प्रभास खण्ड · अध्याय 234
दशाश्वमेधमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.234.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। दशाश्वमेधिकंनाम महापातकनाशनम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tīrthaṁ trailokyaviśrutam| daśāśvamedhikaṁnāma mahāpātakanāśanam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् त्रैलोक्यविख्यात, दशाश्वमेधिक नामक, महापातकनाशक तीर्थ के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.234.2)
वाजिमेधः पुरा चेष्टं दशभिस्तत्र भामिनि। भरतेन समागत्य मत्वा क्षेत्रमनुत्तमम्
vājimedhaḥ purā ceṣṭaṁ daśabhistatra bhāmini| bharatena samāgatya matvā kṣetramanuttamam
हे भामिनि, पूर्वकाल में भरत ने वहाँ आकर उस क्षेत्र को सर्वोत्तम जानकर दस अश्वमेध यज्ञ किए थे।
श्लोक 3 (skanda.7.234.3)
तत्र तृप्तः सहस्राक्षः सोमनाथेन भामिनि। कृपणाः खानपानैश्च दक्षिणाभिर्द्विजातयः
tatra tṛptaḥ sahasrākṣaḥ somanāthena bhāmini| kṛpaṇāḥ khānapānaiśca dakṣiṇābhirdvijātayaḥ
हे भामिनि, वहाँ सोमनाथ के द्वारा सहस्राक्ष (इन्द्र) तृप्त हुए; तथा दीन-दुखी अन्न-पान से और ब्राह्मण दक्षिणाओं से तृप्त हुए।
श्लोक 4 (skanda.7.234.4)
अथोचुस्त्रिदशाः सर्वे सुप्रीता भरतं नृपम्। तुष्टास्तव महाबाहो यज्ञैः संतर्पिता वयम्
athocustridaśāḥ sarve suprītā bharataṁ nṛpam| tuṣṭāstava mahābāho yajñaiḥ saṁtarpitā vayam
तब सभी देवगण अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा भरत से बोले—'हे महाबाहो, हम आपके यज्ञों से संतुष्ट और तृप्त हुए हैं।'
श्लोक 5 (skanda.7.234.5)
वरं वृणीष्व राजेंद्र यत्ते मनसि वर्त्तते
varaṁ vṛṇīṣva rājeṁdra yatte manasi varttate
'हे राजेन्द्र, जो भी आपके मन में हो, वह वर माँगिए।'
श्लोक 6 (skanda.7.234.6)
राजोवाच। अत्रागत्य नरो भक्त्या यः स्नानं कुरुते नरः। दशानामश्वमेधानां स प्राप्नोतु फलं शुभम्
rājovāca| atrāgatya naro bhaktyā yaḥ snānaṁ kurute naraḥ| daśānāmaśvamedhānāṁ sa prāpnotu phalaṁ śubham
राजा ने कहा—'जो मनुष्य यहाँ आकर भक्तिपूर्वक स्नान करे, वह दस अश्वमेध यज्ञों का शुभ फल प्राप्त करे।'
श्लोक 7 (skanda.7.234.7)
देवा ऊचुः। दशानामश्वमेधानां श्रद्धया फलमाप्स्यति। दशाश्वमेधिकंनाम तीर्थमेतन्महीतले
devā ūcuḥ| daśānāmaśvamedhānāṁ śraddhayā phalamāpsyati| daśāśvamedhikaṁnāma tīrthametanmahītale
देवताओं ने कहा—'श्रद्धापूर्वक (स्नान करने वाला) दस अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करेगा। पृथ्वी पर यह तीर्थ दशाश्वमेधिक नाम से (प्रसिद्ध होगा)।'
श्लोक 8 (skanda.7.234.8)
ख्यातिं यास्यति राजेंद्र नात्र कार्या विचारणा
khyātiṁ yāsyati rājeṁdra nātra kāryā vicāraṇā
'हे राजेन्द्र, यह ख्याति को प्राप्त होगा; इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।'
श्लोक 9 (skanda.7.234.9)
ईश्वर उवाच। ततः प्रभृति तत्तीर्थं प्रख्यातं धरणीतले। दशाश्वमेधिकमिति सर्वपापप्रणाशनम्
īśvara uvāca| tataḥ prabhṛti tattīrthaṁ prakhyātaṁ dharaṇītale| daśāśvamedhikamiti sarvapāpapraṇāśanam
