प्रभास खण्ड · अध्याय 119
बलातिबलदैत्यघ्नी माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.119.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि महादेवीं महाप्रभाम्। बलातिबलदैत्यघ्नीं नाम्नेति प्रथितां क्षितौ॥
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi mahādevīṃ mahāprabhām| balātibaladaityaghnīṃ nāmneti prathitāṃ kṣitau||
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, उसके पश्चात् उस महाप्रभावशालिनी महादेवी के पास जाना चाहिए, जो पृथ्वी पर बलातिबलदैत्यघ्नी के नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 2 (skanda.7.119.2)
अनादिनिधनां देवीं तत्र क्षेत्रे व्यवस्थिताम्। कोटिभूतपरीवारां सर्वदैत्यनिबर्हिणीम्॥
anādinidhanāṃ devīṃ tatra kṣetre vyavasthitām| koṭibhūtaparīvārāṃ sarvadaityanibarhiṇīm||
वह देवी अनादि और अनन्त है, उस क्षेत्र में विराजमान है, करोड़ों भूतगणों से घिरी हुई है, और सब दैत्यों का नाश करने वाली है।
श्लोक 3 (skanda.7.119.3)
देव्युवाच। बलातिबलदैत्यघ्नी कथमुक्ता त्वया प्रभो। बलातिबलनामानौ कथं दैत्यौ निपातितौ॥
devyuvāca| balātibaladaityaghnī kathamuktā tvayā prabho| balātibalanāmānau kathaṃ daityau nipātitau||
देवी ने कहा—हे प्रभो, आपने उसे बलातिबलदैत्यघ्नी क्यों कहा? बल और अतिबल नामक दोनों दैत्य किस प्रकार मारे गए?
श्लोक 4 (skanda.7.119.4)
कुत्र तिष्ठति सा देवी किंप्रभावा महेश्वर। माहात्म्यमखिलं तस्याः सर्वं विस्तरतो वद॥
kutra tiṣṭhati sā devī kiṃprabhāvā maheśvara| māhātmyamakhilaṃ tasyāḥ sarvaṃ vistarato vada||
हे महेश्वर, वह देवी कहाँ निवास करती है और उसका कैसा प्रभाव है? उसका सम्पूर्ण माहात्म्य मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 5 (skanda.7.119.5)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशनीम्। यां श्रुत्वा मानवो भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः॥
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi kathāṃ pāpapraṇāśanīm| yāṃ śrutvā mānavo bhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ||
ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, मैं वह कथा कहता हूँ जो पापों का नाश करने वाली है, जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य सब पातकों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.7.119.6)
आसीद्रक्तासुरोनाम महिषस्य सुतो बली। महाकायो महाबाहुर्हिरण्याक्ष इवापरः॥
āsīdraktāsuronāma mahiṣasya suto balī| mahākāyo mahābāhurhiraṇyākṣa ivāparaḥ||
महिष का पुत्र रक्तासुर नामक एक बलवान् दैत्य था, जो विशाल शरीर और विशाल भुजाओं वाला, मानो दूसरा हिरण्याक्ष ही था।
श्लोक 7 (skanda.7.119.7)
बलातिबल नामानौ तस्य पुत्रौ बभूवतुः। तौ विजित्य सुरान्सर्वान्देवेन्द्राग्निपुरोगमान्॥
balātibala nāmānau tasya putrau babhūvatuḥ| tau vijitya surānsarvāndevendrāgnipurogamān||
उसके बल और अतिबल नामक दो पुत्र हुए। उन दोनों ने इन्द्र और अग्नि आदि सब देवताओं को जीतकर—
श्लोक 8 (skanda.7.119.8)
त्रैलोक्येऽस्मिन्निरातंकौ चक्रतू राज्यमञ्जसा। तयोः सेना मुखे वीरास्त्रयस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः॥
trailokye'sminnirātaṃkau cakratū rājyamañjasā| tayoḥ senā mukhe vīrāstrayastriṃśatprakīrtitāḥ||
इस त्रिलोक में निर्भय होकर सहज ही राज्य किया। उनकी सेना के अग्रभाग में तैंतीस वीर प्रसिद्ध थे—
श्लोक 9 (skanda.7.119.9)
रौद्रात्मानो महायोधाः सहस्राक्षौहिणीमुखाः। सिंहस्कन्धा महाकाया दुरात्मानो महाबलाः॥
