Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 101

सांबादित्यमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

श्लोक 1 (skanda.7.101.1)

ईश्वर उवाच। एतस्मिन्नेव काले तु नारदो भगवानृषिः। ब्रह्मणो मानसः पुत्रस्त्रिषु लोकेषु गर्वितः

īśvara uvāca| etasminneva kāle tu nārado bhagavānṛṣiḥ| brahmaṇo mānasaḥ putrastriṣu lokeṣu garvitaḥ

ईश्वर ने कहा—इसी समय भगवान् ऋषि नारद, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और तीनों लोकों में गर्वित थे,

श्लोक 2 (skanda.7.101.2)

सर्वलोकचरः सोऽपि युवा देवनमस्कृतः। तथा यदृच्छया चायमटमानः समंततः

sarvalokacaraḥ so'pi yuvā devanamaskṛtaḥ| tathā yadṛcchayā cāyamaṭamānaḥ samaṁtataḥ

—वे भी सर्वलोकचर, युवा, देवताओं द्वारा नमस्कृत, अपनी इच्छानुसार सर्वत्र विचरण करते हुए,

श्लोक 3 (skanda.7.101.3)

वासुदेवं स वै द्रष्टुं नित्यं द्वारवतीं पुरीम्। आयाति ऋषिभिः सार्द्धं क्रोधेन ऋषिसत्तमः

vāsudevaṁ sa vai draṣṭuṁ nityaṁ dvāravatīṁ purīm| āyāti ṛṣibhiḥ sārddhaṁ krodhena ṛṣisattamaḥ

—वासुदेव के दर्शन हेतु सदैव द्वारवती नगरी में, ऋषियों के साथ, वे ऋषिसत्तम क्रोधपूर्वक आया करते थे।

श्लोक 4 (skanda.7.101.4)

अथाश्वागच्छतस्तस्य सर्वे यदुकुमारकाः। ये प्रद्युम्नप्रभृतयस्ते च प्रह्वाननाः स्थिताः

athāśvāgacchatastasya sarve yadukumārakāḥ| ye pradyumnaprabhṛtayaste ca prahvānanāḥ sthitāḥ

अब जब वे निकट आ रहे थे, प्रद्युम्न आदि सभी यदुकुमार झुके हुए मुखों से खड़े हुए।

श्लोक 5 (skanda.7.101.5)

अभावाच्चार्घ्यपाद्यानां पूजां चक्रुः समंततः। सांबस्त्ववश्यभावित्वात्तस्य शापस्य कारणात्

abhāvāccārghyapādyānāṁ pūjāṁ cakruḥ samaṁtataḥ| sāṁbastvavaśyabhāvitvāttasya śāpasya kāraṇāt

अर्घ्य-पाद्य के अभाव में उन्होंने चारों ओर से उनकी पूजा की; परंतु सांब, उस शाप के कारण की अवश्यंभाविता के कारण,

श्लोक 6 (skanda.7.101.6)

अवज्ञां कुरुते नित्यं नारदस्य महात्मनः। रतक्रीडा स वै नित्यं रूपयौवनगर्वितः

avajñāṁ kurute nityaṁ nāradasya mahātmanaḥ| ratakrīḍā sa vai nityaṁ rūpayauvanagarvitaḥ

—महात्मा नारद का सदैव अनादर करता है; वह सदैव रतिक्रीड़ा में लीन रहता है, अपने रूप और यौवन पर गर्वित।

श्लोक 7 (skanda.7.101.7)

अविनीतं तु तं दृष्ट्वा चिन्तयामास नारदः। अस्याहमविनीतस्य करिष्ये विनयं शुभम्

avinītaṁ tu taṁ dṛṣṭvā cintayāmāsa nāradaḥ| asyāhamavinītasya kariṣye vinayaṁ śubham

उसे इस प्रकार अविनीत देखकर नारद ने सोचा—'मैं इस अविनीत का शुभ विनय करूँगा।'

श्लोक 8 (skanda.7.101.8)

एवं स चिन्तयित्वातु वासुदेवमथाब्रवीत्। इमाः षोडशसाहस्राः स्त्रियो या देवसत्तम

evaṁ sa cintayitvātu vāsudevamathābravīt| imāḥ ṣoḍaśasāhasrāḥ striyo yā devasattama

ऐसा सोचकर उन्होंने फिर वासुदेव से कहा—'हे देवसत्तम, ये जो सोलह हजार स्त्रियाँ हैं—'

श्लोक 9 (skanda.7.101.9)

सर्वास्तासां सदा सांबे भावो देव समाश्रितः। रूपेणाप्रतिमः सांबो लोकेऽस्मिन्सचराचरे

sarvāstāsāṁ sadā sāṁbe bhāvo deva samāśritaḥ| rūpeṇāpratimaḥ sāṁbo loke'sminsacarācare

'—उन सभी का भाव सदैव सांब में आश्रित है; सांब इस चराचर लोक में रूप में अप्रतिम है।'

श्लोक 10 (skanda.7.101.10)

सदाऽर्हंति च तास्तस्य दर्शनं ह्यपि सत्स्त्रियः। श्रुत्वैवं नारदाद्वाक्यं चिन्तयामास केशवः

sadā'rhaṁti ca tāstasya darśanaṁ hyapi satstriyaḥ| śrutvaivaṁ nāradādvākyaṁ cintayāmāsa keśavaḥ

'सती स्त्रियाँ भी सदैव उसके दर्शन की पात्र हैं।' नारद का यह वचन सुनकर केशव ने विचार किया।

