षीण होती प्रतीत नहीं हुई।
श्लोक 49 (skanda.6.278.49)
ततः प्रभातसमये समुत्थाय महीपतिः आह्वयामास शाकल्यं पुरुषैराप्तकारिभिः
tataḥ prabhātasamaye samutthāya mahīpatiḥ āhvayāmāsa śākalyaṁ puruṣairāptakāribhiḥ
तब प्रातःकाल उठकर राजा ने विश्वसनीय पुरुषों द्वारा शाकल्य को बुलवाया।
श्लोक 50 (skanda.6.278.50)
ततः प्रोवाच विनयात्सादरं प्रांजलिः स्थितः कल्ये शिष्यः समायातो यस्त्वदीयो ममांतिकम्
tataḥ provāca vinayātsādaraṁ prāṁjaliḥ sthitaḥ kalye śiṣyaḥ samāyāto yastvadīyo mamāṁtikam
तब हाथ जोड़े विनम्रतापूर्वक खड़े होकर उसने कहा — 'कल आपका जो शिष्य मेरे पास आया था...'
श्लोक 51 (skanda.6.278.51)
शांत्यर्थं प्रेषणीयस्तु सोऽद्यापि च द्विजोत्तम तस्योपरि परा भक्तिर्मम जाताऽद्य केवलम्
śāṁtyarthaṁ preṣaṇīyastu so'dyāpi ca dvijottama tasyopari parā bhaktirmama jātā'dya kevalam
'...हे द्विजोत्तम, आज भी शांति हेतु उसी को भेजा जाए; आज उसी के प्रति मुझे विशेष रूप से परम भक्ति उत्पन्न हुई है।'
श्लोक 52 (skanda.6.278.52)
स तथेति प्रतिज्ञाय गत्वाऽथ निजमन्दिरम् प्रोवाच याज्ञवल्क्यं च शांत्यर्थं श्लक्ष्णया गिरा
sa tatheti pratijñāya gatvā'tha nijamandiram provāca yājñavalkyaṁ ca śāṁtyarthaṁ ślakṣṇayā girā
'तथास्तु' कहकर वे अपने भवन गए और मृदु वाणी में याज्ञवल्क्य से शांति हेतु कहा।
श्लोक 53 (skanda.6.278.53)
गच्छ वत्स त्वमद्यैव पार्थिवस्य निवेशनम् शांत्यर्थं तेन भूयोऽपि त्वमेवाशुनिमंत्रितः
gaccha vatsa tvamadyaiva pārthivasya niveśanam śāṁtyarthaṁ tena bhūyo'pi tvamevāśunimaṁtritaḥ
'हे वत्स, आज ही राजभवन जाओ; उसने शांति हेतु शीघ्रता से पुनः तुम्हें ही आमंत्रित किया है।'
श्लोक 54 (skanda.6.278.54)
याज्ञवल्क्य उवाच नाहं यास्यामि तद्धर्म्ये शांत्यर्थं द्विजपुंगव अनादरेण दृष्टोऽहं नाशीर्मे च समाहृता
yājñavalkya uvāca nāhaṁ yāsyāmi taddharmye śāṁtyarthaṁ dvijapuṁgava anādareṇa dṛṣṭo'haṁ nāśīrme ca samāhṛtā
याज्ञवल्क्य ने कहा — हे द्विजपुंगव, मैं उस धर्मात्मा के यहाँ शांति हेतु नहीं जाऊँगा; मुझे अनादर से देखा गया, मेरा आशीर्वाद भी स्वीकार नहीं किया गया।
श्लोक 55 (skanda.6.278.55)
काष्ठोपरि मया दत्ता तस्य वाक्यादसंशयम् तस्मात्प्रेषय चान्यं त्वं गुरो शिष्यं विचक्षणम् आनर्तं रंजयेद्यस्तु विवेकेन समन्वितम्
kāṣṭhopari mayā dattā tasya vākyādasaṁśayam tasmātpreṣaya cānyaṁ tvaṁ guro śiṣyaṁ vicakṣaṇam ānartaṁ raṁjayedyastu vivekena samanvitam
'उसी के वचन से मैंने वह काष्ठ पर ही अर्पित कर दिया, निःसंदेह। अतः हे गुरो, आप विवेकसम्पन्न किसी अन्य शिष्य को भेजें, जो आनर्त को प्रसन्न कर सके।'
श्लोक 56 (skanda.6.278.56)
शाकल्य उवाच राजाऽऽदेशः सदा कार्यः पुरुषैर्देशवासिभिः योगक्षेमविधानाय तथा लाभाय केवलम्
śākalya uvāca rājā''deśaḥ sadā kāryaḥ puruṣairdeśavāsibhiḥ yogakṣemavidhānāya tathā lābhāya kevalam
शाकल्य ने कहा — देश में रहने वाले पुरुषों को राजाज्ञा सदा माननी चाहिए, केवल अपने योगक्षेम की व्यवस्था और लाभ हेतु।
श्लोक 57 (skanda.6.278.57)
प्रतिकूलो भवेद्यस्तु पाथिवानां स मन्दधीः न तस्य जायते सौख्यं कथंचिद्द्विजसत्तम
pratikūlo bhavedyastu pāthivānāṁ sa mandadhīḥ na tasya jāyate saukhyaṁ kathaṁciddvijasattama
'हे द्विजसत्तम, जो राजाओं के प्रतिकूल हो जाता है, वह मंदबुद्धि है; उसे कभी सुख प्राप्त नहीं होता।'
श्लोक 58 (skanda.6.278.58)
ये जात्यादि महोत्सेकान्न नरेंद्रानुपासते तेषामामरणं भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम्
ye jātyādi mahotsekānna nareṁdrānupāsate teṣāmāmaraṇaṁ bhikṣā prāyaścittaṁ vinirmitam
'जो जाति आदि के अहंकार से राजाओं की सेवा नहीं करते, उनके लिए आजीवन भिक्षाटन ही प्रायश्चित्त बताया गया है।'
श्लोक 59 (skanda.6.278.59)
एवं तयोर्विवदतोस्तदा वै गुरुशिष्ययोः भूयोऽपि तत्र संप्राप्ताः पुरुषाः पार्थिवेरिताः
evaṁ tayorvivadatostadā vai guruśiṣyayoḥ bhūyo'pi tatra saṁprāptāḥ puruṣāḥ pārthiveritāḥ
इस प्रकार गुरु-शिष्य में विवाद चलते हुए, राजा द्वारा भेजे गए और भी पुरुष वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 60 (skanda.6.278.60)
