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प्रभास खण्ड · अध्याय 202

रामेश्वरक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 201अध्याय-सूचीअध्याय 203

श्लोक 1 (skanda.7.202.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि रामेश्वरमनुत्तमम्। मंकीशाद्दक्षिणे भागे आग्नेये तु कृतस्मरात्। पूर्वतस्तु सरस्वत्या बलभद्रप्रतिष्ठितम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi rāmeśvaramanuttamam| maṅkīśāddakṣiṇe bhāge āgneye tu kṛtasmarāt| pūrvatastu sarasvatyā balabhadrapratiṣṭhitam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर उस अनुपम रामेश्वर की ओर जाना चाहिए, जो मंकीश्वर से दक्षिण दिशा में, कृतस्मर से आग्नेय दिशा में तथा सरस्वती के पूर्व की ओर स्थित है, जिसे बलभद्र ने प्रतिष्ठित किया था।

श्लोक 2 (skanda.7.202.2)

यत्र मुक्तोऽभवद्देवि रामो ब्रह्मवधात्किल। पातकात्प्रतिलोमां तामगाहत सरस्वतीम्

yatra mukto'bhavaddevi rāmo brahmavadhātkila| pātakātpratilomāṁ tāmagāhata sarasvatīm

हे देवि, यहीं पर राम ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे, जब उन्होंने उस प्रतिलोमगामिनी सरस्वती में अवगाहन किया।

श्लोक 3 (skanda.7.202.3)

देव्युवाच। कथं स पातकान्मुक्तः कथं पापमभूत्पुरा। कथं तत्स्थापितं लिंगं किंप्रभावं वदस्व मे

devyuvāca| kathaṁ sa pātakānmuktaḥ kathaṁ pāpamabhūtpurā| kathaṁ tatsthāpitaṁ liṅgaṁ kiṁprabhāvaṁ vadasva me

देवी ने कहा—वे उस पाप से कैसे मुक्त हुए? पूर्वकाल में वह पाप कैसे हुआ? वह लिंग कैसे स्थापित हुआ, और उसका क्या प्रभाव है—यह मुझे बताइए।

श्लोक 4 (skanda.7.202.4)

ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्। यां श्रुत्वा मानवो देवि मुक्तः संसारसागरात्। सर्वान्कामान्स लभते सततं मनसि प्रियान्

īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi kathāṁ pāpapraṇāśinīm| yāṁ śrutvā mānavo devi muktaḥ saṁsārasāgarāt| sarvānkāmānsa labhate satataṁ manasi priyān

ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, मैं वह सब कथा कहूँगा, जो पापों का नाश करने वाली है; जिसे सुनकर मनुष्य संसार-सागर से मुक्त हो जाता है और अपने मन में सदा प्रिय समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 5 (skanda.7.202.5)

रामः पूर्वं परां प्रीतिं कृत्वा कृष्णस्य लांगली। चिन्तयामास बहुधा किं कृतं सुकृतं भवेत्

rāmaḥ pūrvaṁ parāṁ prītiṁ kṛtvā kṛṣṇasya lāṅgalī| cintayāmāsa bahudhā kiṁ kṛtaṁ sukṛtaṁ bhavet

पहले राम, जो हलधारी और कृष्ण के परम प्रिय थे, अनेक प्रकार से यह विचार करने लगे कि क्या करना उचित होगा।

श्लोक 6 (skanda.7.202.6)

कृष्णेन हि विना नाहं यास्ये दुर्योधनान्तिकम्। पाण्डवान्वा समाश्रित्य कथं दुर्योधनं नृपम्

kṛṣṇena hi vinā nāhaṁ yāsye duryodhanāntikam| pāṇḍavānvā samāśritya kathaṁ duryodhanaṁ nṛpam

बिना कृष्ण के मैं दुर्योधन के पास नहीं जाऊँगा; तथा पाण्डवों का आश्रय लेकर राजा दुर्योधन को किस प्रकार—

श्लोक 7 (skanda.7.202.7)

जामातरं तथा शिष्यं घातयिष्ये नरेश्वरम्। तस्मान्न पार्थं यास्यामि नापि दुर्योधनं नृपम्

jāmātaraṁ tathā śiṣyaṁ ghātayiṣye nareśvaram| tasmānna pārthaṁ yāsyāmi nāpi duryodhanaṁ nṛpam

—अपने शिष्य और जामाता, राजा दुर्योधन को मरवा सकता हूँ। इसलिए मैं न तो पार्थ के पास जाऊँगा, न ही राजा दुर्योधन के पास।

श्लोक 8 (skanda.7.202.8)

तीर्थेष्वाप्लावयिष्यामि तावदात्मानमात्मना। कुरूणां पाण्डवानां च यावदंताय कल्पते

tīrtheṣvāplāvayiṣyāmi tāvadātmānamātmanā| kurūṇāṁ pāṇḍavānāṁ ca yāvadaṁtāya kalpate

मैं स्वयं ही तीर्थों में अपने आपको स्नान कराता रहूँगा, जब तक कि कुरुओं और पाण्डवों का अन्त न हो जाए।

श्लोक 9 (skanda.7.202.9)

इत्यादिश्य हृषीकेशं पार्थदुर्योधनावपि। जगाम द्वारकां शौरिः स्वसैन्यैश्च परीवृतः

ityādiśya hṛṣīkeśaṁ pārthaduryodhanāvapi| jagāma dvārakāṁ śauriḥ svasainyaiśca parīvṛtaḥ

