Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 144

पुष्करकुण्डमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

श्लोक 1 (skanda.7.144.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तृतीयं पुष्करं महत्। तस्यैव पूर्वदिग्भागे किञ्चिदीशानगोचरे। कनीयः संस्मृतं कुंडं पुष्करं नाम नामतः

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tṛtīyaṁ puṣkaraṁ mahat| tasyaiva pūrvadigbhāge kiñcidīśānagocare| kanīyaḥ saṁsmṛtaṁ kuṁḍaṁ puṣkaraṁ nāma nāmataḥ

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर उस महान् तृतीय पुष्कर के पास जाना चाहिए, जो उसी स्थान के पूर्व भाग में, कुछ ईशान दिशा की ओर है—वह एक छोटा कुण्ड है, जो नाम से पुष्कर ही स्मरण किया जाता है।

श्लोक 2 (skanda.7.144.2)

यत्र मध्याह्नसमये ब्रह्मणा समुपासिता। सन्ध्या त्रैलोक्यजननी प्रतिष्ठार्थं गतेन च

yatra madhyāhnasamaye brahmaṇā samupāsitā| sandhyā trailokyajananī pratiṣṭhārthaṁ gatena ca

जहाँ प्रतिष्ठा के लिए गये हुए ब्रह्मा ने मध्याह्न के समय त्रैलोक्य की जननी सन्ध्या की उपासना की।

श्लोक 3 (skanda.7.144.3)

तत्र यः कुरुते स्नानं पौर्णमास्यां समाहितः। सम्यक्कृतं भवेत्तेन स्नानं तत्रादिपुष्करे

tatra yaḥ kurute snānaṁ paurṇamāsyāṁ samāhitaḥ| samyakkṛtaṁ bhavettena snānaṁ tatrādipuṣkare

जो मनुष्य वहाँ पूर्णिमा के दिन एकाग्रचित्त होकर स्नान करता है, उसके द्वारा वहाँ आदि पुष्कर में किया गया स्नान भलीभाँति सम्पन्न माना जाता है।

श्लोक 4 (skanda.7.144.4)

हिरण्यं तत्र दातव्यं सर्वपापापनुत्तये

hiraṇyaṁ tatra dātavyaṁ sarvapāpāpanuttaye

वहाँ समस्त पापों के निवारण के लिए स्वर्ण देना चाहिए।

श्लोक 5 (skanda.7.144.5)

इति संक्षेपतः प्रोक्तं माहात्म्यं तव पौष्करम्। श्रुतं पापहरं नॄणां सर्वकामप्रदं तथा

iti saṁkṣepataḥ proktaṁ māhātmyaṁ tava pauṣkaram| śrutaṁ pāpaharaṁ nṝṇāṁ sarvakāmapradaṁ tathā

इस प्रकार तुम्हें संक्षेप में पौष्कर माहात्म्य कहा गया, जो सुनने मात्र से मनुष्यों के पापों को हरने वाला तथा समस्त कामनाओं को देने वाला है।

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145