ईश्वर ने कहा—तभी से वह तीर्थ पृथ्वी पर दशाश्वमेधिक नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 10 (skanda.7.234.10)
ऐंद्रवारुणमाश्रित्य गोमुखादाऽऽश्वमेधिकम्। अत्रांतरे महादेवि शिवक्षेत्रं विदुर्बुधाः
aiṁdravāruṇamāśritya gomukhādā''śvamedhikam| atrāṁtare mahādevi śivakṣetraṁ vidurbudhāḥ
इन्द्र-वरुण (तीर्थ) से लेकर गोमुख होते हुए अश्वमेधिक तीर्थ तक—हे महादेवि, इस मध्यवर्ती क्षेत्र को विद्वान लोग शिवक्षेत्र के रूप में जानते हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.234.11)
सर्वपापहरं दिव्यं स्वर्गसोपानसंनिभम्। सपादकोटितीर्थानां स्थानं तत्परिकीर्तितम
sarvapāpaharaṁ divyaṁ svargasopānasaṁnibham| sapādakoṭitīrthānāṁ sthānaṁ tatparikīrtitama
यह दिव्य क्षेत्र समस्त पापों का नाश करने वाला तथा स्वर्ग की सीढ़ी के समान है; यह सवा करोड़ तीर्थों का स्थान कहा गया है।
श्लोक 12 (skanda.7.234.12)
प्राणत्यागे कृते तत्र शिवलोके च मोदते। तिर्यग्योनिगताः पापा कीटपक्षिमृगादयः
prāṇatyāge kṛte tatra śivaloke ca modate| tiryagyonigatāḥ pāpā kīṭapakṣimṛgādayaḥ
यदि वहाँ प्राणत्याग किया जाए, तो शिवलोक में आनन्द प्राप्त होता है। तिर्यक् योनि को प्राप्त पापी जीव—कीट, पक्षी, मृग आदि भी—
श्लोक 13 (skanda.7.234.13)
तेऽपि यांति परं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः। तिलोदकप्रदानेन मातृकाः पैतृकास्तथा
te'pi yāṁti paraṁ sthānaṁ yatra devo maheśvaraḥ| tilodakapradānena mātṛkāḥ paitṛkāstathā
वे भी उस परम स्थान को प्राप्त होते हैं जहाँ भगवान् महेश्वर हैं। तिल-जल के दान से मातृ-पक्ष और पितृ-पक्ष के पितर,
श्लोक 14 (skanda.7.234.14)
पितरस्तस्य तृप्यंति यावदाभूतसंप्लवम्। तत्रेष्टा ब्रह्मणा पूर्वमसंख्याता मखोत्तमाः
pitarastasya tṛpyaṁti yāvadābhūtasaṁplavam| tatreṣṭā brahmaṇā pūrvamasaṁkhyātā makhottamāḥ
उस व्यक्ति के पितर प्रलयपर्यन्त तृप्त रहते हैं। वहाँ पूर्वकाल में ब्रह्मा ने असंख्य उत्तम यज्ञ किए थे।
श्लोक 15 (skanda.7.234.15)
शक्रश्च देवराजत्वे तत्रेष्ट्वा समवाप्तवान्। कार्त्तवीर्येण तत्रैव कृतं यज्ञशतं पुरा
śakraśca devarājatve tatreṣṭvā samavāptavān| kārttavīryeṇa tatraiva kṛtaṁ yajñaśataṁ purā
शक्र (इन्द्र) ने भी वहाँ यज्ञ करके देवराज्य प्राप्त किया था। वहीं पूर्वकाल में कार्तवीर्य ने सौ यज्ञ किए थे।
श्लोक 16 (skanda.7.234.16)
एवं तत्प्रवरं स्थानं क्षेत्रगर्भांतिकं प्रिये। मृतानां तत्र जंतूनामपुनर्भवदायकम्
evaṁ tatpravaraṁ sthānaṁ kṣetragarbhāṁtikaṁ priye| mṛtānāṁ tatra jaṁtūnāmapunarbhavadāyakam
हे प्रिये, इस प्रकार क्षेत्र के गर्भ के समीप स्थित वह श्रेष्ठ स्थान, वहाँ मरने वाले जीवों को पुनर्जन्म से मुक्ति प्रदान करने वाला है।
श्लोक 17 (skanda.7.234.17)
वृषोत्सर्गं तु यस्तत्र कुर्याद्वै भावितात्मवान्। यावंति वृषरोमाणि तावत्स्वर्गे महीयते
vṛṣotsargaṁ tu yastatra kuryādvai bhāvitātmavān| yāvaṁti vṛṣaromāṇi tāvatsvarge mahīyate
जिसका मन शुद्ध हो, वह जो वहाँ वृषोत्सर्ग (बैल-मोचन) करता है, वह उस बैल के जितने रोम हों, उतने ही समय तक स्वर्ग में महिमा को प्राप्त करता है।