raudrātmāno mahāyodhāḥ sahasrākṣauhiṇīmukhāḥ| siṃhaskandhā mahākāyā durātmāno mahābalāḥ||
रौद्र स्वभाव वाले, महायोद्धा, हजार अक्षौहिणियों के अग्रणी, सिंह के समान कन्धों वाले, विशालकाय, दुष्टात्मा और महाबली—
श्लोक 10 (skanda.7.119.10)
धूम्राक्षो भीमदंष्ट्रश्च कालवश्यो महाहनुः। ब्रह्मघ्नो यज्ञकोपश्च स्त्रीघ्नः पापनिकेतनः॥
dhūmrākṣo bhīmadaṃṣṭraśca kālavaśyo mahāhanuḥ| brahmaghno yajñakopaśca strīghnaḥ pāpaniketanaḥ||
धूम्राक्ष, भीमदंष्ट्र, कालवश्य, महाहनु, ब्रह्मघ्न, यज्ञकोप, स्त्रीघ्न और पापनिकेतन,
श्लोक 11 (skanda.7.119.11)
विद्युन्माली च बन्धूकः शंकुकर्णो विभावसुः। देवांतको विकर्मा च दुर्भिक्ष क्रूर एव च॥
vidyunmālī ca bandhūkaḥ śaṃkukarṇo vibhāvasuḥ| devāṃtako vikarmā ca durbhikṣa krūra eva ca||
विद्युन्माली, बन्धूक, शंकुकर्ण, विभावसु, देवान्तक, विकर्मा, दुर्भिक्ष और क्रूर,
श्लोक 12 (skanda.7.119.12)
हयग्रीवोऽश्वकर्णश्च केतुमान्वृषभो द्विजः। शरभः शलभो व्याघ्रो निकुंभो मणिको बकः॥
hayagrīvo'śvakarṇaśca ketumānvṛṣabho dvijaḥ| śarabhaḥ śalabho vyāghro nikuṃbho maṇiko bakaḥ||
हयग्रीव, अश्वकर्ण, केतुमान्, वृषभ, द्विज, शरभ, शलभ, व्याघ्र, निकुम्भ, मणिक और बक,
श्लोक 13 (skanda.7.119.13)
शूर्पको विक्षरो माली कालो दण्डककेरलः। एते दैत्या महाकायास्तयोः सेनाधिकारिणः॥
śūrpako vikṣaro mālī kālo daṇḍakakeralaḥ| ete daityā mahākāyāstayoḥ senādhikāriṇaḥ||
शूर्पक, विक्षर, माली, काल और दण्डककेरल—ये विशालकाय दैत्य उन दोनों की सेना के अधिकारी थे।
श्लोक 14 (skanda.7.119.14)
एवं तैः पृथिवी व्याप्ता पञ्चाशत्कोटि विस्तरा। एवं ज्ञात्वा तदा देवा भयेनोद्विग्नमानसाः॥
evaṃ taiḥ pṛthivī vyāptā pañcāśatkoṭi vistarā| evaṃ jñātvā tadā devā bhayenodvignamānasāḥ||
इस प्रकार उनके द्वारा पचास करोड़ योजन विस्तार वाली पृथ्वी व्याप्त हो गई। यह जानकर तब देवता भय से व्याकुल-मन होकर—
श्लोक 15 (skanda.7.119.15)
सर्वैर्देवर्षिभिः सार्धं जग्मुस्ते हिमवद्वनम्। स्तोत्रेणानेन तां देवीं तुष्टुवुः प्रयतास्तदा॥
sarvairdevarṣibhiḥ sārdhaṃ jagmuste himavadvanam| stotreṇānena tāṃ devīṃ tuṣṭuvuḥ prayatāstadā||
सब देवर्षियों के साथ हिमालय के वन में गए, और वहाँ पवित्र होकर उन्होंने इस स्तोत्र से उस देवी की स्तुति की—
श्लोक 16 (skanda.7.119.16)
देवा ऊचुः। जयाक्षरे जयाऽनंते जयाऽव्यक्ते निरामये। जय देवि महामाये जय देवर्षिवंदिते॥
devā ūcuḥ| jayākṣare jayā'naṃte jayā'vyakte nirāmaye| jaya devi mahāmāye jaya devarṣivaṃdite||
देवताओं ने कहा—हे अक्षरा, तुम्हारी जय हो! हे अनन्ता, जय हो! हे अव्यक्ता, हे निरामया, जय हो! हे देवि महामाये, जय हो! हे देवर्षियों द्वारा वन्दित देवि, जय हो!
श्लोक 17 (skanda.7.119.17)
जय विश्वेश्वरे गंगे जय सर्वार्थसिद्धिदे। जय ब्रह्माणि कौमारि जय नारायणीश्वरि॥
jaya viśveśvare gaṃge jaya sarvārthasiddhide| jaya brahmāṇi kaumāri jaya nārāyaṇīśvari||
हे विश्वेश्वरी, हे गंगे, जय हो! हे सब अर्थों की सिद्धि देने वाली, जय हो! हे ब्रह्माणी, हे कौमारी, जय हो! हे नारायणी, हे ईश्वरी, जय हो!
श्लोक 18 (skanda.7.119.18)
जय ब्रह्माणि चामुंडे जयेन्द्राणि महेश्वरि। जय मातर्महालक्ष्मि जय पार्वति सर्वगे॥
jaya brahmāṇi cāmuṃḍe jayendrāṇi maheśvari| jaya mātarmahālakṣmi jaya pārvati sarvage||
हे ब्रह्माणी, हे चामुण्डे, जय हो! हे इन्द्राणी, हे महेश्वरी, जय हो! हे माता महालक्ष्मी, जय हो! हे सर्वगामिनी पार्वती, जय हो!
