प्रभास खण्ड · अध्याय 118
गोप्यादित्य माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.118.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि गोप्यादित्यमनुत्तमम्। भूतेशाद्वायवे भागे धनुषां त्रिंशकेन्तरे॥
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi gopyādityamanuttamam| bhūteśādvāyave bhāge dhanuṣāṃ triṃśakentare||
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, उसके पश्चात् अनुपम गोप्यादित्य की ओर जाना चाहिए, जो भूतेश से वायव्य दिशा में तीस धनुष की दूरी पर स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.118.2)
बलातिबलदैत्यघ्न्या दक्षिणाग्नेयसंस्थितम्। धनुषां दशके देवि संस्थितं पापनाशनम्॥
balātibaladaityaghnyā dakṣiṇāgneyasaṃsthitam| dhanuṣāṃ daśake devi saṃsthitaṃ pāpanāśanam||
हे देवि, यह बलातिबलदैत्यघ्नी देवी से दक्षिण-आग्नेय दिशा में दस धनुष की दूरी पर स्थित पापनाशक तीर्थ है।
श्लोक 3 (skanda.7.118.3)
तस्योत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि महापापहरां शुभाम्। यां श्रुत्वा मानवो भक्त्या दुःखशोकैः प्रमुच्यते॥
tasyotpattiṃ pravakṣyāmi mahāpāpaharāṃ śubhām| yāṃ śrutvā mānavo bhaktyā duḥkhaśokaiḥ pramucyate||
मैं उसकी उत्पत्ति का वर्णन करूँगा, जो महापापों का हरण करने वाली और शुभ है; जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य दुःख और शोक से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.7.118.4)
पुरा कृष्णो महातेजा यदा प्रभासमागतः। सहितो यादवैः सर्वैः षट्पञ्चाशतिकोटिभिः॥
purā kṛṣṇo mahātejā yadā prabhāsamāgataḥ| sahito yādavaiḥ sarvaiḥ ṣaṭpañcāśatikoṭibhiḥ||
प्राचीन काल में जब महातेजस्वी कृष्ण प्रभास में आए, तब वे छप्पन करोड़ यादवों के साथ थे—
श्लोक 5 (skanda.7.118.5)
षोडशैव सहस्राणि गोप्यस्तत्र समागताः। लक्षमेकं तथा षष्टिरेते कृष्णसुताः प्रिये॥
ṣoḍaśaiva sahasrāṇi gopyastatra samāgatāḥ| lakṣamekaṃ tathā ṣaṣṭirete kṛṣṇasutāḥ priye||
सोलह हजार गोपियाँ वहाँ एकत्र हुईं; और हे प्रिये, ये कृष्ण के पुत्र एक लाख साठ की संख्या में थे।
श्लोक 6 (skanda.7.118.6)
तत्र प्राभासिके क्षेत्रे संस्थिताः पापनाशने। यादवस्थलमासाद्य यावद्रैवतको गिरि॥
tatra prābhāsike kṣetre saṃsthitāḥ pāpanāśane| yādavasthalamāsādya yāvadraivatako giri||
वे उस पापनाशक प्राभासिक क्षेत्र में, यादवस्थल से लेकर रैवतक पर्वत तक, बस गए।
श्लोक 7 (skanda.7.118.7)
तत्र द्वादशवर्षाणि संस्थितास्ते महाबलाः। क्षेत्रं पवित्रमादाय शिवलिंगानि ते पृथक्। स्थापयाञ्चक्रिरे सर्वे ह्यंकितानि स्वनामभिः॥
tatra dvādaśavarṣāṇi saṃsthitāste mahābalāḥ| kṣetraṃ pavitramādāya śivaliṃgāni te pṛthak| sthāpayāñcakrire sarve hyaṃkitāni svanāmabhiḥ||
वे महाबली वहाँ बारह वर्षों तक रहे; उस पवित्र क्षेत्र को लेकर, उन सभी ने अपने-अपने नाम से अंकित पृथक्-पृथक् शिवलिंग स्थापित किए।
श्लोक 8 (skanda.7.118.8)
एवं समग्रं तत्क्षेत्रं यावद्द्वादशयोजनम्। ध्वजलिंगांकितं चक्रुः सर्वे यादवपुंगवाः॥
evaṃ samagraṃ tatkṣetraṃ yāvaddvādaśayojanam| dhvajaliṃgāṃkitaṃ cakruḥ sarve yādavapuṃgavāḥ||
