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प्रभास खण्ड · अध्याय 187

प्रभासपञ्चकमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 186अध्याय-सूचीअध्याय 188

श्लोक 1 (skanda.7.187.1)

ततो गच्छेन्महादेवि सर्वकामफलप्रदम्। प्रभासपंचकं पुण्यमाद्यं तत्र व्यवस्थितम्

tato gacchenmahādevi sarvakāmaphalapradam| prabhāsapaṁcakaṁ puṇyamādyaṁ tatra vyavasthitam

इसके पश्चात् हे महादेवि, समस्त कामनाओं का फल देने वाले प्रभासपंचक के पास जाना चाहिए, जिसका पुण्यमय प्रथम प्रभास वहाँ स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.187.2)

तस्यैव पश्चिमे भागे प्रभास इति चोच्यते। वृद्धप्रभासश्च ततो दक्षिणे नातिदूरतः

tasyaiva paścime bhāge prabhāsa iti cocyate| vṛddhaprabhāsaśca tato dakṣiṇe nātidūrataḥ

उसी के पश्चिम भाग में जो कहा जाता है, वह प्रभास (द्वितीय) है; उससे दक्षिण में न अधिक दूर वृद्धप्रभास है।

श्लोक 3 (skanda.7.187.3)

जलप्रभासश्च ततो दक्षिणेन वरानने। कृतस्मरप्रभासश्च श्मशानं यत्र भैरवम्

jalaprabhāsaśca tato dakṣiṇena varānane| kṛtasmaraprabhāsaśca śmaśānaṁ yatra bhairavam

हे वरानने, उससे दक्षिण में जलप्रभास है, तथा कृतस्मरप्रभास है, जहाँ भैरव का श्मशान है।

श्लोक 4 (skanda.7.187.4)

एवं पंचप्रभासान्यः पश्येद्भक्त्या समन्वितः। स याति परमं स्थानं जरामरणवर्जितम्

evaṁ paṁcaprabhāsānyaḥ paśyedbhaktyā samanvitaḥ| sa yāti paramaṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam

इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक इन पाँचों प्रभासों का दर्शन करता है, वह जरा-मरण से रहित परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (skanda.7.187.5)

न निवर्तति यत्प्राप्य दुष्प्राप्यं त्रिदशैरपि। प्रभासं प्रथमं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्

na nivartati yatprāpya duṣprāpyaṁ tridaśairapi| prabhāsaṁ prathamaṁ tīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam

जिसे प्राप्त कर कोई वापस नहीं लौटता, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है—वह प्रभास प्रथम तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है।

श्लोक 6 (skanda.7.187.6)

देवानामपि दुष्प्राप्यं महापातकनाशनम्। प्रभासे त्वेकरात्रेण अमावास्यां कृतोदकः

devānāmapi duṣprāpyaṁ mahāpātakanāśanam| prabhāse tvekarātreṇa amāvāsyāṁ kṛtodakaḥ

जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, महापातकों का नाश करने वाला है—प्रभास में अमावास्या को एक ही रात्रि में जलांजलि देने से,

श्लोक 7 (skanda.7.187.7)

मुच्यते पातकैः सर्वैः शिवलोकं स गच्छति। सप्तजन्मकृतं पापं गंगासागरसंगमे

mucyate pātakaiḥ sarvaiḥ śivalokaṁ sa gacchati| saptajanmakṛtaṁ pāpaṁ gaṁgāsāgarasaṁgame

मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक को जाता है। गंगासागर-संगम में सात जन्मों में किये गये पाप—

श्लोक 8 (skanda.7.187.8)

जन्मनां च सहस्रेण यत्पापं कुरुते नरः। स्नानादेवास्य नश्येत सागरे लवणांभसि

janmanāṁ ca sahasreṇa yatpāpaṁ kurute naraḥ| snānādevāsya naśyeta sāgare lavaṇāṁbhasi

तथा हजार जन्मों में मनुष्य जो पाप करता है, वह सब सागर के लवण-जल में स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.7.187.9)

चतुर्दश्याममावास्यां पञ्चदश्यां विशेषतः। अहोरात्रोषितो भूत्वा ब्राह्मणान्भोज्य शक्तितः

caturdaśyāmamāvāsyāṁ pañcadaśyāṁ viśeṣataḥ| ahorātroṣito bhūtvā brāhmaṇānbhojya śaktitaḥ