श्लोक 19 (skanda.7.119.19)
जय देवि जगत्सृष्टे जयैरावति भारति। जयानंते जय जये जय देवि जलाविले॥
jaya devi jagatsṛṣṭe jayairāvati bhārati| jayānaṃte jaya jaye jaya devi jalāvile||
हे जगत् की सृष्टि करने वाली देवि, जय हो! हे ऐरावती, हे भारती, जय हो! हे अनन्ते, जय हो, हे जयशीले, जय हो! हे जल में निवास करने वाली देवि, जय हो!
श्लोक 20 (skanda.7.119.20)
जयेशानि शिवे शर्वे जय नित्यं जयार्चिते। मोक्षदे जय सर्वज्ञे जय धर्मार्थकामदे॥
jayeśāni śive śarve jaya nityaṃ jayārcite| mokṣade jaya sarvajñe jaya dharmārthakāmade||
हे ईशानी, हे शिवे, हे शर्वे, जय हो! हे नित्य विजयिनी और सदा पूजित देवि, जय हो! हे मोक्ष देने वाली, हे सर्वज्ञे, जय हो! हे धर्म, अर्थ और काम देने वाली, जय हो!
श्लोक 21 (skanda.7.119.21)
जय गायत्रि कल्याणि जय सह्ये विभावरि। जय दुर्गे महाकालि शिव दूति जयाऽजये॥
jaya gāyatri kalyāṇi jaya sahye vibhāvari| jaya durge mahākāli śiva dūti jayā'jaye||
हे गायत्री, हे कल्याणी, जय हो! हे सह्ये, हे विभावरी, जय हो! हे दुर्गे, हे महाकाली, जय हो! हे शिवदूती, हे अजेय देवि, जय हो!
श्लोक 22 (skanda.7.119.22)
जय चण्डे महामुण्डे जय नन्दे शिवप्रिये। जय क्षेमंकरि शिवे जय कल्याणि रेवति॥
jaya caṇḍe mahāmuṇḍe jaya nande śivapriye| jaya kṣemaṃkari śive jaya kalyāṇi revati||
हे चण्डी, हे महामुण्डी, जय हो! हे नन्दे, हे शिवप्रिये, जय हो! हे कल्याणकारिणी शिवे, जय हो! हे कल्याणी रेवती, जय हो!
श्लोक 23 (skanda.7.119.23)
जयोमे सिद्धिमांगल्ये हरसिद्धे नमोस्तु ते। जयापर्णे जयानन्दे महिषाऽसुरघातिनि॥
jayome siddhimāṃgalye harasiddhe namostu te| jayāparṇe jayānande mahiṣā'suraghātini||
हे उमे, सिद्धि और मंगल स्वरूपिणी, जय हो! हे हरसिद्धे, तुम्हें नमस्कार हो! हे अपर्णे, जय हो! हे आनन्दस्वरूपे, हे महिषासुर का वध करने वाली, जय हो!
श्लोक 24 (skanda.7.119.24)
जय मेधे विशालाक्षि जयानंगे सरस्वति। जयाशेषगुणावासे जयावर्ते सुरान्तके॥
jaya medhe viśālākṣi jayānaṃge sarasvati| jayāśeṣaguṇāvāse jayāvarte surāntake||
हे मेधे, हे विशाल नेत्रों वाली, जय हो! हे अनंगे, हे सरस्वती, जय हो! हे सम्पूर्ण गुणों के निवास स्थान, जय हो! हे दैत्यों का अन्त करने वाली भँवर स्वरूपिणी, जय हो!
श्लोक 25 (skanda.7.119.25)
जय संकल्पसंसिद्धे जय त्रैलोक्यसुंदरि। जय शुंभनिशुंभघ्ने जय पद्मेऽद्रिसंभवे॥
jaya saṃkalpasaṃsiddhe jaya trailokyasuṃdari| jaya śuṃbhaniśuṃbhaghne jaya padme'drisaṃbhave||
हे संकल्पों को सिद्ध करने वाली, जय हो! हे त्रैलोक्यसुन्दरी, जय हो! हे शुम्भ-निशुम्भ का नाश करने वाली, जय हो! हे कमलरूपे, हे पर्वत से उत्पन्न होने वाली, जय हो!
श्लोक 26 (skanda.7.119.26)
जय कौशिकि कौमारि जय वारुणि कामदे। नमोनमस्ते शर्वाणि भूयोभूयो जयाम्बिके॥
jaya kauśiki kaumāri jaya vāruṇi kāmade| namonamaste śarvāṇi bhūyobhūyo jayāmbike||
हे कौशिकी, हे कौमारी, जय हो! हे वारुणी, हे कामनाओं को देने वाली, जय हो! हे शर्वाणी, तुम्हें बार-बार नमस्कार है! हे अम्बिके, बार-बार जय हो!
श्लोक 27 (skanda.7.119.27)
त्राहि नस्त्राहि नो देवि शरण्ये शरणागतान्॥
trāhi nastrāhi no devi śaraṇye śaraṇāgatān||
हे देवि, शरणागतों के लिए शरणदायिनी, हमारी रक्षा करो, हमारी रक्षा करो!
