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प्रभास खण्ड · अध्याय 236

दुर्वासादित्यमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 235अध्याय-सूचीअध्याय 237

श्लोक 1 (skanda.7.236.1)

ततो गच्छेन्महादेवि दुर्वासादित्यमुत्तमम्। यत्र दुर्वाससा तप्तं तपो वर्षसहस्रकम्

tato gacchenmahādevi durvāsādityamuttamam| yatra durvāsasā taptaṁ tapo varṣasahasrakam

तत्पश्चात् हे महादेवि, उस उत्तम दुर्वासादित्य तीर्थ के पास जाना चाहिए, जहाँ दुर्वासा ने सहस्र वर्षों तक तप किया था।

श्लोक 2 (skanda.7.236.2)

निराहारो जिताहारः सूर्याराधनतत्परः। एवं कालेन महता दिव्यतेजा जनाधिपः

nirāhāro jitāhāraḥ sūryārādhanatatparaḥ| evaṁ kālena mahatā divyatejā janādhipaḥ

बिना भोजन किए, आहार पर विजय प्राप्त करके, सूर्य की आराधना में तत्पर रहते हुए—इस प्रकार दीर्घकाल के पश्चात् दिव्यतेजस्वी सूर्यदेव,

श्लोक 3 (skanda.7.236.3)

प्रत्यक्षं दर्शनं गत्वा प्राह सूर्यो महामुनिम्

pratyakṣaṁ darśanaṁ gatvā prāha sūryo mahāmunim

—साक्षात् दर्शन देकर सूर्य ने उस महामुनि से कहा—

श्लोक 4 (skanda.7.236.4)

सूर्य उवाच। मा ब्रह्मन्साहसं कार्षीर्वरं वरय सुव्रत। अप्राप्यमपि दास्यामि यत्ते मनसि वर्तते

sūrya uvāca| mā brahmansāhasaṁ kārṣīrvaraṁ varaya suvrata| aprāpyamapi dāsyāmi yatte manasi vartate

सूर्य ने कहा—'हे ब्रह्मन्, यह हठ मत करो; हे सुव्रत, वर माँगो। जो तुम्हारे मन में है, वह अप्राप्य होते हुए भी मैं दूँगा।'

श्लोक 5 (skanda.7.236.5)

दुर्वासा उवाच। प्रसन्नो यदि मे देव वरार्हो यदि चाऽप्यहम्। अत्र स्थाने त्वया स्थेयं यावत्तिष्ठति मेदिनी

durvāsā uvāca| prasanno yadi me deva varārho yadi cā'pyaham| atra sthāne tvayā stheyaṁ yāvattiṣṭhati medinī

दुर्वासा ने कहा—'हे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं और यदि मैं वर पाने योग्य हूँ, तो जब तक पृथ्वी स्थित रहे, तब तक आप इसी स्थान पर निवास करें।'

श्लोक 6 (skanda.7.236.6)

दुर्वासादित्यना माऽत्र लोके ख्यातिं च गच्छतु। मया प्रतिष्ठिता या तु प्रतिमा तव सुन्दरी

durvāsādityanā mā'tra loke khyātiṁ ca gacchatu| mayā pratiṣṭhitā yā tu pratimā tava sundarī

'आप यहाँ दुर्वासादित्य नाम से लोक में ख्याति प्राप्त करें; तथा आपकी जो यह सुन्दर प्रतिमा मेरे द्वारा प्रतिष्ठित की गई है—'

श्लोक 7 (skanda.7.236.7)

तस्यां सांनिध्यमेवास्तु तव देव जगत्पते। सांनिध्यं कुरुत चात्र यमुना दुहिता तव

tasyāṁ sāṁnidhyamevāstu tava deva jagatpate| sāṁnidhyaṁ kuruta cātra yamunā duhitā tava

'—हे देव, हे जगत्पते, उसमें आपका सान्निध्य ही बना रहे; और आपकी पुत्री यमुना भी यहाँ सान्निध्य करें।'

श्लोक 8 (skanda.7.236.8)

त्वत्सुतस्तु महातेजा धर्मराजो महाबलः

tvatsutastu mahātejā dharmarājo mahābalaḥ

'तथा आपका महातेजस्वी और महाबली पुत्र धर्मराज भी यहाँ निवास करें।'