चतुर्दशी को, अमावास्या को, अथवा विशेषरूप से पूर्णिमा को, अहोरात्र उपवास कर तथा यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर,

श्लोक 10 (skanda.7.187.10)

दत्त्वा गां कांचनं तेभ्यः शिवः प्रीतो भवत्विति। एवं कृत्वा नरो देवि कुलानां तारयेच्छतम्

dattvā gāṁ kāṁcanaṁ tebhyaḥ śivaḥ prīto bhavatviti| evaṁ kṛtvā naro devi kulānāṁ tārayecchatam

उन्हें गौ और स्वर्ण देकर, 'शिव प्रसन्न हों' ऐसी कामना करते हुए—हे देवि, इस प्रकार करने से मनुष्य सौ कुलों का उद्धार करता है।

श्लोक 11 (skanda.7.187.11)

देव्युवाच। प्रभासपंचकं ह्येतद्यत्त्वया परिकीर्तितम्। कथमत्र समुद्भूतमेतन्मे कौतुकं महत्

devyuvāca| prabhāsapaṁcakaṁ hyetadyattvayā parikīrtitam| kathamatra samudbhūtametanme kautukaṁ mahat

देवी ने कहा—आपने जो यह प्रभासपंचक बताया है, यह यहाँ कैसे उत्पन्न हुआ? इसे जानने की मुझे बड़ी उत्कण्ठा है।

श्लोक 12 (skanda.7.187.12)

एक एव श्रुतोऽस्माभिः प्रभासस्तीर्थवासितः। प्रभासाः पंच देवेश यत्त्वया परिकीर्तिताः

eka eva śruto'smābhiḥ prabhāsastīrthavāsitaḥ| prabhāsāḥ paṁca deveśa yattvayā parikīrtitāḥ

हे देवेश, हमने तो केवल एक ही प्रभास तीर्थ के रूप में सुना है, किन्तु आपने पाँच प्रभासों का वर्णन किया है।

श्लोक 13 (skanda.7.187.13)

एतन्मे संशयं सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि

etanme saṁśayaṁ sarvaṁ yathāvadvaktumarhasi

आप मेरे इस समस्त संशय को यथावत् कहकर दूर करने योग्य हैं।

श्लोक 14 (skanda.7.187.14)

ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशनीम्। यां श्रुत्वा मानवो भक्त्या प्राप्नोति परमां गतिम्

īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi kathāṁ pāpapraṇāśanīm| yāṁ śrutvā mānavo bhaktyā prāpnoti paramāṁ gatim

ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, मैं पापों का नाश करने वाली कथा कहूँगा, जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 15 (skanda.7.187.15)

पुरा महेश्वरो देवश्चचार वसुधामिमाम्। दिव्यरूपधरः कान्तो दिग्वासाः स यदृच्छया

purā maheśvaro devaścacāra vasudhāmimām| divyarūpadharaḥ kānto digvāsāḥ sa yadṛcchayā

पूर्वकाल में भगवान् महेश्वर, दिव्य रूप धारण किये हुए, मनोहर, दिशाओं को ही वस्त्र मानकर, अपनी इच्छा से इस पृथ्वी पर विचरण करते थे।

श्लोक 16 (skanda.7.187.16)

एवं च रममाणस्तु ऋषीणामाश्रमं महत्। जगाम कौतुकाविष्टो भिक्षार्थं दारुके वने

evaṁ ca ramamāṇastu ṛṣīṇāmāśramaṁ mahat| jagāma kautukāviṣṭo bhikṣārthaṁ dāruke vane

इस प्रकार विचरण करते हुए वे कौतुक से प्रेरित होकर भिक्षा के लिए दारुकवन में ऋषियों के महान् आश्रम में गये।

श्लोक 17 (skanda.7.187.17)

भ्रममाणस्य तस्याथ दृष्ट्वा रूपमनुत्तमम्। ता नार्यः कामसंतप्ता बभूवुर्व्यथितेन्द्रियाः

bhramamāṇasya tasyātha dṛṣṭvā rūpamanuttamam| tā nāryaḥ kāmasaṁtaptā babhūvurvyathitendriyāḥ