श्लोक 28 (skanda.7.119.28)
सैवं स्तुता भगवती देवैः सर्वैर्वरानने। आत्मानं दर्शयामास भाभासितदिगन्तरम्॥
saivaṃ stutā bhagavatī devaiḥ sarvairvarānane| ātmānaṃ darśayāmāsa bhābhāsitadigantaram||
हे वरानने, इस प्रकार सब देवताओं द्वारा स्तुति की गई वह भगवती अपने तेज से दिशाओं के अन्तराल को प्रकाशित करती हुई प्रकट हुईं।
श्लोक 29 (skanda.7.119.29)
नमस्कृत्य तु तामूचुः सुरास्ते भयनाशनीम्। बलातिबलनामानौ हत्वा दैत्यौ महाबलौ। तेषां चैव महत्सैन्यं पाह्यतो महतो भयात्॥
namaskṛtya tu tāmūcuḥ surāste bhayanāśanīm| balātibalanāmānau hatvā daityau mahābalau| teṣāṃ caiva mahatsainyaṃ pāhyato mahato bhayāt||
देवताओं ने उस भयनाशिनी देवी को नमस्कार करके कहा—'बल और अतिबल नामक दोनों महाबली दैत्यों को तथा उनकी विशाल सेना को मारकर, हमें इस महान् भय से बचाइए।'
श्लोक 30 (skanda.7.119.30)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा दत्त्वा तेभ्योऽभयं ततः। बभूवाद्भुतरूपा सा त्रिनेत्रा चेन्दुशेखरा॥
teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā dattvā tebhyo'bhayaṃ tataḥ| babhūvādbhutarūpā sā trinetrā cenduśekharā||
उनका वह वचन सुनकर और उन्हें अभय देकर, वह देवी तीन नेत्रों वाला तथा चन्द्रमा को शिरोभूषण बनाए हुए अद्भुत रूप धारण करने लगी,
श्लोक 31 (skanda.7.119.31)
सिंहारूढा महादेवि नानाशस्त्रास्त्रधारिणी। सुवक्त्रा विंशतिभुजा स्फूर्जद्विद्युल्लतोपमा॥
siṃhārūḍhā mahādevi nānāśastrāstradhāriṇī| suvaktrā viṃśatibhujā sphūrjadvidyullatopamā||
सिंह पर आरूढ़, अनेक शस्त्र-अस्त्रों को धारण करने वाली, सुन्दर मुख वाली, बीस भुजाओं वाली, और चमकती हुई बिजली की लता के समान—हे महादेवि, ऐसा रूप उसने धारण किया।
श्लोक 32 (skanda.7.119.32)
ततों ऽबिका निनादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः॥
tatoṃ 'bikā ninādoccaiḥ sāṭṭahāsaṃ muhurmuhuḥ||
तब माता अम्बिका ने बार-बार ऊँचे स्वर से अट्टहास सहित गर्जना की।
श्लोक 33 (skanda.7.119.33)
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः। प्रकंपिताखिला चोर्वी सरिद्वारिधिमेखला॥
tasyā nādena ghoreṇa kṛtsnamāpūritaṃ nabhaḥ| prakaṃpitākhilā corvī saridvāridhimekhalā||
उसकी उस भयंकर ध्वनि से सम्पूर्ण आकाश भर गया, और नदियों तथा समुद्रों से घिरी हुई सारी पृथ्वी काँप उठी।
श्लोक 34 (skanda.7.119.34)
शैलतुंगस्तनी रम्या प्रमदेव भयातुरा। तेऽपि तत्रासुराः प्राप्ताश्चतुरंगबलान्विताः॥
śailatuṃgastanī ramyā pramadeva bhayāturā| te'pi tatrāsurāḥ prāptāścaturaṃgabalānvitāḥ||
पर्वतों को ऊँचे स्तनों के समान धारण करने वाली वह सुन्दर पृथ्वी मानो भय से आतुर किसी युवती के समान काँपने लगी। वे असुर भी वहाँ चतुरंगिणी सेना के साथ आ पहुँचे,
श्लोक 35 (skanda.7.119.35)
सम्यग्विदितविक्रान्ताः कालान्तकयमोपमाः। रक्षो दानवदैत्याश्च पाताले येऽपि संस्थिताः॥
samyagviditavikrāntāḥ kālāntakayamopamāḥ| rakṣo dānavadaityāśca pātāle ye'pi saṃsthitāḥ||
जिनका पराक्रम भलीभाँति विख्यात था, जो काल, अन्तक और यम के समान थे; और राक्षस, दानव तथा दैत्य—जो पाताल में भी निवास करते थे—
श्लोक 36 (skanda.7.119.36)
ते सर्व एव दैत्येन्द्राः कोटिशः समुपागताः। ततोऽभवन्महायुद्धं देव्यास्तत्रासुरैः सह॥
te sarva eva daityendrāḥ koṭiśaḥ samupāgatāḥ| tato'bhavanmahāyuddhaṃ devyāstatrāsuraiḥ saha||
