प्रभास खण्ड · अध्याय 237
यादवस्थलोत्पत्तौ वज्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.237.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि यादवस्थलमुत्तमम्। यादवा यत्र नष्टा वै षट्पंचाशच्च कोटयः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi yādavasthalamuttamam| yādavā yatra naṣṭā vai ṣaṭpaṁcāśacca koṭayaḥ
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् उस उत्तम यादवस्थल के पास जाना चाहिए, जहाँ छप्पन करोड़ यादव नष्ट हुए थे।
श्लोक 2 (skanda.7.237.2)
यत्र वज्रेश्वरो देवो वज्रेणाराधितः सदा। यत्राभूद्दिव्यदृष्टीनामृषीणामाश्रमं कुलम्
yatra vajreśvaro devo vajreṇārādhitaḥ sadā| yatrābhūddivyadṛṣṭīnāmṛṣīṇāmāśramaṁ kulam
—जहाँ वज्र द्वारा सदा आराधित वज्रेश्वर देव विराजमान हैं; तथा जहाँ दिव्यदृष्टि वाले ऋषियों का आश्रम-कुल था।
श्लोक 3 (skanda.7.237.3)
देव्युवाच। कथं विनष्टा भगवन्नन्धका वृष्णिभिः सह। पश्यतो वासुदेवस्य भोजाश्चैव महारथाः
devyuvāca| kathaṁ vinaṣṭā bhagavannandhakā vṛṣṇibhiḥ saha| paśyato vāsudevasya bhojāścaiva mahārathāḥ
देवी ने कहा—'हे भगवन्, वासुदेव के देखते-देखते अन्धक वृष्णियों के साथ तथा महारथी भोजगण किस प्रकार नष्ट हो गए?'
श्लोक 4 (skanda.7.237.4)
केन शप्तास्तु ते वीरा नष्टा वृष्ण्यन्धकादयः। भोजाश्चैव महादेव विस्तरेण वदस्व मे
kena śaptāstu te vīrā naṣṭā vṛṣṇyandhakādayaḥ| bhojāścaiva mahādeva vistareṇa vadasva me
'हे महादेव, वे वृष्णि-अन्धक आदि वीर तथा भोजगण किसके शाप से नष्ट हुए? मुझे विस्तारपूर्वक बताइए।'
श्लोक 5 (skanda.7.237.5)
ईश्वर उवाच। षट्त्रिंशे च कलौ वर्षे संप्राप्तेऽन्धकवृष्णयः। अन्योन्यं मुशलैस्ते हि निजघ्नुः कालनोदिताः
īśvara uvāca| ṣaṭtriṁśe ca kalau varṣe saṁprāpte'ndhakavṛṣṇayaḥ| anyonyaṁ muśalaiste hi nijaghnuḥ kālanoditāḥ
ईश्वर ने कहा—जब छत्तीसवाँ वर्ष आ पहुँचा, तब काल से प्रेरित होकर अन्धक-वृष्णियों ने परस्पर मूसलों से एक-दूसरे का वध किया।
श्लोक 6 (skanda.7.237.6)
विश्वामित्रं च कण्वं च नारदं च यशस्विनम्। सारणप्रमुखान्भोजान्ददृशुर्द्वारकां गतान्
viśvāmitraṁ ca kaṇvaṁ ca nāradaṁ ca yaśasvinam| sāraṇapramukhānbhojāndadṛśurdvārakāṁ gatān
विश्वामित्र, कण्व तथा यशस्वी नारद द्वारका गए; उन्हें सारण आदि भोजों ने देखा।
श्लोक 7 (skanda.7.237.7)
ते वै सांबं समानिन्युर्भूषयित्वा स्त्रियं यथा। अब्रुवन्नुपसंगम्य देवदंडनिपीडिताः
te vai sāṁbaṁ samāninyurbhūṣayitvā striyaṁ yathā| abruvannupasaṁgamya devadaṁḍanipīḍitāḥ
उन्होंने साम्ब को स्त्री के समान सजाकर सामने लाया; और देवदण्ड से पीड़ित होकर उनके पास जाकर कहा—
श्लोक 8 (skanda.7.237.8)
इयं स्त्री पुत्रकामस्य बभ्रोरमिततेजसः। ऋषयः साधु जानीत किमियं जनयिष्यति
iyaṁ strī putrakāmasya babhroramitatejasaḥ| ṛṣayaḥ sādhu jānīta kimiyaṁ janayiṣyati
'यह स्त्री अमित तेजस्वी बभ्रु की है, जो पुत्र चाहता है। हे ऋषियो, सम्यक् रूप से बताइए—यह क्या उत्पन्न करेगी?'
