प्रभास खण्ड · अध्याय 1
प्रश्नाध्यायवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.1.1)
व्यास उवाच। यश्चाद्यः पुरुषः पुराण इति यः संस्तूयते सर्वतः सोमेशः सुरसंयुतः क्षितितले यैर्वीक्षितो हीक्षणैः। ते तीर्त्वा विततांतरं भवभयं भूत्याऽभिसंभूषिताः स्वर्गं यानवरैः प्रयांति सुकृतैर्यज्ञै यथा यज्विनः
vyāsa uvāca| yaścādyaḥ puruṣaḥ purāṇa iti yaḥ saṁstūyate sarvataḥ someśaḥ surasaṁyutaḥ kṣititale yairvīkṣito hīkṣaṇaiḥ| te tīrtvā vitatāṁtaraṁ bhavabhayaṁ bhūtyā'bhisaṁbhūṣitāḥ svargaṁ yānavaraiḥ prayāṁti sukṛtairyajñai yathā yajvinaḥ
व्यासजी ने कहा—जो आद्य पुरुष पुराण कहलाते हैं, जिनकी सर्वत्र देवताओं सहित सोमेश (चन्द्रशेखर) के रूप में स्तुति की जाती है, पृथ्वीतल पर जिन्हें भक्तजन अपने नेत्रों से देखते हैं, वे भवभय के विस्तृत सागर को पार करके, ऐश्वर्य से विभूषित होकर उत्तम विमानों द्वारा स्वर्ग को उसी प्रकार जाते हैं जैसे यज्ञकर्ता अपने पुण्यकर्मों और यज्ञों से जाते हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.1.2)
प्रसरद्बिन्दुनादाय शुद्धामृतमयात्मने। षड्त्रिंशत्तत्त्वदेहाय नमश्चिन्मात्रमूर्तये
prasaradbindunādāya śuddhāmṛtamayātmane| ṣaḍtriṁśattattvadehāya namaścinmātramūrtaye
प्रसरित बिन्दु और नाद वाले, शुद्ध अमृतमय आत्मा वाले, छत्तीस तत्त्वों की देहवाले, चिन्मात्र स्वरूप को नमस्कार है।
श्लोक 3 (skanda.7.1.3)
अमृतेनोदरस्थेन म्रियंते सर्वदेवताः। कंठस्थित विषेणापि यो जीवति स पातु वः
amṛtenodarasthena mriyaṁte sarvadevatāḥ| kaṁṭhasthita viṣeṇāpi yo jīvati sa pātu vaḥ
जिसके उदरस्थ अमृत से भी सब देवता मरणधर्मा हो जाते हैं और कण्ठ में स्थित विष से भी जो स्वयं जीवित रहते हैं, वे (शिव) आप सबकी रक्षा करें।
श्लोक 4 (skanda.7.1.4)
सत्रान्ते सूतमनघं नैमिषेया महर्षयः। पुराणसंहितां पुण्यां पप्रच्छुः रोमहर्षणम्
satrāṁte sūtamanaghaṁ naimiṣeyā maharṣayaḥ| purāṇasaṁhitāṁ puṇyāṁ papracchuḥ romaharṣaṇam
सत्र (दीर्घ यज्ञ) के अन्त में नैमिषारण्य के महर्षियों ने निष्पाप सूत रोमहर्षण से पवित्र पुराण-संहिता के विषय में पूछा।
श्लोक 5 (skanda.7.1.5)
त्वया सूत महाबुद्धे भगवान्ब्रह्मवित्तमः। इतिहासपुराणार्थे व्यासः सम्यगुपासितः
tvayā sūta mahābuddhe bhagavānbrahmavittamaḥ| itihāsapurāṇārthe vyāsaḥ samyagupāsitaḥ
हे महाबुद्धिमान सूत! इतिहास-पुराण के विषय में तुमने भगवान व्यास की, जो ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं, भलीभाँति उपासना की है।
श्लोक 6 (skanda.7.1.6)
तस्य ते सर्वरोमाणि वचसा हर्षितानि यत्। द्वैपायनस्यानुभावात्ततोऽभू रोमहर्षणः
tasya te sarvaromāṇi vacasā harṣitāni yat| dvaipāyanasyānubhāvāttato'bhū romaharṣaṇaḥ
उन द्वैपायन (व्यास) के प्रभाव से तुम्हारे सारे रोम उनकी वाणी से हर्षित हो उठे थे, इसी से तुम्हारा नाम रोमहर्षण पड़ा।
श्लोक 7 (skanda.7.1.7)
भवंतमेव प्रथमं व्याजहार स्वयं प्रभुः। मुनीनां संहितां वक्तुं व्यासः पौराणिकीं कथाम्