वे सब दैत्येन्द्र करोड़ों की संख्या में वहाँ एकत्र हुए। फिर वहाँ देवी और असुरों के बीच महान् युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 37 (skanda.7.119.37)
बभूव सर्वब्रह्माण्डे ह्यकाण्डक्षयकारणम्। अक्षौहिणीसहस्राणि त्रयस्त्रिंशत्सुरेश्वरि॥
babhūva sarvabrahmāṇḍe hyakāṇḍakṣayakāraṇam| akṣauhiṇīsahasrāṇi trayastriṃśatsureśvari||
वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अकाल विनाश का कारण बन गया। हे सुरेश्वरी, तैंतीस हजार अक्षौहिणियाँ—
श्लोक 38 (skanda.7.119.38)
एकविंशत्सहस्राणि शतान्यष्टौ च सप्ततिः। सानुगानां सयोधानां रथानां वातरंहसाम्॥
ekaviṃśatsahasrāṇi śatānyaṣṭau ca saptatiḥ| sānugānāṃ sayodhānāṃ rathānāṃ vātaraṃhasām||
और इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर, अनुचरों और योद्धाओं सहित, वायु के समान वेगवान् रथों की—
श्लोक 39 (skanda.7.119.39)
हत्वा सा लीलया देवी निन्ये क्षयमनाकुला॥
hatvā sā līlayā devī ninye kṣayamanākulā||
उस देवी ने बिना विचलित हुए, केवल क्रीड़ा मात्र से उन सबका वध करके उन्हें विनाश को प्राप्त करा दिया।
श्लोक 40 (skanda.7.119.40)
ततो देव्या हतानां च दानवानां महौजसाम्। गजवाजिरथानां च शरीरैरावृता मही॥
tato devyā hatānāṃ ca dānavānāṃ mahaujasām| gajavājirathānāṃ ca śarīrairāvṛtā mahī||
तब देवी द्वारा मारे गए महातेजस्वी दानवों तथा हाथियों, घोड़ों और रथों के शरीरों से पृथ्वी आच्छादित हो गई।
श्लोक 41 (skanda.7.119.41)
कबंधनृत्यसंकुले स्रवद्वसास्थिकर्द्दमे। रणाजिरे निशाचरास्ततो विचेरुरूर्जिताः॥
kabaṃdhanṛtyasaṃkule sravadvasāsthikarddame| raṇājire niśācarāstato vicerurūrjitāḥ||
धड़ों के नृत्य से भरे हुए, बहती चर्बी और हड्डियों के कीचड़ से युक्त उस रणभूमि में तब बलशाली निशाचर विचरण करने लगे;
श्लोक 42 (skanda.7.119.42)
शृगाल गृधवायसाः परं प्रपातमादधुः। क्वचित्परे निशाचराः प्रपीतशोणितोत्कटाः। प्रतर्प्य चात्मनः पितॄन्समर्चयंस्तथा ऋषीन्॥
śṛgāla gṛdhavāyasāḥ paraṃ prapātamādadhuḥ| kvacitpare niśācarāḥ prapītaśoṇitotkaṭāḥ| pratarpya cātmanaḥ pitṝnsamarcayaṃstathā ṛṣīn||
सियार, गीध और कौवे परम उल्लास में मग्न हो गए; कहीं-कहीं अन्य निशाचर रक्त पीकर उन्मत्त हो, अपने पितरों को तृप्त करके उसी प्रकार ऋषियों की भी पूजा करने लगे।
श्लोक 43 (skanda.7.119.43)
गजान्नरांस्तुरंगमान्बभक्षिरे सुनिर्घृणाः। रथोडुपैस्तथा परे तरंति शोणितार्णवम्॥
gajānnarāṃsturaṃgamānbabhakṣire sunirghṛṇāḥ| rathoḍupaistathā pare taraṃti śoṇitārṇavam||
निर्दयी निशाचरों ने हाथियों, मनुष्यों और घोड़ों को खा डाला; और कहीं अन्य लोग रथों को नौका बनाकर रक्त के समुद्र को पार करने लगे।
श्लोक 44 (skanda.7.119.44)
इति प्रगाढसंगरे सुरारिसंघसंकुले। विराजतेऽम्बिका धनुः शराऽसिशूलधारिणी॥
iti pragāḍhasaṃgare surārisaṃghasaṃkule| virājate'mbikā dhanuḥ śarā'siśūladhāriṇī||
इस प्रकार देवताओं के शत्रुओं के समूह से भरे हुए उस घोर संग्राम में, धनुष, बाण, खड्ग और शूल धारण किए हुए अम्बिका सुशोभित हो रही थीं,
श्लोक 45 (skanda.7.119.45)
गजेन्द्रदर्पमर्द्दनी तुरंगयूथपोथिनी। सुरारिसैन्यनाशिनी इतस्ततः प्रपश्यती॥
gajendradarpamarddanī turaṃgayūthapothinī| surārisainyanāśinī itastataḥ prapaśyatī||
गजराजों के गर्व को कुचलती हुई, घोड़ों के झुण्डों को रौंदती हुई, देवताओं के शत्रुओं की सेना का नाश करती हुई, और इधर-उधर देखती हुई।