श्लोक 9 (skanda.7.237.9)
इत्युक्तास्ते तदा देवि विप्रलंभप्रधर्षिताः। प्रत्यब्रुवंस्तान्मुनयस्तच्छृणुष्व यथातथम्
ityuktāste tadā devi vipralaṁbhapradharṣitāḥ| pratyabruvaṁstānmunayastacchṛṇuṣva yathātatham
हे देवि, इस प्रकार कहे जाने पर वे मुनि उस छल से क्रोधित होकर उन्हें उत्तर देने लगे; उसे यथावत् सुनो।
श्लोक 10 (skanda.7.237.10)
ऋषय ऊचुः। वृष्ण्यन्धकविनाशाय मुशलं घोरमायसम्। वासुदेवस्य दायादः सांबोऽयं जनयिष्यति
ṛṣaya ūcuḥ| vṛṣṇyandhakavināśāya muśalaṁ ghoramāyasam| vāsudevasya dāyādaḥ sāṁbo'yaṁ janayiṣyati
ऋषियों ने कहा—'वासुदेव का यह पुत्र साम्ब वृष्णि-अन्धकों के विनाश के लिए एक भयंकर लौह मूसल उत्पन्न करेगा।'
श्लोक 11 (skanda.7.237.11)
येन यूयं सुदुर्वृत्ता नृशंसा जातमन्यवः। उच्छेत्तारः कुलं सर्वमृते रामाज्जनार्द्दनात्
yena yūyaṁ sudurvṛttā nṛśaṁsā jātamanyavaḥ| ucchettāraḥ kulaṁ sarvamṛte rāmājjanārddanāt
'जिससे तुम सब, जो दुराचारी और निर्दय होकर क्रोध से भर गए हो, राम और जनार्दन को छोड़कर अपने सम्पूर्ण कुल का नाश करने वाले बनोगे।'
श्लोक 12 (skanda.7.237.12)
त्यक्त्वा यास्यति वः श्रीमांत्यक्त्वा भूमिं हलायुधः। जरा कृष्णं महाभागं शयानं तु निवेत्स्यति
tyaktvā yāsyati vaḥ śrīmāṁtyaktvā bhūmiṁ halāyudhaḥ| jarā kṛṣṇaṁ mahābhāgaṁ śayānaṁ tu nivetsyati
'वह श्रीमान् (कृष्ण) तुम्हें त्यागकर चला जाएगा, हलायुध (बलराम) पृथ्वी को त्याग देंगे; तथा शयन करते हुए महाभाग कृष्ण को जरा नामक व्याध बींध देगा।'
श्लोक 13 (skanda.7.237.13)
इत्यब्रुवंस्ततो देवि प्रलब्धास्ते दुरात्मभिः। मुनयः क्रोधरक्ताक्षाः समीक्ष्याथ परस्परम्
ityabruvaṁstato devi pralabdhāste durātmabhiḥ| munayaḥ krodharaktākṣāḥ samīkṣyātha parasparam
हे देवि, इस प्रकार कहकर, उन दुरात्माओं के द्वारा छले गए वे क्रोध से लाल आँखों वाले मुनि परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए,
श्लोक 14 (skanda.7.237.14)
तथोक्ता मुनयस्ते तु ततः केशवमभ्ययुः। अथावदत्तदा वृष्णीञ्छ्रुत्वैवं मधुसूदनः
tathoktā munayaste tu tataḥ keśavamabhyayuḥ| athāvadattadā vṛṣṇīñchrutvaivaṁ madhusūdanaḥ
—और यह कहकर वे मुनि तब केशव के पास गए। तब यह सुनकर मधुसूदन ने वृष्णियों से कहा—
श्लोक 15 (skanda.7.237.15)
अभिज्ञो मतिमांस्तस्य भवितव्यं तथेति तत्। एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रविवेश पुनर्गृहान्
