प्रभास खण्ड · अध्याय 17
अर्कस्थलमाहात्म्यार्कस्थलपूजाविधानादिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.17.1)
ईश्वर उवाच। अथ पूजाविधानं ते कथयामि यशस्विनि। अर्कस्थलस्य देवस्य यथा पूज्यो नरोत्तमैः
īśvara uvāca| atha pūjāvidhānaṁ te kathayāmi yaśasvini| arkasthalasya devasya yathā pūjyo narottamaiḥ
ईश्वर ने कहा—अब मैं तुम्हें पूजा-विधान बताता हूँ, हे यशस्विनी! अर्कस्थल देव जिस प्रकार श्रेष्ठ मनुष्यों द्वारा पूजनीय हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.17.2)
सर्वेषामेव देवानामादिरादित्य उच्यते। आदिकर्त्ता त्वसौ यस्मादादित्यस्तेन चोच्यते
sarveṣāmeva devānāmādirāditya ucyate| ādikarttā tvasau yasmādādityastena cocyate
समस्त देवताओं में आदित्य को आदि कहा जाता है। चूँकि वह आदिकर्ता है, इसी से वह आदित्य कहलाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.17.3)
नादित्येन विना रात्रिर्न दिवा न च तर्पणम्। न धर्मो वै न चाधर्मो न संतिष्ठेच्चराचरम्
nādityena vinā rātrirna divā na ca tarpaṇam| na dharmo vai na cādharmo na saṁtiṣṭhecarācaram
आदित्य के बिना न रात्रि है, न दिन है और न तर्पण है। न धर्म है, न अधर्म है, और न ही चराचर जगत स्थित रह सकता है।
श्लोक 4 (skanda.7.17.4)
आदित्यः पालयेत्सर्वमादित्यः सृजते सदा। आदित्यः संहरेत्सर्वं तस्मादेष त्रयीमयः
ādityaḥ pālayetsarvamādityaḥ sṛjate sadā| ādityaḥ saṁharetsarvaṁ tasmādeṣa trayīmayaḥ
आदित्य सबका पालन करता है, आदित्य सदा सृष्टि करता है, आदित्य ही सबका संहार करता है, इसलिए वह त्रयीमय है।
श्लोक 5 (skanda.7.17.5)
आराधनविधिं तस्य भास्करस्य महात्मनः। कथयामि महादेवि वेदोक्तैर्मंत्रविस्तरैः। तं शृणुष्व वरारोहे सर्वपापप्रणाशनम्
ārādhanavidhiṁ tasya bhāskarasya mahātmanaḥ| kathayāmi mahādevi vedoktairmaṁtravistaraiḥ| taṁ śṛṇuṣva varārohe sarvapāpapraṇāśanam
उस महात्मा भास्कर के आराधना-विधान को, हे महादेवी! वेदोक्त मंत्रों के विस्तार सहित बताता हूँ। हे वरारोहे! उसे सुनो, जो सब पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 6 (skanda.7.17.6)
मूर्त्तिस्थः पूज्यते येन विधानेन महेश्वरि। द्वादशात्मा यथा सूर्यस्तत्ते वक्ष्याम्यशेषतः
mūrttisthaḥ pūjyate yena vidhānena maheśvari| dvādaśātmā yathā sūryastatte vakṣyāmyaśeṣataḥ
जिस विधान से मूर्ति में स्थित देव पूजे जाते हैं, हे महेश्वरि! जिस प्रकार सूर्य द्वादश-स्वरूप हैं, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा।
श्लोक 7 (skanda.7.17.7)
मुखशुद्धिं च कृत्वाऽऽदौ स्नानं कृत्वा विशेषतः। वस्त्रशुद्धिं देह शुद्धिं कृत्वा सूर्यं स्पृशेत्ततः
mukhaśuddhiṁ ca kṛtvā'dau snānaṁ kṛtvā viśeṣataḥ| vastraśuddhiṁ deha śuddhiṁ kṛtvā sūryaṁ spṛśettataḥ
पहले मुख-शुद्धि करके, फिर विशेष रूप से स्नान करके, वस्त्र-शुद्धि और देह-शुद्धि करके, तब सूर्य का स्पर्श करना चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.7.17.8)
दन्तकाष्ठविधानं तु प्रथमं कथयामि ते
dantakāṣṭhavidhānaṁ tu prathamaṁ kathayāmi te
पहले मैं तुम्हें दन्तकाष्ठ के विधान के विषय में बताता हूँ।
श्लोक 9 (skanda.7.17.9)
मधूके पुत्रलाभः स्यादर्के नेत्रसुखं प्रिये
madhūke putralābhaḥ syādarke netrasukhaṁ priye
महुए के दातौन से पुत्र-प्राप्ति होती है, अर्क से नेत्र-सुख होता है, हे प्रिये!
श्लोक 10 (skanda.7.17.10)
वक्तृत्वं वै बदर्या च बृहत्या द्रुर्ज्जनाञ्जयेत्
vaktṛtvaṁ vai badaryā ca bṛhatyā drurjjanāñjayet
बेर के दातौन से वाक्पटुता होती है, बृहती के काष्ठ से मनुष्यों पर विजय प्राप्त होती है।
श्लोक 11 (skanda.7.17.11)
ऐश्वर्यं च भवेद्बिल्वे खदिरे च न संशयः
aiśvaryaṁ ca bhavedbilve khadire ca na saṁśayaḥ
बेल के दातौन से ऐश्वर्य प्राप्त होता है, और खदिर से भी, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 12 (skanda.7.17.12)
रोगक्षयः कदम्बे तु अर्थलाभोऽतिमुक्तके
rogakṣayaḥ kadambe tu arthalābho'timuktake
कदम्ब से रोग का क्षय होता है, अतिमुक्तक से धन की प्राप्ति होती है।
श्लोक 13 (skanda.7.17.13)
मरुतां याति सर्वत्र आटरूषकसंभवैः
marutāṁ yāti sarvatra āṭarūṣakasaṁbhavaiḥ
आटरूषक से उत्पन्न दातौन से सर्वत्र मरुद्गणों की प्रीति प्राप्त होती है।
श्लोक 14 (skanda.7.17.14)
जातिप्रधानतां जातावश्वत्थो यच्छते यशः
jātipradhānatāṁ jātāvaśvattho yacchate yaśaḥ
जाति से जाति में प्रधानता प्राप्त होती है, अश्वत्थ से यश की प्राप्ति होती है।
श्लोक 15 (skanda.7.17.15)
श्रियं प्राप्नोति निखिलां शिरीषस्य निषेवणात्
śriyaṁ prāpnoti nikhilāṁ śirīṣasya niṣevaṇāt
शिरीष के सेवन से सम्पूर्ण श्री की प्राप्ति होती है।
श्लोक 16 (skanda.7.17.16)
प्रियंगुं सेवमानस्य सौभाग्यं परमं भवेत्। अभीप्सितार्थसिद्धिः स्यान्नित्यं प्लक्षनिषेवणात्
priyaṁguṁ sevamānasya saubhāgyaṁ paramaṁ bhavet| abhīpsitārthasiddhiḥ syānnityaṁ plakṣaniṣevaṇāt
प्रियंगु के सेवन से परम सौभाग्य होता है। प्लक्ष के नित्य सेवन से अभीष्ट अर्थ की सिद्धि होती है।
श्लोक 17 (skanda.7.17.17)
न पाटितं समश्नीयाद्दंतकाष्ठं न सव्रणम्। न चोर्द्धशुष्कं वक्रं वा नैव च त्वग्विवर्ज्जितम्
na pāṭitaṁ samaśnīyāddaṁtakāṣṭhaṁ na savraṇam| na cordddhaśuṣkaṁ vakraṁ vā naiva ca tvagvivarjjitam
फटा हुआ दातौन नहीं चबाना चाहिए, न व्रणयुक्त, न ऊपर से सूखा, न टेढ़ा, और न छाल-रहित।
श्लोक 18 (skanda.7.17.18)
वितस्तिमात्रमश्नीयाद्दीर्घं ह्रस्वं च वर्जयेत्। उदङ्मुखो वा प्राङ्मुखः सुखासीनोऽथ वाग्यतः
vitastimātramaśnīyāddīrghaṁ hrasvaṁ ca varjayet| udaṅmukho vā prāṅmukhaḥ sukhāsīno'tha vāgyataḥ
एक बित्ता के परिमाण का चबाना चाहिए, दीर्घ और ह्रस्व दोनों का त्याग करना चाहिए। उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके, सुखपूर्वक बैठकर, मौन रहते हुए।
श्लोक 19 (skanda.7.17.19)
कामं यथेष्टं हृदये कृत्वा समभिमन्त्र्य च। मंत्रेणानेन मतिमानश्नीयाद्दन्तधावनम्
kāmaṁ yatheṣṭaṁ hṛdaye kṛtvā samabhimantrya ca| maṁtreṇānena matimānaśnīyāddantadhāvanam
मनोवांछित कामना को हृदय में रखकर और उसे मंत्रित करके, बुद्धिमान पुरुष इस मंत्र से दातौन का उपयोग करे।
श्लोक 20 (skanda.7.17.20)
वरं दत्त्वाऽभिजानासि कामं चैव वनस्पते। सिद्धिं प्रयच्छ मे नित्यं दन्तकाष्ठ नमोऽस्तु ते
varaṁ dattvā'bhijānāsi kāmaṁ caiva vanaspate| siddhiṁ prayaccha me nityaṁ dantakāṣṭha namo'stu te
हे वनस्पते! तुम वरदान देकर मेरी कामना को जानते हो। मुझे सदा सिद्धि प्रदान करो, हे दन्तकाष्ठ! तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 21 (skanda.7.17.21)
त्रीन्वारान्परिजप्यैवं भक्षयेद्दंतधावनम्। पश्चात्प्रक्षाल्य तत्काष्ठं शुचौ देशे विनिक्षिपेत्
trīnvārānparijapyaivaṁ bhakṣayeddaṁtadhāvanam| paścātprakṣālya tatkāṣṭhaṁ śucau deśe viniksipet
इस मंत्र को तीन बार जपकर दातौन का प्रयोग करे। फिर उस काष्ठ को धोकर पवित्र स्थान में फेंक दे।
श्लोक 22 (skanda.7.17.22)
दंतकाष्ठेन देवेशि न जिह्वां परिमार्जयेत्। पृथक्पृथक्तदा कार्यं यदीच्छेद्विपुलं यशः
daṁtakāṣṭhena deveśi na jihvāṁ parimārjayet| pṛthakpṛthaktadā kāryaṁ yadīcchedvipulaṁ yaśaḥ
दातौन से जिह्वा को साफ नहीं करना चाहिए, हे देवेशि! यदि विपुल यश की इच्छा हो तो यह अलग-अलग करना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.7.17.23)
अंगुल्या दंतकाष्ठं च प्रत्यक्षं लवणं च यत्। मृत्तिकाभक्षणं चैव तुल्यं गोमांसभक्षणैः
aṁgulyā daṁtakāṣṭhaṁ ca pratyakṣaṁ lavaṇaṁ ca yat| mṛttikābhakṣaṇaṁ caiva tulyaṁ gomāṁsabhakṣaṇaiḥ
उँगली से दातौन करना, सीधे नमक चाटना और मिट्टी खाना - ये सब गोमांस-भक्षण के समान हैं।
श्लोक 24 (skanda.7.17.24)
मुखे पर्युषिते नित्यं भवत्यप्रयतो द्विजः। तस्माच्छुष्कमथार्द्रं वा भक्षयेद्दंतधावनम्
mukhe paryuṣite nityaṁ bhavatyaprayato dvijaḥ| tasmācchuṣkamathārdraṁ vā bhakṣayeddaṁtadhāvanam
मुख के बासी रहने पर द्विज सदा अपवित्र रहता है। इसलिए सूखा या गीला, दातौन का उपयोग अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 25 (skanda.7.17.25)
वर्जिते दिवसे चैव गडूषांश्चैव षोडश। तत्तत्पद्मसुगन्धैर्वा मुखशुद्धिं च कारयेत्
varjite divase caiva gaḍūṣāṁścaiva ṣoḍaśa| tattatpadmasugandhairvā mukhaśuddhiṁ ca kārayet
जिस दिन दातौन वर्जित हो, उस दिन सोलह कुल्ले करे, या उन-उन सुगन्धित कमलों से मुख-शुद्धि करे।
श्लोक 26 (skanda.7.17.26)
मुखशुद्धिमकृत्वा यो भास्करं स्पृशति द्विजः। त्रीणि वर्षसहस्राणि स कुष्ठी जायते नरः
mukhaśuddhimakṛtvā yo bhāskaraṁ spṛśati dvijaḥ| trīṇi varṣasahasrāṇi sa kuṣṭhī jāyate naraḥ
जो द्विज मुख-शुद्धि किये बिना सूर्य का स्पर्श करता है, वह तीन हज़ार वर्षों तक कोढ़ी होता है।
श्लोक 27 (skanda.7.17.27)
एवं वस्त्रादि संशोध्य ततः स्नानं समाचरेत्। शुचौ मनोरमे स्थाने संगृह्यास्त्रेण मृत्तिकाम्
evaṁ vastrādi saṁśodhya tataḥ snānaṁ samācaret| śucau manorame sthāne saṁgṛhyāstreṇa mṛttikām
इस प्रकार वस्त्र आदि को शुद्ध करके फिर स्नान करना चाहिए। पवित्र और मनोरम स्थान में अस्त्र-मंत्र से मिट्टी लेकर।
श्लोक 28 (skanda.7.17.28)
सानुस्वारोकारयुतो हकारः फट्समन्वितः। अनेनास्त्रेण संगृह्य स्नानं तत्र समाचरेत्
sānusvāro kārayuto hakāraḥ phaṭsamanvitaḥ| anenāstreṇa saṁgṛhya snānaṁ tatra samācaret
अनुस्वार और ओकार से युक्त हकार, फट् से समन्वित - इस अस्त्र-मंत्र से मिट्टी लेकर वहाँ स्नान करना चाहिए।
श्लोक 29 (skanda.7.17.29)
भागत्रयं तु संशुद्धं तृणपाषाणवर्जितम्। एकमस्त्रेण चालभ्य तथान्यं भास्करेण तु
bhāgatrayaṁ tu saṁśuddhaṁ tṛṇapāṣāṇavarjitam| ekamastreṇa cālabhya tathānyaṁ bhāskareṇa tu
तीन शुद्ध भागों को, जो तृण और पाषाण से रहित हों, एक को अस्त्र-मंत्र से स्पर्श करके, दूसरे को भास्कर-मंत्र से।
श्लोक 30 (skanda.7.17.30)
अंगैश्चैव तृतीयं तु अभिमंत्र्य सकृत्सकृत्। जप्त्वास्त्रेण क्षिपेद्दिक्षु निर्विघ्नं तु जलं भवेत्
aṁgaiścaiva tṛtīyaṁ tu abhimaṁtrya sakṛtsakṛt| japtvāstreṇa kṣipeddikṣu nirvighnaṁ tu jalaṁ bhavet
तीसरे को अंग-मंत्रों से, हर एक को एक-एक बार अभिमंत्रित करके। अस्त्र-मंत्र का जप करके दिशाओं में छिड़के, जिससे जल निर्विघ्न हो जाए।