श्लोक 46 (skanda.7.119.46)
सिंहाष्टकयुक्ते महा प्रेतके भूधरहंसशुभ्रोज्जलद्भास्वराभे वृषभसमाने मानिनीमथो ते दैत्येन्द्रवीराः पश्यंतः समुद्भूतरोषास्ततोऽपि जग्मुर्नदन्तो रवन्तो रवं मेघनादाः॥
siṃhāṣṭakayukte mahā pretake bhūdharahaṃsaśubhrojjaladbhāsvarābhe vṛṣabhasamāne māninīmatho te daityendravīrāḥ paśyaṃtaḥ samudbhūtaroṣāstato'pi jagmurnadanto ravanto ravaṃ meghanādāḥ||
आठ सिंहों से युक्त विशाल आसन पर विराजमान, पर्वत के समान श्वेत हंसों की भाँति उज्ज्वल तेज से चमकती हुई, वृषभ के समान गम्भीर उस मानिनी देवी को देखकर, वे दैत्येन्द्र वीर क्रोध से उद्वेलित होकर मेघों की गर्जना के समान दहाड़ते और गरजते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 47 (skanda.7.119.47)
हाहाकारं विकुर्वाणा हन्यमानास्ततोऽसुराः। केचित्समुद्रं विविशुरद्रीन्केचिच्च दानवाः॥
hāhākāraṃ vikurvāṇā hanyamānāstato'surāḥ| kecitsamudraṃ viviśuradrīnkecicca dānavāḥ||
तब मारे जाते हुए असुर हाहाकार करने लगे; कुछ दानव समुद्र में जा घुसे और कुछ पर्वतों में।
श्लोक 48 (skanda.7.119.48)
केचिल्लुञ्चितमूर्धानो जाल्मा भूत्वा वनेऽवसन्। दयाधर्मं ब्रुवाणाश्च निर्ग्रंथव्रतमास्थिताः॥
kecilluñcitamūrdhāno jālmā bhūtvā vane'vasan| dayādharmaṃ bruvāṇāśca nirgraṃthavratamāsthitāḥ||
कुछ सिर मुँडाकर दीन-हीन होकर वन में जा बसे, दया और धर्म की बातें करते हुए वे निर्ग्रन्थ (वस्त्रहीन तापसों के) व्रत में स्थित हो गए।
श्लोक 49 (skanda.7.119.49)
केचित्प्राणपरा भीताः पाखण्डाश्रममास्थिताः। हेतुवादपरा मूढा निःशौचा निरपेक्षकाः॥
kecitprāṇaparā bhītāḥ pākhaṇḍāśramamāsthitāḥ| hetuvādaparā mūḍhā niḥśaucā nirapekṣakāḥ||
कुछ, केवल प्राणों की रक्षा से भयभीत होकर, पाखण्डी आश्रमों में जा टिके—तर्कवाद में लगे हुए, मूढ़, अशुचि और निरपेक्ष।
श्लोक 50 (skanda.7.119.50)
ते चाद्यापीह दृश्यन्ते लोके क्षपणकाः किल। तथैव भिन्दकाश्चान्ये शिवशास्त्रबहिष्कृताः॥
te cādyāpīha dṛśyante loke kṣapaṇakāḥ kila| tathaiva bhindakāścānye śivaśāstrabahiṣkṛtāḥ||
वे ही आज भी इस लोक में क्षपणक (नग्न तापस) कहलाकर दिखाई देते हैं; और उसी प्रकार अन्य कुछ भिन्दक (मतभेदी) शैवशास्त्र से बहिष्कृत होकर विचरते हैं।
श्लोक 51 (skanda.7.119.51)
केचित्कौलव्रता ह्यस्मिन्दृश्यन्ते सकलैर्जनैः। सुरास्त्रीमांसभूयिष्ठा विकर्मस्थाश्च लिङ्गिनः॥
kecitkaulavratā hyasmindṛśyante sakalairjanaiḥ| surāstrīmāṃsabhūyiṣṭhā vikarmasthāśca liṅginaḥ||
कुछ इस लोक में सब लोगों को कौल-व्रतधारी दिखाई देते हैं—मदिरा, स्त्री और मांस में अत्यधिक लिप्त, निषिद्ध कर्मों में स्थित, तथापि शिव-चिह्न धारण किए हुए।
श्लोक 52 (skanda.7.119.52)
प्रायो नैष्कृतिकाः पापा जिह्वोपस्थपरायणा। एवं देव्या हताः सर्वे बलातिबलसंयुताः॥
prāyo naiṣkṛtikāḥ pāpā jihvopasthaparāyaṇā| evaṃ devyā hatāḥ sarve balātibalasaṃyutāḥ||
वे प्रायः अपरिमार्जनीय पापी हैं, जिनका परायण केवल जिह्वा और उपस्थ की तृप्ति में है। इस प्रकार बल और अतिबल सहित वे सब देवी के द्वारा मारे गए।
श्लोक 53 (skanda.7.119.53)
प्रभासं क्षेत्रमासाद्य संस्थिता सा तदाम्बिका। योगिनीनां चतुःषष्ट्या संयुता पापनाशिनी। बलातिबलनाशीति प्रभासे प्रथिता क्षितौ॥
prabhāsaṃ kṣetramāsādya saṃsthitā sā tadāmbikā| yoginīnāṃ catuḥṣaṣṭyā saṃyutā pāpanāśinī| balātibalanāśīti prabhāse prathitā kṣitau||