श्लोक 9 (skanda.7.236.9)

सूर्य उवाच। एतत्सर्वं मुनिश्रेष्ठ त्वयोक्तं संभविष्यति। तीर्थानां कोटिरन्या च गंगादीनां महामुने

sūrya uvāca| etatsarvaṁ muniśreṣṭha tvayoktaṁ saṁbhaviṣyati| tīrthānāṁ koṭiranyā ca gaṁgādīnāṁ mahāmune

सूर्य ने कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ, आपने जो कुछ कहा है, वह सब सम्भव होगा। हे महामुने, गंगा आदि के एक करोड़ अन्य तीर्थ भी—'

श्लोक 10 (skanda.7.236.10)

आगमिष्यति ते स्थानं निश्चितं वचनान्मम। अत्र स्थाने मया ब्रह्मन्स्थातव्यं सह दैवतैः

āgamiṣyati te sthānaṁ niścitaṁ vacanānmama| atra sthāne mayā brahmansthātavyaṁ saha daivataiḥ

'—मेरे वचन से निश्चित रूप से इस स्थान पर आएँगे। हे ब्रह्मन्, मुझे भी देवताओं सहित इसी स्थान पर निवास करना होगा।'

श्लोक 11 (skanda.7.236.11)

आदित्यानां प्रभावैस्तु ब्रह्मांडोदरवासिनाम्। तेषां माहात्म्यसंयुक्तः स्थास्ये चात्र महामुने

ādityānāṁ prabhāvaistu brahmāṁḍodaravāsinām| teṣāṁ māhātmyasaṁyuktaḥ sthāsye cātra mahāmune

'हे महामुने, ब्रह्माण्ड के भीतर निवास करने वाले आदित्यों के प्रभाव से तथा उनके माहात्म्य से संयुक्त होकर मैं यहाँ निवास करूँगा।'

श्लोक 12 (skanda.7.236.12)

सवितॄणां सहस्रेण दृष्टेनैव तु यत्फलम्। तत्फलं कोटिगुणितं दुर्वासादित्यदर्शनात्

savitṝṇāṁ sahasreṇa dṛṣṭenaiva tu yatphalam| tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ durvāsādityadarśanāt

'सहस्र सूर्यों के दर्शन मात्र से जो फल प्राप्त होता है, वही फल दुर्वासादित्य के दर्शन से करोड़ गुणा होकर प्राप्त होता है।'

श्लोक 13 (skanda.7.236.13)

लप्स्यंते प्राणिनः सर्वे यज्ञकोटिफलं तथा। एवमुक्त्वा तदा सूर्यः सस्मार तनयां निजाम्

lapsyaṁte prāṇinaḥ sarve yajñakoṭiphalaṁ tathā| evamuktvā tadā sūryaḥ sasmāra tanayāṁ nijām

'सभी प्राणी इसी प्रकार करोड़ यज्ञों का फल प्राप्त करेंगे।' ऐसा कहकर तब सूर्य ने अपनी पुत्री (यमुना) का स्मरण किया,

श्लोक 14 (skanda.7.236.14)

तथा च धर्मेराजानं सर्वप्राणिनियामकम्। स्मृतमात्रा तत्र भित्त्वा पातालतलमुद्ययौ

tathā ca dharmerājānaṁ sarvaprāṇiniyāmakam| smṛtamātrā tatra bhittvā pātālatalamudyayau

तथा सर्वप्राणियों के नियामक धर्मराज का भी स्मरण किया। स्मरण करते ही यमुना वहाँ पातालतल को भेदकर प्रकट हो गईं।

श्लोक 15 (skanda.7.236.15)

सा नदीरूपिणी देवी तीर्थकोटिसमन्विता। यमश्च तत्र भगवान्कालदंडधरस्तदा

sā nadīrūpiṇī devī tīrthakoṭisamanvitā| yamaśca tatra bhagavānkāladaṁḍadharastadā

वह देवी नदी के रूप में एक करोड़ तीर्थों से युक्त होकर प्रकट हुईं; और तभी वहाँ कालदण्डधारी भगवान् यम भी आए।

श्लोक 16 (skanda.7.236.16)