इस प्रकार हृषीकेश, पार्थ और दुर्योधन को सूचित कर, शौरि अपनी सेना से घिरे हुए द्वारका को चले गए।

श्लोक 10 (skanda.7.202.10)

गत्वा द्वारावतीं रामो हृष्टतुष्टजनाकुलाम्। स्वैरन्तःपुरगैः सार्धं पपौ पानं हलायुधः

gatvā dvārāvatīṁ rāmo hṛṣṭatuṣṭajanākulām| svairantaḥpuragaiḥ sārdhaṁ papau pānaṁ halāyudhaḥ

द्वारावती नगरी में, जो प्रसन्न और संतुष्ट जनों से भरी हुई थी, पहुँचकर, हलायुध राम ने अपने अन्तःपुर की स्त्रियों के साथ मदिरापान किया।

श्लोक 11 (skanda.7.202.11)

पीतपानो जगामाथ रैवतोद्यानमृद्धिमत्। हस्ते गृहीत्वा स गदां रेवत्यादिभिरन्वितः

pītapāno jagāmātha raivatodyānamṛddhimat| haste gṛhītvā sa gadāṁ revatyādibhiranvitaḥ

मदिरापान करने के बाद वे, हाथ में गदा लिए, रेवती आदि के साथ समृद्ध रैवतक उद्यान को गए।

श्लोक 12 (skanda.7.202.12)

स्त्रीकदंबकमध्यस्थो ययौ मत्तवदास्खलन्। ददर्श च वनं वीरो रमणीयमनुत्तमम्

strīkadaṁbakamadhyastho yayau mattavadāskhalan| dadarśa ca vanaṁ vīro ramaṇīyamanuttamam

स्त्रियों के समूह के मध्य में स्थित वे मत्त की भाँति डगमगाते हुए चले; उस वीर ने वहाँ एक अत्यन्त रमणीय वन देखा।

श्लोक 13 (skanda.7.202.13)

सर्वत्र तरुपुष्पाढ्यं शाखामृगगणाकुलम्। पुष्पपद्मवनोपेतं सपल्वलमहावनम्

sarvatra tarupuṣpāḍhyaṁ śākhāmṛgagaṇākulam| puṣpapadmavanopetaṁ sapalvalamahāvanam

वह वन सर्वत्र पुष्पों से भरे वृक्षों से सुशोभित, वानरों के समूहों से भरा हुआ, फूलों और कमलों के वनों से युक्त तथा छोटे जलाशयों वाला महावन था।

श्लोक 14 (skanda.7.202.14)

स शृण्वन्प्रीतिजनकान्वन्यान्मदकलाञ्छुभान्। श्रोत्ररम्यान्सुमधुराञ्छब्दान्खगसुखेरितान्

sa śṛṇvanprītijanakānvanyānmadakalāñchubhān| śrotraramyānsumadhurāñchabdānkhagasukheritān

वह वहाँ प्रिय लगने वाले, मादकता से युक्त, शुभ, कर्णप्रिय तथा अत्यन्त मधुर वन्य ध्वनियों को सुनते हुए चला, जो पक्षियों द्वारा सुखपूर्वक उच्चारित थे।

श्लोक 15 (skanda.7.202.15)

सर्वतः फलरत्नाढ्यान्सर्वतः कुसुमोज्ज्वलान्। अपश्यत्पादपांश्चैव विहगैरनुमोदितान्

sarvataḥ phalaratnāḍhyānsarvataḥ kusumojjvalān| apaśyatpādapāṁścaiva vihagairanumoditān

उसने सब ओर से उत्तम फलों से समृद्ध, सब ओर से फूलों से देदीप्यमान तथा पक्षियों से गुंजित वृक्षों को देखा।

श्लोक 16 (skanda.7.202.16)

आम्रानाग्रातकान्भव्यान्नालिकेरान्सतिंदुकान्। आबल्वनांस्था पीतान्दाडिमान्बीजपूरकान्। पनसाँल्लकुचान्मोचांस्तापांश्चापि मनोहरान्। पालेवतान्कुसंकुल्लान्नलिनानथ वेतसान्

āmrānāgrātakānbhavyānnālikerānsatiṁdukān| ābalvanāṁsthā pītāndāḍimānbījapūrakān| panasāllakucānmocāṁstāpāṁścāpi manoharān| pālevatānkusaṁkullānnalinānatha vetasān

आम, आग्रातक, भव्य फल, नारियल, तिंदुक, बेल के वृक्ष, पीले फल वाले वृक्ष, अनार, बीजपूरक, कटहल, लकुच, केले, तथा मनोहर ताल वृक्ष, बदरी, कमल तथा बेंत के वृक्ष—

श्लोक 17 (skanda.7.202.17)

भल्लातकानामलकींस्तिन्दुकांश्च महाफलान्। इंगुदान्करमर्दांश्च हरीतकबिभीतकान्

bhallātakānāmalakīṁstindukāṁśca mahāphalān| iṁgudānkaramardāṁśca harītakabibhītakān

मार्किंग नट के वृक्ष, आँवले, बड़े फलों वाले तेंदू, इंगुद, करौंदे, तथा हरीतकी और बिभीतक के वृक्ष—

श्लोक 18 (skanda.7.202.18)

एतानन्यांश्च स तरून्ददर्श यदुनन्दनः। तथैवाशोकपुन्नागकेतकीबकुलांस्तथा

etānanyāṁśca sa tarūnddadarśa yadunandanaḥ| tathaivāśokapunnāgaketakībakulāṁstathā