इस प्रकार उन सब श्रेष्ठ यादवों ने बारह योजन तक फैले उस सम्पूर्ण क्षेत्र को ध्वजाओं और लिंगों से अंकित कर दिया।
श्लोक 9 (skanda.7.118.9)
हस्तहस्तान्तरे देवि प्रासादाः क्षेत्र मध्यतः। सुवर्णकलशोपेताः पताकाकुलितांबराः। विराजंते तु तत्रस्थाः कीर्तिस्तंभा हरेरिव॥
hastahastāntare devi prāsādāḥ kṣetra madhyataḥ| suvarṇakalaśopetāḥ patākākulitāṃbarāḥ| virājaṃte tu tatrasthāḥ kīrtistaṃbhā hareriva||
हे देवि, क्षेत्र के मध्य में हाथ-हाथ भर की दूरी पर, सुवर्ण-कलशों से युक्त तथा पताकाओं से आकाश को व्याप्त करते हुए मन्दिर, हरि की कीर्ति के स्तम्भों के समान वहाँ सुशोभित हो रहे थे।
श्लोक 10 (skanda.7.118.10)
ततो गोप्यो महादेवि आद्या याः षोडश स्मृताः। तासां नामानि ते वक्ष्ये तानि ह्मेकमनाः शृणु॥
tato gopyo mahādevi ādyā yāḥ ṣoḍaśa smṛtāḥ| tāsāṃ nāmāni te vakṣye tāni hmekamanāḥ śṛṇu||
हे महादेवि, तत्पश्चात् जो सोलह प्रमुख गोपियाँ स्मरण की जाती हैं, उनके नाम मैं तुम्हें बताता हूँ; उन्हें एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 11 (skanda.7.118.11)
लंबिनी चन्द्रिका कान्ता क्रूरा शान्ता महोदया। भीषणी नन्दिनीऽशोका सुपर्णा विमलाऽक्षया॥
laṃbinī candrikā kāntā krūrā śāntā mahodayā| bhīṣaṇī nandinī'śokā suparṇā vimalā'kṣayā||
लम्बिनी, चन्द्रिका, कान्ता, क्रूरा, शान्ता, महोदया, भीषणी, नन्दिनी, अशोका, सुपर्णा, विमला, अक्षया,
श्लोक 12 (skanda.7.118.12)
शुभदा शोभना पुण्या हंसस्यैताः कलाः स्मृताः। हंस एव मतः कृष्णः परमात्मा जनार्दनः॥
śubhadā śobhanā puṇyā haṃsasyaitāḥ kalāḥ smṛtāḥ| haṃsa eva mataḥ kṛṣṇaḥ paramātmā janārdanaḥ||
शुभदा, शोभना और पुण्या—ये सब हंस की कलाएँ मानी गई हैं; परमात्मा जनार्दन कृष्ण को ही हंस माना गया है।
श्लोक 13 (skanda.7.118.13)
तस्यैताः शक्तयो देवि षोडशैव प्रकीर्तिताः। चन्द्ररूपी ततः कृष्णः कलारूपास्तु ताः स्मृताः॥
tasyaitāḥ śaktayo devi ṣoḍaśaiva prakīrtitāḥ| candrarūpī tataḥ kṛṣṇaḥ kalārūpāstu tāḥ smṛtāḥ||
हे देवि, ये सोलह ही उनकी शक्तियाँ कही गई हैं; इस प्रकार कृष्ण चन्द्ररूप हैं और वे सब उनकी कलाओं के रूप में स्मरण की जाती हैं।
श्लोक 14 (skanda.7.118.14)
संपूर्णमण्डला तासां मालिनी षोडशी कला। प्रतिपत्तिथिमारभ्य विचरत्यासु चन्द्रमाः॥
saṃpūrṇamaṇḍalā tāsāṃ mālinī ṣoḍaśī kalā| pratipattithimārabhya vicaratyāsu candramāḥ||
उनमें मालिनी नामक सोलहवीं कला पूर्ण मण्डल वाली है; प्रतिपदा तिथि से आरम्भ करके चन्द्रमा इन्हीं में संचरण करता है।
श्लोक 15 (skanda.7.118.15)
षोडशैव कला यास्ता गोपीरूपा वरानने। एकैकशस्ताः संभिन्नाः सहस्रेण पृथक्पृथक्॥
ṣoḍaśaiva kalā yāstā gopīrūpā varānane| ekaikaśastāḥ saṃbhinnāḥ sahasreṇa pṛthakpṛthak||
हे वरानने, वे ही सोलह कलाएँ गोपी-रूप में प्रकट हुईं; उनमें से प्रत्येक अलग-अलग एक हजार गुना विभक्त हो गई।
श्लोक 16 (skanda.7.118.16)
एवं ते कथितं देवि रहस्यं ज्ञानसंभवम्। एवं यो वेद पुरुषः स ज्ञेयो वैष्णवो बुधैः॥