abhijño matimāṁstasya bhavitavyaṁ tatheti tat| evamuktvā hṛṣīkeśaḥ praviveśa punargṛhān
—ज्ञानी और बुद्धिमान् होने के कारण उन्होंने कहा, 'जो होनहार है वह वैसा ही होगा।' ऐसा कहकर हृषीकेश पुनः अपने घर में चले गए।
श्लोक 16 (skanda.7.237.16)
कृतांतमन्यथाकर्त्तुं नैच्छत्स जगतः प्रभुः। श्वोभूते सततः सांबो मुसलं तदसूत वै
kṛtāṁtamanyathākarttuṁ naicchatsa jagataḥ prabhuḥ| śvobhūte satataḥ sāṁbo musalaṁ tadasūta vai
जगत् के उस प्रभु ने भाग्य को अन्यथा करना नहीं चाहा। अगला दिन होने पर साम्ब ने वह मूसल उत्पन्न किया,
श्लोक 17 (skanda.7.237.17)
येन वृण्ष्यन्धककुले पुरुषा भस्मसात्कृताः। वृष्ण्यन्धकविनाशाय किंकरप्रतिमं महत्
yena vṛṇṣyandhakakule puruṣā bhasmasātkṛtāḥ| vṛṣṇyandhakavināśāya kiṁkarapratimaṁ mahat
—जिससे वृष्णि-अन्धक कुल के पुरुष भस्म हो गए; यह वृष्णि-अन्धकों के विनाश के लिए यमदूत के समान महान् मूसल था।
श्लोक 18 (skanda.7.237.18)
असूत शापजं घोरं तच्च राज्ञे न्यवेदयत्। विषण्णोऽथ ततो राजा सूक्ष्मं चूर्णमकारयत्
asūta śāpajaṁ ghoraṁ tacca rājñe nyavedayat| viṣaṇṇo'tha tato rājā sūkṣmaṁ cūrṇamakārayat
उसने शाप से उत्पन्न उस भयंकर वस्तु को जन्म दिया, और यह बात राजा को बताई गई। तब खिन्न होकर राजा ने उसका सूक्ष्म चूर्ण बनवाया।
श्लोक 19 (skanda.7.237.19)
प्राक्षिपत्सागरे तत्र पुरुषो राजशासितः। अथोवाच स्वनगरे वचनादाहुकस्य हि
prākṣipatsāgare tatra puruṣo rājaśāsitaḥ| athovāca svanagare vacanādāhukasya hi
राजा की आज्ञा से एक पुरुष ने उसे वहाँ समुद्र में फेंक दिया। तब आहुक के वचन से अपनी नगरी में यह घोषणा की गई—
श्लोक 20 (skanda.7.237.20)
जनार्द्दनस्य रामस्य बभ्रोश्चैव महात्मनः। अद्यप्रभृति सर्वेषां वृष्णन्धकगृहेष्विह
janārddanasya rāmasya babhroścaiva mahātmanaḥ| adyaprabhṛti sarveṣāṁ vṛṣṇandhakagṛheṣviha
'—जनार्दन, राम तथा महात्मा बभ्रु के तथा यहाँ सभी वृष्णि-अन्धकों के घरों में आज से,'
श्लोक 21 (skanda.7.237.21)
सुरासवो न कर्त्तव्यः सर्वैर्विषयवासिभिः। यश्च वो विदितं कुर्यादेवं कश्चित्क्वचिन्नरः
surāsavo na karttavyaḥ sarvairviṣayavāsibhiḥ| yaśca vo viditaṁ kuryādevaṁ kaścitkvacinnaraḥ
'—इस राज्य में रहने वाला कोई भी व्यक्ति मदिरा और सुरा नहीं बनाएगा। और यदि तुम में से कोई भी मनुष्य कहीं भी इसका उल्लंघन करे,'
श्लोक 22 (skanda.7.237.22)
स जीवञ्छूलमारोहेत्स्वयं कृत्वा सबांधवः। ततो राजभयात्सर्वे नियमं तत्र चक्रिरे