श्लोक 31 (skanda.7.17.31)
सूर्यतीर्थ द्वितीयेन तृतीयेन सकृत्सकृत्। गुंठयित्वा ततः स्नायाद्रवितीर्थेन मानवः
sūryatīrtha dvitīyena tṛtīyena sakṛtsakṛt| guṁṭhayitvā tataḥ snāyādravitīrthena mānavaḥ
सूर्य-तीर्थ से दूसरे और तीसरे भाग को एक-एक बार लपेटकर, फिर रवि-तीर्थ से मनुष्य स्नान करे।
श्लोक 32 (skanda.7.17.32)
तूर्यशंख निनादेन ध्यात्वा देवं दिवाकरम्। स्नात्वा राजोपचारेण पुनराचम्य यत्नतः
tūryaśaṁkha ninādena dhyātvā devaṁ divākaram| snātvā rājopacāreṇa punarācamya yatnataḥ
तुरही और शंख की ध्वनि के साथ देव दिवाकर का ध्यान करके, राजोपचार से स्नान करके, फिर यत्नपूर्वक आचमन करके।
श्लोक 33 (skanda.7.17.33)
स्नानं कृत्वा ततो देवि मंत्रराजेन संयुतम्। हरेफौ बिंदु लक्ष्मीश्च तथाऽन्यो दीर्घया सह
snānaṁ kṛtvā tato devi maṁtrarājena saṁyutam| harephau biṁdu lakṣmīśca tathā'nyo dīrghayā saha
स्नान करके, हे देवी! फिर मंत्रराज से संयुक्त होकर। 'ह' और 'र' के साथ बिन्दु और दीर्घ स्वर से युक्त अक्षर।
श्लोक 34 (skanda.7.17.34)
मात्रया रेफसंयुक्तो हकारो बिंदुना सह। सकारः सविसर्गस्तु मंत्रराजोऽयमुच्यते
mātrayā rephasaṁyukto hakāro biṁdunā saha| sakāraḥ savisargastu maṁtrarājo'yamucyate
मात्रा से रेफ-संयुक्त हकार बिन्दु सहित, तथा विसर्ग-सहित सकार - यह मंत्रराज कहा जाता है।
श्लोक 35 (skanda.7.17.35)
ततस्तु तर्प्पयेन्मंत्रान्सर्वांस्तांस्तु कराग्रजैः। तुलनादूर्ध्वतो देवान्सव्येन च मुनींस्तथा। पितॄंश्चैवापसव्येन हृद्बीजेन प्रतर्पयेत्
tatastu tarppayenmantrānsarvāṁstāṁstu karāgrajaiḥ| tulanādūrdhvato devānsavyena ca munīṁstathā| pitṝṁścaivāpasavyena hṛdbījena pratarpayet
फिर सब मंत्रों को अंगुलियों के अग्रभाग से तर्पण करे। तुलना से ऊपर देवताओं को दाहिने हाथ से, मुनियों को भी उसी प्रकार। पितरों को बायें हाथ से, हृदय-बीज मंत्र से तर्पण करे।
श्लोक 36 (skanda.7.17.36)
यद्गीतं प्रवरं लोके अक्षराणां मनीषिभिः। एकोनविंशं मात्राया अक्षरं तत्प्रकीर्त्तितम्
yadgītaṁ pravaraṁ loke akṣarāṇāṁ manīṣibhiḥ| ekonaviṁśaṁ mātrāyā akṣaraṁ tatprakīrttitam
जो अक्षरों में श्रेष्ठ कहा गया है विद्वानों द्वारा संसार में, वह उन्नीस मात्राओं का अक्षर घोषित किया गया है।
श्लोक 37 (skanda.7.17.37)
एवं स्नात्वा विधानेन संध्यां वंदेद्विधानतः। ततो विद्वान्क्षिपेत्पश्चाद्भास्करायोदकांजलिम्
evaṁ snātvā vidhānena saṁdhyāṁ vaṁdedvidhānataḥ| tato vidvānkṣipetpaścādbhāskarāyodakāṁjalim
इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान करके, विधानपूर्वक संध्या-वन्दन करे। फिर विद्वान भास्कर के लिए जलांजलि अर्पित करे।
श्लोक 38 (skanda.7.17.38)
जपेच्च त्र्यक्षरं मंत्र षण्मुखं च यदृच्छया। मंत्रराजेति यः पूर्वं तवाख्यातो मया प्रिये
japecca tryakṣaraṁ mantra ṣaṇmukhaṁ ca yadṛcchayā| mantrarājeti yaḥ pūrvaṁ tavākhyāto mayā priye
फिर त्रयक्षर मंत्र का, षडक्षर मंत्र का, और अपनी इच्छानुसार, मंत्रराज नामक मंत्र का जप करे, जो पहले तुम्हें मेरे द्वारा बताया गया, हे प्रिये!
श्लोक 39 (skanda.7.17.39)
पश्चात्तीर्थेन मंत्रास्तु संहृत्य हृदये न्यसेत्। मंत्रैरात्मानमेकत्र कृत्वा चार्घं प्रदापयेत्
paścāttīrthena maṁtrāstu saṁhṛtya hṛdaye nyaset| maṁtrairātmānamekatra kṛtvā cārghaṁ pradāpayet
फिर तीर्थ-मुद्रा से सब मंत्रों को समेटकर हृदय में स्थापित करे। मंत्रों से आत्मा को एकत्र करके अर्घ्य प्रदान करे।
श्लोक 40 (skanda.7.17.40)
रक्तचंदनगंधैस्तु शुचिःस्नातो महीतले। कृत्वा मंडलकं वृत्तमेकचित्तो व्यवस्थितः
raktacaṁdanagaṁdhaistu śuciḥsnāto mahītale| kṛtvā maṁḍalakaṁ vṛttamekacitto vyavasthitaḥ
लाल चन्दन की सुगन्ध से पवित्र और स्नात होकर, भूतल पर एक गोल मण्डल बनाकर, एकाग्रचित्त होकर स्थित हो।
श्लोक 41 (skanda.7.17.41)
गृहीत्वा करवीराणि ताम्रे संस्थाप्य भाजने। तिलतंदुलसंयुक्तं कुशगन्धोदकेन तु
gṛhītvā karavīrāṇi tāmre saṁsthāpya bhājane| tilataṁdulasaṁyuktaṁ kuśagaṁdhodakena tu
कनेर के फूल लेकर ताँबे के पात्र में रखकर, तिल और चावल से युक्त, कुश और सुगन्धित जल से।
श्लोक 42 (skanda.7.17.42)
रक्तचंदन धूपेन युक्तमर्घ्योपसाधितम्। कृत्वा शिरसि तत्पात्रं जानुभ्यामवनिं गतः
raktacaṁdana dhūpena yuktamarghyopasādhitam| kṛtvā śirasi tatpātraṁ jānubhyāmavaniṁ gataḥ
लाल चन्दन और धूप से युक्त अर्घ्य को तैयार करके, उस पात्र को सिर पर रखकर, घुटनों के बल भूमि पर बैठकर।
श्लोक 43 (skanda.7.17.43)
मूलमंत्रेण संयुक्तमर्घ्यं दद्याच्च भानवे। मुच्यते सर्वपापैस्तु यो ह्येवं विनिवेदयेत्
mūlamantreṇa saṁyuktamarghyaṁ dadyācca bhānave| mucyate sarvapāpaistu yo hyevaṁ vinivedayet
मूल-मंत्र से संयुक्त होकर सूर्य को अर्घ्य दे। जो भी इस प्रकार निवेदन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 44 (skanda.7.17.44)
यद्युगादिसहस्रेण व्यतीपातशतेन च। अयनानां सहस्रेण यत्फलं ज्येष्ठपुष्करे। तत्फलं समवाप्नोति सूर्यायार्घ्य निवेदने
yadyugādisahasreṇa vyatīpātaśatena ca| ayanānāṁ sahasreṇa yatphalaṁ jyeṣṭhapuṣkare| tatphalaṁ samavāpnoti sūryāyārghya nivedane
युगादि के हज़ार यज्ञों से, सौ व्यतीपातों से, और हज़ार अयनों के फल के समान जो फल ज्येष्ठ पुष्कर में प्राप्त होता है, वही फल सूर्य को अर्घ्य निवेदन करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 45 (skanda.7.17.45)
दीक्षामंत्रविहीनोऽपि भक्त्या संवत्सरेण तु। फलमर्घेण वै देवि लभते नात्र संशयः
dīkṣāmantravihīno'pi bhaktyā saṁvatsareṇa tu| phalamargheṇa vai devi labhate nātra saṁśayaḥ
दीक्षा-मंत्र से रहित भी, यदि वह भक्तिपूर्वक एक वर्ष तक अर्घ्य देता है, तो वह फल प्राप्त करता है, हे देवी! इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 46 (skanda.7.17.46)
यः पुनर्दीक्षितो विद्वान्विधिनार्घ्यं निवेदयेत्। नासौ संभवते भूमौ प्रलयं याति भास्करे
yaḥ punardīkṣito vidvānvidhinārghyaṁ nivedayet| nāsau saṁbhavate bhūmau pralayaṁ yāti bhāskare
किन्तु जो विद्वान दीक्षित होकर विधिपूर्वक अर्घ्य निवेदन करता है, वह फिर पृथ्वी पर जन्म नहीं लेता, वह भास्कर में लय को प्राप्त होता है।
श्लोक 47 (skanda.7.17.47)
इह जन्मनि सौभाग्यमायुरारोग्यसंपदम्। अचिराल्लभते देवि सभार्यः सुखभाजनम्
iha janmani saubhāgyamāyurārogyasaṁpadam| acirāllabhate devi sabhāryaḥ sukhabhājanam
इस जन्म में शीघ्र ही सौभाग्य, आयु, आरोग्य और सम्पत्ति प्राप्त करता है, हे देवी! और पत्नी सहित सुख का भागी होता है।
श्लोक 48 (skanda.7.17.48)
एवं स्नानविधिः प्रोक्तः सौरः संक्षेपतस्तव। हिताय मानवेन्द्राणां सर्वपापप्रणाशनः
evaṁ snānavidhiḥ proktaḥ sauraḥ saṁkṣepatastava| hitāya mānavendrāṇāṁ sarvapāpapraṇāśanaḥ
इस प्रकार, हे देवी! तुम्हें संक्षेप में सूर्य-सम्बन्धी स्नान-विधि बतायी गयी, जो मनुष्यों के हित के लिए और सब पापों का नाश करने वाली है।
श्लोक 49 (skanda.7.17.49)
अथवा वेदमार्गेण कुर्यात्स्नानं द्विजोत्तमः। यद्येवं मन्त्रविस्तारे ह्यशक्तो दीक्षया विना
athavā vedamārgeṇa kuryātsnānaṁ dvijottamaḥ| yadyevaṁ mantravistāre hyaśakto dīkṣayā vinā
अथवा वेदमार्ग से भी उत्तम द्विज स्नान कर सकता है, यदि इस मंत्र-विस्तार में दीक्षा के बिना असमर्थ हो।
श्लोक 50 (skanda.7.17.50)
ईश्वर उवाच। अथ पूजाविधानं ते कथयामि यशस्विनि। वेदमार्गेण दिव्येन ब्राह्मणानां हिताय वै
īśvara uvāca| atha pūjāvidhānaṁ te kathayāmi yaśasvini| vedamārgeṇa divyena brāhmaṇānāṁ hitāya vai
ईश्वर ने कहा—अब मैं तुम्हें पूजा-विधान बताता हूँ, हे यशस्विनी! दिव्य वेदमार्ग से, ब्राह्मणों के हित के लिए।
श्लोक 51 (skanda.7.17.51)
एवं संभृतसंभारः पुष्पादिप्रगुणीकृतः। तत आवाहयेद्भानुं स्थापयेत्कर्णिकोपरि
evaṁ saṁbhṛtasaṁbhāraḥ puṣpādipraguṇīkṛtaḥ| tata āvāhayedbhānuṁ sthāpayetkarṇikopari
इस प्रकार पूजा-सामग्री एकत्र करके, पुष्प आदि तैयार करके, फिर भानु का आवाहन करे और कर्णिका के ऊपर स्थापित करे।
श्लोक 52 (skanda.7.17.52)
उपस्थानं तु वै कृत्वा मंत्रेणानेन सुव्रते। उदुत्यं जातवेदसमिति मंत्रः संपरिकीर्तितः
upasthānaṁ tu vai kṛtvā maṁtreṇānena suvrate| udutyaṁ jātavedasamiti mantraḥ saṁparikīrtitaḥ
हे सुव्रते! उपस्थान करके इस मंत्र से - 'उदुत्यं जातवेदसम्' यह मंत्र कहा गया है।
श्लोक 53 (skanda.7.17.53)
अग्निं दूतेति मंत्रेण अनेनावाह्य भामिनि। आकृष्णेन रजसा मंत्रेणानेन वाऽर्चयेत्
agniṁ dūteti mantreṇa anenāvāhya bhāmini| ākṛṣṇena rajasā maṁtreṇānena vā'rcayet
हे भामिनी! 'अग्निं दूतं' मंत्र से आवाहन करके, अथवा 'आ कृष्णेन रजसा' मंत्र से पूजा करे।
श्लोक 54 (skanda.7.17.54)
हंसः शुचिषदिति मंत्रेणानेन पूजयेत्। अपत्येतेति मन्त्रेण सूर्यं देवि प्रपूजयेत्
haṁsaḥ śuciṣaditi maṁtreṇānena pūjayet| apatyeteti mantreṇa sūryaṁ devi prapūjayet
'हंसः शुचिषत्' इस मंत्र से पूजा करे। 'अप त्ये तायवः' इस मंत्र से, हे देवी! सूर्य की भलीभाँति पूजा करे।
श्लोक 55 (skanda.7.17.55)
अदृश्रमस्य चैतेन सूर्यं देवि समर्च्चयेत्। तरणिर्विश्वदर्शेति अनेन सततं जपम्
adṛśramasya caitena sūryaṁ devi samarccayet| taraṇirviśvadarśeti anena satataṁ japam
'अद्रक्ष्म कस्य' इस मंत्र से, हे देवी! सूर्य की पूजा करे। 'तरणिर्विश्वदर्शतः' इस मंत्र से निरन्तर जप करे।
श्लोक 56 (skanda.7.17.56)
चित्रं देवानामुदेति भद्रां देवो सदार्चयेत्। विभूतिमर्च्चयेन्नित्यं येना पावक चक्षसा
citraṁ devānāmudeti bhadrāṁ devo sadārcayet| vibhūtimarccayennityaṁ yenā pāvaka cakṣasā
'चित्रं देवानामुदगादनीकम्' मंत्र से भद्रा देवी की सदा पूजा करे। 'येनापां पावक चक्षसा' मंत्र से विभूति की नित्य पूजा करे।
श्लोक 57 (skanda.7.17.57)
विद्यामेपिरजस्पृथ्वित्यनेन विमलां सदा। अमोघां पूजयेन्नित्यं मंत्रेणानेन सुव्रते
vidyāmepirajaspṛthvityanena vimalāṁ sadā| amoghāṁ pūjayennityaṁ maṁtreṇānena suvrate
'वि द्यामेषि रजस्पृथाः' इस मंत्र से विमला की सदा पूजा करे। हे सुव्रते! इसी मंत्र से अमोघा की नित्य पूजा करे।
श्लोक 58 (skanda.7.17.58)
