प्रभास खण्ड · अध्याय 218
मानवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.218.1)
ईश्वर उवाच। तत्रैव मानवं लिंगं मनुना संप्रतिष्ठितम्। पूर्वं हत्वा सुतं देवि मनुः पापसमन्वितः
īśvara uvāca| tatraiva mānavaṁ liṅgaṁ manunā saṁpratiṣṭhitam| pūrvaṁ hatvā sutaṁ devi manuḥ pāpasamanvitaḥ
ईश्वर ने कहा—वहीं मनु द्वारा प्रतिष्ठित मानव लिंग स्थित है। हे देवि, पूर्वकाल में अपने पुत्र की हत्या कर मनु पाप से युक्त हो गए थे।
श्लोक 2 (skanda.7.218.2)
क्षेत्रं पापहरं ज्ञात्वा तत्र प्रातिष्ठदीश्वरम्। मुक्तश्चैवाभवत्पापात्तस्मात्पुत्रवधोद्भवात्
kṣetraṁ pāpaharaṁ jñātvā tatra prātiṣṭhadīśvaram| muktaścaivābhavatpāpāttasmātputravadhodbhavāt
उस क्षेत्र को पाप-नाशक जानकर उन्होंने वहाँ ईश्वर की स्थापना की, और पुत्र-वध से उत्पन्न उस पाप से मुक्त हो गए।
श्लोक 3 (skanda.7.218.3)
पूजयेन्मानवो यस्तु स मुक्तः पातकैर्भवेत्
pūjayenmānavo yastu sa muktaḥ pātakairbhavet
जो मनुष्य उसकी पूजा करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।