bhavaṁtameva prathamaṁ vyājahāra svayaṁ prabhuḥ| munīnāṁ saṁhitāṁ vaktuṁ vyāsaḥ paurāṇikīṁ kathām
स्वयं प्रभु व्यास ने ही सबसे पहले तुम्हें यह आदेश दिया था कि मुनियों के समक्ष पौराणिक संहिता की कथा कहो।
श्लोक 8 (skanda.7.1.8)
त्वं हि स्वायंभुवे यज्ञे सुत्याहे वितते हरिः। संभूतः संहितां वक्तुं स्वांशेन पुरुषोत्तमः
tvaṁ hi svāyaṁbhuve yajñe sutyāhe vitate hariḥ| saṁbhūtaḥ saṁhitāṁ vaktuṁ svāṁśena puruṣottamaḥ
स्वायम्भुव मनु के यज्ञ में, जब सुत्या-संस्कार विस्तार से चल रहा था, तब स्वयं हरि पुरुषोत्तम ने अपने अंश से यह संहिता कहने के लिए जन्म लिया था।
श्लोक 9 (skanda.7.1.9)
तस्माद्भवंतं पृच्छामः पुराणे स्कंदकीर्तिते। प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये ब्राह्मी यात्रा श्रुता पुरा
tasmādbhavaṁtaṁ pṛcchāmaḥ purāṇe skaṁdakīrtite| prabhāsakṣetramāhātmye brāhmī yātrā śrutā purā
इसीलिए हम आपसे पूछते हैं—स्कन्द द्वारा कीर्तित इस पुराण में प्रभासक्षेत्र के माहात्म्य में हमने पहले ब्राह्मी यात्रा के विषय में सुना था।
श्लोक 10 (skanda.7.1.10)
अधुना वैष्णवीं रौद्रीं यात्रां सर्वार्थसंयुताम्। वक्तुमर्हसि चास्माकं पुराणार्थविशारद
adhunā vaiṣṇavīṁ raudrīṁ yātrāṁ sarvārthasaṁyutām| vaktumarhasi cāsmākaṁ purāṇārthaviśārada
हे पुराणार्थविशारद! अब आप हमें सर्वार्थयुक्त वैष्णवी और रौद्री यात्रा के विषय में बताने की कृपा करें।
श्लोक 11 (skanda.7.1.11)
मुनीनां वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः। प्रणम्य शिरसा प्राह व्यासं सत्यवतीसुतम्
munīnāṁ vacanaṁ śrutvā sūtaḥ paurāṇikottamaḥ| praṇamya śirasā prāha vyāsaṁ satyavatīsutam
मुनियों का यह वचन सुनकर, पौराणिकों में श्रेष्ठ सूत ने सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए सत्यवती-पुत्र व्यास का स्मरण करके यह कहा।
श्लोक 12 (skanda.7.1.12)
रोमहर्षण उवाच। श्रीवत्सांकं जगद्योनिं हरिमोंकाररूपिणम्। अप्रमेयं गुरुं देवं निर्मलं निर्मलाश्रयम्
romaharṣaṇa uvāca| śrīvatsāṁkaṁ jagadyoniṁ harimoṁkārarūpiṇam| aprameyaṁ guruṁ devaṁ nirmalaṁ nirmalāśrayam
रोमहर्षण ने कहा—श्रीवत्स के चिह्नवाले, जगत् के उद्गम, ओंकाररूपी हरि को, जो अप्रमेय हैं, गुरु हैं, देव हैं, निर्मल हैं और निर्मलता के आश्रय हैं—
श्लोक 13 (skanda.7.1.13)
हंसं शुचिषदं व्योम व्यापकं सर्वदं शिवम्। उदासीनं निरायासं निष्प्रपञ्चं निरञ्जनम्
haṁsaṁ śuciṣadaṁ vyoma vyāpakaṁ sarvadaṁ śivam| udāsīnaṁ nirāyāsaṁ niṣprapañcaṁ nirañjanam
जो हंस हैं, पवित्रता में निवास करने वाले हैं, आकाशरूप और व्यापक हैं, सबको देने वाले हैं, कल्याणस्वरूप हैं, उदासीन, प्रयासरहित, प्रपंचरहित और निरंजन हैं—
श्लोक 14 (skanda.7.1.14)
शून्यं बिंदुस्वरूपं तु ध्येयं ध्यानविवर्जितम्। अस्ति नास्तीति यं प्राहुः सुदूरे चांतिके च यत्
śūnyaṁ biṁdusvarūpaṁ tu dhyeyaṁ dhyānavivarjitam| asti nāstīti yaṁ prāhuḥ sudūre cāṁtike ca yat
जो शून्यरूप हैं, बिन्दुस्वरूप हैं, ध्यान करने योग्य होकर भी ध्यान से परे हैं, जिन्हें कोई 'है' और कोई 'नहीं है' कहते हैं, जो अत्यन्त दूर भी हैं और अत्यन्त निकट भी हैं—