इन और अन्य वृक्षों को उस यदुनन्दन ने देखा, तथा इसी प्रकार अशोक, पुन्नाग, केतकी और बकुल के वृक्षों को भी।

श्लोक 19 (skanda.7.202.19)

चंपकान्सप्तपर्णांश्च कर्णिकारान्सुमालतीः। पारिजातान्कोविदारान्मन्दारेन्दीवरांस्तथा

caṁpakānsaptaparṇāṁśca karṇikārānsumālatīḥ| pārijātānkovidārānmandārendīvarāṁstathā

चम्पक, सप्तपर्ण, कर्णिकार, सुन्दर मालती-लताएँ, पारिजात, कोविदार, मन्दार तथा नीलकमल—

श्लोक 20 (skanda.7.202.20)

पाटलान्पुष्पितान्रम्भान्देवदारुद्रुमांस्तथा। शालांस्तालांश्च स्तमालांनिचुलान्वञ्जुलांस्तथा

pāṭalānpuṣpitānraṁbhāndevadārudrumāṁstathā| śālāṁstālāṁśca stamālāṁniculānvañjulāṁstathā

फूले हुए पाटल, केले, देवदार वृक्ष, शाल, ताल, तमाल, निचुल तथा वंजुल के वृक्ष—

श्लोक 21 (skanda.7.202.21)

चकोरैः शतपत्रैश्च भृंगराजैः समावृतान्। कोकिलैः कलविंकैश्च हारीतैर्जीवजीवकैः

cakoraiḥ śataparaiśca bhṛṁgarājaiḥ samāvṛtān| kokilaiḥ kalaviṁkaiśca hārītairjīvajīvakaiḥ

इन वृक्षों में चकोर, शतपत्र, भृंगराज पक्षी, कोयल, गौरैया, हरियल तथा जीवंजीवक पक्षी घिरे हुए थे।

श्लोक 22 (skanda.7.202.22)

प्रियपुत्रैश्चातकैश्च शुकैरन्यैर्विहंगमैः। श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश्चाप्यधिष्ठितैः

priyaputraiścātakaiśca śukairanyairvihaṁgamaiḥ| śrotraramyaṁ sumadhuraṁ kūjadbhiścāpyadhiṣṭhitaiḥ

तथा प्रियपुत्र नामक पक्षियों, चातकों, तोतों और अन्य पक्षियों से, जो कर्णप्रिय और मधुर स्वर में कूज रहे थे।

श्लोक 23 (skanda.7.202.23)

सरांसि च सपद्मानि मनोज्ञसलिलानि च। कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा रोचनकोत्पलैः

sarāṁsi ca sapadmāni manojñasalilāni ca| kumudaiḥ puṇḍarīkaiśca tathā rocanakotpalaiḥ

वहाँ कमलों से युक्त, मनोहर जल वाले सरोवर भी थे, जो कुमुद, पुण्डरीक और सुन्दर नीलकमलों से सुशोभित थे।

श्लोक 24 (skanda.7.202.24)

कह्लारैः कमलैश्चापि चर्चितानि समंततः। कदंबैश्चक्रवाकैश्च तथैव जलकुक्कुटैः

kahlāraiḥ kamalaiścāpi carcitāni samaṁtataḥ| kadaṁbaiścakravākaiśca tathaiva jalakukkuṭaiḥ

जो चारों ओर लाल कमलों और सामान्य कमलों से भरे हुए थे, तथा कदंब वृक्षों, चक्रवाक पक्षियों और जल-कुक्कुटों से युक्त थे।

श्लोक 25 (skanda.7.202.25)

कारण्डवैः प्लवैर्हंसैः कूर्मैर्मंडुभिरेव च। एतैरन्यैश्च कीर्णानि तथान्यैर्जलवासिभिः

kāraṇḍavaiḥ plavairhaṁsaiḥ kūrmairmaṁḍubhireva ca| etairanyaiśca kīrṇāni tathānyairjalavāsibhiḥ

वे सरोवर करण्डव पक्षियों, जलकाकों, हंसों, कछुओं और मेंढकों से तथा इन और अन्य जलचर प्राणियों से भरे हुए थे।

श्लोक 26 (skanda.7.202.26)

क्रमेण संचरन्रामः प्रेक्षमाणो मनोरमम्। जगामानुगतः स्त्रीभिर्लतागृहमनुत्तमम्

krameṇa saṁcaranrāmaḥ prekṣamāṇo manoramam| jagāmānugataḥ strībhirlatāgṛhamanuttamam

इस मनोरम दृश्य को देखते हुए राम क्रमशः आगे बढ़े और स्त्रियों के साथ एक अनुपम लता-मण्डप की ओर गए।

श्लोक 27 (skanda.7.202.27)

स ददर्श द्विजांस्तत्र वेदवेदांगपारगान्। कौशिकान्भार्गवांश्चैव भारद्वाजांश्च गौतमान्

sa dadarśa dvijāṁstatra vedavedāṅgapāragān| kauśikānbhārgavāṁścaiva bhāradvājāṁśca gautamān

वहाँ उसने वेद-वेदांगपारंगत ब्राह्मणों को देखा—कौशिक, भार्गव, भारद्वाज तथा गौतम गोत्र के ब्राह्मणों को।

श्लोक 28 (skanda.7.202.28)

विविधेषु च संभूतान्वंशेषु द्विजसत्तमान्। कथाश्रवणसोत्कण्ठानुपविष्टान्महात्मनः

vividheṣu ca saṁbhūtānvaṁśeṣu dvijasattamān| kathāśravaṇasotkaṇṭhānupaviṣṭānmahātmanaḥ

