प्रभास खण्ड · अध्याय 179
माण्डव्येश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.179.1)
ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं पापप्रणाशनम्। सिद्धेशाद्दक्षिणे कोणे धनुषां त्रितये स्थितम्। माण्डव्येश्वरनामानं महापातकनाशनम्
tato gacchenmahādevi liṁgaṁ pāpapraṇāśanam| siddheśāddakṣiṇe koṇe dhanuṣāṁ tritaye sthitam| māṇḍavyeśvaranāmānaṁ mahāpātakanāśanam
इसके पश्चात् हे महादेवि, पाप का नाश करने वाले उस लिंग के पास जाना चाहिए, जो सिद्धेश्वर से दक्षिण कोण में तीन धनुष की दूरी पर स्थित है—माण्डव्येश्वर नामक, महापातकों का नाश करने वाला।
श्लोक 2 (skanda.7.179.2)
माघे मासे चतुर्दश्यां पूजां जागरणं तथा। कुर्याद्योऽतीन्द्रियो मर्त्यो न स मर्त्ये पुनर्व्रजेत्
māghe māse caturdaśyāṁ pūjāṁ jāgaraṇaṁ tathā| kuryādyo'tīndriyo martyo na sa martye punarvrajet
माघ मास की चतुर्दशी को जो इन्द्रियातीत मनुष्य पूजा और जागरण करता है, वह पुनः मृत्युलोक को नहीं जाता।