प्रोचुश्च त्वरया युक्ताः शाकल्यं प्रांजलिस्थिताः शिष्यं तं प्रेषय क्षिप्रं राजा मार्गं प्रतीक्षते
procuśca tvarayā yuktāḥ śākalyaṁ prāṁjalisthitāḥ śiṣyaṁ taṁ preṣaya kṣipraṁ rājā mārgaṁ pratīkṣate
उन्होंने त्वरा से हाथ जोड़कर शाकल्य से कहा — 'उस शिष्य को शीघ्र भेजिए, राजा मार्ग में प्रतीक्षा कर रहे हैं।'
श्लोक 61 (skanda.6.278.61)
असकृत्प्रोच्यमानोऽपि यदा गच्छति नैव सः तदा संप्रेषयामास उद्दालकमथारुणिम्
asakṛtprocyamāno'pi yadā gacchati naiva saḥ tadā saṁpreṣayāmāsa uddālakamathāruṇim
बार-बार कहे जाने पर भी जब वह नहीं गया, तब उन्होंने उद्दालक आरुणि को भेजा।
श्लोक 62 (skanda.6.278.62)
शिष्यं विनयसंपन्नं कृतांजलिपुटं स्थितम् गच्छ वत्स समादेशात्सांप्रतं नृपमंदिरम्
śiṣyaṁ vinayasaṁpannaṁ kṛtāṁjalipuṭaṁ sthitam gaccha vatsa samādeśātsāṁprataṁ nṛpamaṁdiram
उस विनम्र शिष्य से, जो हाथ जोड़े खड़ा था, उन्होंने कहा — 'हे वत्स, मेरी आज्ञा से अभी राजभवन जाओ।'
श्लोक 63 (skanda.6.278.63)
शांतिकर्म विधायाथ स्वाध्यायं च ततः कुरु
śāṁtikarma vidhāyātha svādhyāyaṁ ca tataḥ kuru
'शांतिक कर्म कर, फिर स्वाध्याय करना।'
श्लोक 64 (skanda.6.278.64)
स तथेति प्रतिज्ञाय गत्वा तं पार्थिवालयम् चकार शांतिकं कर्म विधिदृष्टेन कर्मणा
sa tatheti pratijñāya gatvā taṁ pārthivālayam cakāra śāṁtikaṁ karma vidhidṛṣṭena karmaṇā
'तथास्तु' कहकर उसने राजभवन जाकर विधिवत् शांतिक कर्म किया।
श्लोक 65 (skanda.6.278.65)
ततः कलशतोयं स साक्षतं सुमनोन्वितम् गृहीत्वोपाद्रवत्तत्र यत्र राजा व्यवस्थितः
tataḥ kalaśatoyaṁ sa sākṣataṁ sumanonvitam gṛhītvopādravattatra yatra rājā vyavasthitaḥ
तब कलश-जल अक्षत और पुष्प सहित लेकर वह वहाँ गया, जहाँ राजा उपस्थित थे।
श्लोक 66 (skanda.6.278.66)
राजोवाच स्वकीयमन्त्रलिंगेन अभिषेकं तु यच्छ भोः काष्ठस्यास्य यदग्रे ते प्रोत्थितं तिष्ठते द्विज
rājovāca svakīyamantraliṁgena abhiṣekaṁ tu yaccha bhoḥ kāṣṭhasyāsya yadagre te protthitaṁ tiṣṭhate dvija
राजा ने कहा — हे विप्र, अपने ही मंत्र-चिह्न से अभिषेक करो, इस काष्ठ पर, जो तुम्हारे समक्ष उगकर खड़ा है।
श्लोक 67 (skanda.6.278.67)
ततस्तेन शुभं मंत्रं प्रोच्याभीष्टं जलं स्वयम् अभिषिच्य च तत्काष्ठं ततश्च स्वगृहं ययौ
tatastena śubhaṁ maṁtraṁ procyābhīṣṭaṁ jalaṁ svayam abhiṣicya ca tatkāṣṭhaṁ tataśca svagṛhaṁ yayau
तब उसने शुभ मंत्र का उच्चारण कर स्वयं अभीष्ट जल से उस काष्ठ का अभिषेक किया और फिर अपने घर चला गया।
श्लोक 68 (skanda.6.278.68)
तावद्रूपं च तत्काष्ठं दृष्ट्वाऽऽनर्तो महीपतिः विषादसहितश्चैव पश्चात्तापसमन्वितः
tāvadrūpaṁ ca tatkāṣṭhaṁ dṛṣṭvā''narto mahīpatiḥ viṣādasahitaścaiva paścāttāpasamanvitaḥ
किन्तु उस काष्ठ को वैसे ही रूप में देखकर आनर्त राजा विषाद और पश्चाताप से भर गए।
श्लोक 69 (skanda.6.278.69)
भूयस्तु प्रेषयामास याज्ञवल्क्यकृते तदा अन्यं दूतं विदग्धं च शाकल्यस्य द्विजाश्रयम्
bhūyastu preṣayāmāsa yājñavalkyakṛte tadā anyaṁ dūtaṁ vidagdhaṁ ca śākalyasya dvijāśrayam
उन्होंने पुनः याज्ञवल्क्य हेतु शाकल्य के आश्रम में एक अन्य कुशल दूत भेजा।
श्लोक 70 (skanda.6.278.70)
वेदना कायसंस्था मे वर्तते द्विजसत्तम शांत्यर्थं प्रेषया क्षिप्रं तं शिष्यं पूर्वसंचितम्
vedanā kāyasaṁsthā me vartate dvijasattama śāṁtyarthaṁ preṣayā kṣipraṁ taṁ śiṣyaṁ pūrvasaṁcitam
'हे द्विजसत्तम, मेरे शरीर में पीड़ा उत्पन्न हो गई है; शांति हेतु उसी पूर्व-नियत शिष्य को शीघ्र भेजिए।'
श्लोक 71 (skanda.6.278.71)
अपमानं कृतं तस्य मया कल्ये द्विजोत्तम तेन मे सहसा व्याधिराशीर्वादमनिच्छतः
apamānaṁ kṛtaṁ tasya mayā kalye dvijottama tena me sahasā vyādhirāśīrvādamanicchataḥ
'हे द्विजोत्तम, मैंने कल उसका अपमान किया था; उसका आशीर्वाद न स्वीकार करने के कारण ही मुझे यह अचानक व्याधि हुई है।'
श्लोक 72 (skanda.6.278.72)
तस्मात्प्रेषय मे शीघ्रं येन मे स्वस्थता भवेम् असकृत्प्रोच्यमानोऽपि यदा नैव स गच्छति
tasmātpreṣaya me śīghraṁ yena me svasthatā bhavem asakṛtprocyamāno'pi yadā naiva sa gacchati
'अतः मुझे स्वस्थता प्राप्त हो, इसके लिए शीघ्र उसे भेजिए।' बार-बार कहे जाने पर भी जब वह नहीं गए...
