Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 140

चित्रपथानदीमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 139अध्याय-सूचीअध्याय 141

श्लोक 1 (skanda.7.140.1)

ततो गच्छेन्महादेवि नदीं चित्रपथां ततः। ब्रह्मकुण्डसमीपस्थां चित्रादित्यस्य मध्यतः

tato gacchenmahādevi nadīṁ citrapathāṁ tataḥ| brahmakuṇḍasamīpasthāṁ citrādityasya madhyataḥ

तदनन्तर, हे महादेवि, वहाँ से चित्रपथा नामक नदी के पास जाना चाहिए, जो ब्रह्मकुण्ड के समीप, चित्रादित्य के मध्य में स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.140.2)

यदा च चित्रः संनीतो यमदूतैः सुरप्रिये। सशरीरो महाप्राज्ञो यमादेशपरायणैः

yadā ca citraḥ saṁnīto yamadūtaiḥ surapriye| saśarīro mahāprājño yamādeśaparāyaṇaiḥ

हे सुरप्रिये, जब महाप्राज्ञ चित्र को यम के आदेश-पालन में तत्पर यमदूत सशरीर ले गये,

श्लोक 3 (skanda.7.140.3)

एवं ज्ञात्वा तु तत्रस्था भगिनी तस्य दुःखिता। चित्रा नदी ततो भूत्वा स्वसा तस्य महात्मनः

evaṁ jñātvā tu tatrasthā bhaginī tasya duḥkhitā| citrā nadī tato bhūtvā svasā tasya mahātmanaḥ

यह जानकर वहाँ उपस्थित उसकी बहिन दुःखी हो गई; तब उस महात्मा की वह बहिन चित्रा नदी बन गई,

श्लोक 4 (skanda.7.140.4)

प्रविष्टा सागरे देवि अन्वेषन्ती च बांधवम्। ततश्चित्रपथानाम तस्याश्चक्रुर्द्विजातयः

praviṣṭā sāgare devi anveṣantī ca bāṁdhavam| tataścitrapathānāma tasyāścakrurdvijātayaḥ

हे देवि, अपने बन्धु की खोज करती हुई वह सागर में प्रविष्ट हुई; तब द्विजों ने उसका नाम चित्रपथा रखा।

श्लोक 5 (skanda.7.140.5)

एवं तत्र समुत्पन्ना सा नदी वरवर्णिनि

evaṁ tatra samutpannā sā nadī varavarṇini

हे वरवर्णिनि, इस प्रकार वहाँ वह नदी उत्पन्न हुई।

श्लोक 6 (skanda.7.140.6)

तस्यां स्नात्वा नरो यस्तु चित्रादित्यं प्रपश्यति। स याति परमं स्थानं यत्र देवो दिवाकरः

tasyāṁ snātvā naro yastu citrādityaṁ prapaśyati| sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra devo divākaraḥ

जो मनुष्य उसमें स्नान करके चित्रादित्य का दर्शन करता है, वह उस परम स्थान को जाता है, जहाँ देव दिवाकर विराजते हैं।

श्लोक 7 (skanda.7.140.7)

अस्मिन्कलियुगे देवि अंतर्धानं गता नदी। प्रावृट्काले च दृश्येत दुर्लभं तत्र दर्शनम्

asminkaliyuge devi aṁtardhānaṁ gatā nadī| prāvṛṭkāle ca dṛśyeta durlabhaṁ tatra darśanam

हे देवि, इस कलियुग में यह नदी अन्तर्धान हो गई है; वर्षाकाल में ही यह दिखाई देती है, और उसका दर्शन दुर्लभ है।

श्लोक 8 (skanda.7.140.8)

स्नानं दानं विशेषेण सर्वपातकनाशनम्

snānaṁ dānaṁ viśeṣeṇa sarvapātakanāśanam

वहाँ स्नान और दान विशेष रूप से समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 9 (skanda.7.140.9)

भुक्तो वाप्यथवाऽभुक्तो रात्रौ वा यदि वा दिवा। पर्वकालेऽथवाऽकाले पवित्रोऽप्यथवाऽशुचिः

bhukto vāpyathavā'bhukto rātrau vā yadi vā divā| parvakāle'thavā'kāle pavitro'pyathavā'śuciḥ

चाहे भोजन किया हो या न किया हो, चाहे रात्रि में हो या दिन में, चाहे पर्वकाल में हो या साधारण काल में, चाहे पवित्र हो या अपवित्र—

श्लोक 10 (skanda.7.140.10)

यदैव दृश्यते तत्र नदी चित्रपथा प्रिये। प्रमाणं दर्शनं तस्या न कालस्तत्र कारणम्

yadaiva dṛśyate tatra nadī citrapathā priye| pramāṇaṁ darśanaṁ tasyā na kālastatra kāraṇam

हे प्रिये, जब भी वहाँ चित्रपथा नदी दिखाई दे, उसका दर्शन ही प्रमाण है; समय वहाँ कारण नहीं है।

श्लोक 11 (skanda.7.140.11)

दृष्ट्वा नदीं महादेवि पितरः स्वर्गसंस्थिताः। गायंति तत्र सामानि नृत्यन्ति च हसंति च

dṛṣṭvā nadīṁ mahādevi pitaraḥ svargasaṁsthitāḥ| gāyaṁti tatra sāmāni nṛtyanti ca hasaṁti ca

हे महादेवि, स्वर्ग में स्थित पितर उस नदी को देखकर वहाँ साम-गान करते हैं, नृत्य करते हैं और हँसते हैं,

श्लोक 12 (skanda.7.140.12)

अस्माकं वंशजः कश्चिच्छ्राद्धमत्र करिष्यति। यावत्कल्पं तथाऽस्माकं प्रीतिमुत्पादयिष्यति

asmākaṁ vaṁśajaḥ kaścicchrāddhamatra kariṣyati| yāvatkalpaṁ tathā'smākaṁ prītimutpādayiṣyati

[यह सोचकर कि] हमारे कुल में उत्पन्न कोई पुरुष यहाँ श्राद्ध करेगा, और इस प्रकार कल्प भर हमें प्रसन्नता प्रदान करता रहेगा।

श्लोक 13 (skanda.7.140.13)

एवं ज्ञात्वा नरस्तत्र स्नानं श्राद्धं च कारयेत्। सर्वपापविनाशार्थं पितॄणां प्रीतये तथा

evaṁ jñātvā narastatra snānaṁ śrāddhaṁ ca kārayet| sarvapāpavināśārthaṁ pitṝṇāṁ prītaye tathā

यह जानकर मनुष्य को वहाँ स्नान और श्राद्ध करना चाहिए, समस्त पापों के नाश के लिए तथा पितरों की प्रसन्नता के लिए भी।

श्लोक 14 (skanda.7.140.14)

इत्येतत्कथितं देवि यथा चित्रपथा नदी। प्रभासक्षेत्रमासाद्य संस्थिता पापनाशिनी

ityetatkathitaṁ devi yathā citrapathā nadī| prabhāsakṣetramāsādya saṁsthitā pāpanāśinī

हे देवि, इस प्रकार यह कहा गया कि किस प्रकार चित्रपथा नदी प्रभासक्षेत्र में पहुँचकर पापनाशिनी होकर स्थित है।

अध्याय 139अध्याय-सूचीअध्याय 141