प्रभास खण्ड · अध्याय 185
देवमातृगौरीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.185.1)
ततो गच्छेन्महादेवि देवमातरमव्ययाम्। मंकीशान्नैर्ऋते भागे गौरीरूपसमाश्रिताम्। देवमाता सरस्वत्या नाम लोकेषु गीयते
tato gacchenmahādevi devamātaramavyayām| maṁkīśānnairṛte bhāge gaurīrūpasamāśritām| devamātā sarasvatyā nāma lokeṣu gīyate
इसके पश्चात् हे महादेवि, अविनाशी देवमाता के पास जाना चाहिए, जो मंकीश्वर से नैर्ऋत्य दिशा में, गौरी के रूप में स्थित हैं। सरस्वती के देवमाता नाम से वे लोक में गाई जाती हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.185.2)
पादुकासनसंस्था च तत्र देवी सरस्वती। गौरीरूपेण सा तत्र वडवाश्रितविग्रहा
pādukāsanasaṁsthā ca tatra devī sarasvatī| gaurīrūpeṇa sā tatra vaḍavāśritavigrahā
वहाँ देवी सरस्वती पादुका-आसन पर स्थित हैं; वहाँ वे गौरी के रूप में वडवा (सामुद्रिक अग्नि) के आश्रित शरीर वाली हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.185.3)
मातृवद्रक्षिता देवा वडवानलभीतितः। देवमातेति लोकेऽस्मिंस्ततः सा विबुधैः कृता
mātṛvadrakṣitā devā vaḍavānalabhītitaḥ| devamāteti loke'smiṁstataḥ sā vibudhaiḥ kṛtā
उनके द्वारा माता के समान देवगण वडवानल के भय से रक्षित किये गये; इसीलिए इस लोक में देवताओं ने उन्हें देवमाता की संज्ञा दी।
श्लोक 4 (skanda.7.185.4)
माघे मासे तृतीयायां यस्तामर्चयते नरः। नारी वा संयता साध्वी सर्वान्कामानवाप्नुयात्
māghe māse tṛtīyāyāṁ yastāmarcayate naraḥ| nārī vā saṁyatā sādhvī sarvānkāmānavāpnuyāt
माघ मास की तृतीया को जो पुरुष अथवा संयमित साध्वी नारी उनका पूजन करती है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करती है।
श्लोक 5 (skanda.7.185.5)
दंपती भोजयेद्यस्तु पायसैः शर्करादिभिः। गौरीसहस्रभोज्यस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात्
daṁpatī bhojayedyastu pāyasaiḥ śarkarādibhiḥ| gaurīsahasrabhojyasya dattasya phalamāpnuyāt
जो कोई खीर, शर्करा आदि पदार्थों से किसी दम्पति को भोजन कराता है, वह गौरी को सहस्र भोज्य पदार्थ अर्पित करने के फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (skanda.7.185.6)
सुवर्णपादुका देया तत्र विप्राय शीलिने
suvarṇapādukā deyā tatra viprāya śīline
वहाँ सदाचारी ब्राह्मण को स्वर्ण की पादुका देनी चाहिए।