sa jīvañchūlamārohetsvayaṁ kṛtvā sabāṁdhavaḥ| tato rājabhayātsarve niyamaṁ tatra cakrire
'—तो वह अपने बन्धु-बान्धवों सहित जीवित ही शूल पर चढ़ाया जाएगा।' तब राजा के भय से सबने वहाँ उस नियम का पालन किया,
श्लोक 23 (skanda.7.237.23)
नराः शासनमाज्ञाय रामस्याक्लिष्टकर्मणः। एवं प्रयतमानानां वृष्णीनामन्धकैः सह
narāḥ śāsanamājñāya rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ| evaṁ prayatamānānāṁ vṛṣṇīnāmandhakaiḥ saha
—अक्लिष्टकर्मा राम की आज्ञा का पालन करते हुए लोगों ने ऐसा किया। इस प्रकार अन्धकों के साथ वृष्णियों के इस प्रकार यत्नशील रहने पर भी,
श्लोक 24 (skanda.7.237.24)
कालो गृहाणि सर्वाणि परिचक्राम नित्यशः। करालो विकटो मुंडः पुरुषः कृष्णपिंगलः
kālo gṛhāṇi sarvāṇi paricakrāma nityaśaḥ| karālo vikaṭo muṁḍaḥ puruṣaḥ kṛṣṇapiṁgalaḥ
काल प्रतिदिन उनके समस्त घरों के चारों ओर घूमने लगा—एक भयंकर, विकराल, मुण्डित सिर वाला, काले-भूरे रंग का पुरुष,
श्लोक 25 (skanda.7.237.25)
सम्मार्जनी महाकेतुर्जपापुष्पावतंसकः। कृकलासवाहनश्च रत्तिकाकर्णभूषणः
sammārjanī mahāketurjapāpuṣpāvataṁsakaḥ| kṛkalāsavāhanaśca rattikākarṇabhūṣaṇaḥ
—झाड़ू के समान महाध्वज वाला, जपाकुसुम को कर्णभूषण के रूप में धारण किए हुए, गिरगिट पर सवार, तथा गुंजाफल के कर्णाभूषण से सुसज्जित।
श्लोक 26 (skanda.7.237.26)
गृहाण्यवेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत पुनः क्वचित्। तस्य चासन्महेष्वासाः शरैः शतसहस्रशः
gṛhāṇyavekṣya vṛṣṇīnāṁ nādṛśyata punaḥ kvacit| tasya cāsanmaheṣvāsāḥ śaraiḥ śatasahasraśaḥ
वृष्णियों के घरों का अवलोकन करके वह फिर कहीं दिखाई नहीं दिया। महाधनुर्धरों ने उस पर लाखों बाण चलाए,
श्लोक 27 (skanda.7.237.27)
न चाशक्यत वेद्धुं स सर्वभूताप्ययं सदा। उत्पेदिरे महावाता दारुणा हि दिने दिने
na cāśakyata veddhuṁ sa sarvabhūtāpyayaṁ sadā| utpedire mahāvātā dāruṇā hi dine dine
किन्तु वह, जो सदा समस्त प्राणियों का संहारक है, बींधा नहीं जा सका। प्रतिदिन भयंकर महान् आँधियाँ उठने लगीं।
श्लोक 28 (skanda.7.237.28)
वृष्ण्यन्धकविनाशाय बहवो लोमहर्षणाः। विवृद्ध्य मूषिका रथ्यावितुन्नमणिकास्तथा
vṛṣṇyandhakavināśāya bahavo lomaharṣaṇāḥ| vivṛddhya mūṣikā rathyāvitunnamaṇikāstathā
वृष्णि-अन्धकों के विनाश के लिए अनेक रोमांचकारी अपशकुन हुए; चूहे बहुत बढ़ गए तथा उन्होंने गलियों की मणिकाओं (जलपात्रों) को कुतर डाला।
