प्रभास खण्ड · अध्याय 216
गौतमेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.216.1)
ईश्वर उवाच। मार्कण्डेश्वरतो देवि उत्तरे लिंगमुत्तमम्। धनुषां पञ्चदशभिर्गौतमेश्वरनामकम्
īśvara uvāca| mārkaṇḍeśvarato devi uttare liṅgamuttamam| dhanuṣāṁ pañcadaśabhirgautameśvaranāmakam
ईश्वर ने कहा—हे देवि, मार्कण्डेश्वर से उत्तर दिशा में पन्द्रह धनुष की दूरी पर गौतमेश्वर नामक उत्तम लिंग स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.216.2)
गुरुं हत्वा पुरा देवि गौतमः पापदुःखितः। तत्र लिंगं प्रतिष्ठाप्य तस्मात्पापाद्व्यमुच्यत
guruṁ hatvā purā devi gautamaḥ pāpaduḥkhitaḥ| tatra liṅgaṁ pratiṣṭhāpya tasmātpāpādvyamucyata
पूर्वकाल में गुरु की हत्या कर पाप से दुःखी हुए गौतम ने वहाँ लिंग की प्रतिष्ठा की, जिससे वे उस पाप से मुक्त हो गए।
श्लोक 3 (skanda.7.216.3)
यस्तत्र कपिलां दद्यात्स्नात्वा नद्यां विधानतः। संपूज्य विधिवल्लिंगं मुच्यते पञ्चपातकैः
yastatra kapilāṁ dadyātsnātvā nadyāṁ vidhānataḥ| saṁpūjya vidhivalliṅgaṁ mucyate pañcapātakaiḥ
जो वहाँ नदी में विधिपूर्वक स्नान कर, विधिवत् लिंग की पूजा कर, एक तवे रंग की गाय दान करता है, वह पाँचों महापातकों से मुक्त हो जाता है।