श्लोक 73 (skanda.6.278.73)
याज्ञवल्क्यस्ततः शिष्यमन्यं प्रोवाच सादरम् ततस्तं मधुकं पैग्यं प्रेषयामास तद्गृहे
yājñavalkyastataḥ śiṣyamanyaṁ provāca sādaram tatastaṁ madhukaṁ paigyaṁ preṣayāmāsa tadgṛhe
...तब याज्ञवल्क्य ने आदरपूर्वक एक अन्य शिष्य से कहा; तब उन्होंने मधुक पैंग्य को उस भवन में भेजा।
श्लोक 74 (skanda.6.278.74)
तेनापि विहितं तच्च यथोद्दालकनिर्मितम् आशीर्वादो नृपोद्देशाद्दत्तः काष्ठस्य तस्य च
tenāpi vihitaṁ tacca yathoddālakanirmitam āśīrvādo nṛpoddeśāddattaḥ kāṣṭhasya tasya ca
उसने भी वैसे ही किया जैसा उद्दालक ने किया था; राजा के निर्देशानुसार उस काष्ठ को ही आशीर्वाद दिया गया।
श्लोक 75 (skanda.6.278.75)
तद्रूपमपि तत्काष्ठं दृष्ट्वा भूयोऽपि पार्थिवः अन्यं संप्रेषयामास याज्ञवल्क्यकृते नरम्
tadrūpamapi tatkāṣṭhaṁ dṛṣṭvā bhūyo'pi pārthivaḥ anyaṁ saṁpreṣayāmāsa yājñavalkyakṛte naram
उस काष्ठ को वैसा ही रूप में देखकर राजा ने पुनः याज्ञवल्क्य हेतु एक अन्य पुरुष भेजा।
श्लोक 76 (skanda.6.278.76)
असकृत्प्रोच्यमानोऽपि याज्ञवल्क्यो व्रजेन्न हि यदा तदा बहुगुणमन्यं शिष्यं प्रदिष्टवान्
asakṛtprocyamāno'pi yājñavalkyo vrajenna hi yadā tadā bahuguṇamanyaṁ śiṣyaṁ pradiṣṭavān
बार-बार कहे जाने पर भी जब याज्ञवल्क्य नहीं गए, तब उन्होंने और भी गुणवान एक अन्य शिष्य को नियुक्त किया।
श्लोक 77 (skanda.6.278.77)
प्रचूडं भागवित्तिं च सोऽपि गत्वा यथा पुरा चकार शांतिकं कर्म यथा ताभ्यां पुरा कृतम्
pracūḍaṁ bhāgavittiṁ ca so'pi gatvā yathā purā cakāra śāṁtikaṁ karma yathā tābhyāṁ purā kṛtam
प्रचूड भागवित्ति — उन्होंने भी जाकर पूर्व की भाँति ही शांतिक कर्म किया, जैसा उन दोनों ने पहले किया था।
श्लोक 78 (skanda.6.278.78)
ततः शांत्युदकं तस्मिन्प्राक्षिपच्चैव दारुणि मंत्रवच्च तथाप्येव तद्रूपं च व्यवस्थितम्
tataḥ śāṁtyudakaṁ tasminprākṣipaccaiva dāruṇi maṁtravacca tathāpyeva tadrūpaṁ ca vyavasthitam
तब उन्होंने भी उस काष्ठ पर मंत्रसहित शांति-जल छिड़का, फिर भी उसका रूप वैसा ही स्थिर रहा।
श्लोक 79 (skanda.6.278.79)
ततः स्वयं ययौ राजा शाकल्यस्य निवेशनम् याज्ञवल्क्यस्य मन्त्रार्थं पश्चात्तापसमन्वितः
tataḥ svayaṁ yayau rājā śākalyasya niveśanam yājñavalkyasya mantrārthaṁ paścāttāpasamanvitaḥ
तब राजा स्वयं ही पश्चातापयुक्त होकर याज्ञवल्क्य के मंत्र के लिए शाकल्य के भवन गए।
श्लोक 80 (skanda.6.278.80)
प्रणम्य स द्विजश्रेष्ठः शाकल्यं च द्विजोत्तमम् शांत्यर्थं मम हर्म्ये त्वं कल्ये शिष्यं समादिश येन मे जायते शांतिः शरीरस्य द्विजोत्तम
praṇamya sa dvijaśreṣṭhaḥ śākalyaṁ ca dvijottamam śāṁtyarthaṁ mama harmye tvaṁ kalye śiṣyaṁ samādiśa yena me jāyate śāṁtiḥ śarīrasya dvijottama
उन द्विजश्रेष्ठ शाकल्य को प्रणाम कर राजा ने कहा — 'हे द्विजोत्तम, कल उसी शिष्य को मेरे भवन में शांति हेतु भेजिए, जिससे मेरे शरीर को शांति मिले।'
श्लोक 81 (skanda.6.278.81)
ततः प्रोवाच शाकल्यो याज्ञवल्क्यं द्विजोत्तमाः भूयोऽपि शृण्वतस्तस्य आनर्तस्य महीपतेः
tataḥ provāca śākalyo yājñavalkyaṁ dvijottamāḥ bhūyo'pi śṛṇvatastasya ānartasya mahīpateḥ
हे द्विजोत्तमो, तब शाकल्य ने आनर्त राजा के सुनते हुए ही पुनः याज्ञवल्क्य से कहा।
श्लोक 82 (skanda.6.278.82)
याज्ञवल्क्य द्रुतं गच्छ ममादेशान्नृपालयम् राज्ञोस्य रोगनाशाय शांतिकं कुरु पुत्रक
yājñavalkya drutaṁ gaccha mamādeśānnṛpālayam rājñosya roganāśāya śāṁtikaṁ kuru putraka
'हे याज्ञवल्क्य, मेरी आज्ञा से शीघ्र राजभवन जाओ; हे पुत्रक, इस राजा के रोगनाश हेतु शांतिक कर्म करो।'
श्लोक 83 (skanda.6.278.83)
याज्ञवल्क्य उवाच नाहं तत्र गमिष्यामि गुरो मैवं ब्रवीहि माम् अपमानः कृतोऽनेन गुरो मम महीभुजा
yājñavalkya uvāca nāhaṁ tatra gamiṣyāmi guro maivaṁ bravīhi mām apamānaḥ kṛto'nena guro mama mahībhujā
याज्ञवल्क्य ने कहा — हे गुरो, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा, मुझसे ऐसा मत कहिए; हे गुरो, इस राजा ने मेरा अपमान किया है।