श्लोक 29 (skanda.7.237.29)
केशान्ददंशुः सुप्तानां नृणां युवतयो निशि। चीचीकूचीत्यवाशंत सारिका वृष्णिवेश्मसु
keśāndadaṁśuḥ suptānāṁ nṛṇāṁ yuvatayo niśi| cīcīkūcītyavāśaṁta sārikā vṛṣṇiveśmasu
रात्रि में सोए हुए पुरुषों के केश युवती चूहियाँ कुतर देती थीं; वृष्णियों के घरों में सारिका पक्षी 'चीची-कूची' की चीत्कार करती थीं।
श्लोक 30 (skanda.7.237.30)
नोपशाम्यति शब्दश्च स दिवारात्रमेव वा। अन्वकुर्वन्नुलूकाश्च वायसान्वृष्णिवेश्मसु
nopaśāmyati śabdaśca sa divārātrameva vā| anvakurvannulūkāśca vāyasānvṛṣṇiveśmasu
वह ध्वनि दिन-रात कभी शान्त नहीं होती थी; और वृष्णियों के घरों में उल्लू कौवों की बोली की नकल करने लगे।
श्लोक 31 (skanda.7.237.31)
अजाः शिवानां च रुतमन्वकुर्वत भामिनि। पांडुरारक्तपादाश्च विहगाः कालप्रेरिताः
ajāḥ śivānāṁ ca rutamanvakurvata bhāmini| pāṁḍurāraktapādāśca vihagāḥ kālapreritāḥ
हे भामिनि, बकरियाँ सियारों की बोली की नकल करने लगीं; तथा काल से प्रेरित पाण्डुर और लाल पैरों वाले पक्षी,
श्लोक 32 (skanda.7.237.32)
वृष्ण्यन्धकगृहेष्वेवं कपोता व्यचरंस्तदा। व्यजायंत खरा गोषु करभाश्चाश्वतरीषु च
vṛṣṇyandhakagṛheṣvevaṁ kapotā vyacaraṁstadā| vyajāyaṁta kharā goṣu karabhāścāśvatarīṣu ca
—इस प्रकार वृष्णि-अन्धकों के घरों में कबूतर भटकने लगे। गौओं से गधे उत्पन्न होने लगे और खच्चरियों से ऊँट के बच्चे,
श्लोक 33 (skanda.7.237.33)
शुनीष्वपि बिडालाश्च मूषका नकुलीषु च। तापत्रयांत पापानि कुर्वंतो वृष्णयस्तथा
śunīṣvapi biḍālāśca mūṣakā nakulīṣu ca| tāpatrayāṁta pāpāni kurvaṁto vṛṣṇayastathā
—तथा कुतिया से बिल्लियाँ और नेवली से चूहे उत्पन्न होने लगे। फिर भी त्रिविध ताप से युक्त होकर वृष्णिजन पाप करते हुए,
श्लोक 34 (skanda.7.237.34)
अद्विषन्ब्राह्मणांश्चापि पितॄन्देवांस्तथैव च। गुरूंश्चाप्यवमन्यंते न तु रामजनार्दनौ
adviṣanbrāhmaṇāṁścāpi pitṝndevāṁstathaiva ca| gurūṁścāpyavamanyaṁte na tu rāmajanārdanau
—ब्राह्मणों से, तथा पितरों और देवताओं से भी द्वेष करने लगे; और गुरुजनों का भी अपमान करने लगे—किन्तु राम और जनार्दन ऐसे नहीं थे।
श्लोक 35 (skanda.7.237.35)
भार्याः पतीन्व्युच्चरंति पत्नीश्च पुरुषास्तथा। विभावसुः प्रज्वलितो वामं विपरिवर्त्तते
bhāryāḥ patīnvyuccaraṁti patnīśca puruṣāstathā| vibhāvasuḥ prajvalito vāmaṁ viparivarttate