विविध वंशों में उत्पन्न उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों, उन महात्माओं को, जो कथा सुनने की उत्कण्ठा से बैठे हुए थे।

श्लोक 29 (skanda.7.202.29)

कृष्णाजिनोत्तरीयेषु कूर्चेषु च वृसीषु च। सूते च तेषां मध्यस्थं कथयानं कथाः शुभाः

kṛṣṇājinottarīyeṣu kūrceṣu ca vṛsīṣu ca| sūte ca teṣāṁ madhyasthaṁ kathayānaṁ kathāḥ śubhāḥ

वे काले मृगचर्म के उत्तरीय वस्त्र पहने, कुशासनों और वृसी पर बैठे थे; उनके बीच में बैठा सूत उन्हें शुभ कथाएँ सुना रहा था।

श्लोक 30 (skanda.7.202.30)

पौराणिकाः सुरर्षीणामाद्यानां चरितक्रियाः। दृष्ट्वा रामं द्विजाः सर्वे मधुपानारुणेक्षणम्

paurāṇikāḥ surarṣīṇāmādyānāṁ caritakriyāḥ| dṛṣṭvā rāmaṁ dvijāḥ sarve madhupānāruṇekṣaṇam

—पुराणों में वर्णित देवर्षियों और आदि पुरुषों के आचरण-कथाएँ। तब उन सब ब्राह्मणों ने मदिरापान से लाल नेत्रों वाले राम को देखा।

श्लोक 31 (skanda.7.202.31)

मत्तोऽयमिति मन्वानाः समुत्तस्थुस्त्वरान्विताः। पूजयन्तो हलधरं तमृते सूतवंशजम्

matto'yamiti manvānāḥ samuttasthustvarānvitāḥ| pūjayanto haladharaṁ tamṛte sūtavaṁśajam

'यह मत्त है'—ऐसा समझकर वे शीघ्रता से उठ खड़े हुए और उस हलधारी का सम्मान करने लगे, केवल उस सूतवंशी को छोड़कर।

श्लोक 32 (skanda.7.202.32)

ततः क्रोधसमाविष्टो हली सूतं महाबलः। निजघान विवृत्ताक्षः क्षोभिताशेषदानवः

tataḥ krodhasamāviṣṭo halī sūtaṁ mahābalaḥ| nijaghāna vivṛttākṣaḥ kṣobhitāśeṣadānavaḥ

तब क्रोध से भरे हुए, नेत्र घुमाते हुए, समस्त दानवों को क्षुब्ध करने वाले उस महाबली हलधारी ने उस सूत का वध कर दिया।

श्लोक 33 (skanda.7.202.33)

अन्वासिते पदं ब्राह्म्यं तस्मिन्सूते निपातिते। निष्क्रान्तास्ते द्विजाः सर्वे वनात्कृष्णाजिनांबराः

anvāsite padaṁ brāhmyaṁ tasminsūte nipātite| niṣkrāntāste dvijāḥ sarve vanātkṛṣṇājināṁbarāḥ

जब वह सूत, जो ब्राह्म आसन पर बैठा हुआ था, गिरा दिया गया, तो वे सब ब्राह्मण, कृष्णमृगचर्म पहने हुए, उस वन से बाहर निकल गए।

श्लोक 34 (skanda.7.202.34)

अवधूतं तथात्मानं मन्यमानो हलायुधः। चिन्तयामास सुमहन्मया पापमिदं कृतम्

avadhūtaṁ tathātmānaṁ manyamāno halāyudhaḥ| cintayāmāsa sumahanmayā pāpamidaṁ kṛtam

स्वयं को इस प्रकार तिरस्कृत हुआ मानकर हलायुध ने सोचा—मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है।

श्लोक 35 (skanda.7.202.35)

ब्रह्मासनगतो ह्येष यः सूतो विनिपातितः। तथा ह्येते द्विजाः सर्वे मामवेक्ष्य विनिर्गताः

brahmāsanagato hyeṣa yaḥ sūto vinipātitaḥ| tathā hyete dvijāḥ sarve māmavekṣya vinirgatāḥ

यह सूत ब्राह्म आसन पर बैठा हुआ था, फिर भी मैंने इसे मार डाला; और ये सब ब्राह्मण भी मुझे देखकर यहाँ से चले गए।

श्लोक 36 (skanda.7.202.36)

शरीरस्य च मे गन्धो लोहस्येवासुखावहः। आत्मानं चावगच्छामि ब्रह्मघ्नमिति कुत्सितम्

śarīrasya ca me gandho lohasyevāsukhāvahaḥ| ātmānaṁ cāvagacchāmi brahmaghnamiti kutsitam

मेरे शरीर की गन्ध भी लोहे के समान अशुभ हो गई है; मैं अपने आपको निन्दनीय ब्रह्महत्यारा जान रहा हूँ।

श्लोक 37 (skanda.7.202.37)

धिङ्ममार्थं तथा मद्यं महिमानमकीर्तिदम्। येनाविष्टेन सुमहन्मया पापमिदं कृतम्

dhiṅmamārthaṁ tathā madyaṁ mahimānamakīrtidam| yenāviṣṭena sumahanmayā pāpamidaṁ kṛtam

धिक्कार है मेरे इस अभिमान और उस अकीर्तिकर मद्यपान को, जिससे ग्रस्त होकर मैंने यह इतना बड़ा पाप किया।

श्लोक 38 (skanda.7.202.38)