श्लोक 84 (skanda.6.278.84)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स कोपं परमं गतः अब्रवीद्भर्त्समानस्तु याज्ञवल्क्यं ततः परम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā sa kopaṁ paramaṁ gataḥ abravīdbhartsamānastu yājñavalkyaṁ tataḥ param
उसके ये वचन सुनकर वे अत्यंत क्रोधित होकर, धिक्कारते हुए याज्ञवल्क्य से यह कहने लगे।
श्लोक 85 (skanda.6.278.85)
एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा चानृणी भवेत्
ekamapyakṣaraṁ yastu guruḥ śiṣye nivedayet pṛthivyāṁ nāsti taddravyaṁ yaddattvā cānṛṇī bhavet
'जो गुरु शिष्य को एक अक्षर भी बताता है, ऐसा कोई द्रव्य पृथ्वी पर नहीं है जिसे देकर उससे उऋण हुआ जा सके।'
श्लोक 86 (skanda.6.278.86)
यस्मात्त्वं शिष्यतां गत्वा मम वाक्यं करोषि न तस्मात्त्वां योजयिष्यामि ब्रह्म शापेन सांप्रतम्
yasmāttvaṁ śiṣyatāṁ gatvā mama vākyaṁ karoṣi na tasmāttvāṁ yojayiṣyāmi brahma śāpena sāṁpratam
'चूँकि तू शिष्यत्व प्राप्त कर भी मेरा वचन नहीं मानता, इसलिए अब मैं तुझे ब्रह्मशाप से युक्त करूँगा।'
श्लोक 87 (skanda.6.278.87)
याज्ञवल्क्य उवाच अन्यायेन हि चेच्छापं गुरो मम प्रदास्यसि अहमप्येव दास्यामि प्रतिशापं तवाधुना
yājñavalkya uvāca anyāyena hi cecchāpaṁ guro mama pradāsyasi ahamapyeva dāsyāmi pratiśāpaṁ tavādhunā
याज्ञवल्क्य ने कहा — हे गुरो, यदि आप अन्यायपूर्वक मुझे शाप देंगे, तो मैं भी अभी आपको प्रतिशाप दूँगा।
श्लोक 88 (skanda.6.278.88)
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः उत्पथे वर्तमानस्य परित्यागो विधीयते
gurorapyavaliptasya kāryākāryamajānataḥ utpathe vartamānasya parityāgo vidhīyate
'जो गुरु भी अहंकारी होकर कार्य-अकार्य नहीं जानता तथा कुमार्ग पर चलता है, ऐसे गुरु का त्याग विधिसम्मत है।'
श्लोक 89 (skanda.6.278.89)
तस्मात्त्वं हि मया त्यक्तः सांप्रतं हि न मे गुरुः अविशषेण शिष्यार्थं यदादेशं प्रयच्छसि
tasmāttvaṁ hi mayā tyaktaḥ sāṁprataṁ hi na me guruḥ aviśaṣeṇa śiṣyārthaṁ yadādeśaṁ prayacchasi
'अतः अब से आप मेरे द्वारा त्यागे गए हैं, अब आप मेरे गुरु नहीं हैं, क्योंकि आप बिना विवेक के केवल शिष्य के हित के नाम पर आदेश देते हैं।'
श्लोक 90 (skanda.6.278.90)
यावंतस्ते स्थिताः शिष्यास्तावद्भिर्दिवसैरहम् तवादेशं करिष्यामि नोचेद्यास्यामि दूरतः
yāvaṁtaste sthitāḥ śiṣyāstāvadbhirdivasairaham tavādeśaṁ kariṣyāmi nocedyāsyāmi dūrataḥ
'जितने दिन आपके पास अन्य शिष्य स्थित हैं, उतने ही दिन तक मैं आपकी आज्ञा मानूँगा; अन्यथा दूर चला जाऊँगा।'
श्लोक 91 (skanda.6.278.91)
शाकल्य उवाच यदि गच्छसि चान्यत्र तत्त्वं विद्यां परित्यज यां मया पाठितः पाप व्रज पश्चात्कुशिष्य भोः
śākalya uvāca yadi gacchasi cānyatra tattvaṁ vidyāṁ parityaja yāṁ mayā pāṭhitaḥ pāpa vraja paścātkuśiṣya bhoḥ
शाकल्य ने कहा — यदि तू अन्यत्र जाता है, तो वह विद्या भी त्याग दे, जो मैंने तुझे पढ़ाई है; हे पापी, जा, हे दुष्ट शिष्य!
श्लोक 92 (skanda.6.278.92)
मयाभिमंत्रितं तोयं क्षुरिकामुण्डसंभवम् पिब तस्याः प्रभावेण शीघ्रमेव त्यजिष्यसि जठरान्मामकीं विद्यां त्वयाधीता पुरा तु या
mayābhimaṁtritaṁ toyaṁ kṣurikāmuṇḍasaṁbhavam piba tasyāḥ prabhāveṇa śīghrameva tyajiṣyasi jaṭharānmāmakīṁ vidyāṁ tvayādhītā purā tu yā
'क्षुरिका-मुंड मंत्र से मेरे द्वारा अभिमंत्रित यह जल पी ले; इसके प्रभाव से तू अपने उदर से मेरी वह विद्या शीघ्र ही त्याग देगा, जो तूने पूर्व में पढ़ी थी।'
श्लोक 93 (skanda.6.278.93)
एवमुक्त्वा स चामंत्र्य मंत्रैराथर्वणैर्जलम् पानाय प्रददौ तस्मै वांत्यर्थं सद्विजोत्तमः
evamuktvā sa cāmaṁtrya maṁtrairātharvaṇairjalam pānāya pradadau tasmai vāṁtyarthaṁ sadvijottamaḥ
ऐसा कहकर उन उत्तम विप्र ने अथर्ववेदोक्त मंत्रों से जल अभिमंत्रित कर, वमन कराने हेतु उसे पीने को दिया।
श्लोक 94 (skanda.6.278.94)
याज्ञवल्क्योऽपि तत्पीत्वा जलं तेनाभिमंत्रितम् वांतिं कृत्वा सहान्नेन तद्विद्यां तां परित्यजत्
yājñavalkyo'pi tatpītvā jalaṁ tenābhimaṁtritam vāṁtiṁ kṛtvā sahānnena tadvidyāṁ tāṁ parityajat
याज्ञवल्क्य ने भी उस अभिमंत्रित जल को पीकर, अन्न सहित वमन कर, वह विद्या त्याग दी।