श्लोक 11 (skanda.7.101.11)

यदेतन्नारदेनोक्तं सत्यमत्र तु किं भवेत्। एवं च श्रूयते लोके चापल्यं स्त्रीषु विद्यते। श्लोकाविमौ पुरा गीतौ चित्तज्ञैर्योषितां द्विजैः

yadetannāradenoktaṁ satyamatra tu kiṁ bhavet| evaṁ ca śrūyate loke cāpalyaṁ strīṣu vidyate| ślokāvimau purā gītau cittajñairyoṣitāṁ dvijaiḥ

'नारद ने जो यह कहा है, इसमें सत्य क्या हो सकता है? ऐसा लोक में सुना जाता है कि स्त्रियों में चंचलता विद्यमान है। स्त्रियों के मन को जानने वाले द्विजों द्वारा पूर्वकाल में ये दो श्लोक गाए गए थे—'

श्लोक 12 (skanda.7.101.12)

पौंश्चल्यादतिचापल्यादज्ञानाच्च स्वभावतः। रक्षिता यत्नतो ह्येता विकुर्वंति हि भर्तृषु

pauṁścalyādaticāpalyādajñānācca svabhāvataḥ| rakṣitā yatnato hyetā vikurvaṁti hi bhartṛṣu

'—व्यभिचार से, अत्यधिक चंचलता से तथा स्वभाव से अज्ञान के कारण, यत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी ये स्त्रियाँ अपने पतियों के प्रति विकार करती हैं।'

श्लोक 13 (skanda.7.101.13)

नैता रूपं परीक्षंते नाऽऽसां वयसि संश्रयः। सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुंजते

naitā rūpaṁ parīkṣaṁte nā'sāṁ vayasi saṁśrayaḥ| surūpaṁ vā virūpaṁ vā pumānityeva bhuṁjate

'वे रूप की परीक्षा नहीं करतीं, न ही उन्हें आयु का आश्रय है; सुंदर हो या कुरूप, वे बस उसे पुरुष मानकर ही भोगती हैं।'

श्लोक 14 (skanda.7.101.14)

ईश्वर उवाच। मनसा चिन्तयित्वैवं कृष्णो नारदमब्रवीत्। नह्यहं श्रद्दधाम्येतद्यदेतद्भाषितं पुरा

īśvara uvāca| manasā cintayitvaivaṁ kṛṣṇo nāradamabravīt| nahyahaṁ śraddadhāmyetadyadetadbhāṣitaṁ purā

ईश्वर ने कहा—मन में इस प्रकार विचार करके कृष्ण ने नारद से कहा—'मुझे अभी कहे गए इस वचन पर विश्वास नहीं है।'

श्लोक 15 (skanda.7.101.15)

ब्रुवाणमेवं देवं तु नारदः प्रत्युवाच ह। तथाहं तु करिष्यामि यथा श्रद्धास्यते भवान्

bruvāṇamevaṁ devaṁ tu nāradaḥ pratyuvāca ha| tathāhaṁ tu kariṣyāmi yathā śraddhāsyate bhavān

देव के ऐसा कहने पर नारद ने उत्तर दिया—'तो मैं ऐसा करूँगा जिससे आप विश्वास करेंगे।'

श्लोक 16 (skanda.7.101.16)

एवमुक्त्वा ययौ भूयो नारदस्तु यथागतम्। ततः कतिपयाहस्य द्वारकां पुनरभ्यगात्

evamuktvā yayau bhūyo nāradastu yathāgatam| tataḥ katipayāhasya dvārakāṁ punarabhyagāt

ऐसा कहकर नारद पुनः जिस मार्ग से आए थे उसी मार्ग से चले गए; फिर कुछ दिनों बाद वे पुनः द्वारका लौट आए।

श्लोक 17 (skanda.7.101.17)

तस्मिन्नहनि देवोऽपि सहांतःपौरकैर्जनैः। अनुभूय जलक्रीडां पानमासेवते रहः

tasminnahani devo'pi sahāṁtaḥpaurakairjanaiḥ| anubhūya jalakrīḍāṁ pānamāsevate rahaḥ

उस दिन देव स्वयं अंतःपुर के जनों सहित जलक्रीड़ा का आनंद लेकर एकांत में मद्यपान कर रहे थे।

श्लोक 18 (skanda.7.101.18)

रम्ये रैवतकोद्याने नानाद्रुमविभूषिते। सर्वर्तुकुसुमैर्नित्यं वासिते सर्वकामने

ramye raivatakodyāne nānādrumavibhūṣite| sarvartukusumairnityaṁ vāsite sarvakāmane

रम्य रैवतक उद्यान में, जो विविध वृक्षों से सुशोभित, सभी ऋतुओं के पुष्पों से सदैव सुवासित तथा सर्वकामनापूरक था,

श्लोक 19 (skanda.7.101.19)

नानाजलजफुल्लाभिर्दीर्घिकाभिरलंकृते। हंससारससंघुष्टे चक्रवाकोपशोभिते

nānājalajaphullābhirdīrghikābhiralaṁkṛte| haṁsasārasasaṁghuṣṭe cakravākopaśobhite

—जो विविध जलजों से खिली हुई दीर्घिकाओं से अलंकृत, हंस-सारसों के कलरव से गुंजित तथा चक्रवाकों से सुशोभित था।

श्लोक 20 (skanda.7.101.20)

