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प्रभास खण्ड · अध्याय 103

कपालेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (skanda.7.103.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेद्वरारोहे कपालेश्वरमुत्तमम्। तस्या उत्तरदिग्भागे सुरगंधर्वपूजितम्॥

īśvara uvāca| tato gacchedvarārohe kapāleśvaramuttamam| tasyā uttaradigbhāge suragandharvapūjitam||

ईश्वर ने कहा—हे वरारोहे, उसके पश्चात् उस क्षेत्र के उत्तर दिशा भाग में देवताओं और गन्धर्वों द्वारा पूजित उत्तम कपालेश्वर तीर्थ की ओर जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.103.2)

पुरा यज्ञे वर्त्तमाने दक्षराजस्य धीमतः। उपविष्टेषु विप्रेषु हूयमाने हुताशने॥

purā yajñe varttamāne dakṣarājasya dhīmataḥ| upaviṣṭeṣu vipreṣu hūyamāne hutāśane||

पूर्वकाल में जब बुद्धिमान् दक्षराज का यज्ञ चल रहा था, ब्राह्मण यज्ञमण्डप में बैठे हुए थे और अग्नि में हवन हो रहा था।

श्लोक 3 (skanda.7.103.3)

जाल्मरूपधरो भूत्वा शंकरस्तत्र चागतः। जीर्णकंथान्वितो देवि मलवान्धूलिधूसरः॥

jālmarūpadharo bhūtvā śaṁkarastatra cāgataḥ| jīrṇakaṁthānvito devi malavāndhūlidhūsaraḥ||

उस समय शंकर एक अत्यन्त हीन जाल्म-रूप धारण करके वहाँ आये—हे देवि, वे फटे-पुराने कन्थे से युक्त, मैल से भरे तथा धूल से धूसरित थे।

श्लोक 4 (skanda.7.103.4)

अथ ते ब्राह्मणाः क्रुद्धा दृष्ट्वा तं जाल्मरूपिणम्। कपालधारिणं सर्वे धिक्छब्दैस्तं जगर्हिरे॥

atha te brāhmaṇāḥ kruddhā dṛṣṭvā taṁ jālmarūpiṇam| kapāladhāriṇaṁ sarve dhikchabdaistaṁ jagarhire||

तब उस हीन-रूपधारी, कपाल धारण किये हुए व्यक्ति को देखकर वे सभी ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये और धिक्कार-धिक्कार कहकर उसकी निन्दा करने लगे।

श्लोक 5 (skanda.7.103.5)

असकृत्पापपापेति गच्छगच्छ नराधम। यज्ञवेदिर्न चार्हा हि मानुषास्थिधरस्य ते॥

asakṛtpāpapāpeti gacchagaccha narādhama| yajñavedirna cārhā hi mānuṣāsthidharasya te||

वे बार-बार कहने लगे—पापी! पापी! हे नराधम, चला जा, चला जा! यह यज्ञवेदी तेरे जैसे मनुष्य की अस्थि धारण करने वाले के योग्य नहीं है।

श्लोक 6 (skanda.7.103.6)

अथ प्रहस्य भगवान्यज्ञवेद्यां सुरेश्वरि। क्षिप्त्वा कपालं नष्टोऽसौ न स ज्ञातो मनीषिभिः॥

atha prahasya bhagavānyajñavedyāṁ sureśvari| kṣiptvā kapālaṁ naṣṭo'sau na sa jñāto manīṣibhiḥ||

तब हे सुरेश्वरि, भगवान् शिव हँसकर यज्ञवेदी पर उस कपाल को फेंककर अन्तर्धान हो गये, और बुद्धिमान् ब्राह्मणों में से कोई भी उन्हें पहचान न सका।

श्लोक 7 (skanda.7.103.7)

तस्मिन्नष्टे कपालं तत्क्षिप्तं मंडपबाह्यतः। अथान्यत्तत्र संजातं तद्रूपं च वरानने॥

tasminnaṣṭe kapālaṁ tatkṣiptaṁ maṁḍapabāhyataḥ| athānyattatra saṁjātaṁ tadrūpaṁ ca varānane||

हे वरानने, जब वे अन्तर्धान हो गये, तब वह कपाल मण्डप के बाहर फेंक दिया गया; किन्तु उसी स्थान पर उसी रूप का एक और कपाल उत्पन्न हो गया।