श्लोक 95 (skanda.6.278.95)
ततो मूढत्वमापन्नो विश्वामित्रह्रदं शुभम् गत्वा स्नातो विधानेन शुचि र्भूत्वा समाहितः
tato mūḍhatvamāpanno viśvāmitrahradaṁ śubham gatvā snāto vidhānena śuci rbhūtvā samāhitaḥ
तब मूढ़भाव को प्राप्त होकर वे शुभ विश्वामित्र-ह्रद में जाकर विधिपूर्वक स्नान कर, पवित्र होकर एकाग्रचित्त हुए।
श्लोक 96 (skanda.6.278.96)
चकार मूर्तीस्ता भक्त्या रवेर्द्वादशसंख्यया प्रतिष्ठाप्य ततः सर्वाः पूजयामास भक्तितः
cakāra mūrtīstā bhaktyā raverdvādaśasaṁkhyayā pratiṣṭhāpya tataḥ sarvāḥ pūjayāmāsa bhaktitaḥ
उन्होंने भक्तिपूर्वक बारह संख्या में सूर्य की मूर्तियाँ बनाईं, तथा सबको स्थापित कर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।
श्लोक 97 (skanda.6.278.97)
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणः सांब एव च भगो विवस्वान्पूषा च सविता दशमस्तथा एकादशस्तथा त्वष्टा विष्णुर्द्वादश उच्यते
dhātā mitro'ryamā śakro varuṇaḥ sāṁba eva ca bhago vivasvānpūṣā ca savitā daśamastathā ekādaśastathā tvaṣṭā viṣṇurdvādaśa ucyate
धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण तथा सांब; भग, विवस्वान, पूषा, दसवें सविता; ग्यारहवें त्वष्टा, तथा बारहवें विष्णु कहलाते हैं।
श्लोक 98 (skanda.6.278.98)
एवं द्वादशधा सूर्यः स्थापितोऽत्र विपश्चिता आराधितस्ततो नित्यं गन्धपुष्पानुलेपनैः
evaṁ dvādaśadhā sūryaḥ sthāpito'tra vipaścitā ārādhitastato nityaṁ gandhapuṣpānulepanaiḥ
इस प्रकार उस विद्वान ने वहाँ बारह प्रकार से सूर्य को स्थापित कर, तत्पश्चात नित्य गंध-पुष्प-अनुलेपन से उनकी आराधना की।
श्लोक 99 (skanda.6.278.99)
ततः कालेन महता गत्वा प्रत्यक्षतां रविः प्रोवाच सुन्दरं प्रीत्या वाक्यमेतन्मुनिं प्रति
tataḥ kālena mahatā gatvā pratyakṣatāṁ raviḥ provāca sundaraṁ prītyā vākyametanmuniṁ prati
तब दीर्घकाल बाद सूर्य साक्षात प्रकट होकर उस मुनि से प्रेमपूर्वक यह सुंदर वचन बोले।
श्लोक 100 (skanda.6.278.100)
याज्ञवल्क्य प्रतुष्टोऽहं तव ब्राह्मणसत्तम इष्टं ददामि ते ब्रूहि यद्यत्संप्रति वांछितम्
yājñavalkya pratuṣṭo'haṁ tava brāhmaṇasattama iṣṭaṁ dadāmi te brūhi yadyatsaṁprati vāṁchitam
'हे याज्ञवल्क्य, हे ब्राह्मणसत्तम, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूँ, बताओ अभी क्या अभीष्ट है।'
श्लोक 101 (skanda.6.278.101)
याज्ञवल्क्य उवाच वरं ददासि चेन्मह्यं वेदपाठे नियोजय मां विभो येन शिष्यत्वं तव गच्छामि सांप्रतम्
yājñavalkya uvāca varaṁ dadāsi cenmahyaṁ vedapāṭhe niyojaya māṁ vibho yena śiṣyatvaṁ tava gacchāmi sāṁpratam
याज्ञवल्क्य ने कहा — यदि आप मुझे वर देते हैं, तो हे विभो, मुझे वेदपाठ में नियुक्त कीजिए, जिससे मैं अभी आपका शिष्यत्व प्राप्त करूँ।
श्लोक 102 (skanda.6.278.102)
आदित्य उवाच मया पर्यटनं कार्यं सदैव द्विजसत्तम मेरोः प्रदक्षिणार्थाय लोकालोककृते द्विज
āditya uvāca mayā paryaṭanaṁ kāryaṁ sadaiva dvijasattama meroḥ pradakṣiṇārthāya lokālokakṛte dvija
आदित्य ने कहा — हे द्विजसत्तम, मुझे सदा ही मेरु की प्रदक्षिणा हेतु, लोकालोक तक के लोकों के प्रकाशन हेतु भ्रमण करना पड़ता है।
श्लोक 103 (skanda.6.278.103)
तत्कथं योजयामि त्वां वेदपाठेन स द्विज
tatkathaṁ yojayāmi tvāṁ vedapāṭhena sa dvija
'तो हे द्विज, वेदपाठ में तुम्हें कैसे नियुक्त करूँ?'
श्लोक 104 (skanda.6.278.104)
तस्मात्त्वं लघुतां गत्वा मम मुख्यहयस्य च श्रवणे तिष्ठ मद्वाक्यात्तेजसा चैव येन मे
tasmāttvaṁ laghutāṁ gatvā mama mukhyahayasya ca śravaṇe tiṣṭha madvākyāttejasā caiva yena me
'इसलिए तुम लघु रूप धारण कर मेरे मुख्य अश्व के कान में स्थित हो जाओ, जिससे मेरे वचन और तेज से...'
श्लोक 105 (skanda.6.278.105)
न दह्यसि महाभाग तत्र स्थोऽध्ययनं कुरु स तथेति प्रतिज्ञाय प्रविश्यादित्यवाजिनः
na dahyasi mahābhāga tatra stho'dhyayanaṁ kuru sa tatheti pratijñāya praviśyādityavājinaḥ
'...हे महाभाग, तुम न जलो; वहीं रहकर अध्ययन करो।' 'तथास्तु' कहकर वे आदित्य के अश्व में प्रविष्ट होकर...
