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प्रभास खण्ड · अध्याय 214

कौशिकेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

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श्लोक 1 (skanda.7.214.1)

ईश्वर उवाच। धनुषामष्टभिस्तस्मादीशाने कश्यपेश्वरात्। कौशकेश्वरनामानं महापातकनाशनम्

īśvara uvāca| dhanuṣāmaṣṭabhistasmādīśāne kaśyapeśvarāt| kauśakeśvaranāmānaṁ mahāpātakanāśanam

ईश्वर ने कहा—कश्यपेश्वर से ईशान दिशा में आठ धनुष की दूरी पर कौशिकेश्वर नामक लिंग है, जो महापातकों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.7.214.2)

वसिष्ठतनयान्हत्वा तत्र कौशिकसत्तमः। स्थापयामास तल्लिंगं मुक्तपापस्ततोऽभवत्

vasiṣṭhatanayānhatvā tatra kauśikasattamaḥ| sthāpayāmāsa talliṅgaṁ muktapāpastato'bhavat

वशिष्ठ के पुत्रों की हत्या करके श्रेष्ठ कौशिक ने वहाँ उस लिंग की स्थापना की, और उसके पश्चात् वे पाप-मुक्त हो गए।

श्लोक 3 (skanda.7.214.3)

तं दृष्ट्वा पूजयित्वा तु लभते वाञ्छितं फलम्

taṁ dṛṣṭvā pūjayitvā tu labhate vāñchitaṁ phalam

उसका दर्शन कर तथा पूजा करके मनुष्य इच्छित फल को प्राप्त करता है।

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