उस भ्रमण करते हुए उनके अनुपम रूप को देखकर, वे स्त्रियाँ काम से संतप्त होकर व्याकुल-इन्द्रिय हो गईं।

श्लोक 18 (skanda.7.187.18)

सानुरागास्ततः सर्वा अनुगच्छंति तं सदा। समालिंगंति ताः काश्चित्काश्च वीक्षंति रागतः

sānurāgāstataḥ sarvā anugacchaṁti taṁ sadā| samāliṁgaṁti tāḥ kāścitkāśca vīkṣaṁti rāgataḥ

तब वे सब अनुराग से युक्त होकर सदैव उनके पीछे-पीछे चलने लगीं; उनमें से कुछ उनका आलिंगन करतीं, और कुछ रागपूर्वक उन्हें निहारतीं।

श्लोक 19 (skanda.7.187.19)

प्रार्थयंति तथा चान्याः परित्यज्य गृहान्स्वकान्

prārthayaṁti tathā cānyāḥ parityajya gṛhānsvakān

और कुछ अन्य स्त्रियाँ अपने-अपने घरों को त्यागकर उनसे प्रार्थना करने लगीं।

श्लोक 20 (skanda.7.187.20)

एवं तासां स्वरूपं ते दृष्ट्वा सर्वे महर्षयः। कोपेन महता युक्ताः शेपुस्तं वृषभध्वजम्

evaṁ tāsāṁ svarūpaṁ te dṛṣṭvā sarve maharṣayaḥ| kopena mahatā yuktāḥ śepustaṁ vṛṣabhadhvajam

इस प्रकार उन स्त्रियों की उस अवस्था को देखकर, वे सभी महर्षि अत्यन्त क्रोध से युक्त होकर उन वृषभध्वज (शिव) को शाप देने लगे।

श्लोक 21 (skanda.7.187.21)

यस्मात्त्वं नग्नतामेत्य आश्रमेऽस्मिन्ममागतः। मोहयानः स्त्रियोऽस्माकं लज्जां नैवं करोषि च। तस्मात्ते पतताल्लिंगं सद्य एव वृषध्वज

yasmāttvaṁ nagnatāmetya āśrame'sminmamāgataḥ| mohayānaḥ striyo'smākaṁ lajjāṁ naivaṁ karoṣi ca| tasmātte patatālliṁgaṁ sadya eva vṛṣadhvaja

'चूँकि तुम नग्न होकर हमारे इस आश्रम में आये हो, हमारी स्त्रियों को मोहित करते हुए तुम इस प्रकार लज्जा भी नहीं करते—इसलिए हे वृषध्वज, अभी इसी क्षण तुम्हारा लिंग गिर जाए!'

श्लोक 22 (skanda.7.187.22)

ततस्तत्पतितं लिंगं तत्क्षणाच्छंकरस्य च। तस्मिन्प्रपतिते भूमौ प्राकंपत वसुंधरा

tatastatpatitaṁ liṁgaṁ tatkṣaṇācchaṁkarasya ca| tasminprapatite bhūmau prākaṁpata vasuṁdharā

तब उसी क्षण शंकर का वह लिंग गिर गया; उसके भूमि पर गिरते ही पृथ्वी काँपने लगी।

श्लोक 23 (skanda.7.187.23)

क्षुभिताः सागराः सर्वे मर्यादा विजहुस्तदा। शीर्णानि गिरिशृंगाणि त्रस्ताः सर्वे दिवौकसः

kṣubhitāḥ sāgarāḥ sarve maryādā vijahustadā| śīrṇāni giriśṛṁgāṇi trastāḥ sarve divaukasaḥ

समस्त सागर क्षुब्ध होकर अपनी मर्यादा को छोड़ बैठे; पर्वत शिखर टूट-फूट गये, और समस्त देवगण भयभीत हो गये।

श्लोक 24 (skanda.7.187.24)

ततो देवाः सगन्धर्वाः समहोरगकिन्नराः। ऊचुः पितामहं गत्वा किमेतत्कारणं विभो

tato devāḥ sagandharvāḥ samahoragakinnarāḥ| ūcuḥ pitāmahaṁ gatvā kimetatkāraṇaṁ vibho

तब गन्धर्वों, महानागों तथा किन्नरों सहित देवगण पितामह (ब्रह्मा) के पास जाकर कहने लगे—हे प्रभु, यह क्या कारण है?