श्लोक 106 (skanda.6.278.106)
कर्णेऽपठत्ततो वेदांश्चतुरोऽपि च तन्मुखात् अंगोपांगसमोपेतान्परिशिष्टसमन्वितान्
karṇe'paṭhattato vedāṁścaturo'pi ca tanmukhāt aṁgopāṁgasamopetānpariśiṣṭasamanvitān
...उसी के मुख से अंग-उपांग तथा परिशिष्टों सहित चारों वेदों को कान में सुनकर पढ़ने लगे।
श्लोक 107 (skanda.6.278.107)
ततः समाप्ते स प्राह प्रार्थयस्व विभो हि माम् प्रदास्यामि न सन्देहस्तवाद्य गुरुदक्षिणाम्
tataḥ samāpte sa prāha prārthayasva vibho hi mām pradāsyāmi na sandehastavādya gurudakṣiṇām
तब पूर्ण होने पर उन्होंने कहा — मुझसे माँगो; हे विभो, मैं आज निःसंदेह तुम्हें गुरु-दक्षिणा दूँगा।
श्लोक 108 (skanda.6.278.108)
आदित्य उवाच यानि सूक्तानि ऋग्वेदे मदीयानि द्विजोत्तम सावनानि यजुर्वेदे सामानि च तृतीयके
āditya uvāca yāni sūktāni ṛgvede madīyāni dvijottama sāvanāni yajurvede sāmāni ca tṛtīyake
आदित्य ने कहा — हे द्विजोत्तम, ऋग्वेद में मुझसे संबंधित जो सूक्त हैं, यजुर्वेद में जो सावन-सूक्त हैं, तथा तीसरे (सामवेद) में जो साम हैं...
श्लोक 109 (skanda.6.278.109)
कल्पोक्तानि चतुर्थे च तानि सर्वाणि भूतले त्वया प्रचारणीयानि कृत्वा व्याख्यानमुत्तमम्
kalpoktāni caturthe ca tāni sarvāṇi bhūtale tvayā pracāraṇīyāni kṛtvā vyākhyānamuttamam
'...तथा चौथे (अथर्ववेद) के कल्पोक्त जो मंत्र हैं — इन सबका प्रचार तुम्हें पृथ्वीतल पर उत्तम व्याख्या सहित करना होगा।'
श्लोक 110 (skanda.6.278.110)
ये द्विजास्तानि सर्वाणि कीर्तयिष्यंति मे पुरः ते सर्वे पाप निर्मुक्ताः प्रयास्यंति दिवालयम्
ye dvijāstāni sarvāṇi kīrtayiṣyaṁti me puraḥ te sarve pāpa nirmuktāḥ prayāsyaṁti divālayam
'जो भी द्विज मेरे समक्ष इन सबका कीर्तन करेंगे, वे सभी पापमुक्त होकर स्वर्गलोक जाएँगे।'
श्लोक 111 (skanda.6.278.111)
व्याख्यास्यंति पुनर्ये च मम भक्तिपरायणाः ते यास्यंति द्विजा मुक्तिं सत्यमेतन्मयोदितम्
vyākhyāsyaṁti punarye ca mama bhaktiparāyaṇāḥ te yāsyaṁti dvijā muktiṁ satyametanmayoditam
'और जो मेरी भक्ति में तत्पर होकर इनकी व्याख्या भी करेंगे, वे द्विज मुक्ति प्राप्त करेंगे — यह मैंने सत्य कहा है।'
श्लोक 112 (skanda.6.278.112)
सूत उवाच एवं वेदान्पठित्वा स प्रदत्त्वा गुरुदक्षिणाम् सूर्यायाभ्यागतो भूयश्चमत्कारपुरं प्रति
sūta uvāca evaṁ vedānpaṭhitvā sa pradattvā gurudakṣiṇām sūryāyābhyāgato bhūyaścamatkārapuraṁ prati
सूत जी ने कहा — इस प्रकार वेद पढ़कर, गुरु-दक्षिणा देकर, वे सूर्य से विदा लेकर पुनः चमत्कारपुर की ओर आए।
श्लोक 113 (skanda.6.278.113)
ततः शाकल्यमभ्येत्य गुरुस्त्वं प्राङ् मम स्थितः प्रार्थयस्व महाभाग दास्यामि गुरुदक्षिणाम्
tataḥ śākalyamabhyetya gurustvaṁ prāṅ mama sthitaḥ prārthayasva mahābhāga dāsyāmi gurudakṣiṇām
फिर शाकल्य के पास पहुँचकर कहा — आप पहले मेरे गुरु रहे हैं, हे महाभाग, माँगिए, मैं आपको गुरु-दक्षिणा दूँगा।
श्लोक 114 (skanda.6.278.114)
ज्येष्ठो भ्राता पिता चैव माता चैव गुरुस्तथा वैरुद्ध्येनापि वर्तंते यद्येते द्विजसतम तथापि पूजनीयाश्च पुरुषेण न संशयः
jyeṣṭho bhrātā pitā caiva mātā caiva gurustathā vairuddhyenāpi vartaṁte yadyete dvijasatama tathāpi pūjanīyāśca puruṣeṇa na saṁśayaḥ
'हे द्विजसत्तम, ज्येष्ठ भ्राता, पिता, माता तथा गुरु — यदि ये विरोधी भाव से भी वर्तें, तो भी पुरुष के लिए वे पूजनीय ही हैं, इसमें संदेह नहीं।'
श्लोक 115 (skanda.6.278.115)
सांगोपांगा मयाधीता वेदाश्चत्वार एव च अधीताश्चैव सर्वेषां तेषामर्थोऽवधारितः
sāṁgopāṁgā mayādhītā vedāścatvāra eva ca adhītāścaiva sarveṣāṁ teṣāmartho'vadhāritaḥ
'मैंने अंग-उपांगों सहित चारों वेदों का अध्ययन किया है, तथा उन सबका अर्थ भी निश्चित रूप से समझ लिया है।'
श्लोक 116 (skanda.6.278.116)
तत्त्वं वद महाभाग कां ते यच्छामि दक्षिणाम्
tattvaṁ vada mahābhāga kāṁ te yacchāmi dakṣiṇām
'तो हे महाभाग, बताइए मैं आपको क्या दक्षिणा दूँ?'
श्लोक 117 (skanda.6.278.117)
शाकल्य उवाच यानि वेदरहस्यानि सूर्येण कथितानि ते
śākalya uvāca yāni vedarahasyāni sūryeṇa kathitāni te
शाकल्य ने कहा — जो वेद-रहस्य सूर्य द्वारा तुम्हें बताए गए...