स्मृत्युक्तं ते करिष्यामि प्रायश्चित्तं यथाविधि। उक्तमस्त्येव मनुना प्रायश्चित्तादिकं क्रमात्

smṛtyuktaṁ te kariṣyāmi prāyaścittaṁ yathāvidhi| uktamastyeva manunā prāyaścittādikaṁ kramāt

मैं स्मृतियों में कहे गए प्रायश्चित्त को यथाविधि करूँगा; मनु ने भी क्रमशः प्रायश्चित्त आदि का विधान बताया है।

श्लोक 39 (skanda.7.202.39)

जपः प्रच्छन्नपापानां मनस्ताप एव च। भूतात्मनस्तपोविद्ये बुद्धेर्ज्ञानं विशोधनम्

japaḥ pracchannapāpānāṁ manastāpa eva ca| bhūtātmanastapovidye buddherjñānaṁ viśodhanam

गुप्त पापों के लिए जप और मानसिक संताप ही प्रायश्चित्त हैं; जीवात्मा की शुद्धि तप और विद्या से होती है, तथा बुद्धि की शुद्धि ज्ञान से होती है।

श्लोक 40 (skanda.7.202.40)

क्षेत्रेश्वरस्य विज्ञानाद्विशुद्धिः परमा मता। शरीरस्य विशुद्धिस्तु प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः

kṣetreśvarasya vijñānādviśuddhiḥ paramā matā| śarīrasya viśuddhistu prāyaścittaiḥ pṛthagvidhaiḥ

क्षेत्रज्ञ के ज्ञान से ही परम शुद्धि मानी गई है; किन्तु शरीर की शुद्धि विविध प्रकार के प्रायश्चित्तों से होती है।

श्लोक 41 (skanda.7.202.41)

ततोऽद्यतः करिष्यामि व्रतं द्वादशवार्षिकम्। स्वकर्मख्यापनं कुर्वन्प्रायश्चित्तमनुत्तमम्

tato'dyataḥ kariṣyāmi vrataṁ dvādaśavārṣikam| svakarmakhyāpanaṁ kurvanprāyaścittamanuttamam

इसलिए आज से मैं बारह वर्ष का व्रत करूँगा, अपने कर्म की घोषणा करते हुए यह सर्वोत्तम प्रायश्चित्त करूँगा।

श्लोक 42 (skanda.7.202.42)

इयं विशुद्धिरज्ञानाद्धत्वा चाकामतो द्विजम्। कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते

iyaṁ viśuddhirajñānāddhatvā cākāmato dvijam| kāmato brāhmaṇavadhe niṣkṛtirna vidhīyate

यह शुद्धि तब है जब अज्ञानवश और बिना इच्छा के किसी द्विज का वध हो जाए; परन्तु जानबूझकर ब्राह्मण-वध करने पर कोई प्रायश्चित्त विहित नहीं है।

श्लोक 43 (skanda.7.202.43)

यः कामतो महापापं नरः कुर्यान्न कथंचन। न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा भृग्वग्निपतनादृते

yaḥ kāmato mahāpāpaṁ naraḥ kuryānna kathaṁcana| na tasya niṣkṛtirdṛṣṭā bhṛgvagnipatanādṛte

जो मनुष्य जानबूझकर महापाप करता है, उसके लिए भृगुपतन या अग्नि में प्रवेश किए बिना कोई प्रायश्चित्त नहीं देखा गया है।

श्लोक 44 (skanda.7.202.44)

अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः। कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात्

akāmataḥ kṛte pāpe prāyaścittaṁ vidurbudhāḥ| kāmakārakṛte'pyāhureke śrutinidarśanāt

अनजाने में हुए पाप का प्रायश्चित्त विद्वानों ने बताया है; किन्तु कुछ आचार्य श्रुति-प्रमाण के आधार पर जानबूझकर किए गए पाप के लिए भी प्रायश्चित्त मानते हैं।

श्लोक 45 (skanda.7.202.45)

विधिः प्राथमिकस्तस्माद्द्वितीये द्विगुणं चरेत्। तृतीये त्रिगुणं प्रोक्तं चतुर्थे नास्ति निष्कृतिः

vidhiḥ prāthamikastasmāddvitīye dviguṇaṁ caret| tṛtīye triguṇaṁ proktaṁ caturthe nāsti niṣkṛtiḥ

पहली बार के लिए सामान्य विधि है, दूसरी बार दुगना प्रायश्चित्त करना चाहिए, तीसरी बार तिगुना कहा गया है, और चौथी बार के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

श्लोक 46 (skanda.7.202.46)

औषधं स्नेहमाहारं ददद्गोब्राह्मणादिषु। दीयमाने विपत्तिः स्यान्न स पापेन लिप्यते

auṣadhaṁ snehamāhāraṁ dadadgobrāhmaṇādiṣu| dīyamāne vipattiḥ syānna sa pāpena lipyate

जो व्यक्ति गौ, ब्राह्मण आदि को औषधि, घी और आहार देता है, यदि उस देने के कारण कोई विपत्ति हो जाए, तो वह पाप से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 47 (skanda.7.202.47)

अकारणं तु यः कश्चिद्द्विजः प्राणान्परित्यजेत्। तस्यैव तत्र दोषः स्यान्न तु योऽस्मै ददाति तत्

akāraṇaṁ tu yaḥ kaścidddvijaḥ prāṇānparityajet| tasyaiva tatra doṣaḥ syānna tu yo'smai dadāti tat

यदि कोई द्विज बिना किसी कारण के अपने प्राण त्याग दे, तो उसी का दोष होता है, न कि उस व्यक्ति का जो उसे कुछ देता है।