श्लोक 25 (skanda.7.187.25)

सागराः क्षुभिता येन प्लावयंति वसुंधराम्। शीर्यंते गिरिशृङ्गाणि कंपते च वसुंधरा

sāgarāḥ kṣubhitā yena plāvayaṁti vasuṁdharām| śīryaṁte giriśṛṅgāṇi kaṁpate ca vasuṁdharā

जिसके कारण क्षुब्ध सागर पृथ्वी को जलमग्न कर रहे हैं, पर्वत शिखर टूट रहे हैं, और पृथ्वी काँप रही है,

श्लोक 26 (skanda.7.187.26)

चिह्नानि लोकनाशाय दृश्यन्ते दारुणानि च। तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मलोके पितामहः

cihnāni lokanāśāya dṛśyaṁte dāruṇāni ca| teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā brahmaloke pitāmahaḥ

और लोक-विनाश के भयंकर लक्षण दिखाई दे रहे हैं। उनका यह वचन सुनकर, ब्रह्मलोक में पितामह,

श्लोक 27 (skanda.7.187.27)

ध्यात्वा तु सुचिरं कालं वाक्यमेतदुवाच ह। शिवलिंगं निपतितं पृथिव्यां सुरसत्तमाः

dhyātvā tu suciraṁ kālaṁ vākyametaduvāca ha| śivaliṁgaṁ nipatitaṁ pṛthivyāṁ surasattamāḥ

बहुत देर तक ध्यान करके यह वचन बोले—हे श्रेष्ठ देवगण, शिव का लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा है।

श्लोक 28 (skanda.7.187.28)

शापेन ऋषिमुख्यानां भार्गवाणां महात्मनाम्। तस्मिन्निपतिते भूमौ त्रैलोक्यं सचराचरम्

śāpena ṛṣimukhyānāṁ bhārgavāṇāṁ mahātmanām| tasminnipatite bhūmau trailokyaṁ sacarācaram

भृगुवंशी महात्मा ऋषिश्रेष्ठों के शाप से यह हुआ है। उसके भूमि पर गिरते ही चराचर सहित त्रैलोक्य,

श्लोक 29 (skanda.7.187.29)

एतदवस्थतां प्राप्तं तस्मात्तत्रैव गम्यताम्। विष्णुना सह गीर्वाणास्तथा नीतिर्विधीयताम्

etadavasthatāṁ prāptaṁ tasmāttatraiva gamyatām| viṣṇunā saha gīrvāṇāstathā nītirvidhīyatām

इस दशा को प्राप्त हुआ है। अतः, हे देवगण, विष्णु के साथ वहीं जाओ, और उचित नीति का विधान करो।

श्लोक 30 (skanda.7.187.30)

ततः क्षीरोदधिं जग्मुर्ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौकसः। यत्र शेते चतुर्बाहुर्योगनिद्रां च संगतः

tataḥ kṣīrodadhiṁ jagmurbrahmādyāstridivaukasaḥ| yatra śete caturbāhuryoganidrāṁ ca saṁgataḥ

तब ब्रह्मा आदि देवगण क्षीरसागर की ओर गये, जहाँ चतुर्भुज विष्णु योगनिद्रा में लीन होकर शयन कर रहे थे।

श्लोक 31 (skanda.7.187.31)

तस्मै सर्वं समाचख्युस्तेनैव सहितास्ततः। जग्मुर्यत्र महादेवो लिंगेन रहितो विभुः

tasmai sarvaṁ samācakhyustenaiva sahitāstataḥ| jagmuryatra mahādevo liṁgena rahito vibhuḥ

उन्हें सब कुछ बता दिया; फिर उन्हीं के साथ वे वहाँ गये, जहाँ महादेव प्रभु लिंगरहित थे।

श्लोक 32 (skanda.7.187.32)

ऊचुः समाहिताः सर्वे प्रणिपत्य दिवौकसः

ūcuḥ samāhitāḥ sarve praṇipatya divaukasaḥ

समस्त देवगण एकाग्रचित्त होकर, प्रणाम कर बोले—

श्लोक 33 (skanda.7.187.33)

लिंगमुत्क्षिप्यतामेतद्यत्क्षितौ पतितं विभो। एते महार्णवाः सर्वे प्लावयंति वसुंधराम्

liṁgamutkṣipyatāmetadyatkṣitau patitaṁ vibho| ete mahārṇavāḥ sarve plāvayaṁti vasuṁdharām