श्लोक 118 (skanda.6.278.118)
यैः स्यात्पापप्रणाशश्च व्याख्यातैः पठितैस्तथा तानि मे कीर्तय क्षिप्रमेषा मे गुरुदक्षिणा ११८ याज्ञवल्क्य उवाच तदागच्छ मया सार्धं यत्र सूर्याः प्रतिष्ठिताः मया द्वादश तेषां च कीर्तयिष्यामि चात्रतः
yaiḥ syātpāpapraṇāśaśca vyākhyātaiḥ paṭhitaistathā tāni me kīrtaya kṣiprameṣā me gurudakṣiṇā 118 yājñavalkya uvāca tadāgaccha mayā sārdhaṁ yatra sūryāḥ pratiṣṭhitāḥ mayā dvādaśa teṣāṁ ca kīrtayiṣyāmi cātrataḥ
'...जिनके व्याख्यान अथवा पाठ से पापों का नाश होता है, वे मुझे शीघ्र सुनाओ — यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी।' याज्ञवल्क्य ने कहा — तो चलिए मेरे साथ, जहाँ मैंने सूर्य स्थापित किए हैं; मैं वहीं उन बारहों का कीर्तन करूँगा।
श्लोक 119 (skanda.6.278.119)
तच्छ्रुत्वा शिष्यसंयुक्तः शाकल्यस्तैश्च सद्द्विजैः शिष्यैस्तिष्ठन्ति ये तत्र स्थापितास्तेन भास्कराः
tacchrutvā śiṣyasaṁyuktaḥ śākalyastaiśca saddvijaiḥ śiṣyaistiṣṭhanti ye tatra sthāpitāstena bhāskarāḥ
यह सुनकर शाकल्य अपने शिष्यों तथा उन सज्जन द्विजों सहित, जो वहाँ रहते थे, उन्हीं भास्करों के पास गए, जो उनके शिष्यों द्वारा स्थापित किए गए थे।
श्लोक 120 (skanda.6.278.120)
ततस्तु कीर्तयामास व्याख्यानं तत्पुरः स्थितः वेदान्तानां च सर्वेषां यथोक्तं रविणा पुरा
tatastu kīrtayāmāsa vyākhyānaṁ tatpuraḥ sthitaḥ vedāntānāṁ ca sarveṣāṁ yathoktaṁ raviṇā purā
तब उनके समक्ष खड़े होकर उन्होंने समस्त वेदांतों की व्याख्या का कीर्तन किया, जैसा पूर्व में सूर्य ने बताया था।
श्लोक 121 (skanda.6.278.121)
अवसाने च तेषां तु चतुश्चरणसंभवैः ब्राह्मणैर्याज्ञवल्क्यस्तु वेदान्तज्ञैः प्रतोषितः
avasāne ca teṣāṁ tu catuścaraṇasaṁbhavaiḥ brāhmaṇairyājñavalkyastu vedāntajñaiḥ pratoṣitaḥ
उसके अंत में चार आश्रमों में उत्पन्न वेदांतज्ञ ब्राह्मणों ने याज्ञवल्क्य को संतुष्ट किया।
श्लोक 122 (skanda.6.278.122)
प्रोक्तस्तव प्रसादेन वेदांतज्ञा वयं स्थिताः श्रुताध्ययनसंपन्ना याचस्व गुरुदक्षिणाम्
proktastava prasādena vedāṁtajñā vayaṁ sthitāḥ śrutādhyayanasaṁpannā yācasva gurudakṣiṇām
उन्होंने कहा — आपकी कृपा से हम वेदांतज्ञ हो गए हैं, श्रुताध्ययन-सम्पन्न; अब गुरु-दक्षिणा माँगिए।
श्लोक 123 (skanda.6.278.123)
याज्ञवल्क्य उवाच एतेषां भास्कराणां च मदीयानां पुरो द्विजाः कीर्तयिष्यंति ये विप्रास्तेषां युष्मत्प्रसादतः भूया स्वर्गगतिर्विप्रा एषा मे गुरु दक्षिणा
yājñavalkya uvāca eteṣāṁ bhāskarāṇāṁ ca madīyānāṁ puro dvijāḥ kīrtayiṣyaṁti ye viprāsteṣāṁ yuṣmatprasādataḥ bhūyā svargagatirviprā eṣā me guru dakṣiṇā
याज्ञवल्क्य ने कहा — हे द्विजो, आपकी कृपा से जो भी विप्र मेरे इन सूर्यों के समक्ष इस (व्याख्यान) का कीर्तन करेंगे, उन्हें स्वर्गगति प्राप्त हो — यही मेरी गुरु-दक्षिणा है।
श्लोक 124 (skanda.6.278.124)
ये पुनर्भक्तिसंयुक्ताः करिष्यंति विचारणम् तेषां तुर्यपदं यच्च जरामरणवर्जितम्
ye punarbhaktisaṁyuktāḥ kariṣyaṁti vicāraṇam teṣāṁ turyapadaṁ yacca jarāmaraṇavarjitam
'और जो भक्तिपूर्वक इस पर विचार भी करेंगे, उन्हें जरा-मरण से रहित वह तुरीय पद प्राप्त होगा।'
श्लोक 125 (skanda.6.278.125)
ब्राह्मणा ऊचुः भविष्यति कलौ विप्रा दौस्थ्यभावसमन्विताः पठने नैव शक्ताश्च व्याख्यानस्य च का कथा
brāhmaṇā ūcuḥ bhaviṣyati kalau viprā dausthyabhāvasamanvitāḥ paṭhane naiva śaktāśca vyākhyānasya ca kā kathā
ब्राह्मणों ने कहा — कलियुग में विप्र दुर्दशा से युक्त होंगे, वे पाठ करने में भी समर्थ नहीं होंगे, व्याख्यान की तो बात ही क्या।
श्लोक 126 (skanda.6.278.126)
तस्मात्सारस्वतं ब्रूहि वेदानां द्विजसत्तम अपि दौस्थ्यसमायुक्ता येन ते कीर्तयंति च
tasmātsārasvataṁ brūhi vedānāṁ dvijasattama api dausthyasamāyuktā yena te kīrtayaṁti ca
'अतः हे द्विजसत्तम, वेदों का सार बताइए, जिससे दुर्दशाग्रस्त होते हुए भी वे उसका कीर्तन कर सकें।'
श्लोक 127 (skanda.6.278.127)
याज्ञवल्क्य उवाच रथं युञ्जंति सूक्तं यत्प्रथमं वित्तलक्षणम् त्रिष्टुभेति च यत्सूक्तं तथाद्यं ब्राह्मणोत्तमाः
yājñavalkya uvāca rathaṁ yuñjaṁti sūktaṁ yatprathamaṁ vittalakṣaṇam triṣṭubheti ca yatsūktaṁ tathādyaṁ brāhmaṇottamāḥ
याज्ञवल्क्य ने कहा — हे ब्राह्मणोत्तमो, धन का लक्षण बताने वाला प्रथम सूक्त 'रथं युञ्जंति' है, तथा त्रिष्टुप छंद वाला वह प्रथम सूक्त...
श्लोक 128 (skanda.6.278.128)
चित्रं देवानामिति च तथान्यत्तस्य वल्लभम् हंसः शुचिषदित्युक्तं ततश्चापि प्रहर्षदम्
citraṁ devānāmiti ca tathānyattasya vallabham haṁsaḥ śuciṣadityuktaṁ tataścāpi praharṣadam
'...तथा 'चित्रं देवानाम्', और उसका दूसरा प्रिय सूक्त; 'हंसः शुचिषत्' कहा गया, फिर हर्ष देने वाला भी एक...'