सप्त त्वा हरितोऽनेन सिद्धिदां सर्वकर्मसु। विद्युतामर्चयेद्देवं सप्त त्वा हरितेन च
sapta tvā harito'nena siddhidāṁ sarvakarmasu| vidyutāmarcayeddevaṁ sapta tvā haritena ca
'सप्त त्वा हरितो रथे' इस मंत्र से सर्वकर्मों में सिद्धि देने वाली की पूजा करे। इसी 'सप्त त्वा हरितः' मंत्र से विद्युत देवता की भी पूजा करे।
श्लोक 59 (skanda.7.17.59)
नवमीं पूजयेद्देवीं सततं सर्वतोमुखीम्। मन्त्रेणानेन वै देवि उद्वयन्तमितीह वै
navamīṁ pūjayeddevīṁ satataṁ sarvatomukhīm| mantreṇānena vai devi udvayaṁtamitīha vai
हे देवी! इस 'उद्वयं तमसस्परि' मंत्र से नवमी देवी सर्वतोमुखी की सदा पूजा करे।
श्लोक 60 (skanda.7.17.60)
उद्यन्नद्य मित्रमहः प्रथममक्षरं जपेत्। द्वितीयं पूजयेद्देवि शुकेषु मे हरिमेति वै
udyannadya mitramahaḥ prathamamakṣaraṁ japet| dvitīyaṁ pūjayeddevi śukeṣu me harimeti vai
'उद्यन्नद्य मित्रमहः' - इस प्रथम अक्षर का जप करे। द्वितीय, हे देवी! 'शुकेषु मे हरिमणिः' मंत्र से पूजा करे।
श्लोक 61 (skanda.7.17.61)
उदगादयमादित्यो ह्यनेनापि तृतीयकम्। तत्सवितुर्वरेण्येति चतुर्थं परिकीर्तितम्
udagādayamādityo hyanenāpi tṛtīyakam| tatsaviturvareṇyeti caturthaṁ parikīrtitam
'उदगादयमादित्यः' इस मंत्र से तीसरा भी है। 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' - यह चौथा घोषित किया गया है।
श्लोक 62 (skanda.7.17.62)
महाहिवो महायेति पञ्चमं परिकीर्तितम्। हिरण्यगर्भः समवर्तत षष्ठं बीजं प्रकीर्तितम्
mahāhivo mahāyeti pañcamaṁ parikīrtitam| hiraṇyagarbhaḥ samavartata ṣaṣṭhaṁ bījaṁ prakīrtitam
'महाही वो महे अनु' - यह पंचम घोषित किया गया है। 'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे' - यह छठा बीज-मंत्र कहा गया है।
श्लोक 63 (skanda.7.17.63)
सविता पश्चातात्सविता सप्तमं वरवर्णिनि। एवं बीजानि विन्यस्य आदित्यं स्थापयेच्छुभे
savitā paścātātsavitā saptamaṁ varavarṇini| evaṁ bījāni vinyasya ādityaṁ sthāpayecchubhe
'सविता पश्चातात्' - हे वरवर्णिनि! यह सातवाँ है। इस प्रकार बीज-मंत्रों को स्थापित कर, हे शुभे! आदित्य को स्थापित करे।
श्लोक 64 (skanda.7.17.64)
आदित्यं स्थापयित्वा तु पश्चादङ्गानि विन्यसेत्
ādityaṁ sthāpayitvā tu paścādaṅgāni vinyaset
आदित्य को स्थापित करके, फिर उनके अंगों का न्यास करे।
श्लोक 65 (skanda.7.17.65)
आग्नेय्यां हृदयं न्यस्य ऐशान्यां तु शिरो न्यसेत्। नैर्ऋत्यां तु शिखां चैव कवचं वायुगोचरे
āgneyyāṁ hṛdayaṁ nyasya aiśānyāṁ tu śiro nyaset| nairṛtyāṁ tu śikhāṁ caiva kavacaṁ vāyugocare
अग्निकोण में हृदय स्थापित करे, ईशान कोण में शिर स्थापित करे। नैर्ऋत्य कोण में शिखा और वायव्य कोण में कवच स्थापित करे।
श्लोक 66 (skanda.7.17.66)
अस्त्रं दिशासु विन्यस्य स्वबीजेन तु कर्णिकाम्। अमोसि प्राणितेनेति अनेन हृदयं यजेत्
astraṁ diśāsu vinyasya svabījena tu karṇikām| amosi prāṇiteneti anena hṛdayaṁ yajet
अस्त्र-मंत्र को दिशाओं में स्थापित कर, अपने बीज-मंत्र से कर्णिका को स्थापित करे। 'अमोऽसि प्राणितेन' इस मंत्र से हृदय की पूजा करे।
श्लोक 67 (skanda.7.17.67)
शिरस्तु पूजयेद्देवि आयुष्यं वर्चसेति वै। गायत्र्या तु शिखां पूज्य नैर्ऋत्यां तु व्यवस्थिताम्
śirastu pūjayeddevi āyuṣyaṁ varcaseti vai| gāyatryā tu śikhāṁ pūjya nairṛtyāṁ tu vyavasthitām
'आयुष्यं वर्चसा' मंत्र से, हे देवी! शिर की पूजा करे। गायत्री से नैर्ऋत्य में स्थित शिखा की पूजा करे।
श्लोक 68 (skanda.7.17.68)
जीमूतस्येव भवति प्रत्येकं कवचं यजेत्। धन्वन्नागा धन्वनेति अनेनास्त्रं सदाऽर्चयेत्
jīmūtasyeva bhavati pratyekaṁ kavacaṁ yajet| dhanvannāgā dhanvaneti anenāstraṁ sadā'rcayet
जीमूत के समान मंत्र से हर अंग के कवच की पूजा करे। 'धन्वन्नागा धन्वना' इस मंत्र से अस्त्र की सदा पूजा करे।
श्लोक 69 (skanda.7.17.69)
नेत्रं तु पूजयेद्देवि अश्विना तेजसेति च। ह्यतः पूर्वतः सोमं दक्षिणेन बुधं तथा
netraṁ tu pūjayeddevi aśvinā tejaseti ca| hyataḥ pūrvataḥ somaṁ dakṣiṇena budhaṁ tathā
'अश्विना तेजसा' मंत्र से नेत्र की पूजा करे, हे देवी! इसके बाद पूर्व में सोम, दक्षिण में बुध की पूजा करे।
श्लोक 70 (skanda.7.17.70)
पश्चिमेन गुरुं न्यस्य उत्तरेण च भार्गवम्। आग्नेय्यां मङ्गलं न्यस्य नैर्ऋत्यां तु शनैश्चरम्
paścimena guruṁ nyasya uttareṇa ca bhārgavam| āgneyyāṁ maṅgalaṁ nyasya nairṛtyāṁ tu śanaiścaram
पश्चिम में गुरु को, उत्तर में शुक्र को स्थापित करे। अग्निकोण में मंगल को, नैर्ऋत्य कोण में शनैश्चर को स्थापित करे।
श्लोक 71 (skanda.7.17.71)
वायव्यां तु न्यसेद्राहुं केतुमीशानगोचरे। आप्यायस्वेति मन्त्रेण देवि सोमं सदार्चयेत्
vāyavyāṁ tu nyasedrāhuṁ ketumīśānagocare| āpyāyasveti mantreṇa devi somaṁ sadārcayet
वायव्य कोण में राहु को, ईशान कोण में केतु को स्थापित करे। 'आप्यायस्व' मंत्र से, हे देवी! सोम की सदा पूजा करे।
श्लोक 72 (skanda.7.17.72)
उद्बुध्यध्वं महादेवि बुधं तत्र सदार्चयेत्। बृहस्पतेति मन्त्रेण पूजयेत्सततं गुरुम्
udbudhyadhvaṁ mahādevi budhaṁ tatra sadārcayet| bṛhaspateti mantreṇa pūjayetsatataṁ gurum
'उद्बुध्यध्वम्' मंत्र से, हे महादेवी! वहाँ बुध की सदा पूजा करे। 'बृहस्पते' मंत्र से गुरु की निरन्तर पूजा करे।
श्लोक 73 (skanda.7.17.73)
शुक्रः शुशुक्वानिति च भार्गवं देवि पूजयेत्। अग्निर्मूर्द्धेति मन्त्रेण सदा मंगलमर्चयेत्
śukraḥ śuśukvāniti ca bhārgavaṁ devi pūjayet| agnirmūrddheti mantreṇa sadā maṁgalamarcayet
'शुक्रः शुशुक्वान्' मंत्र से भार्गव की, हे देवी! पूजा करे। 'अग्निर्मूर्धा' मंत्र से मंगल की सदा पूजा करे।
श्लोक 74 (skanda.7.17.74)
शमग्निरितिमन्त्रेण पूजयेद्भास्करात्मजम्। कयानश्चित्रेतिमन्त्रेण देवि राहुं सदाऽर्चयेत्
śamagniritimantreṇa pūjayedbhāskarātmajam| kayānaścitretimantreṇa devi rāhuṁ sadā'rcayet
'शमग्निः' मंत्र से भास्कर-पुत्र की पूजा करे। 'कया नश्चित्र' मंत्र से, हे देवी! राहु की सदा पूजा करे।
श्लोक 75 (skanda.7.17.75)
केतुं कृण्वेति केतुं वै सततं पूजयेद्बुधः
ketuṁ kṛṇveti ketuṁ vai satataṁ pūjayedbudhaḥ
'केतुं कृण्वन्' मंत्र से बुद्धिमान पुरुष केतु की निरन्तर पूजा करे।
श्लोक 76 (skanda.7.17.76)
बाह्यतः पूर्वतः शुक्रं दक्षिणेन यमं तथा। ऐशान्यामीश्वरं विंद्यादाग्नेय्यामग्निरुच्यते
bāhyataḥ pūrvataḥ śukraṁ dakṣiṇena yamaṁ tathā| aiśānyāmīśvaraṁ viṁdyādāgneyyāmagniḥ ucyate
बाह्य आवरण में पूर्व में शुक्र, दक्षिण में यम, ईशान में ईश्वर जानना चाहिए, और अग्निकोण में अग्नि कहा गया है।
श्लोक 77 (skanda.7.17.77)
नैऋतेति विरूपाक्षं पवनं वायुगोचरे। तमुष्टवाम इति वै ह्यनेनेन्द्रमथार्चयेत्
nairṛteti virūpākṣaṁ pavanaṁ vāyugocare| tamuṣṭavāma iti vai hyanenendramathārcayet
नैर्ऋत्य में विरूपाक्ष, वायव्य में पवन। 'तमुष्टवाम' इस मंत्र से इन्द्र की पूजा करे।
श्लोक 78 (skanda.7.17.78)
उदीरतामवरेति सदा वैवस्वतं यजेत्
udīratāmavareti sadā vaivasvataṁ yajet
'उदीरतामवरे' मंत्र से सदा वैवस्वत की पूजा करे।
श्लोक 79 (skanda.7.17.79)
तत्त्वायामीति मन्त्रेण वरुणं देवि पूजयेत्। इन्द्रासोमावत इति मन्त्रेण धनदं यजेत्
tattvāyāmīti mantreṇa varuṇaṁ devi pūjayet| indrāsomāvata iti mantreṇa dhanadaṁ yajet
'तत्त्वायामि' मंत्र से, हे देवी! वरुण की पूजा करे। 'इन्द्रासोमा वि' मंत्र से धनद की पूजा करे।
श्लोक 80 (skanda.7.17.80)
पावकं पूजयेद्देवि अग्निमीळे पुरोहितम्। रक्षोहणं वाजिनेति विरूपाक्षं सदार्चयेत्
pāvakaṁ pūjayeddevi agnimīḷe purohitam| rakṣohaṇaṁ vājineti virūpākṣaṁ sadārcayet
'अग्निमीळे पुरोहितम्' मंत्र से, हे देवी! पावक की पूजा करे। 'रक्षोहणं वाजिनम्' मंत्र से विरूपाक्ष की सदा पूजा करे।
श्लोक 81 (skanda.7.17.81)
वायवायाहि मन्त्रेण वायुं देवि सदार्चयेत्। यथाक्रममिमान्देवि सर्वान्वै पूजयेद्बुधः
vāyavāyāhi mantreṇa vāyuṁ devi sadārcayet| yathākramamimāndevi sarvānvai pūjayedbudhaḥ
'वायवा याहि' मंत्र से, हे देवी! वायु की सदा पूजा करे। हे देवी! बुद्धिमान पुरुष इस प्रकार क्रमशः इन सबकी पूजा करे।
श्लोक 82 (skanda.7.17.82)
बाह्यतः पूर्वतो देवि इन्द्रादीनां समन्ततः। रक्तवर्णं महातेजं सितपद्मोपरि स्थितम्
bāhyataḥ pūrvato devi indrādīnāṁ samantataḥ| raktavarṇaṁ mahātejaṁ sitapadmopari sthitam
बाह्य आवरण के पूर्व में, हे देवी! इन्द्र आदि की चारों ओर स्थापना कर। रक्तवर्ण, महातेजस्वी, श्वेत कमल पर स्थित।
श्लोक 83 (skanda.7.17.83)
सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वाभरणभूषितम्। द्विभुजं चैकवक्त्रं च सौम्यपञ्चकधृक्करम्
sarvalakṣaṇasaṁyuktaṁ sarvābharaṇabhūṣitam| dvibhujaṁ caikavaktraṁ ca saumyapañcakadhṛkkaram
समस्त शुभ लक्षणों से युक्त, समस्त आभूषणों से सुशोभित, दो भुजाओं और एक मुख वाला, हाथ में सौम्य पंच वस्तुएँ धारण किये हुए।
श्लोक 84 (skanda.7.17.84)
वर्त्तुलं तेजबिंबं तु मध्यस्थं रक्तवाससम्। आदित्यस्य त्विदं रूपं सर्वलोकेषु पूजितम्। ध्यात्वा संपूजयेन्नित्यं स्थंडिलं मण्डलाश्रयम्
varttulaṁ tejabiṁbaṁ tu madhyasthaṁ raktavāsasam| ādityasya tvidaṁ rūpaṁ sarvalokeṣu pūjitam| dhyātvā saṁpūjayennityaṁ sthaṁḍilaṁ maṇḍalāśrayam
गोल तेज-बिम्ब के मध्य में स्थित, रक्त वस्त्र धारण किये हुए। यह आदित्य का रूप समस्त लोकों में पूजित है। इसका ध्यान करके मण्डल-आश्रित स्थण्डिल की नित्य पूजा करे।
श्लोक 85 (skanda.7.17.85)
देव्युवाच। मण्डलस्थः सुरश्रेष्ठ विधिना येन भास्करः। पूज्यते मानवैर्भक्त्या स विधिः कथितस्त्वया
devyuvāca| maṇḍalasthaḥ suraśreṣṭha vidhinā yena bhāskaraḥ| pūjyate mānavairbhaktyā sa vidhiḥ kathitastvayā
देवी ने कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मण्डल में स्थित भास्कर की जिस विधि से मनुष्य भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं, वह विधि आपने बतायी।
श्लोक 86 (skanda.7.17.86)
पूजयेद्विधिना येन भास्करं पद्मसंभवम्। मूर्त्तिस्थं सर्वगं देवं तन्मे कथय शंकर
pūjayedvidhinā yena bhāskaraṁ padmasaṁbhavam| mūrttisthaṁ sarvagaṁ devaṁ tanme kathaya śaṁkara
जिस विधि से पद्मसम्भव भास्कर की, मूर्ति में स्थित सर्वव्यापी देव की पूजा की जाती है, वह मुझे बताइये, हे शंकर!
