प्रभास खण्ड · अध्याय 145
गजकुम्भोदरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.145.1)
ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं पश्येद्विघ्नेशं पापनाशनम्। गजकुंभोदरं नाम सर्वसिद्धिप्रदायकम्
īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ paśyedvighneśaṁ pāpanāśanam| gajakuṁbhodaraṁ nāma sarvasiddhipradāyakam
ईश्वर ने कहा—वहीं पर स्थित सिद्ध, पापनाशक विघ्नेश को देखना चाहिए, जो गजकुम्भोदर नाम से प्रसिद्ध है और समस्त सिद्धियों को देने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.145.2)
तत्र कुंडे नरः स्नात्वा चतुर्थ्यां प्रयतात्मवान्। पूजयेद्यस्तु तं भक्त्या विघ्नेशस्तस्य तुष्यति
tatra kuṁḍe naraḥ snātvā caturthyāṁ prayatātmavān| pūjayedyastu taṁ bhaktyā vighneśastasya tuṣyati
जो मनुष्य वहाँ के कुण्ड में स्नान करके चतुर्थी को शुद्ध चित्त से भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करता है, उससे विघ्नेश प्रसन्न होते हैं।