तस्मिन्स रमते देवः स्त्रीभिः परिवृतस्तदा। हारनूपुरकेयूररसनाद्यैर्विभूषणैः

tasminsa ramate devaḥ strībhiḥ parivṛtastadā| hāranūpurakeyūrarasanādyairvibhūṣaṇaiḥ

वहाँ देव उस समय स्त्रियों से घिरे हुए, हार, नूपुर, केयूर और करधनी आदि आभूषणों से सुशोभित होकर विहार कर रहे थे।

श्लोक 21 (skanda.7.101.21)

भूषितानां वरस्त्रीणां सर्वांगीणां विशेषतः। तत्रस्थः पिबते पानं शुभगन्धान्वितं शुभम्

bhūṣitānāṁ varastrīṇāṁ sarvāṁgīṇāṁ viśeṣataḥ| tatrasthaḥ pibate pānaṁ śubhagandhānvitaṁ śubham

समस्त अंगों में विशेष रूप से आभूषित उन उत्तम स्त्रियों के बीच वहाँ बैठकर वे सुगंधयुक्त शुभ पान पी रहे थे।

श्लोक 22 (skanda.7.101.22)

एतस्मिन्नंतरे बुद्ध्वा मद्यमत्तास्ततः स्त्रियः। उवाच नारदः सांबमस्मिंस्तिष्ठ कुमारक

etasminnaṁtare buddhvā madyamattāstataḥ striyaḥ| uvāca nāradaḥ sāṁbamasmiṁstiṣṭha kumāraka

इसी बीच स्त्रियों को मद्य से मत्त हुआ जानकर नारद ने सांब से कहा—'हे कुमार, यहीं ठहरो—'

श्लोक 23 (skanda.7.101.23)

त्वां समाह्वयते देवो न युक्तं स्थातुमत्र ते। तद्वाक्यार्थमबुद्ध्वैव नारदेनाथ नोदितः

tvāṁ samāhvayate devo na yuktaṁ sthātumatra te| tadvākyārthamabuddhvaiva nāradenātha noditaḥ

'—देव तुम्हें बुला रहे हैं; तुम्हारा यहाँ ठहरना उचित नहीं है।' उस वचन के अभिप्राय को न समझते हुए, नारद द्वारा प्रेरित होकर,

श्लोक 24 (skanda.7.101.24)

गत्वा तु सत्वरं सांबः प्रणाममकरोत्पितुः। निर्द्दिष्टमासनं भेजे यथाभावेन विष्णुना

gatvā tu satvaraṁ sāṁbaḥ praṇāmamakarotpituḥ| nirddiṣṭamāsanaṁ bheje yathābhāvena viṣṇunā

—सांब शीघ्र जाकर पिता को प्रणाम कर, विष्णु द्वारा यथाभाव निर्दिष्ट आसन पर बैठ गया।

श्लोक 25 (skanda.7.101.25)

एतस्मिन्नंतरे तत्र यास्तु वै चाल्पसात्त्विकाः। ता दृष्ट्वा सहसा सांबं सर्वाश्चुक्षुभिरे स्त्रियः

etasminnaṁtare tatra yāstu vai cālpasāttvikāḥ| tā dṛṣṭvā sahasā sāṁbaṁ sarvāścukṣubhire striyaḥ

इसी बीच वहाँ जो अल्पसत्त्व स्त्रियाँ थीं, वे सहसा सांब को देखकर सभी क्षुब्ध हो उठीं।

श्लोक 26 (skanda.7.101.26)

न स दृष्टः पुरा याभिरंतःपुरनिवासिभिः। मद्यदोषात्ततस्तासां स्मृतिलोपात्तथा बहु

na sa dṛṣṭaḥ purā yābhiraṁtaḥpuranivāsibhiḥ| madyadoṣāttatastāsāṁ smṛtilopāttathā bahu

उसे उन अंतःपुरनिवासिनी स्त्रियों ने पहले नहीं देखा था; तब मद्य के दोष से तथा स्मृति के अत्यधिक लोप से,

श्लोक 27 (skanda.7.101.27)

स्वभावतोऽल्पसत्त्वानां जघनानि विसुस्रुवुः। श्रूयते चाप्ययं श्लोकः पुराणप्रथितः क्षितौ

svabhāvato'lpasattvānāṁ jaghanāni visusruvuḥ| śrūyate cāpyayaṁ ślokaḥ purāṇaprathitaḥ kṣitau

—स्वभावतः अल्पसत्त्व स्त्रियों के वस्त्र ढीले हो गए। पृथ्वी पर पुराणों में प्रसिद्ध यह श्लोक भी सुना जाता है—

श्लोक 28 (skanda.7.101.28)

ब्रह्मचर्येऽपि वर्त्तंत्या योगिन्या वा प्रमादतः। प्रकृष्टं पुरुषं दृष्ट्वा वरांगं क्लिद्यते स्त्रियाः

brahmacarye'pi varttaṁtyā yoginyā vā pramādataḥ| prakṛṣṭaṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā varāṁgaṁ klidyate striyāḥ

'ब्रह्मचर्य में रहने वाली अथवा योगिनी स्त्री भी प्रमादवश उत्कृष्ट पुरुष को देखकर उसका सुंदर अंग कामातुर हो उठता है।'

श्लोक 29 (skanda.7.101.29)

लोकेऽपि दृश्यते ह्येतन्मद्यस्याप्यथ सेवनात्। लज्जां मुंचंति निःशंका ह्रीमत्यो ह्यपि च स्त्रियः

loke'pi dṛśyate hyetanmadyasyāpyatha sevanāt| lajjāṁ muṁcaṁti niḥśaṁkā hrīmatyo hyapi ca striyaḥ

