प्रभास खण्ड · अध्याय 195
वृद्धप्रभासमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.195.1)
ईश्वर उवाच। ततो वृद्धप्रभासं तु गच्छेच्च नियतात्मवान्। आदिप्रभासाद्दक्षिणतो नातिदूरे व्यवस्थितम्
īśvara uvāca| tato vṛddhaprabhāsaṁ tu gacchecca niyatātmavān| ādiprabhāsāddakṣiṇato nātidūre vyavasthitam
ईश्वर ने कहा—तदनन्तर संयमी पुरुष को वृद्धप्रभास की ओर जाना चाहिए, जो आदिप्रभास से दक्षिण दिशा में न अधिक दूर पर स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.195.2)
चतुर्मुखं महालिंगं दर्शनात्पापनाशनम्
caturmukhaṁ mahāliṅgaṁ darśanātpāpanāśanam
वहाँ चतुर्मुख महालिंग है, जिसके दर्शनमात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.195.3)
श्रीदेव्युवाच। कथं वृद्धप्रभासं तु नाम तस्याभवत्प्रभो। तस्मिन्दृष्टे फलं किं स्यात्स्तुते संपूजिते तथा
śrīdevyuvāca| kathaṁ vṛddhaprabhāsaṁ tu nāma tasyābhavatprabho| tasmindṛṣṭe phalaṁ kiṁ syātstute saṁpūjite tathā
श्रीदेवी ने कहा—हे प्रभो, उसका नाम वृद्धप्रभास कैसे हुआ? उसके दर्शन, स्तवन तथा सम्यक् पूजन से क्या फल प्राप्त होता है?
श्लोक 4 (skanda.7.195.4)
एतत्कथय मे देव संक्षेपान्नातिविस्तरात्
etatkathaya me deva saṁkṣepānnātivistarāt
हे देव, यह सब मुझे संक्षेप में बताइए, अधिक विस्तार से नहीं।
श्लोक 5 (skanda.7.195.5)
ईश्वर उवाच। आदौ स्वायंभुवे देवि पूर्वमन्वन्तरे पुरा। त्रेतायुगे चतुर्थे तु प्रभासे क्षेत्र उत्तमे
īśvara uvāca| ādau svāyaṁbhuve devi pūrvamanvantare purā| tretāyuge caturthe tu prabhāse kṣetra uttame
ईश्वर ने कहा—हे देवि, प्रारम्भ में, प्राचीन स्वायम्भुव मन्वन्तर में, चतुर्थ त्रेतायुग में, इस उत्तम प्रभास क्षेत्र में—
श्लोक 6 (skanda.7.195.6)
तस्मिन्काले महादेवि पूर्वमन्वंतरे पुरा। त्रेतायुगे चतुर्थे तु ऋषयस्तत्र संगताः
tasminkāle mahādevi pūrvamanvaṁtare purā| tretāyuge caturthe tu ṛṣayastatra saṁgatāḥ
उस काल में, हे महादेवि, उस प्राचीन मन्वन्तर के चतुर्थ त्रेतायुग में, वहाँ ऋषिगण एकत्रित हुए थे।
श्लोक 7 (skanda.7.195.7)
दर्शनार्थं प्रभासस्य उत्तरापथगामिनः। तं दृष्ट्वाऽऽच्छादितं देवं वज्रेण तु महेश्वरि
darśanārthaṁ prabhāsasya uttarāpathagāminaḥ| taṁ dṛṣṭvācchāditaṁ devaṁ vajreṇa tu maheśvari
वे प्रभास के दर्शनार्थ उत्तरापथ की ओर जा रहे थे; हे महेश्वरि, वहाँ उन्होंने उस देव को वज्र से आच्छादित देखा।
श्लोक 8 (skanda.7.195.8)
विषादं परमं जग्मुर्वाक्यं चेदमथाबुवन्। अदृष्ट्वा शांकरं लिंगं न यास्यामो वयं गृहम्
viṣādaṁ paramaṁ jagmurvākyaṁ cedamathābuvan| adṛṣṭvā śāṅkaraṁ liṅgaṁ na yāsyāmo vayaṁ gṛham
वे अत्यन्त विषाद को प्राप्त हुए और यह वचन कहा—शांकर लिंग का दर्शन किए बिना हम अपने घर नहीं जाएँगे।
श्लोक 9 (skanda.7.195.9)
स्वर्गार्थिनो वयं प्राप्ता महदध्वानमेव हि। तस्मादत्रैव तिष्ठामो यावल्लिंगस्य दर्शनम्
svargārthino vayaṁ prāptā mahadadhvānameva hi| tasmādatraiva tiṣṭhāmo yāvalliṅgasya darśanam
स्वर्ग की कामना करने वाले हम यहाँ बड़े मार्ग को पार कर आए हैं; इसलिए जब तक लिंग का दर्शन न हो, तब तक हम यहीं ठहरेंगे।
श्लोक 10 (skanda.7.195.10)
एवं ते निश्चयं कृत्वा परस्मिंस्तपसि स्थिताः। वर्षास्वाकाशगा भूत्वा हेमंते सलिलाश्रयाः
evaṁ te niścayaṁ kṛtvā parasmiṁstapasi sthitāḥ| varṣāsvākāśagā bhūtvā hemaṁte salilāśrayāḥ
इस प्रकार निश्चय करके वे परम तप में स्थित हो गए; वर्षा ऋतु में आकाश में रहकर तथा हेमन्त में जल का आश्रय लेकर—