श्लोक 87 (skanda.7.17.87)
ईश्वर उवाच। साधुसाधु महादेवि साधु पृष्टोऽस्मि सुवते। शृणुष्वैकमना देवि मूर्तिथं येन पूजयेत्
īśvara uvāca| sādhusādhu mahādevi sādhu pṛṣṭo'smi suvate| śṛṇuṣvaikamanā devi mūrtithaṁ yena pūjayet
ईश्वर ने कहा—साधु, साधु, हे महादेवी! हे सुव्रते! तुमने भलीभाँति पूछा है। हे देवी! एकाग्रचित्त होकर सुनो, जिस विधि से मूर्तिस्थ देव की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 88 (skanda.7.17.88)
इषेत्वेति च मन्त्रेण उत्तमांगं सदार्चयेत्। अग्निमीळेति मन्त्रेण पूजयेद्दक्षिणं करम्
iṣetveti ca mantreṇa uttamāṅgaṁ sadārcayet| agnimīḷeti mantreṇa pūjayeddakṣiṇaṁ karam
'इषे त्वा' मंत्र से उत्तमांग की सदा पूजा करे। 'अग्निमीळे' मंत्र से दाहिने हाथ की पूजा करे।
श्लोक 89 (skanda.7.17.89)
अग्न आयाहि मन्त्रेण पादौ देवस्य पूजयेत्। आजिघ्रेति च मन्त्रेण पूजयेत्पुष्पमालया
agna āyāhi mantreṇa pādau devasya pūjayet| ājighreti ca mantreṇa pūjayetpuṣpamālayā
'अग्न आयाहि' मंत्र से देव के दोनों चरणों की पूजा करे। 'आजिघ्र' मंत्र से पुष्पमाला से पूजा करे।
श्लोक 90 (skanda.7.17.90)
योगेयोगेति मन्त्रेण मुक्तपुष्पांजलिं क्षिपेत्। समुद्रागच्छ यत्प्रोक्तमनेन स्नापयेद्रविम्
yogeyogeti mantreṇa muktapuṣpāñjaliṁ kṣipet| samudrāgaccha yatproktamanena snāpayedravim
'योगे योगे' मंत्र से मुक्त पुष्पांजलि अर्पित करे। जो 'समुद्रादूर्मिः' कहा गया है, उससे सूर्य को स्नान कराए।
श्लोक 91 (skanda.7.17.91)
इमं मे गंगेति यत्प्रोक्तमनेनापि च भामिनि। समुद्रज्येति मन्त्रेण क्षालयेद्विधिवद्रविम्
imaṁ me gaṁgeti yatproktamanenāpi ca bhāmini| samudrajyeti mantreṇa kṣālayedvidhivadravim
'इमं मे गंगे' जो कहा गया है, उससे भी, हे भामिनी! और 'समुद्रज्येष्ठाः' मंत्र से सूर्य को विधिपूर्वक धोए।
श्लोक 92 (skanda.7.17.92)
सिनीवालीति मन्त्रेण स्नापयेच्छंखवारिणा। यज्ञं यज्ञेति मन्त्रेण कषायैः परिरक्षयेत्
sinīvālīti mantreṇa snāpayecchaṁkhavāriṇā| yajñaṁ yajñeti mantreṇa kaṣāyaiḥ parirakṣayet
'सिनीवाली' मंत्र से शंख के जल से स्नान कराए। 'यज्ञं यज्ञं' मंत्र से कषाय द्रव्यों से रक्षा करे।
श्लोक 93 (skanda.7.17.93)
स्नापयेत्पयसा देवि आप्यायस्वेति मंत्रतः। दधिक्राव्णेति वै दध्ना स्नापयेद्विधिवद्रविम्
snāpayetpayasā devi āpyāyasveti mantrataḥ| dadhikrāvṇeti vai dadhnā snāpayedvidhivadravim
'आप्यायस्व' मंत्र से दूध से स्नान कराए, हे देवी! 'दधिक्राव्णः' मंत्र से दही से सूर्य को विधिपूर्वक स्नान कराए।
श्लोक 94 (skanda.7.17.94)
इमं मे गंगेति यत्प्रोक्तमनेनापि च भामिनि। समुद्रज्येति मंत्रेण स्नानमौषधिभिः स्मृतम्
imaṁ me gaṁgeti yatproktamanenāpi ca bhāmini| samudrajyeti mantreṇa snānamauṣadhibhiḥ smṛtam
'इमं मे गंगे' जो कहा गया है, उससे भी, हे भामिनी! और 'समुद्रज्येष्ठाः' मंत्र से औषधियों से स्नान स्मरण किया गया है।
श्लोक 95 (skanda.7.17.95)
उद्वर्तयेत्ततो भानुं द्विपदाभिर्वरानने। मानस्तोकेति मंत्रेण युगपत्स्नानमाचरेत्
udvartayettato bhānuṁ dvipadābhirvarānane| mānastokeeti mantreṇa yugapatsnānamācaret
फिर, हे वरानने! दो पदों वाले मंत्र से भानु का उद्वर्तन करे। 'मा नस्तोके' मंत्र से एक साथ स्नान कराए।
श्लोक 96 (skanda.7.17.96)
विष्णोरराटमन्त्रेण स्नापयेद्गंधवारिणा। सौवर्णेन तु मंत्रेण अर्घ्यं पाद्यं निवेदयेत्
viṣṇorarāṭamantreṇa snāpayedgaṁdhavāriṇā| sauvarṇena tu mantreṇa arghyaṁ pādyaṁ nivedayet
'विष्णोरराटः' मंत्र से गन्धयुक्त जल से स्नान कराए। सौवर्ण मंत्र से अर्घ्य और पाद्य अर्पित करे।
श्लोक 97 (skanda.7.17.97)
इदं विष्णुर्विचक्रमे मंत्रेणार्घ्यं प्रदापयेत्। वेदोसीति च मंत्रेण उपवीतं प्रदापयेत्
idaṁ viṣṇurvicakrame mantreṇārghyaṁ pradāpayet| vedosīti ca mantreṇa upavītaṁ pradāpayet
'इदं विष्णुर्विचक्रमे' मंत्र से अर्घ्य अर्पित करे। 'वेदोऽसि' मंत्र से यज्ञोपवीत अर्पित करे।
श्लोक 98 (skanda.7.17.98)
बृहस्पतेति मंत्रेण दद्याद्वस्त्राणि भानवे। येन श्रियं प्रकुर्वाणः पुष्पमालां प्रपूजयेत्
bṛhaspateti mantreṇa dadyādvastrāṇi bhānave| yena śriyaṁ prakurvāṇaḥ puṣpamālāṁ prapūjayet
'बृहस्पते' मंत्र से भानु को वस्त्र अर्पित करे। जिस मंत्र से श्री की कामना करते हुए पुष्पमाला की पूजा करे।
श्लोक 99 (skanda.7.17.99)
धूरसीति च मंत्रेण धूपं दद्यात्सगुग्गलम्। समिद्धोंजनमंत्रेण अंजनं तु प्रदापयेत्
dhūrasīti ca mantreṇa dhūpaṁ dadyātsaguggalam| samiddhoṁjanamantreṇa aṁjanaṁ tu pradāpayet
'धूरसि' मंत्र से गुग्गुल-सहित धूप अर्पित करे। 'समिद्धो' मंत्र से अंजन अर्पित करे।
श्लोक 100 (skanda.7.17.100)
युंजान इति मंत्रेण भानुं रोचनमालभेत्। आरार्त्तिकं च वै कुर्याद्दीर्घायुत्वाय वै पुनः
yuṁjāna iti mantreṇa bhānuṁ rocanamālabhet| ārārttikaṁ ca vai kuryāddīrghāyutvāya vai punaḥ
'युंजान' मंत्र से भानु को गोरोचन का लेप करे। फिर दीर्घायु के लिए आरती करे।
श्लोक 101 (skanda.7.17.101)
सहस्रशीर्षा पुरुषः सूर्यं शिरसि पूजयेत्। शंभवायेति मंत्रेण रवेर्नेत्रे परामृशेत्
sahasraśīrṣā puruṣaḥ sūryaṁ śirasi pūjayet| śaṁbhavāyeti mantreṇa raverneṁtre parāmṛśet
'सहस्रशीर्षा पुरुषः' मंत्र से सूर्य के शिर की पूजा करे। 'शंभवाय' मंत्र से सूर्य के नेत्रों का स्पर्श करे।
श्लोक 102 (skanda.7.17.102)
विश्वतश्चक्षुरित्येवं भानोर्देहं समालभेत्। श्रीश्च ते लक्ष्मीश्चेति सर्वांगे पूजयेद्रविम्
viśvataścakṣurityevaṁ bhānordehaṁ samālabhet| śrīśca te lakṣmīśceti sarvāṁge pūjayedravim
'विश्वतश्चक्षुः' इस मंत्र से भानु के सम्पूर्ण शरीर का लेप करे। 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च' मंत्र से सूर्य के सर्वांगों की पूजा करे।
श्लोक 103 (skanda.7.17.103)
ईश्वर उवाच। अथ मेरोर्महादेवि अष्टशृंगस्य सुव्रते। पूजाविधानमंत्रांस्ते कथयामि समासतः
īśvara uvāca| atha meror mahādevi aṣṭaśṛṁgasya suvrate| pūjāvidhānamaṁtrāṁste kathayāmi samāsataḥ
ईश्वर ने कहा—अब मेरु के, हे महादेवी! जो आठ शिखरों वाला है, हे सुव्रते! उसके पूजा-विधान और मंत्रों को मैं संक्षेप में बताता हूँ।
श्लोक 104 (skanda.7.17.104)
अष्टशृंगं महादेवि अनेन विधिनाऽर्चयेत्। प्रथमं पूजयेन्मध्ये मंत्रेणानेन सुव्रते
aṣṭaśṛṁgaṁ mahādevi anena vidhinā'rcayet| prathamaṁ pūjayenmadhye maṁtreṇānena suvrate
आठ शिखरों वाले मेरु की इसी विधि से पूजा करे, हे महादेवी! प्रथम मध्य में इस मंत्र से पूजा करे, हे सुव्रते!