तब वह माता अम्बिका प्रभासक्षेत्र में आकर वहीं निवास करने लगीं, चौंसठ योगिनियों से युक्त और पापों का नाश करने वाली; वे प्रभास में पृथ्वी पर बलातिबलनाशी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
श्लोक 54 (skanda.7.119.54)
देव्युवाच। चतुःषष्टिस्त्वया प्रोक्ता योगिन्यो याः सुरेश्वर। तासां नामानि मे ब्रूहि सर्वपापहराणि च॥
devyuvāca| catuḥṣaṣṭistvayā proktā yoginyo yāḥ sureśvara| tāsāṃ nāmāni me brūhi sarvapāpaharāṇi ca||
देवी ने कहा—हे सुरेश्वर, आपने जिन चौंसठ योगिनियों की बात कही, उनके नाम, जो सब पापों को हरने वाले हैं, मुझे बताइए।
श्लोक 55 (skanda.7.119.55)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि योगिनीनां महोदयम्। सर्वरक्षाकरं दिव्यं महाभयविनाशनम्॥
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi yoginīnāṃ mahodayam| sarvarakṣākaraṃ divyaṃ mahābhayavināśanam||
ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, मैं योगिनियों का वह महान् वृत्तान्त कहता हूँ, जो सबकी रक्षा करने वाला, दिव्य और महाभय का नाशक है।
श्लोक 56 (skanda.7.119.56)
आदौ तत्र महालक्ष्मीर्नंदा क्षेमंकरी तथा। शिवदूती महाभद्रा भ्रामरी चन्द्रमण्डला॥
ādau tatra mahālakṣmīrnaṃdā kṣemaṃkarī tathā| śivadūtī mahābhadrā bhrāmarī candramaṇḍalā||
सबसे पहले महालक्ष्मी, फिर नन्दा, क्षेमंकरी, शिवदूती, महाभद्रा, भ्रामरी और चन्द्रमण्डला—
श्लोक 57 (skanda.7.119.57)
रेवती हरसिद्धिश्च दुर्गा विषमलोचना। सहजा कुलजा कुब्जा मायावी शांभवी क्रिया॥
revatī harasiddhiśca durgā viṣamalocanā| sahajā kulajā kubjā māyāvī śāṃbhavī kriyā||
रेवती, हरसिद्धि, दुर्गा, विषमलोचना, सहजा, कुलजा, कुब्जा, मायावी, शाम्भवी और क्रिया—
श्लोक 58 (skanda.7.119.58)
आद्या सर्वगता शुद्धा भावगम्या मनोतिगा। विद्याविद्या महामाया सुषुम्ना सर्वमंगला॥
ādyā sarvagatā śuddhā bhāvagamyā manotigā| vidyāvidyā mahāmāyā suṣumnā sarvamaṃgalā||
आद्या, सर्वगता, शुद्धा, भावगम्या, मनोतिगा, विद्याविद्या, महामाया, सुषुम्ना और सर्वमंगला—
श्लोक 59 (skanda.7.119.59)
ॐकारात्मा महादेवि वेदार्थजननी शिवा। पुराणान्वीक्षिकी दीक्षा चामुण्डा शंकरप्रिया॥
oṃkārātmā mahādevi vedārthajananī śivā| purāṇānvīkṣikī dīkṣā cāmuṇḍā śaṃkarapriyā||
हे महादेवि, ओंकारात्मा, वेदार्थजननी, शिवा, पुराणान्वीक्षिकी, दीक्षा, चामुण्डा और शंकरप्रिया—
श्लोक 60 (skanda.7.119.60)
ब्राह्मी शांतिकरी गौरी ब्रह्मण्या ब्राह्मणप्रिया। भद्रा भगवती कृष्णा ग्रहनक्षत्रमालिनी॥
brāhmī śāṃtikarī gaurī brahmaṇyā brāhmaṇapriyā| bhadrā bhagavatī kṛṣṇā grahanakṣatramālinī||
ब्राह्मी, शान्तिकरी, गौरी, ब्रह्मण्या, ब्राह्मणप्रिया, भद्रा, भगवती, कृष्णा और ग्रहनक्षत्रमालिनी—
श्लोक 61 (skanda.7.119.61)
त्रिपुरा त्वरिता नित्या सांख्या कुंडलिनी ध्रुवा। कल्याणी शोभना निरया निष्कला परमा कला॥
tripurā tvaritā nityā sāṃkhyā kuṃḍalinī dhruvā| kalyāṇī śobhanā nirayā niṣkalā paramā kalā||
त्रिपुरा, त्वरिता, नित्या, सांख्या, कुण्डलिनी, ध्रुवा, कल्याणी, शोभना, निरया, निष्कला और परमा कला—
श्लोक 62 (skanda.7.119.62)
योगिनी योगसद्भावा योगगम्या गुहाशया। कात्यायनी उमा शर्वा ह्यपर्णेति प्रकीर्तिता॥
yoginī yogasadbhāvā yogagamyā guhāśayā| kātyāyanī umā śarvā hyaparṇeti prakīrtitā||