ऊचतुः प्रणयोपेतौ सूर्यं भुवनसाक्षिणम्

ūcatuḥ praṇayopetau sūryaṁ bhuvanasākṣiṇam

स्नेहयुक्त होकर उन दोनों ने भुवनसाक्षी सूर्य से कहा—

श्लोक 17 (skanda.7.236.17)

यम उवाच। आज्ञापयतु मां देवो यमुनां च जगत्प्रभुः। कार्यं यद्भाविनोऽर्थस्य तत्करिष्ये न संशयः

yama uvāca| ājñāpayatu māṁ devo yamunāṁ ca jagatprabhuḥ| kāryaṁ yadbhāvino'rthasya tatkariṣye na saṁśayaḥ

यम ने कहा—'हे जगत्प्रभु देव, मुझे और यमुना को आज्ञा दीजिए; भावी प्रयोजन के लिए जो भी कार्य हो, उसे मैं निःसंदेह करूँगा।'

श्लोक 18 (skanda.7.236.18)

सूत उवाच। अत्र क्षेत्रे स्वरूपेण स्थातव्यं वचनान्मम। पापिनां प्राणिनां चात्र रक्षा कार्या प्रयत्नतः

sūta uvāca| atra kṣetre svarūpeṇa sthātavyaṁ vacanānmama| pāpināṁ prāṇināṁ cātra rakṣā kāryā prayatnataḥ

सूत ने कहा—'मेरे वचन से इस क्षेत्र में साक्षात् रूप में निवास करना चाहिए; यहाँ पापी प्राणियों की रक्षा का कार्य यत्नपूर्वक करना चाहिए।'

श्लोक 19 (skanda.7.236.19)

सूर्यभक्ताः सदा रक्ष्या ब्राह्मणा गृहमेधिनः। त्वं चापि यमुने चात्र कोटितीर्थेन संयुता

sūryabhaktāḥ sadā rakṣyā brāhmaṇā gṛhamedhinaḥ| tvaṁ cāpi yamune cātra koṭitīrthena saṁyutā

'सूर्य के भक्त तथा गृहस्थ ब्राह्मणों की सदा रक्षा करनी चाहिए। और हे यमुने, तुम भी यहाँ करोड़ तीर्थों से युक्त होकर,'

श्लोक 20 (skanda.7.236.20)

वस त्वं भव सुप्रीता स्थाने दुर्वाससोद्भवे। इत्येवमुक्त्वा देवेशस्तत्र दुर्वाससोंऽतिके

vasa tvaṁ bhava suprītā sthāne durvāsasodbhave| ityevamuktvā deveśastatra durvāsasoṁ'tike

'—इस स्थान में निवास करो और प्रसन्न रहो, जो दुर्वासा के तप से उत्पन्न हुआ है।' ऐसा कहकर देवेश (सूर्य) वहाँ दुर्वासा के समीप,

श्लोक 21 (skanda.7.236.21)

पश्यतां सर्वदेवानामंतर्द्धानमगात्प्रभुः। दुर्वासास्तु तदा हृष्टो यावत्पश्यति स्वाश्रमम्

paśyatāṁ sarvadevānāmaṁtarddhānamagātprabhuḥ| durvāsāstu tadā hṛṣṭo yāvatpaśyati svāśramam

—सभी देवताओं के देखते-देखते अन्तर्धान हो गए। तब दुर्वासा प्रसन्नचित्त होकर जैसे ही अपने आश्रम की ओर देखने लगे,

श्लोक 22 (skanda.7.236.22)

तावत्पातालमार्गेण यमुना प्रादुराभवत्। यमश्च भगवांस्तत्र दृष्टः क्षेत्रपरूपधृक्

tāvatpātālamārgeṇa yamunā prādurābhavat| yamaśca bhagavāṁstatra dṛṣṭaḥ kṣetraparūpadhṛk

—तभी पाताल मार्ग से यमुना प्रकट हो गईं; और वहाँ भगवान् यम भी क्षेत्रपाल का रूप धारण किए हुए दिखाई दिए।

श्लोक 23 (skanda.7.236.23)

ईश्वर उवाच। इत्थं समभवत्तत्र यमुनोद्भेदमुत्तमम्। कुण्डमादित्यतो याम्ये दुंदुभिस्तत्र पूर्वतः