श्लोक 105 (skanda.7.17.105)
महाहिवोमहायेति नानापुष्पकदंबकैः। त्रातारमिंद्रमंत्रेण पूर्वशृंगं सदार्चयेत्
mahāhivomahāyeti nānāpuṣpakadaṁbakaiḥ| trātāramiṁdramantreṇa pūrvaśṛṁgaṁ sadārcayet
'महाही वो महे' मंत्र से विविध पुष्प-समूहों सहित, तथा 'त्रातारमिन्द्रम्' मंत्र से पूर्व शिखर की सदा पूजा करे।
श्लोक 106 (skanda.7.17.106)
तमुष्टवामेति मंत्रेण पूजयेत्सुरसुन्दरि। अग्निमीळे पुरोहितमाग्नेयं शृंगमर्चयेत्
tamuṣṭavāmeti mantreṇa pūjayetsurasundari| agnimīḷe purohitamāgneyaṁ śṛṁgamarcayet
'तमुष्टवाम' मंत्र से पूजा करे, हे देवसुन्दरि! 'अग्निमीळे पुरोहितम्' मंत्र से आग्नेय शिखर की पूजा करे।
श्लोक 107 (skanda.7.17.107)
आग्नेय्या चैव गायत्र्या अथवानेन पूजयेत्। यमाय त्वा मखाय त्वा दक्षिणं शृंगमर्च येत्
āgneyyā caiva gāyatryā athavānena pūjayet| yamāya tvā makhāya tvā dakṣiṇaṁ śṛṁgamarcayet
अथवा आग्नेयी गायत्री से इससे पूजा करे। 'यमाय त्वा मखाय त्वा' मंत्र से दक्षिण शिखर की पूजा करे।
श्लोक 108 (skanda.7.17.108)
उदीरतामवरेप्यथवानेन पूजयेत्। आयं गौरिति मंत्रेण नैर्ऋत्यं शृङ्गमर्चयेत्
udīratāmavarepyathavānena pūjayet| āyaṁ gauriti mantreṇa nairṛtyaṁ śṛṅgamarcayet
अथवा 'उदीरतामवरे' मंत्र से भी पूजा करे। 'अयं गौः' मंत्र से नैर्ऋत्य शिखर की पूजा करे।
श्लोक 109 (skanda.7.17.109)
रक्षोहणं वाजिनं वा पूजयेदसुरांतिकम्। इंद्रासोमा च यो मंत्रो ह्यथवा तेन पूजयेत्
rakṣohaṇaṁ vājinaṁ vā pūjayedasurāṁtikam| indrāsomā ca yo mantro hyathavā tena pūjayet
'रक्षोहणं वाजिनम्' मंत्र से असुरों के समीपवर्ती शिखर की पूजा करे। अथवा जो 'इन्द्रासोमा' मंत्र है, उससे भी पूजा करे।
श्लोक 110 (skanda.7.17.110)
अभि त्वा सूर नोन्विति चैशानं शृंगमर्चयेत्। येनेदं भूतमिति वा अथवानेन पूजयेत्
abhi tvā sūra nonviti caiśānaṁ śṛṁgamarcayet| yenedaṁ bhūtamiti vā athavānena pūjayet
'अभि त्वा सूर नोनुमः' मंत्र से ईशान शिखर की पूजा करे। अथवा 'येनेदं भूतम्' इस मंत्र से भी पूजा करे।
श्लोक 111 (skanda.7.17.111)
नमोस्तु सर्पेभ्य इति मेरुपीठं सदाऽर्चयेत्
namostu sarpebhya iti merupīṭhaṁ sadā'rcayet
'नमोऽस्तु सर्पेभ्यः' मंत्र से मेरु-पीठ की सदा पूजा करे।
श्लोक 112 (skanda.7.17.112)
हिरण्यगर्भः समवर्त्ततेति पुनर्मध्ये सदार्चयेत्
hiraṇyagarbhaḥ samavarttateti punarmadhye sadārcayet
'हिरण्यगर्भः समवर्तत' मंत्र से पुनः मध्य की सदा पूजा करे।
श्लोक 113 (skanda.7.17.113)
सविता पश्चातादिति वै पूजयेत्पुष्प मालया। त्रिकालमर्चयेद्देवि प्रदद्यादर्घ्यमादरात्
savitā paścātāditi vai pūjayetpuṣpa mālayā| trikālamarcayeddevi pradadyādarghyamādarāt
'सविता पश्चातात्' मंत्र से पुष्पमाला द्वारा पूजा करे। त्रिकाल पूजा करे, हे देवी! और आदरपूर्वक अर्घ्य प्रदान करे।
श्लोक 114 (skanda.7.17.114)
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां पूर्वाह्ने चैव पूजयेत्। मध्याह्ने पूजयेद्देवि तद्विष्णोः परमं पदम्
mātā rudrāṇāṁ duhitā vasūnāṁ pūrvāhne caiva pūjayet| madhyāhne pūjayeddevi tadviṣṇoḥ paramaṁ padam
'माता रुद्राणाम् दुहिता वसूनाम्' मंत्र से प्रातःकाल पूजा करे। मध्याह्न में, हे देवी! 'तद्विष्णोः परमं पदम्' मंत्र से पूजा करे।
श्लोक 115 (skanda.7.17.115)
हँसः शुचिषदिति वा अपराह्णे सदार्चयेत्
haṁsaḥ śuciṣaditi vā aparāhṇe sadārcayet
'हंसः शुचिषत्' मंत्र से अपराह्न में सदा पूजा करे।
श्लोक 116 (skanda.7.17.116)
एवं भानुं ग्रहैः सार्द्ध पूजयेद्वरवर्णिनि
evaṁ bhānuṁ grahaiḥ sārddha pūjayedvaravarṇini
इस प्रकार, हे वरवर्णिनि! भानु की ग्रहों सहित पूजा करे।
श्लोक 117 (skanda.7.17.117)
देव्युवाच। यानि पुष्पाणि चेष्टानि सदा भास्करपूजने। कानि चोक्तानि देवेश कथयस्व प्रसादतः
devyuvāca| yāni puṣpāṇi ceṣṭāni sadā bhāskarapūjane| kāni cokthāni deveśa kathayasva prasādataḥ
देवी ने कहा—भास्कर की पूजा में जो पुष्प सदा वांछित हैं, वे क्या-क्या कहे गये हैं? हे देवेश! कृपापूर्वक बताइये।
श्लोक 118 (skanda.7.17.118)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि पुष्पा ध्यायमनुत्तमम्। येन चार्कस्थले देवि शीघ्रं तुष्यति पूजितः
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi puṣpā dhyāyamanuttamam| yena cārkasthale devi śīghraṁ tuṣyati pūjitaḥ
ईश्वर ने कहा—हे देवी! सुनो, मैं पुष्पों का अनुपम ध्यान बताता हूँ, जिससे अर्कस्थल में, हे देवी! पूजित देव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 119 (skanda.7.17.119)
मालतीकुसुमैः पूजा भवेत्सांनिध्यकारिका। मल्लिकायाश्च कुसुमैर्भोगवाञ्जायते नरः
mālatīkusumaiḥ pūjā bhavetsāṁnidhyakārikā| mallikāyāśca kusumairbhogavāñjāyate naraḥ
मालती के फूलों से पूजा करने पर देव-सान्निध्य होता है। मल्लिका के फूलों से मनुष्य भोगवान होता है।
श्लोक 120 (skanda.7.17.120)
सौभाग्यं पुंडरीकैस्तु भवत्यर्थश्च शाश्वतः। कदंबपुष्पैर्देवेशि परमैश्वर्यमश्नुते
saubhāgyaṁ puṁḍarīkaistu bhavatyarthaśca śāśvataḥ| kadaṁbapuṣpairdeveśi paramaiśvaryamaśnute
पुण्डरीक से सौभाग्य और शाश्वत अर्थ प्राप्त होता है। कदम्ब के फूलों से, हे देवेशि! परम ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
श्लोक 121 (skanda.7.17.121)
भवत्यक्षयमन्नं च बकुलै रर्चने रवेः। मंदारपुष्पकैः पूजा सर्वकुष्ठविनाशिनी
bhavatyakṣayamannaṁ ca bakulai rarcane raveḥ| maṁdārapuṣpakaiḥ pūjā sarvakuṣṭhavināśinī
बकुल के फूलों से सूर्य की पूजा करने पर अक्षय अन्न प्राप्त होता है। मन्दार के फूलों से पूजा सब प्रकार के कुष्ठ का नाश करने वाली है।
श्लोक 122 (skanda.7.17.122)
बिल्वस्य पत्रकुसुमैमहतीं श्रियमश्नुते। अर्कस्रजा भवत्यर्थः सर्वकामफलप्रदः
bilvasya patrakusumaimahatīṁ śriyamaśnute| arkasrajā bhavatyarthaḥ sarvakāmaphalapradaḥ
बेल के पत्ते और फूलों से महान श्री की प्राप्ति होती है। अर्क की माला से सर्वकाम-फलप्रद अर्थ की प्राप्ति होती है।
श्लोक 123 (skanda.7.17.123)
प्रदद्याद्रूपिणीं कन्यां पूजितो बकुलस्रजा। किंशुकैरर्चितो देवि न पीडयति भास्करः
pradadyādrūpiṇīṁ kanyāṁ pūjito bakulasrajā| kiṁśukairarcito devi na pīḍayati bhāskaraḥ
बकुल की माला से पूजित होने पर वह सुरूप कन्या प्रदान करता है। किंशुक के फूलों से पूजित होने पर, हे देवी! सूर्य पीड़ा नहीं देता।
श्लोक 124 (skanda.7.17.124)
अगस्तिकुसुमैस्तद्वदानुकूल्यं प्रयच्छ ति। करवीरैस्तु देवेशि सूर्यस्यानुचरो भवेत्
agastikusumaistadvadānukūlyaṁ prayacchati| karavīraistu deveśi sūryasyānucaro bhavet
अगस्ति के फूलों से भी वैसे ही अनुकूलता प्रदान करता है। कनेर के फूलों से, हे देवेशि! मनुष्य सूर्य का अनुचर बनता है।
श्लोक 125 (skanda.7.17.125)
शतपत्रस्रजा देवि सूर्यसालोक्यतां व्रजेत्। बकपुष्पैर्महादेवि दारिद्यं नैव जायते
śatapatrasrajā devi sūryasālokyatāṁ vrajet| bakapuṣpairmahādevi dāridryaṁ naiva jāyate
शतपत्र की माला से, हे देवी! सूर्य-लोक की समता प्राप्त होती है। बक के फूलों से, हे महादेवी! दरिद्रता नहीं होती।
श्लोक 126 (skanda.7.17.126)
ऋतुकुसुमेन गन्धेन समभ्यर्च्य दिवाकरम्। चतुःसमुद्रमर्यादां स भुंक्ते पृथिवीमिमाम्
ṛtukusumena gaṁdhena samabhyarcya divākaram| catuḥsamudramaryādāṁ sa bhuṁkte pṛthivīmimām
ऋतु के अनुसार पुष्पों और गन्ध से दिवाकर की पूजा करने पर, वह चार समुद्रों की सीमा वाली इस पृथ्वी का भोग करता है।
श्लोक 127 (skanda.7.17.127)
यः सूर्यायतनं भक्त्या गैरिकेणोपलेपयेत्। प्राप्नुयान्महतीं लक्ष्मीं रोगैश्चापि प्रमुच्यते
yaḥ sūryāyatanaṁ bhaktyā gairikeṇopalepayet| prāpnuyānmahatīṁ lakṣmīṁ rogaiścāpi pramucyate
जो भक्तिपूर्वक सूर्य के मन्दिर को गेरू से लीपता है, वह महान लक्ष्मी प्राप्त करता है और रोगों से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 128 (skanda.7.17.128)
अष्टादशेह कुष्ठानि ये चान्ये व्याधयो नृणाम्। प्रलयं यांति ते सर्वे मृदा यद्युपलेपयेत्
aṣṭādaśeha kuṣṭhāni ye cānye vyādhayo nṛṇām| pralayaṁ yāṁti te sarve mṛdā yadyupalepayet
अठारह प्रकार के कुष्ठ और मनुष्यों की अन्य व्याधियाँ भी, यदि मिट्टी से लेप किया जाए, तो सब नष्ट हो जाती हैं।
श्लोक 129 (skanda.7.17.129)
विलेपनानां सर्वेषां कुंकुमं रक्तचंदनम्। पुष्पाणां करवीराणि प्रशस्तानि वरानने
vilepanānāṁ sarveṣāṁ kuṁkumaṁ raktacaṁdanam| puṣpāṇāṁ karavīrāṇi praśastāni varānane
समस्त लेपों में कुंकुम और रक्तचंदन, तथा पुष्पों में कनेर - ये सर्वश्रेष्ठ कहे गये हैं, हे वरानने!
श्लोक 130 (skanda.7.17.130)
नातः परतरं किंचिद्भास्वतस्तुष्टिकारकम्। यादृशं कुङ्कुमं जाती शतपत्रं तथाऽगुरुः। किं तस्य न भवेल्लोके यश्चैभिश्चार्चयेद्रविम्
nātaḥ parataraṁ kiṁciddbhāsvatastuṣṭikārakam| yādṛśaṁ kuṅkumaṁ jātī śatapatraṁ tathā'guruḥ| kiṁ tasya na bhavelloke yaścaibhiścārcayedravim
इनसे बढ़कर सूर्य को सन्तुष्ट करने वाला कुछ भी नहीं है, जैसा कुंकुम, चमेली, शतपत्र और अगुरु। इन सबसे जो सूर्य की पूजा करता है, उसे संसार में क्या प्राप्त नहीं होता?