श्लोक 8 (skanda.7.103.8)

क्षिप्तंक्षिप्तं पुनस्तत्र जायते च महीतले। एवं शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च॥

kṣiptaṁkṣiptaṁ punastatra jāyate ca mahītale| evaṁ śatasahasrāṇi prayutānyarbudāni ca||

जितनी बार उसे फेंका जाता, उतनी ही बार वह पुनः उसी भूतल पर उत्पन्न हो जाता। इस प्रकार सैकड़ों-हज़ारों, लाखों और करोड़ों कपाल उत्पन्न हो गये।

श्लोक 9 (skanda.7.103.9)

तत्र क्षिप्तानि जातानि ततस्ते विस्मयान्विताः। अथोचुर्मुनयः सर्वे निर्विण्णाश्चास्य चेष्टितम्॥

tatra kṣiptāni jātāni tataste vismayānvitāḥ| athocurmunayaḥ sarve nirviṇṇāścāsya ceṣṭitam||

वहाँ फेंके जाने पर भी कपाल उत्पन्न होते ही गये; इससे वे सब आश्चर्यचकित हो गये। तब सभी मुनि उसकी इस लीला से खिन्न होकर बोले।

श्लोक 10 (skanda.7.103.10)

कोऽन्यो देवान्महादेवाद्गंगाक्षालितशेखरात्। समर्थ ईदृशं कर्त्तुमस्मिन्यज्ञे विशेषतः॥

ko'nyo devānmahādevādgaṁgākṣālitaśekharāt| samartha īdṛśaṁ karttumasminyajñe viśeṣataḥ||

महादेव के अतिरिक्त, जिनका मुकुट गंगाजल से धुला हुआ है, और कौन देवता इस यज्ञ में विशेष रूप से ऐसा आश्चर्यजनक कार्य करने में समर्थ है?

श्लोक 11 (skanda.7.103.11)

ततस्ते विविधैः स्तोत्रैः स्तुवंतो वृषभध्वजम्। होमं चक्रुर्मुहुर्वह्नौ मंत्रैस्तैः शतरुद्रियैः॥

tataste vividhaiḥ stotraiḥ stuvaṁto vṛṣabhadhvajam| homaṁ cakrurmuhurvahnau maṁtraistaiḥ śatarudriyaiḥ||

तब वे नाना प्रकार के स्तोत्रों से वृषभध्वज शिव की स्तुति करते हुए, शतरुद्रिय मन्त्रों के द्वारा बार-बार अग्नि में हवन करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.7.103.12)

ततः प्रत्यक्षतां प्राप्तस्तेषां देवो महेश्वरः। ततस्ते विविधैः स्तोत्रैस्तुष्टुवुः शूलपाणिनम्। वेदोक्तमंत्रैर्विविधैः पुराणोक्तैस्तथैव च॥

tataḥ pratyakṣatāṁ prāptasteṣāṁ devo maheśvaraḥ| tataste vividhaiḥ stotraistuṣṭuvuḥ śūlapāṇinam| vedoktamaṁtrairvividhaiḥ purāṇoktaistathaiva ca||

तब भगवान् महेश्वर उनके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। तब वे नाना प्रकार के स्तोत्रों से, वेदोक्त तथा पुराणोक्त विविध मन्त्रों से भी शूलपाणि की स्तुति करने लगे।

श्लोक 13 (skanda.7.103.13)

ऋषय ऊचुः। ॐ नमो मूलप्रकृतये अजिताय महात्मने। अनावृताय देवाय निःस्पृहाय नमोनमः॥

ṛṣaya ūcuḥ| oṁ namo mūlaprakṛtaye ajitāya mahātmane| anāvṛtāya devāya niḥspṛhāya namonamaḥ||

ऋषियों ने कहा—ॐ, मूल प्रकृति स्वरूप, अजित, महात्मा, सर्वत्र प्रकट, निःस्पृह देव को बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 14 (skanda.7.103.14)

नम आद्याय बीजाय आर्षेयाय प्रवर्त्तिने। अनंतराय चैकाय अव्यक्ताय नमोनमः॥

nama ādyāya bījāya ārṣeyāya pravarttine| anaṁtarāya caikāya avyaktāya namonamaḥ||

