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प्रभास खण्ड · अध्याय 174

कुन्तीश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

श्लोक 1 (skanda.7.174.1)

ततो गच्छेन्महादेवि कुन्तीश्वरमनुत्तमम्। सावित्र्याः पूर्वभागस्थं खातमध्ये व्यवस्थितम्

tato gacchenmahādevi kuntīśvaramanuttamam| sāvitryāḥ pūrvabhāgasthaṁ khātamadhye vyavasthitam

इसके पश्चात् हे महादेवि, उस अनुपम कुन्तीश्वर के पास जाना चाहिए, जो सावित्री के पूर्व भाग में, खात (कुण्ड) के मध्य में स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.174.2)

कुन्त्या प्रतिष्ठितं देवि क्षेत्रे प्राभासिके प्रिये। पाण्डवास्तु यदा पूर्वं प्रभासक्षेत्रमागताः

kuntyā pratiṣṭhitaṁ devi kṣetre prābhāsike priye| pāṇḍavāstu yadā pūrvaṁ prabhāsakṣetramāgatāḥ

हे प्रिये देवि, यह प्राभासिक क्षेत्र में कुन्ती के द्वारा प्रतिष्ठित है। पूर्वकाल में जब पाण्डव प्रभासक्षेत्र में आये थे,

श्लोक 3 (skanda.7.174.3)

तीर्थयात्राप्रसंगेन कुन्त्या चैव समन्विताः। तस्मिन्काले महादेवि ज्ञात्वा क्षेत्रमनुत्तमम्

tīrthayātrāprasaṁgena kuntyā caiva samanvitāḥ| tasminkāle mahādevi jñātvā kṣetramanuttamam

तीर्थयात्रा के प्रसंग में कुन्ती के साथ आये हुए, उस समय हे महादेवि, इस अनुपम क्षेत्र को जानकर,

श्लोक 4 (skanda.7.174.4)

कुन्त्या प्रतिष्ठितं लिंगं सर्वपापभयापहम्। कार्तिक्यां तु विशेषेण यस्तं पूजयते नरः। स सर्वकामतृप्तात्मा रुद्रलोके महीयते

kuntyā pratiṣṭhitaṁ liṁgaṁ sarvapāpabhayāpaham| kārtikyāṁ tu viśeṣeṇa yastaṁ pūjayate naraḥ| sa sarvakāmatṛptātmā rudraloke mahīyate

कुन्ती ने वहाँ समस्त पाप और भय को दूर करने वाला लिंग स्थापित किया। कार्तिकी में विशेषरूप से जो मनुष्य उसकी पूजा करता है, वह सर्वकामनाओं से तृप्त आत्मा होकर रुद्रलोक में प्रतिष्ठा पाता है।

श्लोक 5 (skanda.7.174.5)

वाचिकं मानसं पापं कर्मणा यदुपार्जितम्। तत्सर्वं नश्यते देवि तस्य लिंगस्य दर्शनात्

vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmaṇā yadupārjitam| tatsarvaṁ naśyate devi tasya liṁgasya darśanāt

वाणी से, मन से और कर्म से जो पाप अर्जित किया गया हो, हे देवि, वह सब उस लिंग के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाता है।

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