श्लोक 48 (skanda.7.202.48)

परिष्कृतो यदा विप्रो हत्वाऽऽत्मानं मृतो यदि। निर्गुणः सहसा क्रोधाद्गृहक्षेत्रादिकारणात्

pariṣkṛto yadā vipro hatvātmānaṁ mṛto yadi| nirguṇaḥ sahasā krodhādgṛhakṣetrādikāraṇāt

जब कोई विप्र स्वयं सुसज्जित होकर, बिना किसी अच्छे कारण के, घर या भूमि आदि किसी विषय को लेकर अचानक क्रोधवश आत्महत्या कर मर जाए—

श्लोक 49 (skanda.7.202.49)

त्रिवार्षिकं व्रतं कुर्यात्प्रतिलोमां सरस्वतीम्। गच्छेद्वापि विशुद्ध्यर्थं तत्पापस्येति निश्चितम्

trivārṣikaṁ vrataṁ kuryātpratilomāṁ sarasvatīm| gacchedvāpi viśuddhyarthaṁ tatpāpasyeti niścitam

—तो उस पाप की शुद्धि के लिए तीन वर्ष का व्रत करना चाहिए, अथवा उस प्रतिलोमगामिनी सरस्वती के पास जाना चाहिए, यह निश्चित विधान है।

श्लोक 50 (skanda.7.202.50)

उद्दिश्य कुपितो हत्वा तोषितं वासयेत्पुनः। तस्मिन्मृते न दोषोऽस्ति द्वयोरुच्छ्रावणे कृते

uddiśya kupito hatvā toṣitaṁ vāsayetpunaḥ| tasminmṛte na doṣo'sti dvayorucchrāvaṇe kṛte

यदि क्रोध में आकर आघात करने के बाद उसे पुनः प्रसन्न कर संतुष्ट कर दिया जाए, और वह फिर भी मर जाए, तो दोनों पक्षों को समझा दिए जाने पर कोई दोष नहीं होता।

श्लोक 51 (skanda.7.202.51)

षण्ढं तु ब्राह्मणं हत्वा शूद्रहत्याव्रतं चरेत्। बहूनामेककार्याणां सर्वेषां शस्त्रधारिणाम्

ṣaṇḍhaṁ tu brāhmaṇaṁ hatvā śūdrahatyāvrataṁ caret| bahūnāmekakāryāṇāṁ sarveṣāṁ śastradhāriṇām

किन्तु किसी नपुंसक ब्राह्मण की हत्या करने पर शूद्र-हत्या का व्रत करना चाहिए। जब बहुत से लोग एक ही कार्य के लिए शस्त्र धारण करते हैं—

श्लोक 52 (skanda.7.202.52)

यद्येको घातयेत्तत्र सर्वे ते घातकाः स्मृताः। प्रायश्चित्ते व्यवसिते यदि कर्ता विपद्यते

yadyeko ghātayettatra sarve te ghātakāḥ smṛtāḥ| prāyaścitte vyavasite yadi kartā vipadyate

—और यदि उनमें से एक ही वध करता है, तो वे सब ही हत्यारे माने जाते हैं। यदि प्रायश्चित्त निश्चित हो जाने के बाद कर्ता का ही निधन हो जाए—

श्लोक 53 (skanda.7.202.53)

एनस्तत्प्राप्नुयादेनमिह लोके परत्र च। तदहं किं करोम्येष क्व गच्छामि दुरात्मवान्

enastatprāpnuyādenamiha loke paratra ca| tadahaṁ kiṁ karomyeṣa kva gacchāmi durātmavān

—तो वह पाप उसी को इस लोक और परलोक दोनों में प्राप्त होता है। अब मैं, यह दुरात्मा, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ?

श्लोक 54 (skanda.7.202.54)

धिङ्मां च पापचरितं महादुष्कृतकर्मिणम्

dhiṅmāṁ ca pāpacaritaṁ mahāduṣkṛtakarmiṇam

धिक्कार है मुझे, जो पापाचारी हूँ और महान दुष्कर्म करने वाला हूँ।

श्लोक 55 (skanda.7.202.55)

ईश्वर उवाच। इत्येवं विलपन्यावच्छोकाकुलितमानसः। तावदाकाशसंभूता वागुवाचाशरीरिणी

īśvara uvāca| ityevaṁ vilapanyāvacchokākulitamānasaḥ| tāvadākāśasaṁbhūtā vāguvācāśarīriṇī

ईश्वर ने कहा—इस प्रकार शोक से व्याकुल मन से विलाप करते हुए राम को, तभी आकाश से उत्पन्न हुई एक अशरीरी वाणी ने कहा—

श्लोक 56 (skanda.7.202.56)

भोभो राम न संतापस्त्वया कार्यः कथंचन। गच्छ प्राभासिकं क्षेत्रं यत्र देवी सरस्वती

bhobho rāma na saṁtāpastvayā kāryaḥ kathaṁcana| gaccha prābhāsikaṁ kṣetraṁ yatra devī sarasvatī

हे राम, तुम्हें किसी भी प्रकार का संताप नहीं करना चाहिए। तुम प्राभासिक क्षेत्र में जाओ, जहाँ देवी सरस्वती हैं।

श्लोक 57 (skanda.7.202.57)

पञ्चस्रोताः स्थिता तत्र पञ्चपातकनाशनी। नदीनां प्रवरा सा तु ब्रह्मभूता सरस्वती

pañcasrotāḥ sthitā tatra pañcapātakanāśanī| nadīnāṁ pravarā sā tu brahmabhūtā sarasvatī