यह लोक में भी देखा जाता है कि मद्य के सेवन से ही लज्जाशील स्त्रियाँ भी निःशंक होकर लज्जा त्याग देती हैं।

श्लोक 30 (skanda.7.101.30)

समांसैर्भोजनैः स्निग्धैः पानैः सीधुसुरासवैः। गंधैर्मनोज्ञैर्वस्त्रैश्च कामः स्त्रीषु विजृंभति

samāṁsairbhojanaiḥ snigdhaiḥ pānaiḥ sīdhusurāsavaiḥ| gandhairmanojñairvastraiśca kāmaḥ strīṣu vijṛṁbhati

मांसयुक्त स्निग्ध भोजनों से, सीधु और सुरा जैसे पेयों से, मनोहर गंधों और वस्त्रों से स्त्रियों में काम बढ़ जाता है।

श्लोक 31 (skanda.7.101.31)

मद्यं न देयमत्यर्थं पुरुषेण विपश्चिता। मदोन्मत्ताः स्वभावेन पूर्वं संति यतः स्त्रियः

madyaṁ na deyamatyarthaṁ puruṣeṇa vipaścitā| madonmattāḥ svabhāvena pūrvaṁ saṁti yataḥ striyaḥ

बुद्धिमान पुरुष को मद्य कभी नहीं देना चाहिए; क्योंकि स्त्रियाँ स्वभाव से ही पहले से मदोन्मत्त होती हैं।

श्लोक 32 (skanda.7.101.32)

नारदोऽप्यथ तं सांबं प्रेषयित्वा त्वरान्वितः। आजगामाथ तत्रैव सांबस्यानुपदेन तु

nārado'pyatha taṁ sāṁbaṁ preṣayitvā tvarānvitaḥ| ājagāmātha tatraiva sāṁbasyānupadena tu

नारद ने इस प्रकार सांब को शीघ्रता से भेजकर, फिर स्वयं सांब के पीछे-पीछे वहीं आ पहुँचे।

श्लोक 33 (skanda.7.101.33)

आयांतं ताः स्वयं दृष्ट्वा प्रियसौमनसं मुनिम्। सहसैवोत्थिताः सर्वा मदोन्मत्ता अपि स्त्रियः

āyāṁtaṁ tāḥ svayaṁ dṛṣṭvā priyasaumanasaṁ munim| sahasaivotthitāḥ sarvā madonmattā api striyaḥ

उस प्रिय-सौम्य मुनि को स्वयं आते देखकर वे मदोन्मत्त स्त्रियाँ भी सहसा सभी खड़ी हो गईं।

श्लोक 34 (skanda.7.101.34)

तासामथोत्थितानां तु वासुदेवस्य पश्यतः। भित्त्वा वासांस्यनर्घाणि पात्रेषु पतितानि तु

tāsāmathotthitānāṁ tu vāsudevasya paśyataḥ| bhittvā vāsāṁsyanarghāṇi pātreṣu patitāni tu

उनके इस प्रकार खड़े होने पर, वासुदेव के देखते ही देखते, उनके अमूल्य वस्त्र खुलकर पात्रों पर गिर पड़े,

श्लोक 35 (skanda.7.101.35)

जघनेषु विलग्नानि तानि पेतुः पृथक्पृथक्। तद्दृष्ट्वा तु हरिः कुद्धस्ताः शशाप ततोऽबलाः

jaghaneṣu vilagnāni tāni petuḥ pṛthakpṛthak| taddṛṣṭvā tu hariḥ kuddhastāḥ śaśāpa tato'balāḥ

—उनकी जांघों में उलझकर वे अलग-अलग गिर गए। यह देखकर हरि क्रुद्ध होकर उन अबलाओं को शाप दे बैठे।

श्लोक 36 (skanda.7.101.36)

यस्माद्गतानि चेतांसि मां मुक्त्वाऽन्यत्र वः स्त्रियः। तस्मात्पतिकृताँल्लोकानायुषोंऽते न यास्यथ

yasmādgatāni cetāṁsi māṁ muktvā'nyatra vaḥ striyaḥ| tasmātpatikṛtāllokānāyuṣo'nte na yāsyatha

'चूँकि तुम स्त्रियों के मन मुझे छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं, इसलिए तुम आयु के अंत में पति द्वारा अर्जित लोकों को प्राप्त नहीं करोगी।'

श्लोक 37 (skanda.7.101.37)

पतिलोकात्परिभ्रष्टाः स्वर्गमार्गात्तथैव च। भूत्वा ह्यशरणा भूयो दस्युहस्तं गमिष्यथ

patilokātparibhraṣṭāḥ svargamārgāttathaiva ca| bhūtvā hyaśaraṇā bhūyo dasyuhastaṁ gamiṣyatha

'पतिलोक से भ्रष्ट होकर तथा स्वर्गमार्ग से भी भ्रष्ट होकर, पुनः अशरण होकर तुम डाकुओं के हाथों में पड़ोगी।'

श्लोक 38 (skanda.7.101.38)

शापदोषात्ततस्तस्मात्ताः स्त्रियो गां गते हरौ। हृताः पांचनदैश्चौरैरर्जुनस्य प्रपश्यतः

śāpadoṣāttatastasmāttāḥ striyo gāṁ gate harau| hṛtāḥ pāṁcanadaiścaurairarjunasya prapaśyataḥ

उस शाप के दोष के कारण, हरि के गोलोक-गमन के समय, वे स्त्रियाँ अर्जुन के देखते-देखते पंचनद के चोरों द्वारा हर ली गईं।