श्लोक 129 (skanda.6.278.129)
पावमानं तथा सूक्तं ये पठिष्यंति बह्वृचः इत्येषामाद्यमेवं तु ते यास्यंति परां गतिम्
pāvamānaṁ tathā sūktaṁ ye paṭhiṣyaṁti bahvṛcaḥ ityeṣāmādyamevaṁ tu te yāsyaṁti parāṁ gatim
'...तथा पावमान सूक्त — जो भी ऋग्वेदी इन्हें प्रथम मानकर पढ़ेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 130 (skanda.6.278.130)
एकविंशतिसामानि आदित्येष्टानि यानि च सामगाः कीर्तयिष्यंति येऽत्रस्थाः शुचयः स्थिताः
ekaviṁśatisāmāni ādityeṣṭāni yāni ca sāmagāḥ kīrtayiṣyaṁti ye'trasthāḥ śucayaḥ sthitāḥ
'आदित्य को समर्पित इक्कीस साम — जो भी पवित्र सामगायक यहाँ रहकर उनका कीर्तन करेंगे...'
श्लोक 131 (skanda.6.278.131)
निश्चयं तु परं धृत्वा येऽपि स्तोष्यंति भास्करम् ततस्तेऽपि प्रयास्यंति निर्भिद्य रविमंडलम्
niścayaṁ tu paraṁ dhṛtvā ye'pi stoṣyaṁti bhāskaram tataste'pi prayāsyaṁti nirbhidya ravimaṁḍalam
'...तथा परम निश्चय धारण कर जो भी सूर्य की स्तुति करेंगे, वे भी सूर्य-मंडल को भेदकर आगे चले जाएँगे।'
श्लोक 132 (skanda.6.278.132)
क्षुरिकासंपुटं चैव सूर्यकल्पं तथैव च शांतिकल्पसमायुक्तं कीर्तयिष्यंति ये द्विजाः
kṣurikāsaṁpuṭaṁ caiva sūryakalpaṁ tathaiva ca śāṁtikalpasamāyuktaṁ kīrtayiṣyaṁti ye dvijāḥ
'तथा जो भी द्विज क्षुरिका-संपुट, सूर्यकल्प तथा शांतिकल्प-सहित का कीर्तन करेंगे...'
श्लोक 133 (skanda.6.278.133)
अथर्वपाठकास्तेऽपि प्रयास्यंति परां गतिम् मूर्खा अपि समागत्य संप्राप्ते सूर्यवासरे
atharvapāṭhakāste'pi prayāsyaṁti parāṁ gatim mūrkhā api samāgatya saṁprāpte sūryavāsare
'...वे अथर्ववेद-पाठक भी परम गति को प्राप्त होंगे। और मूर्ख भी एकत्र होकर, रविवार आने पर...'
श्लोक 134 (skanda.6.278.134)
प्रणामं ये करिष्यंति श्रद्धया परया युताः सप्तरात्रकृतात्पापान्मुक्तिं प्राप्संति ते द्विजाः
praṇāmaṁ ye kariṣyaṁti śraddhayā parayā yutāḥ saptarātrakṛtātpāpānmuktiṁ prāpsaṁti te dvijāḥ
'...परम श्रद्धा से युक्त होकर जो भी प्रणाम करेंगे, वे द्विज सप्तरात्रि-कृत पापों से मुक्ति प्राप्त करेंगे।'
श्लोक 135 (skanda.6.278.135)
सूत उवाच तथेति तैः प्रतिज्ञाते चतुश्चरणसंभवैः ब्राह्मणैर्याज्ञवल्क्यस्तु विज्ञातो येन केन तु
sūta uvāca tatheti taiḥ pratijñāte catuścaraṇasaṁbhavaiḥ brāhmaṇairyājñavalkyastu vijñāto yena kena tu
सूत जी ने कहा — चार आश्रमों में उत्पन्न उन ब्राह्मणों के 'तथास्तु' प्रतिज्ञा करने पर, याज्ञवल्क्य किसी न किसी प्रकार सर्वत्र विख्यात हो गए।
श्लोक 136 (skanda.6.278.136)
विदेहेन ततः प्राप्तः श्रवणार्थं नराधिपः वेदांतानां च सर्वेषां रत्नाख्येन महीभुजा
videhena tataḥ prāptaḥ śravaṇārthaṁ narādhipaḥ vedāṁtānāṁ ca sarveṣāṁ ratnākhyena mahībhujā
तब विदेह देश के रत्न नामक राजा समस्त वेदांतों को सुनने हेतु उनके पास आए।
श्लोक 137 (skanda.6.278.137)
तेनापि च परिज्ञाय माहात्म्यं सूर्यसं भवम् ततः संस्थापितः सूर्यस्तस्मिन्स्थाने द्विजोत्तमाः
tenāpi ca parijñāya māhātmyaṁ sūryasaṁ bhavam tataḥ saṁsthāpitaḥ sūryastasminsthāne dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, उन्होंने भी सूर्य से उत्पन्न इस माहात्म्य को जानकर, उस स्थान पर सूर्य की स्थापना कराई।
श्लोक 138 (skanda.6.278.138)
तं चापि सूर्यवारेण यः प्रपश्यति मानवः सप्तरात्रकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
taṁ cāpi sūryavāreṇa yaḥ prapaśyati mānavaḥ saptarātrakṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
जो मनुष्य रविवार को उनका दर्शन करता है, वह सप्तरात्रि-कृत पापों से निःसंदेह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 139 (skanda.6.278.139)
एतद्वः कथितं सर्वं माहात्म्यं सूर्यसंभवम् यः शृणोति नरो भक्त्या अश्वमेधफलं लभेत्
etadvaḥ kathitaṁ sarvaṁ māhātmyaṁ sūryasaṁbhavam yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā aśvamedhaphalaṁ labhet
इस प्रकार तुम्हें सूर्य से उत्पन्न यह सम्पूर्ण माहात्म्य बताया गया; जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह अश्वमेध का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 140 (skanda.6.278.140)
संक्रांतौ यत्प्रदानेन सूर्ये वा श्रवणेन तु तत्फलं समवाप्नोति श्रुत्वा माहात्म्यमुतमम्
saṁkrāṁtau yatpradānena sūrye vā śravaṇena tu tatphalaṁ samavāpnoti śrutvā māhātmyamutamam
संक्रांति के समय जो फल दान से अथवा सूर्य के श्रवण से प्राप्त होता है, वही फल इस उत्तम माहात्म्य को सुनने से प्राप्त हो जाता है।