प्रभास खण्ड · अध्याय 213
कश्यपेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.213.1)
ईश्वर उवाच। क्रत्वीशात्पूर्वदिग्भागे धनुःषोडशकान्तरे। कश्यपेश्वरनामानं महापातकनाशनम्
īśvara uvāca| kratvīśātpūrvadigbhāge dhanuḥṣoḍaśakāntare| kaśyapeśvaranāmānaṁ mahāpātakanāśanam
ईश्वर ने कहा—क्रत्वीश्वर से पूर्व दिशा में सोलह धनुष की दूरी पर कश्यपेश्वर नामक लिंग है, जो महापातकों का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.213.2)
तं दृष्ट्वा मानवो देवि धनवान्पुत्रवान्भवेत्। सर्वपातकयुक्तोऽपि मुच्यते नात्र संशयः
taṁ dṛṣṭvā mānavo devi dhanavānputravānbhavet| sarvapātakayukto'pi mucyate nātra saṁśayaḥ
हे देवि, उसका दर्शन कर मनुष्य धनवान् और पुत्रवान् होता है; सभी पापों से युक्त होने पर भी वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।