वहाँ वह पंचस्रोता के रूप में स्थित है, जो पाँच महापातकों का नाश करने वाली है; वह सरस्वती नदियों में श्रेष्ठ तथा साक्षात् ब्रह्मस्वरूपा है।

श्लोक 58 (skanda.7.202.58)

एकतः सर्वतीर्थानि ब्रह्माण्डे सचराचरे। गंगादीनि नरश्रेष्ठ तेषां पुण्या सरस्वती

ekataḥ sarvatīrthāni brahmāṇḍe sacarācare| gaṅgādīni naraśreṣṭha teṣāṁ puṇyā sarasvatī

हे नरश्रेष्ठ, एक ओर तो इस चराचर ब्रह्माण्ड के गंगा आदि समस्त तीर्थ हैं, और उन सबसे भी अधिक पुण्यमयी सरस्वती है।

श्लोक 59 (skanda.7.202.59)

तावद्गर्जंति पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च। यावन्न दृश्यते देवी प्रभासस्था सरस्वती

tāvadgarjaṁti pāpāni brahmahatyādikāni ca| yāvanna dṛśyate devī prabhāsasthā sarasvatī

सिर उठाए हुए पाप, ब्रह्महत्या आदि, तभी तक गरजते रहते हैं, जब तक प्रभास में स्थित देवी सरस्वती के दर्शन नहीं हो जाते।

श्लोक 60 (skanda.7.202.60)

तस्मात्तत्रैव गच्छ त्वं यत्र देवी सरस्वती। नान्यैस्तीर्थैः सहस्रैस्त्वं कर्तुं शक्यो विकल्मषः

tasmāttatraiva gaccha tvaṁ yatra devī sarasvatī| nānyaistīrthaiḥ sahasraistvaṁ kartuṁ śakyo vikalmaṣaḥ

इसलिए तुम वहीं जाओ, जहाँ देवी सरस्वती हैं। अन्य हजारों तीर्थों के द्वारा तुम्हें पाप-रहित नहीं किया जा सकता।

श्लोक 61 (skanda.7.202.61)

तन्मा कार्षीर्विलंबं त्वं गच्छ तीरं महोदधेः। प्राभासिके महादेवीं प्रतिलोमां विगाहय

tanmā kārṣīrvilaṁbaṁ tvaṁ gaccha tīraṁ mahodadheḥ| prābhāsike mahādevīṁ pratilomāṁ vigāhaya

इसलिए विलम्ब मत करो, तुम महासागर के तट पर जाओ; प्राभासिक क्षेत्र में उस प्रतिलोमगामिनी महादेवी में स्नान करो।

श्लोक 62 (skanda.7.202.62)

तत्रैवाराधय विभुं लिंगरूपिणमीश्वरम्। प्रतिष्ठाप्य महापापाच्छारीरात्त्वं विमोक्ष्यसि

tatraivārādhaya vibhuṁ liṅgarūpiṇamīśvaram| pratiṣṭhāpya mahāpāpācchārīrāttvaṁ vimokṣyasi

वहीं लिंगरूपधारी सर्वव्यापक ईश्वर की आराधना करो; उसे प्रतिष्ठित कर तुम अपने शरीर के महापाप से मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 63 (skanda.7.202.63)

इति श्रुत्वा वचो रामः परमानंदपूरितः। प्रभासक्षेत्रगमने मतिं चक्रे महामनाः

iti śrutvā vaco rāmaḥ paramānaṁdapūritaḥ| prabhāsakṣetragamane matiṁ cakre mahāmanāḥ

यह वचन सुनकर राम परम आनन्द से भर गए और उस उदारचित्त वीर ने प्रभास क्षेत्र जाने का निश्चय किया।

श्लोक 64 (skanda.7.202.64)

ततः स्वसैन्यसंयुक्तो द्रव्योपस्करसंयुतः। आजगाम महाक्षेत्रं प्रभासमिति विश्रुतम्

tataḥ svasainyasaṁyukto dravyopaskarasaṁyutaḥ| ājagāma mahākṣetraṁ prabhāsamiti viśrutam

तब अपनी सेना और आवश्यक सामग्री सहित वे उस महाक्षेत्र में पहुँचे, जो प्रभास नाम से विख्यात है।

श्लोक 65 (skanda.7.202.65)

दृष्ट्वा मनोरमं तीर्थं सरस्वत्यब्धिसंगमे। चकार हृदि संकल्पं प्रतिलोमावगाहने

dṛṣṭvā manoramaṁ tīrthaṁ sarasvatyabdhisaṁgame| cakāra hṛdi saṁkalpaṁ pratilomāvagāhane

सरस्वती और समुद्र के संगम पर उस मनोहर तीर्थ को देखकर उन्होंने मन ही मन उस प्रतिलोमगामिनी में स्नान करने का संकल्प किया।

श्लोक 66 (skanda.7.202.66)

आहूय ब्राह्मणांस्तत्र प्रभासक्षेत्रवासिनः। सम्यग्यात्राविधानेन यात्रां तत्राकरोद्विभुः

āhūya brāhmaṇāṁstatra prabhāsakṣetravāsinaḥ| samyagyātrāvidhānena yātrāṁ tatrākarodvibhuḥ

वहाँ प्रभास क्षेत्र में निवास करने वाले ब्राह्मणों को बुलाकर उस प्रभु ने यात्रा की सम्यक् विधि के अनुसार वहाँ यात्रा सम्पन्न की।