श्लोक 39 (skanda.7.101.39)

अल्पसत्त्वाश्च याश्चासंस्ता गता दूषणं स्त्रियः। रुक्मिणी सत्यभामा च तथा जांबवती प्रिये

alpasattvāśca yāścāsaṁstā gatā dūṣaṇaṁ striyaḥ| rukmiṇī satyabhāmā ca tathā jāṁbavatī priye

जो अल्पसत्त्व स्त्रियाँ पहले ऐसी नहीं थीं, वे भी दोष को प्राप्त हुईं; परंतु रुक्मिणी, सत्यभामा तथा जांबवती, हे प्रिये,

श्लोक 40 (skanda.7.101.40)

न प्राप्ता दस्युहस्तं ताः स्वेन सत्त्वेन रक्षिताः। शप्त्वैवं ताः स्त्रियः कृष्णः सांबमप्यशपत्पुनः

na prāptā dasyuhastaṁ tāḥ svena sattvena rakṣitāḥ| śaptvaivaṁ tāḥ striyaḥ kṛṣṇaḥ sāṁbamapyaśapatpunaḥ

—डाकुओं के हाथ नहीं पड़ीं; वे अपने ही सत्त्व से सुरक्षित रहीं। इस प्रकार उन स्त्रियों को शाप देकर कृष्ण ने सांब को भी पुनः शाप दिया।

श्लोक 41 (skanda.7.101.41)

यस्मादतीव ते कांतं दृष्ट्वा रूपमिमाः स्त्रियः। क्षुब्धाः सर्वा यतस्तस्मात्कुष्ठरोगमवाप्नुहि

yasmādatīva te kāṁtaṁ dṛṣṭvā rūpamimāḥ striyaḥ| kṣubdhāḥ sarvā yatastasmātkuṣṭharogamavāpnuhi

'चूँकि तुम्हारे अत्यंत मनोहर रूप को देखकर ये सभी स्त्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं, इसलिए तुम कुष्ठरोग को प्राप्त हो।'

श्लोक 42 (skanda.7.101.42)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सांबो लज्जासमन्वितः। उवाच प्रहसन्वाक्यं स स्मरन्नृषिसत्तमम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā sāṁbo lajjāsamanvitaḥ| uvāca prahasanvākyaṁ sa smarannṛṣisattamam

उनके उस वचन को सुनकर सांब, लज्जायुक्त होकर, उस ऋषिसत्तम का स्मरण करते हुए, हँसते हुए बोला।

श्लोक 43 (skanda.7.101.43)

अनिमित्तमहं तात भावदोषविवर्जितः। शप्तो न मेऽत्र वै कुद्धो दुर्वासा नान्यथा वदेत्

animittamahaṁ tāta bhāvadoṣavivarjitaḥ| śapto na me'tra vai kuddho durvāsā nānyathā vadet

'हे तात, मैं भावदोष से रहित होकर भी अकारण शापित हुआ हूँ; परंतु क्रुद्ध हुए दुर्वासा अन्यथा नहीं कहेंगे, अर्थात् उनका वचन सत्य होकर रहेगा।'

श्लोक 44 (skanda.7.101.44)

एवमुक्त्वा ततः सांबः कृष्णं कमललोचनम्। ततो वैराग्यसंयुक्तश्चिन्ताशोकपरायणः

evamuktvā tataḥ sāṁbaḥ kṛṣṇaṁ kamalalocanam| tato vairāgyasaṁyuktaścintāśokaparāyaṇaḥ

कमललोचन कृष्ण से ऐसा कहकर सांब तब वैराग्य से युक्त होकर, चिंता और शोक में डूबा हुआ,

श्लोक 45 (skanda.7.101.45)

प्रभासक्षेत्रमगमत्सर्वपातकनाशनम्। एवं तत्क्षेत्रमासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्

prabhāsakṣetramagamatsarvapātakanāśanam| evaṁ tatkṣetramāsādya tapastepe sudāruṇam

—सर्वपातकनाशक प्रभासक्षेत्र में गया। इस प्रकार उस क्षेत्र में पहुँचकर उसने अत्यंत दारुण तप किया।

श्लोक 46 (skanda.7.101.46)

प्रतिष्ठाप्य सहस्रांशुं देवं पापनिषूदनम्। ततश्चाराधयामास परं नियममाश्रितः

pratiṣṭhāpya sahasrāṁśuṁ devaṁ pāpaniṣūdanam| tataścārādhayāmāsa paraṁ niyamamāśritaḥ

सहस्रांशु, उस पापनिषूदक देव की स्थापना करके, उसने परम नियम का आश्रय लेकर उनकी आराधना की।

श्लोक 47 (skanda.7.101.47)

त्रिसंध्यं पूजयामास दिव्यगंधानुलेपनैः। स्तोत्रेणानेन भक्त्या वै स्तौति नित्यं दिनाधिपम्

trisaṁdhyaṁ pūjayāmāsa divyagandhānulepanaiḥ| stotreṇānena bhaktyā vai stauti nityaṁ dinādhipam

उसने त्रिकाल दिव्य सुगंधित लेपों से पूजा की; इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक वह सदैव दिनाधिप की स्तुति करता था।

श्लोक 48 (skanda.7.101.48)

सांब उवाच। नमस्त्रैलोक्यदीपाय नमस्ते तिमिरापह। नमः पंकजनाथाय नमः कुमुदशत्रवे

sāṁba uvāca| namastrailokyadīpāya namaste timirāpaha| namaḥ paṁkajanāthāya namaḥ kumudaśatrave

सांब ने कहा—त्रैलोक्य के दीपक को नमस्कार! हे तिमिरनाशक, तुम्हें नमस्कार! पंकज के स्वामी को नमस्कार! कुमुद के शत्रु को नमस्कार!