हे प्रभु, पृथ्वी पर गिरे हुए इस लिंग को उठा लिया जाए, क्योंकि ये समस्त महासागर पृथ्वी को जलमग्न कर रहे हैं।

श्लोक 34 (skanda.7.187.34)

भगवानुवाच। ऋषिभिः पातितं ह्येतन्मम लिंगं सुरेश्वराः। न तु शक्यो मया कर्तुं बाधस्तेषां महात्मनाम्

bhagavānuvāca| ṛṣibhiḥ pātitaṁ hyetanmama liṁgaṁ sureśvarāḥ| na tu śakyo mayā kartuṁ bādhasteṣāṁ mahātmanām

भगवान् ने कहा—हे सुरेश्वरो, ऋषियों ने ही मेरे इस लिंग को गिराया है; किन्तु उन महात्माओं को बाधा पहुँचाना मेरे लिए संभव नहीं है।

श्लोक 35 (skanda.7.187.35)

शापो हि भार्गवेन्द्राणामतो मे श्रूयतां वचः। पूजयध्वं सुराः सर्वे ब्रह्मविष्णुपुरस्सराः

śāpo hi bhārgavendrāṇāmato me śrūyatāṁ vacaḥ| pūjayadhvaṁ surāḥ sarve brahmaviṣṇupurassarāḥ

यह भृगुवंशी श्रेष्ठों का शाप है; अतः मेरा वचन सुनो—हे देवगण, तुम सब ब्रह्मा और विष्णु को आगे रखकर इसकी पूजा करो।

श्लोक 36 (skanda.7.187.36)

लिंगमेतत्ततः सर्वे सर्वं लिप्सथ सत्तमाः। प्रकृतिं सागराः सर्वे यास्यंति गिरयस्तथा

liṁgametattataḥ sarve sarvaṁ lipsatha sattamāḥ| prakṛtiṁ sāgarāḥ sarve yāsyaṁti girayastathā

हे श्रेष्ठजनो, तब तुम सब मिलकर इस लिंग को समग्ररूप से ग्रहण करो; इससे समस्त सागर और पर्वत अपनी प्रकृति को प्राप्त हो जाएंगे।

श्लोक 37 (skanda.7.187.37)

एतत्पुण्यतमे क्षेत्रे धृत्वा सर्वे समाहिताः। अथोद्धृत्य सुराः सर्वे प्रभासं क्षेत्रमागताः

etatpuṇyatame kṣetre dhṛtvā sarve samāhitāḥ| athoddhṛtya surāḥ sarve prabhāsaṁ kṣetramāgatāḥ

इसे इस परम पुण्यमय क्षेत्र में धारण करो।' तब एकाग्रचित्त होकर, उसे उठाकर, समस्त देवगण प्रभासक्षेत्र में आये।

श्लोक 38 (skanda.7.187.38)

तत्रैव निदधुः सर्वे ततः पूजां प्रचक्रिरे। ब्रह्मणा पूजितं लिंगं विष्णुना प्रभविष्णुना

tatraiva nidadhuḥ sarve tataḥ pūjāṁ pracakrire| brahmaṇā pūjitaṁ liṁgaṁ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

वहीं सबने उसे स्थापित किया और फिर पूजा की; ब्रह्मा तथा शक्तिशाली विष्णु द्वारा वह लिंग पूजित हुआ।

श्लोक 39 (skanda.7.187.39)

शक्रेणाथ कुबेरेण यमेन वरुणेन च। ऊचुश्चैव ततो देवा लिंगं संपूज्य भक्तितः

śakreṇātha kubereṇa yamena varuṇena ca| ūcuścaiva tato devā liṁgaṁ saṁpūjya bhaktitaḥ

तथा इन्द्र, कुबेर, यम और वरुण द्वारा भी; तब देवताओं ने भक्तिपूर्वक उस लिंग की पूजा कर कहा—

श्लोक 40 (skanda.7.187.40)

अद्यप्रभृति रुद्रस्य लिंगं संपूज्य भक्तितः। भविष्यामो न संदेहस्तथा पितृगणाश्च ये

adyaprabhṛti rudrasya liṁgaṁ saṁpūjya bhaktitaḥ| bhaviṣyāmo na saṁdehastathā pitṛgaṇāśca ye