श्लोक 131 (skanda.7.17.131)
उपलिप्यालयं यस्तु कुर्यान्मंडलकं शुभम्। एकेनास्य भवेदर्थो द्वाभ्यामारोग्यमश्नुते। त्रिभिस्तु सर्वविद्यावांश्चतुर्भिर्भोगवान्भवेत्
upalipyālayaṁ yastu kuryānmaṁḍalakaṁ śubham| ekenāsya bhavedartho dvābhyāmārogyamaśnute| tribhistu sarvavidyāvāṁścaturbhirbhogavānbhavet
जो मन्दिर को लीपकर शुभ मण्डल बनाता है, उसे एक बार से अर्थ की, दो बार से आरोग्य की प्राप्ति होती है, तीन बार से वह सर्वविद्यावान होता है, चार बार से भोगवान होता है।
श्लोक 132 (skanda.7.17.132)
पंचभिर्विपुलं धान्यं षड्भिरायुर्बलं यशः। सप्तमण्डलतारी स्यान्मंडलाधिपतिर्नरः
paṁcabhirvipulaṁ dhānyaṁ ṣaḍbhirāyurbalaṁ yaśaḥ| saptamaṇḍalatārī syānmaṇḍalādhipatirnaraḥ
पाँच बार से विपुल धान्य, छह बार से आयु, बल और यश प्राप्त होता है। सात बार करने वाला मनुष्य सप्त मण्डलों का अधिपति होता है।
श्लोक 133 (skanda.7.17.133)
घृतदीपप्रदानेन चक्षुष्माञ्जायते नरः। कटुतैलस्य दीपेन स्वं शत्रुं जयते नरः
ghṛtadīpapradānena cakṣuṣmāñjāyate naraḥ| kaṭutailasya dīpena svaṁ śatruṁ jayate naraḥ
घी के दीप देने से मनुष्य नेत्रवान होता है। कड़वे तेल के दीप से मनुष्य अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करता है।
श्लोक 134 (skanda.7.17.134)
तैलदीपप्रदानेन सूर्यलोके महीयते। मधूकतैलदीपेन सौभाग्यं परमं लभेत्
tailadīpapradānena sūryaloke mahīyate| madhūkatailadīpena saubhāgyaṁ paramaṁ labhet
तेल के दीप देने से सूर्यलोक में पूजित होता है। महुए के तेल के दीप से परम सौभाग्य प्राप्त होता है।
श्लोक 135 (skanda.7.17.135)
पुष्पाणां प्रवरा जाती धूपानां विजयः परः। गन्धानां कुंकुमं श्रेष्ठं लेपानां रक्तचंदनम्
puṣpāṇāṁ pravarā jātī dhūpānāṁ vijayaḥ paraḥ| gaṁdhānāṁ kuṁkumaṁ śreṣṭhaṁ lepānāṁ raktacaṁdanam
पुष्पों में जाती श्रेष्ठ है, धूपों में विजय सर्वोत्तम है। सुगन्धों में कुंकुम श्रेष्ठ है, लेपों में रक्तचंदन।
श्लोक 136 (skanda.7.17.136)
दीपदाने घृतं श्रेष्ठं नैवेद्ये मोदकः परम्। एतैस्तुष्यति देवेशः सांनिध्यं चाधिगच्छति
dīpadāne ghṛtaṁ śreṣṭhaṁ naivedye modakaḥ param| etaistuṣyati deveśaḥ sāṁnidhyaṁ cādhigacchati
दीप-दान में घी श्रेष्ठ है, नैवेद्य में मोदक सर्वोत्तम है। इन सबसे देवेश प्रसन्न होते हैं और सान्निध्य को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 137 (skanda.7.17.137)
एवं संपूज्य विधिवत्कृत्वा पितृप्रदक्षिणाम्। प्रणम्य शिरसा देवं तत्र चार्कस्थलं प्रिये
evaṁ saṁpūjya vidhivatkṛtvā pitṛpradakṣiṇām| praṇamya śirasā devaṁ tatra cārkasthalaṁ priye
इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके, पितृ-प्रदक्षिणा करके, सिर से प्रणाम करके, वहाँ अर्कस्थल देव को, हे प्रिये!
श्लोक 138 (skanda.7.17.138)
सुखासीनस्ततः पश्येद्रवेरभिमुखे स्थितः। एकं सिद्धार्थकं कृत्वा हस्ते पानीयसंयुतम्
sukhāsīnastataḥ paśyedraverabhimukhe sthitaḥ| ekaṁ siddhārthakaṁ kṛtvā haste pānīyasaṁyutam
फिर सुखपूर्वक बैठकर सूर्य के सम्मुख स्थित होकर देखे। एक सिद्धार्थक लेकर हाथ में जल सहित।
श्लोक 139 (skanda.7.17.139)
कामं यथेष्टं हृदये कृत्वार्कस्थलसन्निधौ। पिबेत्सतोयं तद्देवि ह्यस्पृष्टं दशनैः सकृत्
kāmaṁ yatheṣṭaṁ hṛdaye kṛtvārkasthalasannidhau| pibetsatoyaṁ taddevi hyaspṛṣṭaṁ daśanaiḥ sakṛt
अपनी इच्छानुसार कामना को हृदय में रखकर अर्कस्थल के समीप, हे देवी! उस जल को एक बार दाँतों से बिना छुए पी ले।
श्लोक 140 (skanda.7.17.140)
एवं कृत्वा नरो देवि कोटियात्राफलं लभेत्। ब्रह्मा विष्णुर्महादेवो ज्वलनो धनदस्तथा
evaṁ kṛtvā naro devi koṭiyātrāphalaṁ labhet| brahmā viṣṇurmahādevo jvalano dhanadastathā
ऐसा करके मनुष्य, हे देवी! करोड़ों यात्राओं का फल प्राप्त करता है। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, अग्नि और कुबेर भी।
श्लोक 141 (skanda.7.17.141)
भानुमाश्रित्य सर्वे ते मोदन्ते दिवि सुव्रते। तस्माद्भानुसमं देवं नाहं पश्यामि कञ्चन
bhānumāśritya sarve te modaṁte divi suvrate| tasmādbhānusamaṁ devaṁ nāhaṁ paśyāmi kañcana
सब भानु का आश्रय लेकर स्वर्ग में आनन्दित रहते हैं, हे सुव्रते! इसलिए मैं भानु के समान कोई अन्य देव नहीं देखता।
श्लोक 142 (skanda.7.17.142)
इति कृत्वा महादेवि पुनर्भानौ प्रदक्षिणम्। कुर्यान्मन्त्रेण देवेशि सप्तकृत्वो वरानने
iti kṛtvā mahādevi punarbhānau pradakṣiṇam| kuryānmantreṇa deveśi saptakṛtvo varānane
यह करके, हे महादेवी! पुनः भानु की सात बार प्रदक्षिणा मंत्र सहित करे, हे देवेशि! हे वरानने!
श्लोक 143 (skanda.7.17.143)
तमुष्टवाम इति ऋक्प्रथमा परिकीर्तिता। एतोन्विन्द्रं स्तवामेति द्वितीया परिकीर्तिता
tamuṣṭavāma iti ṛkprathamā parikīrtitā| etonvindraṁ stavāmeti dvitīyā parikīrtitā
'तमुष्टवाम' यह प्रथम ऋचा घोषित की गयी है। 'एतोन्विन्द्रं स्तवाम' यह द्वितीया घोषित की गयी है।
श्लोक 144 (skanda.7.17.144)
इंद्र शुद्धो न आगहि तृतीया परिकीर्तिता। इन्द्रं शुद्धो हि नो रयिं चतुर्थी परिकीर्तिता
iṁdra śuddho na āgahi tṛtīyā parikīrtitā| indraṁ śuddho hi no rayiṁ caturthī parikīrtitā
'इन्द्र क्रत्वो न आगहि' यह तृतीया घोषित की गयी है। 'इन्द्रं क्रत्वो हि नो रयिम्' यह चतुर्थी घोषित की गयी है।
श्लोक 145 (skanda.7.17.145)
अस्य वामस्येति शुभे पञ्चमी परिकीर्तिता। त्रिभिष्ट्वं देव इति वै षष्ठी च परिकीर्तिता
asya vāmasyeti śubhe pañcamī parikīrtitā| tribhiṣṭvaṁ deva iti vai ṣaṣṭhī ca parikīrtitā
'अस्य वामस्य' यह पंचमी घोषित की गयी है, हे शुभे! 'त्रिभिष्ट्वं देव' यह षष्ठी घोषित की गयी है।
श्लोक 146 (skanda.7.17.146)
दश सामानि वै यानि प्रवराणि मनीषिभिः। गीतानि सामगैर्नित्यं सप्तमीं तैस्तु कारयेत्
daśa sāmāni vai yāni pravarāṇi manīṣibhiḥ| gītāni sāmagairnityaṁ saptamīṁ taistu kārayet
जो दस साम विद्वानों द्वारा श्रेष्ठ कहे गये हैं, जो सामगायकों द्वारा नित्य गाये जाते हैं, उनसे सप्तमी सम्पन्न करे।
श्लोक 147 (skanda.7.17.147)
तानि ते कथयाम्यद्य दश सामानि सुन्दरि। हुंकारः प्रणवोद्गीथः प्रस्तावश्च चतुष्टयम्
tāni te kathayāmyadya daśa sāmāni sundari| huṁkāraḥ praṇavodgīthaḥ prastāvaśca catuṣṭayam
आज मैं तुम्हें वे दस साम बताता हूँ, हे सुन्दरि! हुंकार, प्रणव, उद्गीथ और प्रस्ताव - यह चार हैं।
श्लोक 148 (skanda.7.17.148)
पञ्चमं प्रहरो यत्र षष्ठमारण्यकं तथा। निधनं सप्तमं साम्नां सप्तसिद्धिमिति स्मृतम्
pañcamaṁ paharo yatra ṣaṣṭhamāraṇyakaṁ tathā| nidhanaṁ saptamaṁ sāmnāṁ saptasiddhimiti smṛtam
पाँचवाँ प्रहर आदि जहाँ है, छठा आरण्यक है, सातवाँ निधन है - यह साम की सप्त-सिद्धि कही गयी है।
श्लोक 149 (skanda.7.17.149)
पञ्चविध्यमिति प्रोक्तं ह्रींकारप्रणवेन तु। अष्टमं च तथा साध्यं नवमं वामदेवकम्
pañcavidhyamiti proktaṁ hrīṁkārapraṇavena tu| aṣṭamaṁ ca tathā sādhyaṁ navamaṁ vāmadevakam
'पंचविध' यह ह्रींकार और प्रणव से कहा गया है, आठवाँ साध्य और नवाँ वामदेव्य है।
श्लोक 150 (skanda.7.17.150)
ज्येष्ठं तु दशमं साम वेधसे प्रियमुत्तमम्। एतेषां देवि साम्नां वै जाप्यं कार्यं विधानतः
jyeṣṭhaṁ tu daśamaṁ sāma vedhase priyamuttamam| eteṣāṁ devi sāmnāṁ vai jāpyaṁ kāryaṁ vidhānataḥ
ज्येष्ठ साम दसवाँ है, जो विधाता को अत्यन्त प्रिय है। इन सामों का जप, हे देवी! विधिपूर्वक करना चाहिए।
श्लोक 151 (skanda.7.17.151)
ज्येष्ठसामपरं चैव द्वितीयं गदतः शृणु। न च श्राव्यं द्वितीयं तु जप्तव्यं मुक्तिमिच्छता
jyeṣṭhasāmaparaṁ caiva dvitīyaṁ gadataḥ śṛṇu| na ca śrāvyaṁ dvitīyaṁ tu japtavyaṁ muktimicchatā
ज्येष्ठसाम से अन्य, दूसरा भी है, उसे कहते हुए मुझसे सुनो। यह दूसरा किसी को सुनाने योग्य नहीं, बल्कि मुक्ति चाहने वाले द्वारा जप करने योग्य है।
श्लोक 152 (skanda.7.17.152)
तज्जाप्यं परमं प्रोक्तं स्वयं देवेन भानुना। जाप्यस्य विनियोगोऽस्य लक्षणं च निबोध मे। स्तोभसारं श्वासलीनमोंकारादि स्मृतं बुधैः
tajjāpyaṁ paramaṁ proktaṁ svayaṁ devena bhānunā| jāpyasya viniyogo'sya lakṣaṇaṁ ca nibodha me| stobhasāraṁ śvāsalīnamoṁkārādi smṛtaṁ budhaiḥ
यह जप्य स्वयं देव भानु द्वारा परम कहा गया है। इस जप्य के प्रयोग और लक्षण को मुझसे जानो। स्तोभ-सार, श्वास में लीन, ओंकार आदि - यह विद्वानों द्वारा स्मरण किया गया है।
श्लोक 153 (skanda.7.17.153)
ऊर्भानुश्च तथा धर्मं धर्मः सत्यं ह्यृत तथा। धर्मं ये धर्मवद्धर्मे धर्मे वै निधनं गताः
ūrbhānuśca tathā dharmaṁ dharmaḥ satyaṁ hyṛta tathā| dharmaṁ ye dharmavaddharme dharme vai nidhanaṁ gatāḥ
'ऊर्भानु' और धर्म, धर्म सत्य और ऋत भी, जो धर्मवत् धर्म में स्थित रहकर धर्म में ही निधन को प्राप्त हुए।
श्लोक 154 (skanda.7.17.154)
यदेभिश्च यजेच्छब्दैरुचितं सामगैर्द्विजैः। जाप्यं चैतत्परं प्रोक्तं स्वयं देवेन भानुना
yadebhiśca yajecchabdairucitaṁ sāmagairdvijaiḥ| jāpyaṁ caitatparaṁ proktaṁ svayaṁ devena bhānunā
जिन शब्दों से सामगायक द्विज यजन करते हैं, वे उचित हैं। यह परम जप्य स्वयं देव भानु द्वारा कहा गया है।
श्लोक 155 (skanda.7.17.155)
एतद्वै जप्यमानस्तु पुनरावर्तते न तु। सर्वरोगविनिर्मुक्तो मुच्यते ब्रह्महत्यया
etadvai japyamānastu punarāvartate na tu| sarvarogavinirmukto mucyate brahmahatyayā
इसका जप करते हुए मनुष्य फिर संसार में नहीं लौटता। वह सब रोगों से मुक्त होता है और ब्रह्महत्या से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 156 (skanda.7.17.156)
आज्यदोहाद्यदोहेति ज्येष्ठसाम्नोऽपि लक्षणम्
ājyadohādyadoheti jyeṣṭhasāmno'pi lakṣaṇam
'आज्यदोहा' से लेकर जो दोह है, वह ज्येष्ठसाम का भी लक्षण है।
श्लोक 157 (skanda.7.17.157)
इति संपूज्य देवेशं ततः कुर्यात्परां स्तुतिम्। ऋग्भिर्वे पंचभिश्चैव शृणुष्वैकमनास्तु ताः
iti saṁpūjya deveśaṁ tataḥ kuryātparāṁ stutim| ṛgbhirve paṁcabhiścaiva śṛṇuṣvaikamanāstu tāḥ
इस प्रकार देवेश की पूजा करके फिर परम स्तुति करे। पाँच ऋचाओं से - उन्हें एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 158 (skanda.7.17.158)
उक्षाणं पृश्निमिति वै प्रथमा परिकीर्तिता। चत्वारि वाक्परीति वै द्वितीया परिकीर्तिता
ukṣāṇaṁ pṛśnimiti vai prathamā parikīrtitā| catvāri vākparīti vai dvitīyā parikīrtitā