īśvara uvāca| itthaṁ samabhavattatra yamunodbhedamuttamam| kuṇḍamādityato yāmye duṁdubhistatra pūrvataḥ

ईश्वर ने कहा—इस प्रकार वहाँ यमुना का उत्तम प्रादुर्भाव हुआ—आदित्य से दक्षिण में वह कुण्ड है, और वहीं पूर्व दिशा में दुन्दुभि हैं।

श्लोक 24 (skanda.7.236.24)

क्षेत्रपालो महादेवि यतो दुंदुभिनिःस्वनः। तत्र स्नात्वा महाकुण्डे यः संतर्पयते पितॄन्

kṣetrapālo mahādevi yato duṁdubhiniḥsvanaḥ| tatra snātvā mahākuṇḍe yaḥ saṁtarpayate pitṝn

हे महादेवि, दुन्दुभि के समान ध्वनि होने के कारण उन्हें क्षेत्रपाल कहा जाता है। जो वहाँ महाकुण्ड में स्नान करके पितरों को तर्पण देता है,

श्लोक 25 (skanda.7.236.25)

दश वर्षाणि पञ्चैव तृप्तिं यांति पितामहः। पिंडदानेन दत्तेन पितॄणां तुष्टिमावहेत्

daśa varṣāṇi pañcaiva tṛptiṁ yāṁti pitāmahaḥ| piṁḍadānena dattena pitṝṇāṁ tuṣṭimāvahet

—उसके पितर पन्द्रह वर्षों तक तृप्त रहते हैं। पिण्डदान करने से पितरों को सन्तोष प्राप्त होता है,

श्लोक 26 (skanda.7.236.26)

नरके तु स्थितानां च मुक्तिर्भूयान्न संशयः। माघे मासि सिते पक्षे सप्तम्यां संयतात्मवान्

narake tu sthitānāṁ ca muktirbhūyānna saṁśayaḥ| māghe māsi site pakṣe saptamyāṁ saṁyatātmavān

—और नरक में पड़े हुए पितरों को भी निःसंदेह मुक्ति प्राप्त होती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को संयमी होकर,

श्लोक 27 (skanda.7.236.27)

दुर्वासार्कं च संपूज्य मुच्यते ब्रह्महत्यया। स्नात्वा तु यमुना कुण्डे माधवे मासि मानवः

durvāsārkaṁ ca saṁpūjya mucyate brahmahatyayā| snātvā tu yamunā kuṇḍe mādhave māsi mānavaḥ

—दुर्वासार्क की भलीभाँति पूजा करके ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है। और जो मनुष्य माधव (वैशाख) मास में यमुना कुण्ड में स्नान करके,

श्लोक 28 (skanda.7.236.28)

पूजयेद्भक्तिभावेन रविं गगनभूषणम्। पठेत्सहस्रं नाम्ना तु दुर्वासादित्यसंनिधौ

pūjayedbhaktibhāvena raviṁ gaganabhūṣaṇam| paṭhetsahasraṁ nāmnā tu durvāsādityasaṁnidhau

—भक्तिभाव से आकाश के आभूषण सूर्य की पूजा करता है तथा दुर्वासादित्य के समीप सहस्रनाम का पाठ करता है,

श्लोक 29 (skanda.7.236.29)

षण्मासान्मुच्यते जंतुर्यद्यपि ब्रह्महा नरः। सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्

ṣaṇmāsānmucyate jaṁturyadyapi brahmahā naraḥ| sarvamaṁgalamāṁgalyaṁ sarvapāpapraṇāśanam

—वह प्राणी छह महीनों में मुक्त हो जाता है, चाहे वह ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो। यह समस्त मंगलों में परम मंगल तथा समस्त पापों का नाश करने वाला है—

श्लोक 30 (skanda.7.236.30)

दुर्वासादित्यनामानं सूर्यं को नु न पूजयेत्। न तदस्ति भयं किंचिद्यदनेन न शाम्यति

durvāsādityanāmānaṁ sūryaṁ ko nu na pūjayet| na tadasti bhayaṁ kiṁcidyadanena na śāmyati

—दुर्वासादित्य नामधारी सूर्य की पूजा कौन नहीं करेगा? ऐसा कोई भय नहीं है जो इससे शान्त न हो जाए।