'आज से हम रुद्र के इस लिंग की भक्तिपूर्वक पूजा करने वाले होंगे, इसमें कोई संशय नहीं—तथा जो पितृगण हैं, वे भी।'

श्लोक 41 (skanda.7.187.41)

य एनं पूजयिष्यंति भक्तियुक्ताश्च मानवाः। यास्यंति ते सुरावासं सशरीरा नरोत्तमाः

ya enaṁ pūjayiṣyaṁti bhaktiyuktāśca mānavāḥ| yāsyaṁti te surāvāsaṁ saśarīrā narottamāḥ

जो मनुष्य भक्तियुक्त होकर इसकी पूजा करेंगे, वे श्रेष्ठ पुरुष अपने शरीर सहित ही देवलोक को जाएँगे।

श्लोक 42 (skanda.7.187.42)

अत्रैव प्रथमं लिंगं यतोऽस्माभिः प्रतिष्ठितम्। प्रभासं नाम चास्यापि प्रभासेति भविष्यति

atraiva prathamaṁ liṁgaṁ yato'smābhiḥ pratiṣṭhitam| prabhāsaṁ nāma cāsyāpi prabhāseti bhaviṣyati

चूँकि यहीं हम लोगों के द्वारा इस प्रथम लिंग की प्रतिष्ठा की गई है, अतः इसका नाम भी प्रभास होगा।

श्लोक 43 (skanda.7.187.43)

एवमुक्त्वा गताः सर्वे त्रिदिवं सुरसत्तमाः। तं दृष्ट्वा त्रिदिवं यान्ति भूयांसः प्राणिनो भुवि

evamuktvā gatāḥ sarve tridivaṁ surasattamāḥ| taṁ dṛṣṭvā tridivaṁ yānti bhūyāṁsaḥ prāṇino bhuvi

ऐसा कहकर समस्त श्रेष्ठ देवगण स्वर्गलोक को चले गये। उसका दर्शन कर पृथ्वी पर के अनेक प्राणी भी स्वर्ग को जाने लगे।

श्लोक 44 (skanda.7.187.44)

ततस्त्रिविष्टपं व्याप्तं बहुभिः प्राणिभिः प्रिये। तद्दृष्ट्वा त्रिदिवं व्याप्तं सहस्राक्षः सुदुःखितः

tatastriviṣṭapaṁ vyāptaṁ bahubhiḥ prāṇibhiḥ priye| taddṛṣṭvā tridivaṁ vyāptaṁ sahasrākṣaḥ suduḥkhitaḥ

हे प्रिये, तब स्वर्गलोक अनेक प्राणियों से व्याप्त हो गया। स्वर्ग को इस प्रकार व्याप्त देखकर सहस्राक्ष (इन्द्र) अत्यन्त दुःखी हुए।

श्लोक 45 (skanda.7.187.45)

ज्ञात्वा लिंगप्रभावं तु ततश्चागत्य भूतलम्। वज्रेणाच्छादयामास समंतात्स वरानने

jñātvā liṁgaprabhāvaṁ tu tataścāgatya bhūtalam| vajreṇācchādayāmāsa samaṁtātsa varānane

हे वरानने, तब उस लिंग के प्रभाव को जानकर, वे पृथ्वी पर आकर, वज्र से उसे चारों ओर से आच्छादित कर दिया।

श्लोक 46 (skanda.7.187.46)

ततः प्रभृति नो देवि स्वर्गं गच्छंति मानवाः। इति संक्षेपतः प्रोक्तः प्रभासस्य महोदयः। सर्वपापोपशमनः सर्वकामफलं प्रदः

tataḥ prabhṛti no devi svargaṁ gacchaṁti mānavāḥ| iti saṁkṣepataḥ proktaḥ prabhāsasya mahodayaḥ| sarvapāpopaśamanaḥ sarvakāmaphalaṁ pradaḥ

हे देवि, तभी से मनुष्य पहले की भाँति सशरीर स्वर्ग को नहीं जाते। इस प्रकार संक्षेप में प्रभास की यह महती उत्पत्ति-कथा कही गई, जो समस्त पापों को शान्त करने वाली तथा समस्त कामनाओं का फल देने वाली है।

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