श्लोक 11 (skanda.7.195.11)
पञ्चाग्निसाधना ग्रीष्मे नियता ब्रह्मचारिणः। बहून्वर्षगणान्विप्रा जराग्रस्तास्तदाऽभवन्
paṁcāgnisādhanā grīṣme niyatā brahmacāriṇaḥ| bahūnvarṣagaṇānviprā jarāgrastāstadā'bhavan
ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि साधना करते हुए, संयमी ब्रह्मचारी बनकर वे विप्रगण अनेक वर्षों तक तप करते हुए तब वृद्धावस्था से ग्रस्त हो गए।
श्लोक 12 (skanda.7.195.12)
एवं वृद्धत्वमापन्ना यदा ते वरवर्णिनि। छन्द्यमाना वरैस्ते तु शंकरेण महात्मना
evaṁ vṛddhatvamāpannā yadā te varavarṇini| chandyamānā varaiste tu śaṅkareṇa mahātmanā
हे वरवर्णिनि, इस प्रकार जब वे वृद्धावस्था को प्राप्त हुए, तब महात्मा शंकर ने उन्हें वर देने की इच्छा प्रकट की।
श्लोक 13 (skanda.7.195.13)
लिंगस्य दर्शनं मुक्त्वा न तेऽन्यं वव्रिरे वरम्
liṅgasya darśanaṁ muktvā na te'nyaṁ vavrire varam
किन्तु लिंग के दर्शन के अतिरिक्त उन्होंने कोई अन्य वर नहीं माँगा।
श्लोक 14 (skanda.7.195.14)
तेषां तु निश्चयं ज्ञात्वा सर्वेषां वृषभध्वजः। अनुकम्पापरो भूत्वा स्वलिंगं तानदर्शयत्
teṣāṁ tu niścayaṁ jñātvā sarveṣāṁ vṛṣabhadhvajaḥ| anukampāparo bhūtvā svaliṅgaṁ tānadarśayat
उन सबके दृढ़ निश्चय को जानकर, वृषभध्वज (शिव) दया से भरकर उन्हें अपने लिंग का दर्शन कराया।
श्लोक 15 (skanda.7.195.15)
एतस्मिन्नेव काले तु भित्त्वा चैव वसुन्धराम्। उत्थितं सहसा लिंगं तदेव वरवर्णिनि
etasminneva kāle tu bhittvā caiva vasuṁdharām| utthitaṁ sahasā liṅgaṁ tadeva varavarṇini
उसी समय पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए वह लिंग सहसा प्रकट हो उठा, हे वरवर्णिनि।
श्लोक 16 (skanda.7.195.16)
ऋषयस्ते च तं दृष्ट्वा सर्वे च त्रिदिवं गताः। अथ तेषु प्रयातेषु शक्रस्तप्तमना ह्यभूत्
ṛṣayaste ca taṁ dṛṣṭvā sarve ca tridivaṁ gatāḥ| atha teṣu prayāteṣu śakrastaptamanā hyabhūt
उन सब ऋषियों ने उसका दर्शन कर स्वर्गलोक को प्राप्त किया; तत्पश्चात् उनके चले जाने पर इन्द्र संतप्त मन वाले हो गए।
श्लोक 17 (skanda.7.195.17)
तमपि च्छादयामास वज्रेण शतपर्वणा
tamapi cchādayāmāsa vajreṇa śataparvaṇā
उसने भी उस लिंग को सौ पोरों वाले वज्र से आच्छादित कर दिया।
श्लोक 18 (skanda.7.195.18)
वृद्धभावे यतस्तेषामृषीणां दर्शनं गतः। अतो वृद्धप्रभासं तत्कीर्त्यते वसुधातले
vṛddhabhāve yatasteṣāmṛṣīṇāṁ darśanaṁ gataḥ| ato vṛddhaprabhāsaṁ tatkīrtyate vasudhātale
क्योंकि उन ऋषियों की वृद्धावस्था में उसने दर्शन दिया था, अतः वह पृथ्वीतल पर वृद्धप्रभास नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 19 (skanda.7.195.19)
तस्मिन्दृष्टे वरारोहे अद्यापि लभते फलम्। राजसूयाश्वमेधानां नरो भक्तिसमन्वितः
tasmindṛṣṭe varārohe adyāpi labhate phalam| rājasūyāśvamedhānāṁ naro bhaktisamanvitaḥ
हे वरारोहे, उसके दर्शन से आज भी भक्तियुक्त मनुष्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 20 (skanda.7.195.20)
एवं तत्र समुत्पन्नं प्रभासं वृद्धसंज्ञकम्। तत्रोक्षा ब्राह्मणे देयः सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः
evaṁ tatra samutpannaṁ prabhāsaṁ vṛddhasaṁjñakam| tatrokṣā brāhmaṇe deyaḥ samyagyātrāphalepsubhiḥ
इस प्रकार वहाँ वृद्ध नाम से प्रसिद्ध प्रभास उत्पन्न हुआ; यात्रा का सम्यक् फल चाहने वालों को वहाँ ब्राह्मण को वृषभ का दान देना चाहिए।