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प्रभास खण्ड · अध्याय 186

नागस्थानमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 185अध्याय-सूचीअध्याय 187

श्लोक 1 (skanda.7.186.1)

ततो गच्छेन्महादेवि नागस्थानमनुत्तमम्। मंकीशात्पश्चिमे भागे संगमत्रितयं गतम्

tato gacchenmahādevi nāgasthānamanuttamam| maṁkīśātpaścime bhāge saṁgamatritayaṁ gatam

इसके पश्चात् हे महादेवि, उस अनुपम नागस्थान के पास जाना चाहिए, जो मंकीश्वर से पश्चिम भाग में, त्रिवेणी-संगम पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.186.2)

पापघ्नं सर्वजंतूनां पातालविवरं महत्

pāpaghnaṁ sarvajaṁtūnāṁ pātālavivaraṁ mahat

यह समस्त प्राणियों के पापों का नाश करने वाला, पाताल का महान् विवर (गुहा-द्वार) है।

श्लोक 3 (skanda.7.186.3)

बलभद्रः पुरा देवि श्रुत्वा कृष्णस्य पंचताम्। भल्लतीर्थे तु भल्लेन ततः प्रभासमागतः

balabhadraḥ purā devi śrutvā kṛṣṇasya paṁcatām| bhallatīrthe tu bhallena tataḥ prabhāsamāgataḥ

हे देवि, पूर्वकाल में बलभद्र ने भल्लतीर्थ में बहेलिये के बाण से कृष्ण की मृत्यु का समाचार सुनकर, तब वे प्रभास में आये।

श्लोक 4 (skanda.7.186.4)

क्षेत्रं महाप्रभावं हि ज्ञात्वा सर्वार्थसिद्धिदम्। यादवानां क्षयं कृत्वा ततो वैराग्यमेयिवान्

kṣetraṁ mahāprabhāvaṁ hi jñātvā sarvārthasiddhidam| yādavānāṁ kṣayaṁ kṛtvā tato vairāgyameyivān

उस महाप्रभावशाली, समस्त अर्थों की सिद्धि देने वाले क्षेत्र को जानकर, यादवों के क्षय के पश्चात् वे वैराग्य को प्राप्त हुए।

श्लोक 5 (skanda.7.186.5)

शेषनागेशरूपेण निष्क्रम्य च शरीरतः। गच्छन्गच्छंस्तदा प्राप्य तीर्थं त्रैसंगमं परम्

śeṣanāgeśarūpeṇa niṣkramya ca śarīrataḥ| gacchangacchaṁstadā prāpya tīrthaṁ traisaṁgamaṁ param

अपने शरीर से शेषनाग के रूप में निकलकर, चलते-चलते वे उस परम त्रिसंगम तीर्थ पर पहुँचे।

श्लोक 6 (skanda.7.186.6)

पातालस्य तदा दृष्ट्वा द्वारं विवररूपकम्। प्रविष्टोऽथ जगामाशु यत्रानंतः स्वयं स्थितः

pātālasya tadā dṛṣṭvā dvāraṁ vivararūpakam| praviṣṭo'tha jagāmāśu yatrānaṁtaḥ svayaṁ sthitaḥ

तब पाताल के विवर-रूप द्वार को देखकर, वे उसमें प्रविष्ट होकर शीघ्र ही वहाँ पहुँचे जहाँ स्वयं अनन्त स्थित थे।

श्लोक 7 (skanda.7.186.7)

यतो नागस्वरूपेण स्थानेऽस्मिंश्च समाविशत्। तत्प्रभृत्येव देवेशि नागस्थानमिति श्रुतम्

yato nāgasvarūpeṇa sthāne'smiṁśca samāviśat| tatprabhṛtyeva deveśi nāgasthānamiti śrutam

चूँकि वे नाग-स्वरूप से इस स्थान में प्रविष्ट हुए, अतः तभी से, हे देवेशि, यह नागस्थान नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 8 (skanda.7.186.8)

नागरादित्यपूर्वेण यत्र कायो विसर्जितः। तदद्यापि प्रसिद्धं वै शेषस्थानमिति श्रुतम्

nāgarādityapūrveṇa yatra kāyo visarjitaḥ| tadadyāpi prasiddhaṁ vai śeṣasthānamiti śrutam

नागरादित्य के पूर्व में जहाँ उन्होंने अपना शरीर त्यागा, वह स्थान आज भी शेषस्थान नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 9 (skanda.7.186.9)

अतः स्नात्वा महादेवि तत्र तीर्थे त्रिसंगमे। नागस्थानं समभ्यर्च्य पञ्चम्यामकृताशनः

ataḥ snātvā mahādevi tatra tīrthe trisaṁgame| nāgasthānaṁ samabhyarcya pañcamyāmakṛtāśanaḥ

अतः हे महादेवि, उस त्रिसंगम तीर्थ में स्नान कर, पंचमी को उपवास रखते हुए नागस्थान का सम्यक् पूजन कर,

श्लोक 10 (skanda.7.186.10)

श्राद्धं कृत्वा यथाशक्त्या दत्त्वा विप्राय दक्षिणाम्। विमुक्तः सर्वदुःखेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति

śrāddhaṁ kṛtvā yathāśaktyā dattvā viprāya dakṣiṇām| vimuktaḥ sarvaduḥkhebhyo rudralokaṁ sa gacchati

यथाशक्ति श्राद्ध कर तथा ब्राह्मण को दक्षिणा देकर, वह समस्त दुःखों से मुक्त होकर रुद्रलोक को जाता है।

श्लोक 11 (skanda.7.186.11)

पायसं मधुसंमिश्रं भक्ष्यभोज्यैः समन्वितम्। शेषनागं समुद्दिश्य विप्रं यस्तत्र भोजयेत्। कोटिभोज्यं कृतं तेन जायते नात्र संशयः

pāyasaṁ madhusaṁmiśraṁ bhakṣyabhojyaiḥ samanvitam| śeṣanāgaṁ samuddiśya vipraṁ yastatra bhojayet| koṭibhojyaṁ kṛtaṁ tena jāyate nātra saṁśayaḥ

मधु मिश्रित खीर तथा विविध भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से युक्त भोजन, शेषनाग का उद्देश्य कर जो कोई वहाँ ब्राह्मण को कराता है, उसके द्वारा करोड़ों भोजन कराने का फल प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

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