श्लोक 67 (skanda.7.202.67)

यानि प्राभासिके क्षेत्रे तीर्थानि विविधानि तु। रवियोजनसंस्थानि तेषु यात्रां चकार सः

yāni prābhāsike kṣetre tīrthāni vividhāni tu| raviyojanasaṁsthāni teṣu yātrāṁ cakāra saḥ

प्राभासिक क्षेत्र में जो विविध तीर्थ हैं, जो सूर्य-योजन विस्तार में स्थित हैं, उन सब में उसने यात्रा की।

श्लोक 68 (skanda.7.202.68)

प्रत्येकं च ददौ तेषु दानानि विविधानि तु। तथाऽधः स्थापयामास सरस्वत्यब्धिसंगमे

pratyekaṁ ca dadau teṣu dānāni vividhāni tu| tathā'dhaḥ sthāpayāmāsa sarasvatyabdhisaṁgame

उनमें से प्रत्येक तीर्थ में उसने विविध प्रकार के दान दिए; तथा सरस्वती और समुद्र के संगम-स्थल पर—

श्लोक 69 (skanda.7.202.69)

पूर्वभागे महालिंगं कृत्वा यज्ञविधिक्रियाम्। एवं कृते महादेवि विमुक्तः पातकैरभूत्

pūrvabhāge mahāliṅgaṁ kṛtvā yajñavidhikriyām| evaṁ kṛte mahādevi vimuktaḥ pātakairabhūt

—पूर्व दिशा में एक महालिंग स्थापित कर उसने यज्ञ-विधि सम्पन्न की। हे महादेवि, ऐसा करने पर वह पापों से मुक्त हो गया।

श्लोक 70 (skanda.7.202.70)

निर्मलांगस्ततो देवि दिनानि दश संस्थितः। ततस्तां चैव स स्नात्वा प्रतिलोमां क्रमाद्ययौ। प्लक्षावतरणं यावत्समुद्राच्च हिमाह्वयम्

nirmalāṅgastato devi dināni daśa saṁsthitaḥ| tatastāṁ caiva sa snātvā pratilomāṁ kramādyayau| plakṣāvataraṇaṁ yāvatsamudrācca himāhvayam

हे देवि, तब निर्मल शरीर होकर वह दस दिनों तक वहाँ ठहरा; फिर उसी प्रतिलोमगामिनी में स्नान कर क्रमशः वह समुद्र से लेकर प्लक्षावतरण तक तथा हिमालय तक गया।

श्लोक 71 (skanda.7.202.71)

एवं मुक्तः स पापौघै रामोऽभूत्प्रथितः प्रिये। तस्य लिंगस्य माहात्म्यात्सरस्वत्याः प्रसादतः

evaṁ muktaḥ sa pāpaughai rāmo'bhūtprathitaḥ priye| tasya liṅgasya māhātmyāttasarasvatyāḥ prasādataḥ

इस प्रकार पापों के समूह से मुक्त होकर राम विख्यात हुए, हे प्रिये—उस लिंग के माहात्म्य से तथा सरस्वती की कृपा से।

श्लोक 72 (skanda.7.202.72)

यस्तत्पूजयते देवि लिंगं पापभयापहम्। रामेश्वरेति कथितं सोऽपि मुच्येत पातकात्

yastatpūjayate devi liṅgaṁ pāpabhayāpaham| rāmeśvareti kathitaṁ so'pi mucyeta pātakāt

हे देवि, जो कोई उस लिंग की पूजा करता है, जो भय और पाप दोनों को दूर करने वाला है और रामेश्वर कहलाता है, वह भी पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 73 (skanda.7.202.73)

अष्टम्यां च विशेषेण ब्रह्मकूर्चविधानतः। यस्तत्र कुरुते देवि सोऽश्वमेधफलं लभेत्

aṣṭamyāṁ ca viśeṣeṇa brahmakūrcavidhānataḥ| yastatra kurute devi so'śvamedhaphalaṁ labhet

विशेष रूप से अष्टमी तिथि को जो ब्रह्मकूर्च विधि से वहाँ यह करता है, हे देवि, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 74 (skanda.7.202.74)

स्नात्वा तत्र वरारोहे सरस्वत्यब्धिसंगमे। रामेश्वरेतिनामानं ततः संपूज्य शंकरम्। गोदानं तत्र देयं तु सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः

snātvā tatra varārohe sarasvatyabdhisaṁgame| rāmeśvaretināmānaṁ tataḥ saṁpūjya śaṅkaram| godānaṁ tatra deyaṁ tu samyagyātrāphalepsubhiḥ

हे वरारोहे, वहाँ सरस्वती और समुद्र के संगम पर स्नान करके, तत्पश्चात् रामेश्वर नामधारी शंकर का सम्यक् पूजन कर, यात्रा का सम्पूर्ण फल चाहने वालों को वहाँ गोदान देना चाहिए।

श्लोक 75 (skanda.7.202.75)

इत्येवं कथितं देवि रामेश्वरमहोदयम्। यच्छ्रुत्वा मानवः सम्यक्छ्रद्धावान्प्राप्नुयाद्दिवम्

ityevaṁ kathitaṁ devi rāmeśvaramahodayam| yacchrutvā mānavaḥ samyakśraddhāvānprāpnuyāddivam

हे देवि, इस प्रकार रामेश्वर की महिमा का वर्णन किया गया; इसे सुनकर श्रद्धावान मनुष्य सम्यक् रूप से स्वर्ग को प्राप्त करता है।

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