श्लोक 49 (skanda.7.101.49)

नमो जगत्प्रतिष्ठाय जगद्धात्रे नमोऽस्तु ते। देवदेव नमस्यामि सूर्यं त्रैलोक्यदीपकम्

namo jagatpratiṣṭhāya jagaddhātre namo'stu te| devadeva namasyāmi sūryaṁ trailokyadīpakam

जगत् की प्रतिष्ठा को नमस्कार! हे जगद्धाता, तुम्हें नमस्कार हो! हे देवदेव, मैं त्रैलोक्यदीपक सूर्य को नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.7.101.50)

आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता अपूर्व एष प्रथमः सुराणाम्। हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा स पठ्यते वै तमसः परस्तात्

ādityavarṇo bhuvanasya goptā apūrva eṣa prathamaḥ surāṇām| hiraṇyagarbhaḥ puruṣo mahātmā sa paṭhyate vai tamasaḥ parastāt

आदित्यवर्ण, भुवन के रक्षक, अपूर्व, देवताओं में प्रथम—वे हिरण्यगर्भ पुरुष महात्मा तमस् से परे कहे जाते हैं।

श्लोक 51 (skanda.7.101.51)

इति स्तुतस्तदा सूर्यः प्रसन्नेनांतरात्मना। उवाच दर्शनं गत्वा सांबं जांबवतीसुतम्

iti stutastadā sūryaḥ prasannenāṁtarātmanā| uvāca darśanaṁ gatvā sāṁbaṁ jāṁbavatīsutam

इस प्रकार स्तुति किए जाने पर सूर्य ने प्रसन्न अंतरात्मा से, दर्शन देकर, जांबवतीसुत सांब से कहा।

श्लोक 52 (skanda.7.101.52)

सांबसांब महावाहो शृणु गोविन्दनन्दने। स्तोत्रेणानेन तुष्टोऽहं वरं ब्रूहि यदीप्सितम्

sāṁbasāṁba mahāvāho śṛṇu govindanandane| stotreṇānena tuṣṭo'haṁ varaṁ brūhi yadīpsitam

'हे सांब, सांब, महाबाहु, हे गोविंदनंदन, सुनो! मैं इस स्तोत्र से संतुष्ट हूँ; जो अभीष्ट हो वह वर माँगो।'

श्लोक 53 (skanda.7.101.53)

सांब उवाच। कृष्णेनाहं सुरश्रेष्ठ शप्तः पापः सुदुर्मतिः। कुष्ठांतं कुरु मे देव यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो

sāṁba uvāca| kṛṣṇenāhaṁ suraśreṣṭha śaptaḥ pāpaḥ sudurmatiḥ| kuṣṭhāṁtaṁ kuru me deva yadi tuṣṭo'si me prabho

सांब ने कहा—'हे सुरश्रेष्ठ, पापी और दुर्मति मैं कृष्ण द्वारा शापित हुआ हूँ; हे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे प्रभो, तो मेरे कुष्ठ का अंत कीजिए।'

श्लोक 54 (skanda.7.101.54)

श्रीभानुरुवाच। भूय एव महाभाग नीरोगस्त्वं भविष्यसि। यादृग्रूपः पुरा ह्यासीर्मम चैव प्रसादतः

śrībhānuruvāca| bhūya eva mahābhāga nīrogastvaṁ bhaviṣyasi| yādṛgrūpaḥ purā hyāsīrmama caiva prasādataḥ

श्रीभानु ने कहा—'हे महाभाग, तुम मेरी ही कृपा से पुनः निरोग हो जाओगे, जैसा तुम्हारा रूप पूर्वकाल में था।'

श्लोक 55 (skanda.7.101.55)

अद्य प्रभृति नेक्ष्यास्ता विष्णुभार्याः कथंचन। न तासां दर्शने जातु स्थातव्यं यदुनन्दन

adya prabhṛti nekṣyāstā viṣṇubhāryāḥ kathaṁcana| na tāsāṁ darśane jātu sthātavyaṁ yadunandana

'आज से तुम विष्णु की पत्नियों को किसी भी प्रकार नहीं देखोगे; हे यदुनंदन, तुम्हें उनके दर्शन में कदापि नहीं ठहरना चाहिए।'

श्लोक 56 (skanda.7.101.56)

तासामीर्ष्यापरीतेन विष्णुना प्रभविष्णुना। कुष्ठं ते यादवश्रेष्ठ प्रदत्तं हि महात्मना

tāsāmīrṣyāparītena viṣṇunā prabhaviṣṇunā| kuṣṭhaṁ te yādavaśreṣṭha pradattaṁ hi mahātmanā

'उनके प्रति ईर्ष्या से घिरे प्रभविष्णु महात्मा विष्णु द्वारा ही, हे यादवश्रेष्ठ, तुम्हें यह कुष्ठ प्रदान किया गया था।'

श्लोक 57 (skanda.7.101.57)

यो मां स्तोत्रेण चानेन समागत्य च स्तोष्यति। न तस्यान्वयसंभूतः कुष्ठी कश्चिद्भविष्यति

yo māṁ stotreṇa cānena samāgatya ca stoṣyati| na tasyānvayasaṁbhūtaḥ kuṣṭhī kaścidbhaviṣyati