'उक्षाणं पृश्निम्' यह प्रथम घोषित की गयी है। 'चत्वारि वाक्परिमिता' यह द्वितीया घोषित की गयी है।
श्लोक 159 (skanda.7.17.159)
इंद्रं मित्रं तृतीया तु ऋक्चैव परिकीर्तिता। कृष्णं नियानं हि तथा चतुर्थी परिकीर्तिता
iṁdraṁ mitraṁ tṛtīyā tu ṛkcaiva parikīrtitā| kṛṣṇaṁ niyānaṁ hi tathā caturthī parikīrtitā
'इन्द्रं मित्रम्' यह तृतीय ऋचा घोषित की गयी है। 'कृष्णं नियानम्' यह चतुर्थी घोषित की गयी है।
श्लोक 160 (skanda.7.17.160)
द्वादशप्रथम इति पंचमी परिकीर्तिता। यो रत्नवाहीत्यनया किरीटं योजयेद्रवेः
dvādaśapratham iti pañcamī parikīrtitā| yo ratnavāhītyanayā kirīṭaṁ yojayedraveḥ
'द्वादशप्रथम्' यह पंचम घोषित की गयी है। 'यो रत्नवाही' इस मंत्र से सूर्य के मुकुट को जोड़े।
श्लोक 161 (skanda.7.17.161)
गतेहनामित्यनया अव्यंगं भास्करं न्यसेत्। अनेन विधिना देवि पूजयेद्विधिवद्रविम्
gatehanāmityanayā avyaṅgaṁ bhāskaraṁ nyaset| anena vidhinā devi pūjayedvidhivadravim
'गतेहना' इस मंत्र से अव्यंग भास्कर को स्थापित करे। इसी विधि से, हे देवी! सूर्य की विधिपूर्वक पूजा करे।
श्लोक 162 (skanda.7.17.162)
इत्येष ते मया ख्यातः प्रतिमापूजने विधिः
ityeṣa te mayā khyātaḥ pratimāpūjane vidhiḥ
यह मैंने तुम्हें प्रतिमा-पूजन का विधान बता दिया।
श्लोक 163 (skanda.7.17.163)
अनेनविधिना यस्तु सततं पूजयेद्रविम्। स प्राप्नोत्यधिकान्कामानिह लोके परत्र च
anenavidhinā yastu satataṁ pūjayedravim| sa prāpnotyadhikānkāmāniha loke paratra ca
जो भी इस विधि से निरन्तर सूर्य की पूजा करता है, वह इस लोक में और परलोक में अधिक कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 164 (skanda.7.17.164)
पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्। कन्यार्थी लभते कन्यां विद्यार्थी वेदविद्भवेत्
putrārthī labhate putraṁ dhanārthī labhate dhanam| kanyārthī labhate kanyāṁ vidyārthī vedavidbhavet
पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है, धनार्थी धन प्राप्त करता है, कन्यार्थी कन्या प्राप्त करता है, विद्यार्थी वेदज्ञ हो जाता है।
श्लोक 165 (skanda.7.17.165)
निष्कामः पूजयेद्यस्तु स मोक्षं याति वै ध्रुवम्। अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यादर्कसूर्यप्रभावतः
niṣkāmaḥ pūjayedyastu sa mokṣaṁ yāti vai dhruvam| asya kṣetrasya māhātmyādarkasūryaprabhāvataḥ
जो निष्काम भाव से पूजा करता है, वह निश्चय ही मोक्ष को प्राप्त होता है, इस क्षेत्र के माहात्म्य से और अर्क-सूर्य के प्रभाव से।
श्लोक 166 (skanda.7.17.166)
अन्यत्र ब्राह्मणानां च कोटिना यत्फलं लभेत्। अर्कस्थले तथैकेन भोजितेन तु तत्फलम्
anyatra brāhmaṇānāṁ ca koṭinā yatphalaṁ labhet| arkasthale tathaikena bhojitena tu tatphalam
अन्यत्र करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल अर्कस्थल में एक ब्राह्मण को भोजन कराने से मिल जाता है।
श्लोक 167 (skanda.7.17.167)
स्नानं दानं जपो होमः सूर्यपर्वणि यत्कृतम्। तत्सर्वं कोटिगुणितं सूर्यकोटिप्रभावतः
snānaṁ dānaṁ japo homaḥ sūryaparvaṇi yatkṛtam| tatsarvaṁ koṭiguṇitaṁ sūryakoṭiprabhāvataḥ
सूर्य-पर्व पर किया गया स्नान, दान, जप और हवन - यह सब करोड़ों गुना फल देने वाला है, करोड़ों सूर्यों के प्रभाव के समान।
श्लोक 168 (skanda.7.17.168)
माघमासे नरो यस्तु सप्तम्यां रविवासरे। कृष्णपक्षे महादेवि जागरं श्रद्धयाऽऽचरेत्। अर्कस्थलसमीपे तु स याति परमां गतिम्
māghamāse naro yastu saptamyāṁ ravivāsare| kṛṣṇapakṣe mahādevi jāgaraṁ śraddhayā'caret| arkasthalasamīpe tu sa yāti paramāṁ gatim
जो मनुष्य माघ मास में, कृष्णपक्ष की सप्तमी को, जो रविवार को पड़े, हे महादेवी! श्रद्धापूर्वक जागरण करता है, वह अर्कस्थल के समीप परम गति को प्राप्त करता है।
श्लोक 169 (skanda.7.17.169)
गोशतस्य प्रदत्तस्य कुरुक्षेत्रे च यत्फलम्। तत्फलं समवाप्नोति तत्रार्कस्थलदर्शनात्
gośatasya pradattasya kurukṣetre ca yatphalam| tatphalaṁ samavāpnoti tatrārkasthaladarśanāt
कुरुक्षेत्र में सौ गायों के दान से जो फल मिलता है, वही फल वहाँ अर्कस्थल के दर्शन से प्राप्त होता है।
श्लोक 170 (skanda.7.17.170)
अर्कस्थलः पूजनीयस्तत्र स्थाने निवासिभिः। जपापुष्पैरर्कपुष्पै रोगिभिस्तु विशेषतः
arkasthalaḥ pūjanīyastatra sthāne nivāsibhiḥ| japāpuṣpairarkapuṣpai rogibhistu viśeṣataḥ
अर्कस्थल की पूजा वहाँ के निवासियों द्वारा जपा के फूलों और अर्क के फूलों से करनी चाहिए, विशेष रूप से रोगियों द्वारा।
श्लोक 171 (skanda.7.17.171)
न च पत्रोर्णकुसुमैर्न चैवोन्मत्तसंभवैः। न चाम्रातकजैः पुष्पैरर्चनीयो दिवाकरः
na ca patrorṇakusumairna caivonmattasaṁbhavaiḥ| na cāmrātakajaiḥ puṣpairarcanīyo divākaraḥ
पत्रोर्ण के फूलों से, धतूरे से उत्पन्न फूलों से, और आम्रातक के फूलों से दिवाकर की पूजा नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 172 (skanda.7.17.172)
आम्रातकस्य कुसुमं निर्माल्यमिव दृश्यते। अप्रत्यग्रं बहिर्यस्मात्तस्मात्तत्परिवर्जयेत्
āmrātakasya kusumaṁ nirmālyamiva dṛśyate| apratyagraṁ bahiryasmāttasmāttatparivarjayet
आम्रातक का फूल निर्माल्य के समान दिखायी देता है, क्योंकि वह बाहर से ताज़ा नहीं होता, इसलिए उसका त्याग करना चाहिए।
श्लोक 173 (skanda.7.17.173)
नाविज्ञातं प्रदातव्यं न म्लानं न च दूषितम्। न च पर्य्युषितं माल्यं दातव्यं भूतिमिच्छता
nāvijñātaṁ pradātavyaṁ na mlānaṁ na ca dūṣitam| na ca paryyuṣitaṁ mālyaṁ dātavyaṁ bhūtimicchatā
जो अज्ञात हो, म्लान हो, दूषित हो, या बासी हो, ऐसी माला भूति चाहने वाले द्वारा नहीं देनी चाहिए।
श्लोक 174 (skanda.7.17.174)
देवमुल्लोचयेद्यस्तु तत्क्षणात्पुष्पलोभतः। पुष्पाणि च सुगन्धानि भोजकेनेतराणि च
devamullocayedyastu tatkṣaṇātpuṣpalobhataḥ| puṣpāṇi ca sugaṁdhāni bhojakenetarāṇi ca
जो पुजारी लोभ के कारण उसी क्षण देव को फूलों से वंचित कर देता है, तथा सुगन्धित फूलों के स्थान पर अन्य फूल चढ़ाता है।
श्लोक 175 (skanda.7.17.175)
ब्रह्महत्यामवाप्नोति भोजको लोभमोहितः। महारौरवमासाद्य पच्यते शाश्वतीः समाः
brahmahatyāmavāpnoti bhojako lobhamohitaḥ| mahāraurvamāsādya pacyate śāśvatīḥ samāḥ
वह लोभ से मोहित पुजारी ब्रह्महत्या के पाप को प्राप्त करता है। वह महारौरव नरक को प्राप्त होकर शाश्वत वर्षों तक वहाँ पकता रहता है।
श्लोक 176 (skanda.7.17.176)
हन्त ते कीर्त्तयिष्यामि धूपदानविधिं परम्। प्रदानाद्देवदेवस्य येन धूपेन यत्फलम्
hanta te kīrttayiṣyāmi dhūpadānavidhiṁ param| pradānāddevadevasya yena dhūpena yatphalam
अब मैं तुम्हें धूप-दान की उत्तम विधि बताता हूँ। देवाधिदेव को जिस धूप के अर्पण से जो फल प्राप्त होता है।
श्लोक 177 (skanda.7.17.177)
सदार्चने च धूपेन सामीप्यं कुरुते रविः। प्रदद्यात्सकलं कामं यद्यदिच्छति मानवः
sadārcane ca dhūpena sāmīpyaṁ kurute raviḥ| pradadyātsakalaṁ kāmaṁ yadyadicchati mānavaḥ
नित्य पूजा में धूप से सूर्य निकटता प्रदान करते हैं। मनुष्य जो भी कामना करता है, वह उसे सम्पूर्ण रूप से प्रदान करते हैं।
श्लोक 178 (skanda.7.17.178)
तथैवागुरुधूपेन निधिं दद्यादभीप्सितम्। आरोग्यार्थी धनार्थी च नित्यदा गुग्गलं दहेत्
tathaivāguru dhūpena nidhiṁ dadyādabhīpsitam| ārogyārthī dhanārthī ca nityadā guggalaṁ dahet
इसी प्रकार अगुरु धूप से भी अभीष्ट निधि प्रदान करते हैं। आरोग्य और धन चाहने वाला नित्य गुग्गुल जलाए।
श्लोक 179 (skanda.7.17.179)
पिंडातधूपदानेन सदा तुष्यति भानुमान्। आरोग्यं च स्वयं दद्यात्सौख्यं च परमं भवेत्
piṁḍātadhūpadānena sadā tuṣyati bhānumān| ārogyaṁ ca svayaṁ dadyātsaukhyaṁ ca paramaṁ bhavet
पिण्डात धूप के दान से भानुमान सदा प्रसन्न होते हैं। वह स्वयं आरोग्य देंगे और परम सुख होगा।
श्लोक 180 (skanda.7.17.180)
श्रीवासकस्य धूपेन वाणिज्यं सकलं लभेत्। रसं सर्जरसं चैव दहतोऽर्थागमो भवेत्
śrīvāsakasya dhūpena vāṇijyaṁ sakalaṁ labhet| rasaṁ sarjarasaṁ caiva dahato'rthāgamo bhavet
श्रीवास के धूप से सम्पूर्ण वाणिज्य की प्राप्ति होती है। सर्जरस को जलाने से धन की प्राप्ति होती है।
श्लोक 181 (skanda.7.17.181)
देवदारुं च दहतो भवत्यन्नमथाक्षयम्। विलेपनं कुंकुमेन सर्वकामफलप्रदम्
devadāruṁ ca dahato bhavatyannamathākṣayam| vilepanaṁ kuṁkumena sarvakāmaphalapradam
देवदारु को जलाने से अक्षय अन्न प्राप्त होता है। कुंकुम का लेप सब कामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 182 (skanda.7.17.182)
इह लोके सुखी भूत्वा अक्षयं स्वर्गमाप्नुयात्। चंदनस्य प्रलेपेन श्रियमायुश्च विंदति
iha loke sukhī bhūtvā akṣayaṁ svargamāpnuyāt| caṁdanasya pralepena śriyamāyuśca viṁdati
इस लोक में सुखी होकर व्यक्ति अक्षय स्वर्ग प्राप्त करता है। चंदन के लेप से श्री और आयु की प्राप्ति होती है।
श्लोक 183 (skanda.7.17.183)
रक्तचन्दनलेपेन सर्वं दद्याद्दिवाकरः। अपि रोगशतैर्ग्रस्तः क्षेममारोग्यमाप्नुयात्
raktacandanalepena sarvaṁ dadyāddivākaraḥ| api rogaśatairgrastaḥ kṣemamārogyamāpnuyāt
रक्तचंदन के लेप से दिवाकर सब कुछ प्रदान करते हैं। सैकड़ों रोगों से ग्रस्त व्यक्ति भी क्षेम और आरोग्य प्राप्त करता है।
श्लोक 184 (skanda.7.17.184)
गतिगंधं च सौभाग्यं परमं विंदते नरः। कस्तूरिकामर्दनकैरैश्वर्यमतुलं लभेत्
gatigaṁdhaṁ ca saubhāgyaṁ paramaṁ viṁdate naraḥ| kastūrikāmardanakairaiśvaryamatulaṁ labhet
सुगन्ध से मनुष्य परम सौभाग्य को प्राप्त करता है। कस्तूरी के लेप से अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
श्लोक 185 (skanda.7.17.185)
कर्पूरसंयुतैर्गंधैः क्ष्माधिपाधिपतिभवेत्। चतुःसमेन गंधेन सर्वान्कामानवाप्नुयात्
karpūrasaṁyutairgaṁdhaiḥ kṣmādhipādhipatirbhavet| catuḥsamena gaṁdhena sarvānkāmānavāpnuyāt
कर्पूर-युक्त सुगन्धों से मनुष्य राजाओं का भी अधिपति बनता है। चतुःसम सुगन्ध से सब कामनाएँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक 186 (skanda.7.17.186)
एतत्ते कथितं देवि सूर्यमाहात्म्यमुत्तमम्। सविस्तरं मया ख्यातं किमन्यत्परिपृच्छसि
etatte kathitaṁ devi sūryamāhātmyamuttamam| savistaraṁ mayā khyātaṁ kimanyatparipṛcchasi
यह, हे देवी! तुम्हें सूर्य का उत्तम माहात्म्य बताया गया, जो मैंने विस्तारपूर्वक कहा है। अब और क्या पूछना चाहती हो?