श्लोक 31 (skanda.7.236.31)

दर्शनेनापि सूर्यस्य तत्र दुर्वाससः प्रिये। संपद्यंते तथा कामाः सर्व एव यथेप्सिताः

darśanenāpi sūryasya tatra durvāsasaḥ priye| saṁpadyaṁte tathā kāmāḥ sarva eva yathepsitāḥ

हे प्रिये, वहाँ दुर्वासा-सम्बद्ध सूर्य के दर्शन मात्र से भी सभी कामनाएँ यथेच्छ रूप से पूर्ण हो जाती हैं।

श्लोक 32 (skanda.7.236.32)

बंध्यानां पुत्रफलदं भीतानां भयनाशनम्। भूतिप्रदं दरिद्राणां कुष्ठिनां परमौषधम्

baṁdhyānāṁ putraphaladaṁ bhītānāṁ bhayanāśanam| bhūtipradaṁ daridrāṇāṁ kuṣṭhināṁ paramauṣadham

यह बाँझ स्त्रियों को पुत्रफल देने वाला, भयभीतों के भय का नाश करने वाला, दरिद्रों को समृद्धि देने वाला तथा कुष्ठरोगियों के लिए परम औषध है।

श्लोक 33 (skanda.7.236.33)

बालानां चैव सर्वेषां ग्रहरक्षोनिवारणम्। महापापोपशमनं दुर्वासादित्यदर्शनम्

bālānāṁ caiva sarveṣāṁ graharakṣonivāraṇam| mahāpāpopaśamanaṁ durvāsādityadarśanam

यह समस्त बालकों के लिए ग्रह-बाधा और राक्षस-बाधा का निवारण करने वाला है; दुर्वासादित्य का दर्शन महापापों को शान्त करने वाला है।

श्लोक 34 (skanda.7.236.34)

हेमाश्वस्तत्र दातव्यः सूर्यमुद्दिश्य भामिनि। ब्राह्मणे वेदसंयुक्ते तेन दत्ता मही भवेत्

hemāśvastatra dātavyaḥ sūryamuddiśya bhāmini| brāhmaṇe vedasaṁyukte tena dattā mahī bhavet

हे भामिनि, वहाँ सूर्य को उद्दिष्ट करके वेदयुक्त ब्राह्मण को स्वर्णमय अश्व का दान देना चाहिए; उससे मानो सम्पूर्ण पृथ्वी का दान हो जाता है।

श्लोक 35 (skanda.7.236.35)

यस्तत्र पूजयेद्देवं क्षेत्रपालं च दुन्दुभिम्। स पुत्रपशुमान्धीमाञ्छ्रीमान्भवति मानवः

yastatra pūjayeddevaṁ kṣetrapālaṁ ca dundubhim| sa putrapaśumāndhīmāñchrīmānbhavati mānavaḥ

जो वहाँ उस देव की तथा क्षेत्रपाल दुन्दुभि की पूजा करता है, वह मनुष्य पुत्र-पशुओं से युक्त, बुद्धिमान् तथा श्रीमान् होता है।

श्लोक 36 (skanda.7.236.36)

न भयं जायते तस्य त्रिविधं वरवर्णिनि। अर्धगव्यूतिमात्रं तु तत्र क्षेत्रं रवेः स्मृतम्

na bhayaṁ jāyate tasya trividhaṁ varavarṇini| ardhagavyūtimātraṁ tu tatra kṣetraṁ raveḥ smṛtam

हे वरवर्णिनि, उसे त्रिविध भय उत्पन्न नहीं होता। वहाँ सूर्य का वह क्षेत्र आधे गव्यूति परिमाण का बताया गया है।

श्लोक 37 (skanda.7.236.37)

न तत्र प्रविशेज्जन्तुः सूर्यभक्तिविवर्जितः। इत्येतत्कथितं देवि माहात्म्यं सूर्यदैवतम्

na tatra praviśejjantuḥ sūryabhaktivivarjitaḥ| ityetatkathitaṁ devi māhātmyaṁ sūryadaivatam

सूर्यभक्ति से रहित कोई भी प्राणी वहाँ प्रवेश न करे। हे देवि, इस प्रकार सूर्यदेवता-सम्बन्धी यह माहात्म्य कहा गया।

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