evaṃ te kathitaṃ devi rahasyaṃ jñānasaṃbhavam| evaṃ yo veda puruṣaḥ sa jñeyo vaiṣṇavo budhaiḥ||
हे देवि, इस प्रकार ज्ञान से उत्पन्न यह रहस्य तुम्हें कहा गया। जो पुरुष इसे इस प्रकार जानता है, विद्वानों द्वारा वह सच्चा वैष्णव माना जाता है।
श्लोक 17 (skanda.7.118.17)
अथ ताभिः कृताञ्ज्ञात्वा प्रासादान्यादवैः पृथक्। ततो गोप्योऽपि ताः सर्वाः सहस्राणि तु षोडश। कृष्णमाज्ञाप्य भावेन स्थापयांचक्रिरे रविम्॥
atha tābhiḥ kṛtāñjñātvā prāsādānyādavaiḥ pṛthak| tato gopyo'pi tāḥ sarvāḥ sahasrāṇi tu ṣoḍaśa| kṛṣṇamājñāpya bhāvena sthāpayāṃcakrire ravim||
फिर उन यादवों द्वारा पृथक्-पृथक् बनाए गए मन्दिरों को जानकर, उन सोलह हजार गोपियों ने भी कृष्ण की आज्ञा लेकर भावपूर्वक सूर्य की स्थापना की।
श्लोक 18 (skanda.7.118.18)
ऋषिभिर्नारदाद्यैस्तास्तथा क्षेत्रनिवासिभिः। तं प्रतिष्ठापयामासुः प्रतिष्ठाविधिना रविम्॥
ṛṣibhirnāradādyaistāstathā kṣetranivāsibhiḥ| taṃ pratiṣṭhāpayāmāsuḥ pratiṣṭhāvidhinā ravim||
उन्होंने नारद आदि ऋषियों तथा क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के साथ मिलकर, विधिपूर्वक उस सूर्य की प्रतिष्ठा की।
श्लोक 19 (skanda.7.118.19)
प्रतिष्ठिते ततः सूर्ये ददुर्दानानि भूरिशः। ततः क्षेत्रनिवासिभ्यो गोभूहेमांबराणि च॥
pratiṣṭhite tataḥ sūrye dadurdānāni bhūriśaḥ| tataḥ kṣetranivāsibhyo gobhūhemāṃbarāṇi ca||
सूर्य की प्रतिष्ठा हो जाने पर, उन्होंने क्षेत्र में रहने वालों को गौ, भूमि, सुवर्ण और वस्त्र आदि प्रचुर दान दिए।
श्लोक 20 (skanda.7.118.20)
ततस्त ऋषयः सर्वे संतुष्टा हृष्टमानसाः। चक्रुर्नाम रवेस्तत्र गोप्यादित्येति विश्रुतम्। सर्वपाप हरं देवं महासौभाग्यदायकम्॥
tatasta ṛṣayaḥ sarve saṃtuṣṭā hṛṣṭamānasāḥ| cakrurnāma ravestatra gopyādityeti viśrutam| sarvapāpa haraṃ devaṃ mahāsaubhāgyadāyakam||
तब वे सभी ऋषि सन्तुष्ट और प्रसन्नचित्त होकर, सब पापों को हरने वाले और महासौभाग्य देने वाले उस सूर्यदेव का नाम वहाँ गोप्यादित्य के नाम से विख्यात कर दिया।
श्लोक 21 (skanda.7.118.21)
एवं कृते कृतार्थास्ताः संप्राप्यातिमहद्यशः। जग्मुर्यथागतं सर्वा द्वारकां कृष्णसंयुताः॥
evaṃ kṛte kṛtārthāstāḥ saṃprāpyātimahadyaśaḥ| jagmuryathāgataṃ sarvā dvārakāṃ kṛṣṇasaṃyutāḥ||
ऐसा करके, कृतार्थ होकर तथा अत्यन्त महान् यश प्राप्त करके, वे सब गोपियाँ कृष्ण के साथ जैसे आई थीं वैसे ही द्वारका को लौट गईं।
श्लोक 22 (skanda.7.118.22)
पुनः कालान्तरे देवि शापाद्दुर्वाससः प्रिये। यादवस्थलतां प्राप्ताः प्रभासे पापनाशने॥
punaḥ kālāntare devi śāpāddurvāsasaḥ priye| yādavasthalatāṃ prāptāḥ prabhāse pāpanāśane||
हे प्रिय देवि, फिर कुछ काल बीतने पर दुर्वासा के शाप से वे पुनः पापनाशक प्रभास के उसी यादवस्थल को प्राप्त हुए।
श्लोक 23 (skanda.7.118.23)
एवं ते कथितो देवि गोप्यादित्यसमुद्भवः। माहात्म्यं तस्य ते वच्मि पूजावन्दनजं क्रमात्॥
evaṃ te kathito devi gopyādityasamudbhavaḥ| māhātmyaṃ tasya te vacmi pūjāvandanajaṃ kramāt||
हे देवि, इस प्रकार तुम्हें गोप्यादित्य की उत्पत्ति कही गई। अब मैं क्रमशः उसकी पूजा और वन्दन से उत्पन्न होने वाला माहात्म्य कहता हूँ।