श्लोक 15 (skanda.7.1.15)
मनोग्राह्यं परं धाम पुरुषाख्यं जगन्मयम्। हृत्पंकजसमासीनं तेजोरूपं निरिंद्रियम्
manogrāhyaṁ paraṁ dhāma puruṣākhyaṁ jaganmayam| hṛtpaṁkajasamāsīnaṁ tejorūpaṁ niriṁdriyam
जो केवल मन से ग्रहण किए जाने योग्य परम धाम हैं, पुरुष नाम से प्रसिद्ध हैं, जगन्मय हैं, हृदयकमल में विराजमान हैं, तेजोरूप हैं और इन्द्रियों से रहित हैं—
श्लोक 16 (skanda.7.1.16)
एवंविधं नमस्कृत्य परमात्मानमीश्वरम्। कथां वदिष्ये द्विविधां द्विशरीरां तथैव तु
evaṁvidhaṁ namaskṛtya paramātmānamīśvaram| kathāṁ vadiṣye dvividhāṁ dviśarīrāṁ tathaiva tu
ऐसे परमात्मा ईश्वर को नमस्कार करके मैं दो प्रकार की तथा दो शरीरों वाली कथा कहूँगा,
श्लोक 17 (skanda.7.1.17)
दिव्यभाषासमोपेतां वेदाधिष्ठानसंयुताम्। पञ्चसंधिसमायुक्तां षडलंकारभूषिताम्
divyabhāṣāsamopetāṁ vedādhiṣṭhānasaṁyutām| pañcasaṁdhisamāyuktāṁ ṣaḍalaṁkārabhūṣitām
जो दिव्य भाषा से युक्त है, वेद के आधार से संयुक्त है, पाँच सन्धियों से युक्त है और छः अलंकारों से विभूषित है,
श्लोक 18 (skanda.7.1.18)
सप्तसाधनसंयुक्तां रसाष्टगुणरंजिताम्। गुणैर्नवभिराकीर्णां दशदोषविवर्जिताम्
saptasādhanasaṁyuktāṁ rasāṣṭaguṇaraṁjitām| guṇairnavabhirākīrṇāṁ daśadoṣavivarjitām
जो सात साधनों से युक्त है, आठ रसरूपी गुणों से रंजित है, नौ गुणों से परिपूर्ण है, और दस दोषों से रहित है,
श्लोक 19 (skanda.7.1.19)
विभाषाभूषितां तद्वदेकायत्तां मनोहराम्। पञ्चकारणसंयुक्तां चतुष्करणसम्मताम्
vibhāṣābhūṣitāṁ tadvadekāyattāṁ manoharām| pañcakāraṇasaṁyuktāṁ catuṣkaraṇasammatām
जो विशेष भाषा से अलंकृत है, एकसूत्र में बँधी हुई और मनोहर है, पाँच कारणों से युक्त है, तथा चार करणों से सम्मत है,
श्लोक 20 (skanda.7.1.20)
पुनश्च द्विविधां तद्वज्ज्ञानसंदोहदायिनीम्। व्यासेन कथितां पुण्यां शृणुध्वं पापनाशिनीम्
punaśca dvividhāṁ tadvajjñānasaṁdohadāyinīm| vyāsena kathitāṁ puṇyāṁ śṛṇudhvaṁ pāpanāśinīm
और पुनः इसी प्रकार दो प्रकार की, ज्ञान का समूह देने वाली, व्यासजी द्वारा कही गई इस पुण्य तथा पापनाशिनी कथा को सुनो।
श्लोक 21 (skanda.7.1.21)
यां श्रुत्वा पापकर्मापि गच्छेद्धि परमां गतिम्। दुःखत्रयविनिर्मुक्तः सर्वातंकविवर्जितः
yāṁ śrutvā pāpakarmāpi gaccheddhi paramāṁ gatim| duḥkhatrayavinirmuktaḥ sarvātaṁkavivarjitaḥ
जिसे सुनकर पापकर्मी मनुष्य भी त्रिविध दुःखों से मुक्त होकर तथा सब प्रकार के भय से रहित होकर परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 22 (skanda.7.1.22)
न नास्तिके कथां पुण्यामिमां ब्रूयात्कदाचन। श्रद्दधानाय शांताय कीर्तनीया द्विजातये
na nāstike kathāṁ puṇyāmimāṁ brūyātkadācana| śraddadhānāya śāṁtāya kīrtanīyā dvijātaye
यह पुण्य कथा कभी भी नास्तिक को नहीं सुनानी चाहिए; इसे केवल श्रद्धालु, शान्त और द्विजातियों को ही सुनाना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.7.1.23)