'जो कोई आकर इसी स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा, उसके वंश में उत्पन्न कोई भी कुष्ठी नहीं होगा।'

श्लोक 58 (skanda.7.101.58)

अथादित्यस्य नामानि सम्यग्जानीहि द्वादश। द्वादशैव तथान्यानि तानि वक्ष्याम्यशेषतः

athādityasya nāmāni samyagjānīhi dvādaśa| dvādaśaiva tathānyāni tāni vakṣyāmyaśeṣataḥ

'अब आदित्य के बारह नामों को भलीभाँति जानो; इनके अतिरिक्त अन्य बारह नाम भी मैं तुम्हें पूर्णरूप से बताऊँगा।'

श्लोक 59 (skanda.7.101.59)

आदित्यः सविता सूर्यो मिहिरोऽर्कः प्रतापनः। मार्त्तंडो भास्करो भानुश्चित्रभानुर्द्दिवाकरः

ādityaḥ savitā sūryo mihiro'rkaḥ pratāpanaḥ| mārttaṇḍo bhāskaro bhānuścitrabhānurddivākaraḥ

'आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रतापन, मार्तंड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर—'

श्लोक 60 (skanda.7.101.60)

रविर्द्वादशनामैवं ज्ञेयः सामान्यनामभिः। विष्णुर्धाता भगः पूषा मित्रोंऽशुर्वरुणोऽर्यमा

ravirdvādaśanāmaivaṁ jñeyaḥ sāmānyanāmabhiḥ| viṣṇurdhātā bhagaḥ pūṣā mitro'ṁśurvaruṇo'ryamā

'—रवि: इस प्रकार ये बारह सामान्य नाम जानने चाहिए। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, अंशु, वरुण, अर्यमा,'

श्लोक 61 (skanda.7.101.61)

इन्द्रो विवस्वांस्त्वष्टा च पर्जन्यो द्वादशः स्मृतः। इति ते द्वादशादित्याः पृथक्त्वेन प्रकीर्तिताः

indro vivasvāṁstvaṣṭā ca parjanyo dvādaśaḥ smṛtaḥ| iti te dvādaśādityāḥ pṛthaktvena prakīrtitāḥ

'इंद्र, विवस्वान्, त्वष्टा और द्वादश माना गया पर्जन्य: इस प्रकार ये बारह आदित्य पृथक्-पृथक् रूप से कहे गए हैं।'

श्लोक 62 (skanda.7.101.62)

उत्तिष्ठंति सदा ह्येते मासैर्द्वादशभिः क्रमात्। विष्णुस्तपति वै चैत्रे वैशाखे चार्यमा सदा

uttiṣṭhaṁti sadā hyete māsairdvādaśabhiḥ kramāt| viṣṇustapati vai caitre vaiśākhe cāryamā sadā

'ये सदैव क्रमशः बारह महीनों में उदित होते हैं। चैत्र में विष्णु तपते हैं, और सदैव वैशाख में अर्यमा।'

श्लोक 63 (skanda.7.101.63)

विवस्वाञ्ज्येष्ठमासे तु आषाढे चांशुमांस्तथा। पर्ज्जन्यः श्रावणे मासि वरुणः प्रौष्ठसंज्ञिके

vivasvāñjyeṣṭhamāse tu āṣāḍhe cāṁśumāṁstathā| parjjanyaḥ śrāvaṇe māsi varuṇaḥ prauṣṭhasaṁjñike

'ज्येष्ठ मास में विवस्वान्, तथा आषाढ़ में अंशुमान्; श्रावण मास में पर्जन्य, प्रौष्ठ (भाद्रपद) नामक मास में वरुण।'

श्लोक 64 (skanda.7.101.64)

इन्द्रश्चाश्वयुजे मासि धाता तपति कार्तिके। मार्गशीर्षे तथा मित्रः पौषे पूषा दिवाकरः

indraścāśvayuje māsi dhātā tapati kārtike| mārgaśīrṣe tathā mitraḥ pauṣe pūṣā divākaraḥ

'आश्वयुज मास में इंद्र, कार्तिक में धाता तपते हैं; मार्गशीर्ष में मित्र, तथा पौष में पूषा-दिवाकर।'

श्लोक 65 (skanda.7.101.65)

माघे भगस्तु विज्ञेयस्त्वष्टा तपति फाल्गुने। शतैर्द्वादशभिर्विष्णू रश्मीनां दीप्यते सदा

māghe bhagastu vijñeyastvaṣṭā tapati phālgune| śatairdvādaśabhirviṣṇū raśmīnāṁ dīpyate sadā

'माघ में भग जानने चाहिए, फाल्गुन में त्वष्टा तपते हैं। विष्णु सदैव बारह सौ किरणों से देदीप्यमान रहते हैं।'

श्लोक 66 (skanda.7.101.66)

दीप्यते गोसहस्रेण शतैश्च त्रिभिरर्यमा। द्विसप्तकैर्विवस्वांस्तु अंशुमान्पञ्चकैस्त्रिभिः

dīpyate gosahasreṇa śataiśca tribhiraryamā| dvisaptakairvivasvāṁstu aṁśumānpañcakaistribhiḥ

'अर्यमा एक हजार तीन सौ किरणों से देदीप्यमान होते हैं; विवस्वान् दो बार सात सौ से, अंशुमान् तीन बार पाँच सौ से।'

श्लोक 67 (skanda.7.101.67)