श्लोक 187 (skanda.7.17.187)
देव्युवाच। यद्येवं भगवान्सूर्यः सर्वतेजस्विनां वरः। स कथं ग्रस्यते देव सैंहिकेयेन राहुणा
devyuvāca| yadyevaṁ bhagavānsūryaḥ sarvatejasvināṁ varaḥ| sa kathaṁ grasyate deva saiṁhikeyena rāhuṇā
देवी ने कहा—यदि भगवान सूर्य समस्त तेजस्वियों में श्रेष्ठ हैं, तो हे देव! वे सैंहिकेय राहु द्वारा कैसे ग्रस लिये जाते हैं?
श्लोक 188 (skanda.7.17.188)
ईश्वर उवाच। शृणु दैवि प्रवक्ष्यामि सर्व पापप्रणाशनम्। कारणं ग्रहणस्यापि भ्रांतेर्विच्छेदकारकम्
īśvara uvāca| śṛṇu daivi pravakṣyāmi sarva pāpapraṇāśanam| kāraṇaṁ grahaṇasyāpi bhrāṁterviccedakārakam
ईश्वर ने कहा—हे देवी! सुनो, मैं सब पापों का नाश करने वाला, ग्रहण के कारण को भी बताता हूँ, जो भ्रान्ति का विच्छेद करने वाला है।
श्लोक 189 (skanda.7.17.189)
राहुरादित्यबिंबस्याधस्तात्तिष्ठति भामिनि। अमृतार्थी विमानस्थो यावत्संस्रवतेऽमृतम्
rāhurādityabiṁbasyādhastāttiṣṭhati bhāmini| amṛtārthī vimānastho yāvatsaṁsravate'mṛtam
हे भामिनी! राहु आदित्य-बिम्ब के नीचे स्थित रहता है, विमान में स्थित, अमृत की इच्छा से, जब तक अमृत झरता रहता है।
श्लोक 190 (skanda.7.17.190)
बिंबेनांतरितो देवि आदित्यग्रहणं हि तत्। न कश्चिद्ग्रसितुं शक्त आदित्यो दहति ध्रुवम्
biṁbenāṁtarito devi ādityagrahaṇaṁ hi tat| na kaścidgrasituṁ śakta ādityo dahati dhruvam
उस बिम्ब के आड़ में आ जाने से, हे देवी! वही आदित्य-ग्रहण है। कोई भी उसे ग्रसने में समर्थ नहीं है, आदित्य निश्चय ही दग्ध कर देते हैं।
श्लोक 191 (skanda.7.17.191)
ब्रह्मादयस्तमर्चंति स आदिः सर्वनाकिनाम्। आदित्यदेहजाः सर्वे तथान्ये देवदानवाः
brahmādayastamarcaṁti sa ādiḥ sarvanākinām| ādityadehajāḥ sarve tathānye devadānavāḥ
ब्रह्मा आदि सब उनकी पूजा करते हैं, वे समस्त स्वर्गवासियों के आदि हैं। समस्त देव-दानव भी आदित्य की देह से उत्पन्न हैं।
श्लोक 192 (skanda.7.17.192)
आदिकर्त्ता स्वयं यस्मादादित्यस्तेन चोच्यते। प्रभासे संस्थितो देवः सर्वपातकनाशनः
ādikarttā svayaṁ yasmādādityastena cocyate| prabhāse saṁsthito devaḥ sarvapātakanāśanaḥ
चूँकि वह स्वयं आदिकर्ता है, इसी से वह आदित्य कहलाता है। प्रभास में स्थित वह देव समस्त पातकों का नाशक है।
श्लोक 193 (skanda.7.17.193)
भुक्तिमुक्तिप्रदो देवो व्याधिदुष्कृतनाशकृत्। तत्र सिद्धाः पुरा देवि लोकपाला महर्षयः
bhuktimuktipradodevo vyādhiduṣkṛtanāśakṛt| tatra siddhāḥ purā devi lokapālā maharṣayaḥ
वह देव भोग और मोक्ष देने वाले, व्याधि और दुष्कृत्यों का नाश करने वाले हैं। वहाँ पूर्वकाल में, हे देवी! लोकपाल और महर्षि सिद्ध हुए।
श्लोक 194 (skanda.7.17.194)
सिद्धा विद्या धरा यक्षा गंधर्वा मुनयस्तथा। धनदोऽपि तथा भीष्मो ययातिर्गालवस्तथा
siddhā vidyā dharā yakṣā gaṁdharvā munayastathā| dhanado'pi tathā bhīṣmo yayātirgālavastathā
सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व, मुनि, तथा कुबेर, भीष्म, ययाति और गालव भी।
श्लोक 195 (skanda.7.17.195)
सांबश्चैव तथा देवि परां सिद्धिमितो गताः। इदं रहस्यं देवेशि सूर्यमाहात्म्यमुत्तमम्
sāmbaścaiva tathā devi parāṁ siddhimito gatāḥ| idaṁ rahasyaṁ deveśi sūryamāhātmyamuttamam
साम्ब भी, हे देवी! इसी स्थान से परम सिद्धि को प्राप्त हुए। यह रहस्य, हे देवेशि! सूर्य का उत्तम माहात्म्य है।
श्लोक 196 (skanda.7.17.196)
न देयं दुष्टबुद्धीनां पापिनां च विशेषतः। न नास्तिकेऽश्रद्दधाने न क्रूरं वा कथंचन
na deyaṁ duṣṭabuddhīnāṁ pāpināṁ ca viśeṣataḥ| na nāstike'śraddadhāne na krūraṁ vā kathaṁcana
यह दुष्ट बुद्धि वालों को और विशेष रूप से पापियों को नहीं देना चाहिए, न नास्तिक को, न अश्रद्धालु को, और न किसी क्रूर व्यक्ति को कभी।
श्लोक 197 (skanda.7.17.197)
इमां कथामनुब्रूयात्तथा नाऽसूयके शिवे। इदं पुत्राय शिष्याय धर्मिणे न्यायवर्तिने
imāṁ kathāmanubrūyāttathā nā'sūyake śive| idaṁ putrāya śiṣyāya dharmiṇe nyāyavartine
इस कथा को ईर्ष्यालु को भी नहीं सुनानी चाहिए, हे शिवे! यह पुत्र को, शिष्य को, धर्मात्मा को, न्यायवर्ती को कहनी चाहिए।
श्लोक 198 (skanda.7.17.198)
कथनीयं महाब्रह्म सूर्यभक्ताय सुव्रते। अर्कस्थलस्य देवस्य माहात्म्यमिदमुत्तमम्
kathanīyaṁ mahābrahma sūryabhaktāya suvrate| arkasthalasya devasya māhātmyamidamuttamam
हे सुव्रते! यह महान ब्रह्म-रहस्य सूर्य-भक्त को कहना चाहिए। अर्कस्थल देव का यह उत्तम माहात्म्य है।
श्लोक 199 (skanda.7.17.199)
यः श्राद्धे श्रावयेद्देवि ब्राह्मणान्संशितव्रतान्। तस्यानंतं भवेद्देवि यद्दानं पुरुषस्य वै
yaḥ śrāddhe śrāvayeddevi brāhmaṇānsaṁśitavratān| tasyānaṁtaṁ bhaveddevi yaddānaṁ puruṣasya vai
जो इसे श्राद्ध में दृढ़-व्रती ब्राह्मणों को सुनाता है, हे देवी! उस पुरुष का जो दान होता है, वह अनन्त हो जाता है।
श्लोक 200 (skanda.7.17.200)
यत्रेदं कीर्त्त्यते पुण्यं संपदस्तत्र वै सदा। यातुधाना न हिंसंति तच्छ्राद्धं भयविह्वलाः
yatredaṁ kīrttyate puṇyaṁ saṁpadastatra vai sadā| yātudhānā na hiṁsaṁti tacchrāddhaṁ bhayavihvalāḥ
जहाँ यह पुण्य कथा कही जाती है, वहाँ सदा सम्पत्तियाँ रहती हैं। भय से व्याकुल यातुधान उस श्राद्ध को हानि नहीं पहुँचाते।
श्लोक 201 (skanda.7.17.201)
पंक्तिपावनतां यांति येऽपि वै पंक्तिदूषकाः। सुतवाञ्जन्मवांश्च स्यात्सर्वकाममनोरमः
paṁktipāvanatāṁ yāṁti ye'pi vai paṁktidūṣakāḥ| sutavāñjanmavāṁśca syātsarvakāmamanoramaḥ
जो लोग भोज्य-पंक्ति को दूषित करने वाले भी हैं, वे भी पंक्ति-पावनता को प्राप्त होते हैं। मनुष्य सुतवान, सफल जन्म वाला और सब कामनाओं से मनोरम होता है।
श्लोक 202 (skanda.7.17.202)
प्रवासिभिर्बंधुवर्गैः संयुज्येत सदा नरः। नष्टैः संयुज्यते चार्थैरपरैश्चापि चिंतितैः
pravāsibhirbaṁdhuvargaiḥ saṁyujyeta sadā naraḥ| naṣṭaiḥ saṁyujyate cārthairaparaiścāpi ciṁtitaiḥ
प्रवास में गये बन्धुजनों से मनुष्य सदा मिलता है। नष्ट हुए धन से और अन्य वांछित वस्तुओं से भी वह जुड़ता है।
श्लोक 203 (skanda.7.17.203)
रक्ष्यते यागिनीभिश्च प्रियैश्च न वियुज्यते। उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा शृणुयाद्ब्राह्मणः सदा। सर्वान्कामांश्च लभते नात्र कार्या विचारणा
rakṣyate yāginībhiśca priyaiśca na viyujyate| upaspṛśya śucirbhūtvā śṛṇuyādbrāhmaṇaḥ sadā| sarvānkāmāṁśca labhate nātra kāryā vicāraṇā
वह योगिनियों द्वारा रक्षित रहता है और प्रियजनों से वियुक्त नहीं होता। ब्राह्मण स्पर्श करके पवित्र होकर इसे सदा सुने, वह सब कामनाओं को प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 204 (skanda.7.17.204)
वैश्यः समृद्धिमतुलां क्षत्रियः पृथिवीपतिः। वणिजश्चापि वाणिज्यमखंडं शतसंख्यया। लभेयुः कीर्तनादस्याः सूर्योत्पत्तेर्वरानने
vaiśyaḥ samṛddhimatulāṁ kṣatriyaḥ pṛthivīpatiḥ| vaṇijaścāpi vāṇijyamakhaṇḍaṁ śatasaṁkhyayā| labheyuḥ kīrtanādasyāḥ sūryotpatterarānane
वैश्य अतुल समृद्धि प्राप्त करता है, क्षत्रिय पृथ्वी का स्वामी बनता है। व्यापारी भी सौ गुना अखण्डित वाणिज्य प्राप्त करता है, हे वरानने! सूर्य की इस उत्पत्ति-कथा के कीर्तन से।
श्लोक 205 (skanda.7.17.205)
शूद्राश्चैवाभिलषितान्कामान्प्राप्स्यंति भामिनि। अपमृत्युभयं घोरं मृत्युतोऽपि महाभयम्
śūdrāścaivābhilaṣitānkāmānprāpsyaṁti bhāmini| apamṛtyubhayaṁ ghoraṁ mṛtyuto'pi mahābhayam
शूद्र भी अभिलषित कामनाओं को प्राप्त करेंगे, हे भामिनी! अपमृत्यु का घोर भय, जो मृत्यु से भी बड़ा भय है।
श्लोक 206 (skanda.7.17.206)
नश्यते नात्र संदेहो राजद्वारकृतं च यत्। सर्वकामसमृद्धात्मा सूर्यलोके महीयते
naśyate nātra saṁdeho rājadvārakṛtaṁ ca yat| sarvakāmasamṛddhātmā sūryaloke mahīyate
यह नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं, और जो भी राजद्वार-सम्बन्धी कष्ट हो, वह भी नष्ट हो जाता है। सब कामनाओं से समृद्ध आत्मा वाला व्यक्ति सूर्यलोक में पूजित होता है।
श्लोक 207 (skanda.7.17.207)
इत्येतत्कथितं देवि माहात्म्यं सूर्यदैवतम्। अर्कस्थलप्रसंगेन किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि
ityetatkathitaṁ devi māhātmyaṁ sūryadaivatam| arkasthalaprasaṁgena kimanyacchrotumicchasi
इस प्रकार यह, हे देवी! सूर्य-देवता का माहात्म्य कहा गया, अर्कस्थल के प्रसंग में। अब और क्या सुनना चाहती हो?
श्लोक 208 (skanda.7.17.208)
स्थानं शाश्वतमोजसां गतिरपां दीपो दिशामक्षयः सिद्धेर्द्वारमपावभेदि जगतां साधारणं लोचनम्। हैमं पुष्करमंतरिक्षसरसो दीप्तं दिवः कुण्डलं कालोन्मानविभावनाक्षतलयं बिंबं रवेः पातु वः
sthānaṁ śāśvatamojasāṁ gatirapāṁ dīpo diśāmakṣayaḥ siddherdvāramapāvabhedi jagatāṁ sādhāraṇaṁ locanam| haimaṁ puṣkaramaṁtarikṣasaraso dīptaṁ divaḥ kuṇḍalaṁ kālonmānavibhāvanākṣatalayaṁ biṁbaṁ raveḥ pātu vaḥ
जो तेजों का शाश्वत स्थान है, जलों की गति है, दिशाओं का अक्षय दीपक है, सिद्धि का खुला हुआ द्वार है, समस्त जगत का साझा नेत्र है, जो अन्तरिक्ष-सरोवर का स्वर्णिम कमल है, स्वर्ग का दीप्त कुण्डल है, काल के मान और भाव से अक्षत-अखण्डित बिम्ब है - वह सूर्य-बिम्ब तुम्हारी रक्षा करे।