निषेकादिः श्मशानांतो मंत्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्ति ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्
niṣekādiḥ śmaśānāṁto maṁtrairyasyodito vidhiḥ| tasya śāstre'dhikāro'sti jñeyo nānyasya kasyacit
जिसके गर्भाधान से लेकर श्मशान तक के संस्कार वैदिक मंत्रों द्वारा विहित हैं, उसी को इस शास्त्र का अधिकार है, यह जानना चाहिए, अन्य किसी को नहीं।
श्लोक 24 (skanda.7.1.24)
चतुःपक्षावदातस्य विशुद्धिर्ब्राह्मणस्य च। सद्वृत्तस्याधिकारोऽस्ति शास्त्रेऽस्मिन्वेदसम्मते
catuḥpakṣāvadātasya viśuddhirbrāhmaṇasya ca| sadvṛttasyādhikāro'sti śāstre'sminvedasammate
जिसकी चार पीढ़ियाँ शुद्ध हों, जो ब्राह्मण की विशुद्धता से युक्त हो और सदाचारी हो, उसी को इस वेदसम्मत शास्त्र का अधिकार है।
श्लोक 25 (skanda.7.1.25)
यथा सुराणां प्रवरो देवदेवो महेश्वरः। नदीनां च यथा गंगा वर्णानां ब्राह्मणो यथा
yathā surāṇāṁ pravaro devadevo maheśvaraḥ| nadīnāṁ ca yathā gaṁgā varṇānāṁ brāhmaṇo yathā
जैसे देवताओं में महेश्वर देवाधिदेव श्रेष्ठ हैं, जैसे नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, जैसे वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है,
श्लोक 26 (skanda.7.1.26)
अक्षराणां तु सर्वेषामोंकारः प्रथमो यथा। पूज्यानां तु यथा माता गुरूणां च यथा पिता। तथैव सर्वशास्त्राणां प्रधानं स्कन्दकीर्तितम्
akṣarāṇāṁ tu sarveṣāmoṁkāraḥ prathamo yathā| pūjyānāṁ tu yathā mātā gurūṇāṁ ca yathā pitā| tathaiva sarvaśāstrāṇāṁ pradhānaṁ skaṁdakīrtitam
जैसे सब अक्षरों में ओंकार प्रथम है, जैसे पूज्यों में माता और गुरुओं में पिता श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सब शास्त्रों में स्कन्द द्वारा कीर्तित यह पुराण प्रधान है।
श्लोक 27 (skanda.7.1.27)
पुरा कैलासशिखरे ब्रह्मादीनां च सन्निधौ। स्कांदं पुराणं कथितं पार्वत्यग्रे पिनाकिना
purā kailāsaśikhare brahmādīnāṁ ca saṁnidhau| skāṁdaṁ purāṇaṁ kathitaṁ pārvatyagre pinākinā
पूर्वकाल में कैलास शिखर पर, ब्रह्मा आदि की उपस्थिति में, पिनाकधारी शिव ने पार्वती के समक्ष यह स्कन्द पुराण कहा था।
श्लोक 28 (skanda.7.1.28)
पार्वत्या षण्मुखस्याग्रे तेन नंदिगणाय वै। नंदिना तु कुमाराय तेन व्यासाय धीमते
pārvatyā ṣaṇmukhasyāgre tena naṁdigaṇāya vai| naṁdinā tu kumārāya tena vyāsāya dhīmate
पार्वती ने इसे षण्मुख (कार्तिकेय) के समक्ष कहा, उन्होंने नन्दिगण को, नन्दी ने कुमार को, और उन्होंने बुद्धिमान व्यास को यह कथा सुनाई।
श्लोक 29 (skanda.7.1.29)
व्यासेन मे समाख्यातं भवद्भ्योऽहं प्रकीर्तये
vyāsena me samākhyātaṁ bhavadbhyo'haṁ prakīrtaye
व्यासजी ने मुझे जो सुनाया था, वही मैं आप लोगों के समक्ष कह रहा हूँ।
श्लोक 30 (skanda.7.1.30)
यूयं सद्भावसंयुक्ता यतः सर्वे महर्षयः। तेन मे भाषितुं श्रद्धा भवतां स्कंदसंहिताम्
yūyaṁ sadbhāvasaṁyuktā yataḥ sarve maharṣayaḥ| tena me bhāṣituṁ śraddhā bhavatāṁ skaṁdasaṁhitām
चूँकि आप सभी महर्षि सद्भाव से युक्त हैं, इसलिए मेरी आप लोगों को स्कन्द-संहिता सुनाने में श्रद्धा है।