योगिनी, योगसद्भावा, योगगम्या और गुहाशया—तथा कात्यायनी, उमा, शर्वा और अपर्णा नाम से प्रकीर्तित देवियाँ।
श्लोक 63 (skanda.7.119.63)
चतुःषष्टिर्महादेवि एवं ते परिकीर्तिताः। स्तोत्रेणानेन दिव्येन भक्त्या यः स्तौति चंडिकाम्॥
catuḥṣaṣṭirmahādevi evaṃ te parikīrtitāḥ| stotreṇānena divyena bhaktyā yaḥ stauti caṃḍikām||
हे महादेवि, इस प्रकार तुम्हें वे चौंसठ योगिनियाँ बताई गईं। जो इस दिव्य स्तोत्र से भक्तिपूर्वक चण्डिका की स्तुति करता है,
श्लोक 64 (skanda.7.119.64)
तं पुत्रमिव शर्वाणी सर्वापत्स्वभिरक्षति। चतुर्दश्यामथाष्टम्यां नवम्यां च विशेषतः॥
taṃ putramiva śarvāṇī sarvāpatsvabhirakṣati| caturdaśyāmathāṣṭamyāṃ navamyāṃ ca viśeṣataḥ||
उसकी शर्वाणी पुत्र के समान सब विपत्तियों में रक्षा करती हैं—विशेष रूप से चतुर्दशी, अष्टमी और नवमी को।
श्लोक 65 (skanda.7.119.65)
उपवासैकभक्तेन तथैवायाचितेन च। गृहीतनियमा देवि ये जपंति च चंडिकाम्॥
upavāsaikabhaktena tathaivāyācitena ca| gṛhītaniyamā devi ye japaṃti ca caṃḍikām||
हे देवि, जो नियम धारण करके उपवास से, एक बार भोजन से, अथवा अयाचित भोजन से चण्डिका का जप करते हैं,
श्लोक 66 (skanda.7.119.66)
वर्षार्धं वर्षमेकं वा सिद्धास्ते तत्त्वचारिणः। आश्वयुक्छुक्लपक्षे च मन्वादिष्वष्टकासु च॥
varṣārdhaṃ varṣamekaṃ vā siddhāste tattvacāriṇaḥ| āśvayukchuklapakṣe ca manvādiṣvaṣṭakāsu ca||
वे तत्त्वज्ञान के मार्ग पर चलने वाले, आधे वर्ष या एक पूरे वर्ष में सिद्ध हो जाते हैं; तथा आश्विन मास के शुक्लपक्ष में, मन्वादि तिथियों और अष्टकाओं में भी—
श्लोक 67 (skanda.7.119.67)
कृत्वा महोत्सवं देवीं यजेच्छ्रेयोऽभिवृद्धये। पादुके धारयेद्देव्या दुर्गाभक्तो हिरण्मये॥
kṛtvā mahotsavaṃ devīṃ yajecchreyo'bhivṛddhaye| pāduke dhārayeddevyā durgābhakto hiraṇmaye||
महोत्सव का आयोजन करके कल्याण की वृद्धि के लिए देवी का पूजन करना चाहिए; दुर्गा के भक्त को देवी की स्वर्णमयी खड़ाऊँ धारण करनी चाहिए,
श्लोक 68 (skanda.7.119.68)
प्रमादविघ्नशांत्यर्थं क्षुरिकां च सदा पुमान्। पशुमांसासवैश्चैवमासुरं भावमाश्रिताः॥
pramādavighnaśāṃtyarthaṃ kṣurikāṃ ca sadā pumān| paśumāṃsāsavaiścaivamāsuraṃ bhāvamāśritāḥ||
और प्रमाद तथा विघ्नों की शान्ति के लिए पुरुष को सदा एक छुरिका धारण करनी चाहिए। जो लोग पशु-मांस और मदिरा से, आसुरी भाव का आश्रय लेकर—
श्लोक 69 (skanda.7.119.69)
ये यजन्त्यम्बिकां ते स्युर्दैत्या ऐश्वर्यभोगिनः। देवत्वं सात्त्विका यांति सात्त्विकीं भक्तिमास्थिताः॥
ye yajantyambikāṃ te syurdaityā aiśvaryabhoginaḥ| devatvaṃ sāttvikā yāṃti sāttvikīṃ bhaktimāsthitāḥ||
अम्बिका की पूजा करते हैं, वे दैत्यों के समान केवल ऐश्वर्य के भोगी बनते हैं; और सात्त्विक भक्ति में स्थित सात्त्विक पुरुष देवत्व को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 70 (skanda.7.119.70)
एतत्ते कथितं देवि माहात्म्यं पापनाशनम्। बलातिबलनाशिन्या देव्या सर्वार्थसाधकम्। प्रभासक्षेत्रसंस्थायाः संक्षेपात्कीर्तिवर्धनम्॥
etatte kathitaṃ devi māhātmyaṃ pāpanāśanam| balātibalanāśinyā devyā sarvārthasādhakam| prabhāsakṣetrasaṃsthāyāḥ saṃkṣepātkīrtivardhanam||
हे देवि, इस प्रकार तुम्हें यह पापनाशक माहात्म्य कहा गया—प्रभासक्षेत्र में निवास करने वाली, बल और अतिबल का नाश करने वाली उस देवी का, सब अर्थों को सिद्ध करने वाला और संक्षेप में कीर्ति बढ़ाने वाला यह वृत्तान्त।