श्लोक 24 (skanda.7.118.24)
अस्मिन्मित्रवने देवि यो गोपीभिः प्रतिष्ठितः। तस्य दर्शनमात्रेण दुःखशोकैः प्रमुच्यते॥
asminmitravane devi yo gopībhiḥ pratiṣṭhitaḥ| tasya darśanamātreṇa duḥkhaśokaiḥ pramucyate||
हे देवि, इस मित्रवन में गोपियों के द्वारा जो स्थापित किया गया, उसके दर्शनमात्र से मनुष्य दुःख और शोक से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 25 (skanda.7.118.25)
सुतप्तेनेह तपसा यज्ञैर्वा बहुदक्षिणैः। तां गतिं ते नरा यान्ति ये गोपीरविमाश्रिताः॥
sutapteneha tapasā yajñairvā bahudakṣiṇaiḥ| tāṃ gatiṃ te narā yānti ye gopīravimāśritāḥ||
जो मनुष्य गोपी-सूर्य की शरण लेते हैं, वे उसी गति को प्राप्त करते हैं जो यहाँ भलीभाँति की गई तपस्या से अथवा प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों से प्राप्त होती है।
श्लोक 26 (skanda.7.118.26)
येन सर्वात्मना भावो गोप्यादित्ये निवेशितः। महेश्वरि कृतार्थत्वात्स श्लाघ्यो धन्य एव सः॥
yena sarvātmanā bhāvo gopyāditye niveśitaḥ| maheśvari kṛtārthatvātsa ślāghyo dhanya eva saḥ||
हे महेश्वरि, जिसने सर्वात्मना अपनी भावना गोप्यादित्य में स्थिर की है, वह कृतार्थ होने के कारण प्रशंसनीय और धन्य ही है।
श्लोक 27 (skanda.7.118.27)
अपि नः स कुले धन्यो जायते कुलपावनः। भाग्यवान्भक्तिभावेन येन भानुरुपासितः॥
api naḥ sa kule dhanyo jāyate kulapāvanaḥ| bhāgyavānbhaktibhāvena yena bhānurupāsitaḥ||
जिसने भक्तिभाव से सूर्य की उपासना की, वह भाग्यशाली कुल को पवित्र करने वाला होकर हमारे कुल में भी धन्य होकर जन्म लेता है।
श्लोक 28 (skanda.7.118.28)
सप्तम्यां पूजयेद्यस्तु माघे मास्युषसि प्रिये। सप्तावरान्सप्त पूर्वान्पितॄन्सोप्युद्धरेन्नरः॥
saptamyāṃ pūjayedyastu māghe māsyuṣasi priye| saptāvarānsapta pūrvānpitṝnsopyuddharennaraḥ||
हे प्रिये, जो मनुष्य माघ मास की सप्तमी को प्रातःकाल उसकी पूजा करता है, वह सात पूर्व और सात परवर्ती पितरों का भी उद्धार कर देता है।
श्लोक 29 (skanda.7.118.29)
छिनत्ति रोगान्दुश्चेष्टान्दुर्जयाञ्जयति ह्यरीन्॥
chinatti rogānduśceṣṭāndurjayāñjayati hyarīn||
वह रोगों और दुश्चेष्टाओं को काट डालता है, तथा दुर्जेय शत्रुओं को भी जीत लेता है।
श्लोक 30 (skanda.7.118.30)
न सप्तम्यां स्पृशेत्तैलं नीलवस्त्रं न धारयेत्। न चाप्यामलकैः स्नानं न कुर्यात्कलहं क्वचित्॥
na saptamyāṃ spṛśettailaṃ nīlavastraṃ na dhārayet| na cāpyāmalakaiḥ snānaṃ na kuryātkalahaṃ kvacit||
सप्तमी के दिन तेल का स्पर्श नहीं करना चाहिए, नील वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए, आँवले से स्नान नहीं करना चाहिए, और कहीं भी कलह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.7.118.31)
नीलरक्तेन वस्त्रेण यत्कर्म कुरुते द्विजः। स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम्। वृथा तस्य महायज्ञा नीलसूत्रस्य धारणात्॥
nīlaraktena vastreṇa yatkarma kurute dvijaḥ| snānaṃ dānaṃ japo homaḥ svādhyāyaḥ pitṛtarpaṇam| vṛthā tasya mahāyajñā nīlasūtrasya dhāraṇāt||