विवस्वानिव पर्जन्यो वरुणश्चार्यमा इव। इन्द्रस्तु द्विगुणैः षड्भिर्भात्येकादशभिः शतैः

vivasvāniva parjanyo varuṇaścāryamā iva| indrastu dviguṇaiḥ ṣaḍbhirbhātyekādaśabhiḥ śataiḥ

'पर्जन्य विवस्वान् के समान हैं, और वरुण अर्यमा के समान; परंतु इंद्र दुगुने, छह गुने, ग्यारह सौ किरणों से देदीप्यमान होते हैं।'

श्लोक 68 (skanda.7.101.68)

मित्रवच्च भगस्त्वष्टा सहस्रेण शतेन च। उत्तरोपक्रमेऽर्कस्य वर्धन्ते रश्मयः सदा। दक्षिणोपक्रमे भूयो ह्रसन्ते सूर्यरश्मयः

mitravacca bhagastvaṣṭā sahasreṇa śatena ca| uttaropakrame'rkasya vardhante raśmayaḥ sadā| dakṣiṇopakrame bhūyo hrasaṁte sūryaraśmayaḥ

'भग मित्र के समान हैं, तथा त्वष्टा ग्यारह सौ के समान। उत्तरायण के आरंभ में अर्क की किरणें सदैव बढ़ती हैं; दक्षिणायन के आरंभ में सूर्य की किरणें पुनः घटती हैं।'

श्लोक 69 (skanda.7.101.69)

एवं द्वादश मूर्तिस्थः प्रभासक्षेत्रमध्यतः। सांबादित्येति विख्यातः स्थास्ये मन्वन्तरान्तरे

evaṁ dvādaśa mūrtisthaḥ prabhāsakṣetramadhyataḥ| sāṁbādityeti vikhyātaḥ sthāsye manvantarāntare

'इस प्रकार बारह मूर्तियों में स्थित होकर, प्रभासक्षेत्र के मध्य में, सांबादित्य नाम से विख्यात होकर, मैं मन्वंतर-मन्वंतर में स्थित रहूँगा।'

श्लोक 70 (skanda.7.101.70)

माघस्य शुक्लपक्षे तु पञ्चम्यां यादवोत्तम। एकभक्तं सदा ख्यातं षष्ठ्यां नक्तमुदाहृतम्

māghasya śuklapakṣe tu pañcamyāṁ yādavottama| ekabhaktaṁ sadā khyātaṁ ṣaṣṭhyāṁ naktamudāhṛtam

'हे यादवोत्तम, माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को एकभक्त सदैव प्रसिद्ध है; षष्ठी को नक्त कहा गया है।'

श्लोक 71 (skanda.7.101.71)

सप्तम्यामुपवासं तु कृत्वा सांबार्कसंनिधौ। रक्तचन्दनमिश्रैस्तु करवीरैर्महाव्रतः

saptamyāmupavāsaṁ tu kṛtvā sāṁbārkasaṁnidhau| raktacandanamiśraistu karavīrairmahāvrataḥ

'सप्तमी को सांबार्क के समीप उपवास करके, रक्तचंदन मिश्रित करवीर पुष्पों से महाव्रती होकर—'

श्लोक 72 (skanda.7.101.72)

दत्त्वा कुन्दरकं धूपं पूजयेद्भास्करं बुधः। ब्राह्मणान्दिव्यभोज्येन भोजयित्वाऽपि शक्तितः

dattvā kuṁdarakaṁ dhūpaṁ pūjayedbhāskaraṁ budhaḥ| brāhmaṇāndivyabhojyena bhojayitvā'pi śaktitaḥ

'—कुंदपुष्प का सुगंधित धूप अर्पित कर, बुद्धिमान व्यक्ति को भास्कर की पूजा करनी चाहिए; तथा सामर्थ्यानुसार ब्राह्मणों को दिव्य भोजन से भोजन कराना चाहिए।'

श्लोक 73 (skanda.7.101.73)

एवं यः कुरुते सम्यक्सांबादित्यस्य पूजनम्। सम्यक्छ्रद्धासमायुक्तः संप्राप्स्यत्यखिलं फलम्

evaṁ yaḥ kurute samyaksāṁbādityasya pūjanam| samyakchraddhāsamāyuktaḥ saṁprāpsyatyakhilaṁ phalam

'जो इस प्रकार सम्यक् श्रद्धा से युक्त होकर सांबादित्य की पूजा भलीभाँति करता है, वह संपूर्ण फल प्राप्त करता है।'

श्लोक 74 (skanda.7.101.74)

ईश्वर उवाच। एवमुक्त्वा सहस्रांशुस्तत्रैवांतरधीयत। सांबोऽपि निर्जरो भूत्वा द्वारकां पुनरागमत्

īśvara uvāca| evamuktvā sahasrāṁśustatraivāṁtaradhīyata| sāṁbo'pi nirjaro bhūtvā dvārakāṁ punarāgamat

ईश्वर ने कहा—ऐसा कहकर सहस्रांशु वहीं अंतर्धान हो गए; सांब भी निरोग होकर पुनः द्वारका लौट आया।

श्लोक 75 (skanda.7.101.75)

इत्येतत्कथितं देवि सांबादित्यमहोदयम्। श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति

ityetatkathitaṁ devi sāṁbādityamahodayam| śrutaṁ harati pāpāni tathā'rogyaṁ prayacchati

इस प्रकार तुम्हें, हे देवि, यह सांबादित्य का महान माहात्म्य कहा गया; इसके श्रवण से पाप दूर होते हैं तथा आरोग्य प्राप्त होता है।

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102