आदि, बीजस्वरूप, ऋषिपरम्परा के मूल, प्रवर्तक को नमस्कार है; अन्तररहित, अद्वितीय, अव्यक्त को बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 15 (skanda.7.103.15)

नानाविचित्रभुजगांगदभूषणाय सर्वेश्वराय विरजाय नमो वराय। विश्वात्मने परमकारणकारणाय फुल्लारविंदविपुलायतलोचनाय॥

nānāvicitrabhujagāṁgadabhūṣaṇāya sarveśvarāya virajāya namo varāya| viśvātmane paramakāraṇakāraṇāya phullāraviṁdavipulāyatalocanāya||

विचित्र प्रकार के सर्पों के आभूषणों से सुशोभित, सबके ईश्वर, रजोगुण-रहित, श्रेष्ठ को नमस्कार है; विश्व की आत्मा, परम कारण के भी कारण, तथा खिले हुए विशाल कमल के समान विस्तृत नेत्रों वाले को नमस्कार है।

श्लोक 16 (skanda.7.103.16)

अदृश्यमव्यक्तमनादिमव्ययं यदक्षरं ब्रह्म वदंति सर्वगम्। निशाम्य यं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते तमादिदेवं शरणं प्रपद्ये॥

adṛśyamavyaktamanādimavyayaṁ yadakṣaraṁ brahma vadaṁti sarvagam| niśāmya yaṁ mṛtyumukhātpramucyate tamādidevaṁ śaraṇaṁ prapadye||

जो अदृश्य, अव्यक्त, अनादि, अव्यय है, जिसे सर्वव्यापी अक्षर ब्रह्म कहते हैं—जिसका ध्यान करके मनुष्य मृत्यु के मुख से मुक्त हो जाता है, उस आदिदेव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्लोक 17 (skanda.7.103.17)

एवं स्तुतस्तदा सर्वैर्ऋषिभिर्गतकल्मषैः। ततस्तुष्टो महादेवस्तेषां प्रत्यक्षतां गतः। अब्रवीत्तानृषीन्देवो वृणुध्वं वरमुत्तमम्॥

evaṁ stutastadā sarvairṛṣibhirgatakalmaṣaiḥ| tatastuṣṭo mahādevasteṣāṁ pratyakṣatāṁ gataḥ| abravīttānṛṣīndevo vṛṇudhvaṁ varamuttamam||

इस प्रकार समस्त निष्पाप ऋषियों द्वारा स्तुति किये जाने पर, महादेव प्रसन्न होकर उनके समक्ष पुनः प्रत्यक्ष हुए और उन ऋषियों से बोले—श्रेष्ठ वर माँगो।

श्लोक 18 (skanda.7.103.18)

ब्राह्मणा ऊचुः। यदि तुष्टोऽसि नो देव स्थानेऽस्मिन्निरतो भव। असंख्यातानि यस्माच्च कपालानि सुरेश्वर॥

brāhmaṇā ūcuḥ| yadi tuṣṭo'si no deva sthāne'sminnirato bhava| asaṁkhyātāni yasmācca kapālāni sureśvara||

ब्राह्मणों ने कहा—हे देव, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो इसी स्थान में अनुरक्त होकर रहें; क्योंकि हे सुरेश्वर, यहाँ से असंख्य कपाल उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 19 (skanda.7.103.19)

पुनः पुनः प्रवृत्तानि व्यपनीतान्यपि प्रभो। अस्मिन्नसंशयं स्थाने कपालेश्वरनामभृत्॥

punaḥ punaḥ pravṛttāni vyapanītānyapi prabho| asminnasaṁśayaṁ sthāne kapāleśvaranāmabhṛt||

हे प्रभो, हटाये जाने पर भी वे बार-बार प्रकट होते रहे; अतः निःसंदेह इस स्थान में आप कपालेश्वर नाम धारण करें।

श्लोक 20 (skanda.7.103.20)

स्वयं तु लिंगं देवेश तिष्ठेन्मन्वंतरांतरम्। कपालेश्वरनाम्ना त्वमस्मिन्स्थाने स्थितिं कुरु॥

svayaṁ tu liṁgaṁ deveśa tiṣṭhenmanvaṁtarāṁtaram| kapāleśvaranāmnā tvamasminsthāne sthitiṁ kuru||