नील रंग से रँगे वस्त्र को पहनकर द्विज जो भी कर्म करता है—स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण—नील सूत्र धारण करने के कारण उसके वे सब महायज्ञ व्यर्थ हो जाते हैं।
श्लोक 32 (skanda.7.118.32)
नीलीरक्तं यदा वस्त्रं विप्रस्त्वंगेषु धारयेत्। अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति॥
nīlīraktaṃ yadā vastraṃ viprastvaṃgeṣu dhārayet| ahorātroṣito bhūtvā pañcagavyena śuddhyati||
जब कोई ब्राह्मण अपने अंगों पर नील रंग से रँगा वस्त्र धारण कर लेता है, तो वह एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध होता है।
श्लोक 33 (skanda.7.118.33)
रोमकूपे यदा गच्छेद्रसं नीलस्य कस्यचित्। पतितस्तु भवेद्विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्यपोहति॥
romakūpe yadā gacchedrasaṃ nīlasya kasyacit| patitastu bhavedviprastribhiḥ kṛcchrairvyapohati||
जब किसी भी नील पदार्थ का रस उसके रोमकूपों तक पहुँच जाता है, तो वह ब्राह्मण पतित हो जाता है, और तीन कृच्छ्र व्रतों से उस दोष को दूर करता है।
श्लोक 34 (skanda.7.118.34)
नीलमध्यं यदा गच्छेत्प्रमादाद्ब्राह्मणः क्वचित्। अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुद्ध्यति॥
nīlamadhyaṃ yadā gacchetpramādādbrāhmaṇaḥ kvacit| ahorātroṣito bhūtvā pañcagavyena śuddhyati||
यदि किसी असावधानी से ब्राह्मण कभी नील पदार्थों के बीच चला जाए, तो वह एक दिन-रात उपवास करके पंचगव्य से शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 35 (skanda.7.118.35)
नीलदारु यदा भिद्येद्ब्राह्मणानां शरीरके। शोणितं दृश्यते तत्र द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्॥
nīladāru yadā bhidyedbrāhmaṇānāṃ śarīrake| śoṇitaṃ dṛśyate tatra dvijaścāndrāyaṇaṃ caret||
जब नील रंग की लकड़ी ब्राह्मणों के शरीर को बींध दे और वहाँ रक्त दिखाई पड़े, तो द्विज को चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।
श्लोक 36 (skanda.7.118.36)
कुर्यादज्ञानतो यस्तु नीलं वै दन्तधावनम्। कृत्वा कृच्छ्रद्वयं तस्य शुद्धिरुक्ता मनीषिभिः॥
kuryādajñānato yastu nīlaṃ vai dantadhāvanam| kṛtvā kṛcchradvayaṃ tasya śuddhiruktā manīṣibhiḥ||
जो अनजाने में नील वृक्ष की दातुन कर ले, उसके लिए विद्वानों ने दो कृच्छ्र व्रत करने से शुद्धि बताई है।
श्लोक 37 (skanda.7.118.37)
इत्येतत्कथितं देवि गोप्यादित्यमहोदय। पापघ्नं सर्वजन्तूनां श्रुतं सर्वार्थसाधकम्॥
ityetatkathitaṃ devi gopyādityamahodaya| pāpaghnaṃ sarvajantūnāṃ śrutaṃ sarvārthasādhakam||
हे देवि, इस प्रकार गोप्यादित्य का यह महान् माहात्म्य कहा गया, जो सब प्राणियों के पापों का नाशक है और सुनने मात्र से सब अर्थों को सिद्ध करने वाला है।
श्लोक 38 (skanda.7.118.38)
गवां शतसहस्रैस्तु दत्तैर्यत्कुरुजांगले। पुण्यं भवति देवेशि तद्गोप्यादित्यदर्शने॥
gavāṃ śatasahasraistu dattairyatkurujāṃgale| puṇyaṃ bhavati deveśi tadgopyādityadarśane||
हे देवेशि, कुरुजांगल में एक लाख गौओं के दान से जो पुण्य होता है, वही पुण्य गोप्यादित्य के दर्शनमात्र से प्राप्त हो जाता है।