हे देवेश, यहाँ आपका लिंग स्वयं ही एक मन्वन्तर तक स्थित रहे; आप कपालेश्वर नाम से इस स्थान में निवास करें।

श्लोक 21 (skanda.7.103.21)

येत्र त्वां पूजयिष्यंति धूपमाल्यानुलेपनैः। तेषां तु परमं स्थानं यद्देवैरपि दुर्लभम्॥

yetra tvāṁ pūjayiṣyaṁti dhūpamālyānulepanaiḥ| teṣāṁ tu paramaṁ sthānaṁ yaddevairapi durlabham||

जो लोग यहाँ आपको धूप, माला और अनुलेपन से पूजेंगे, उन्हें वह परम पद प्राप्त होगा जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 22 (skanda.7.103.22)

बाढमित्येवमुक्त्वाऽसौ स्थितस्तत्र महेश्वरः। पुनः प्रवर्तितो यज्ञो निशानाथस्य भामिनि॥

bāḍhamityevamuktvā'sau sthitastatra maheśvaraḥ| punaḥ pravartito yajño niśānāthasya bhāmini||

ऐसा ही हो, यह कहकर महेश्वर वहीं स्थित हो गये, और हे भामिनि, तत्पश्चात् निशानाथ का यज्ञ पुनः चलाया गया।

श्लोक 23 (skanda.7.103.23)

तस्मिन्दृष्टे लभेन्मर्त्यो वाजिमेधफलं प्रिये। मुच्यते पातकैः सर्वैः पूर्वजन्मार्ज्जितैरपि॥

tasmindṛṣṭe labhenmartyo vājimedhaphalaṁ priye| mucyate pātakaiḥ sarvaiḥ pūrvajanmārjjitairapi||

हे प्रिये, उस लिंग के दर्शन से मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है, और पूर्वजन्मों में अर्जित समस्त पापों से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 24 (skanda.7.103.24)

इदं माहात्म्यमखिलमभूत्स्वायंभुवांतरे। वैवस्वते पुनश्चान्यद्दक्षयज्ञविनाशकृत्॥

idaṁ māhātmyamakhilamabhūtsvāyaṁbhuvāṁtare| vaivasvate punaścānyaddakṣayajñavināśakṛt||

यह सम्पूर्ण माहात्म्य स्वायम्भुव मन्वन्तर में घटित हुआ था; वैवस्वत मन्वन्तर में पुनः दूसरी कथा दक्षयज्ञ के विनाश से सम्बद्ध हुई।

श्लोक 25 (skanda.7.103.25)

कपालीति महेशानो दक्षेणोक्तः पुरा हरः। तेन यज्ञस्य विध्वंसं कपाली तमथाकरोत्। कपालेश्वरनामेति स्थितोऽस्मिन्मानवान्तरे॥

kapālīti maheśāno dakṣeṇoktaḥ purā haraḥ| tena yajñasya vidhvaṁsaṁ kapālī tamathākarot| kapāleśvaranāmeti sthito'sminmānavāntare||

पूर्वकाल में दक्ष ने महेश्वर हर को कपाली कहकर सम्बोधित किया था; तब कपाली ने उस यज्ञ का विध्वंस कर दिया। तभी से इस मन्वन्तर में वे कपालेश्वर नाम से स्थित हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.103.26)

अथास्य नाम देवस्य सूर्यसावर्णिकेऽन्तरे। भविष्यति वरारोहे नाम तत्त्वेश्वरेति च॥

athāsya nāma devasya sūryasāvarṇike'ntare| bhaviṣyati varārohe nāma tattveśvareti ca||

हे वरारोहे, इस देव का नाम सूर्यसावर्णि मन्वन्तर में तत्त्वेश्वर होगा।

श्लोक 27 (skanda.7.103.27)

इति संक्षेपतः प्रोक्तं माहात्म्यं रुद्रदैवतम्। पापघ्नं सर्वजंतूनां पशुपाशविमोक्षणम्॥

iti saṁkṣepataḥ proktaṁ māhātmyaṁ rudradaivatam| pāpaghnaṁ sarvajaṁtūnāṁ paśupāśavimokṣaṇam||

इस प्रकार संक्षेप में रुद्र-सम्बन्धी यह माहात्म्य कहा गया, जो पापनाशक है तथा सभी प्राणियों को पशुपाश (सांसारिक बन्धन) से मुक्त करने वाला है।

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