पत्नियाँ पतियों के विरुद्ध आचरण करने लगीं, और पुरुष भी पत्नियों के विरुद्ध; प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला बाईं ओर घूमने लगी।
श्लोक 36 (skanda.7.237.36)
नीललोहितमांजिष्ठा विसृजंश्चार्चिषः पृथक्। उदयास्तमने नित्यं पर्यस्तः स्याद्दिवाकरः
nīlalohitamāṁjiṣṭhā visṛjaṁścārciṣaḥ pṛthak| udayāstamane nityaṁ paryastaḥ syāddivākaraḥ
—नील, लाल और मंजिष्ठा वर्ण की पृथक्-पृथक् ज्वालाएँ निकालती हुई। सूर्य नित्य उदय और अस्त होते समय मानो घिरा हुआ प्रतीत होता था।
श्लोक 37 (skanda.7.237.37)
व्यदृश्यत सकृत्पुंभिः कबन्धैः परिवारितः। महानसेषु सिद्धांते संस्कृतेऽन्ने तु भामिनि
vyadṛśyata sakṛtpuṁbhiḥ kabandhaiḥ parivāritaḥ| mahānaseṣu siddhāṁte saṁskṛte'nne tu bhāmini
एक बार वह (सूर्य) कबन्धों (धड़ों) से घिरा हुआ दिखाई दिया। और हे भामिनि, रसोईघरों में जब अन्न पक चुका और तैयार हो गया,
श्लोक 38 (skanda.7.237.38)
उत्तार्यमाणे कृमयो दृश्यंते च वरानने। पुण्याहे वाच्यमाने च पठत्सु च महात्मसु
uttāryamāṇe kṛmayo dṛśyaṁte ca varānane| puṇyāhe vācyamāne ca paṭhatsu ca mahātmasu
—तो उतारे जाने पर हे वरानने, उसमें कीड़े दिखाई देते थे। और 'पुण्याहं' का उच्चारण किए जाने पर तथा महात्माओं के वेदपाठ करते समय,
श्लोक 39 (skanda.7.237.39)
अभिधावंति श्रूयंते न चादृश्यत कश्चन। परस्परस्य नक्षत्रं हन्यमानं पुनःपुनः
abhidhāvaṁti śrūyaṁte na cādṛśyata kaścana| parasparasya nakṣatraṁ hanyamānaṁ punaḥpunaḥ
—किसी के दौड़ने की आवाज सुनाई देती थी, परन्तु कोई दिखाई नहीं देता था। बार-बार एक नक्षत्र दूसरे नक्षत्र पर आक्रमण करता हुआ प्रतीत होता था,
श्लोक 40 (skanda.7.237.40)
ग्रहैरपश्यन्सर्वैस्ते नात्मनस्तु कथञ्चन। न हुतं पाचयत्यग्निर्वृष्ण्यंधकपुरस्कृतम्
grahairapaśyansarvaiste nātmanastu kathañcana| na hutaṁ pācayatyagnirvṛṣṇyaṁdhakapuraskṛtam
—उन्होंने समस्त ग्रहों में अपशकुन देखे, किन्तु अपने लिए किसी प्रकार का भी संकेत नहीं समझा। वृष्णि-अन्धकों द्वारा किए गए हवन को अग्नि ठीक से पचा (ग्रहण) नहीं करती थी,
श्लोक 41 (skanda.7.237.41)
समंतात्प्रत्यवाशंत रासभा दारुणस्वनाः। एवं पश्यन्हृषीकेशः संप्राप्तान्कालपर्ययान्
samaṁtātpratyavāśaṁta rāsabhā dāruṇasvanāḥ| evaṁ paśyanhṛṣīkeśaḥ saṁprāptānkālaparyayān
—और चारों ओर गधे भयंकर स्वर में रेंकने लगे। इस प्रकार हृषीकेश उन पर आए हुए कालपरिवर्तनों को देखते हुए,
श्लोक 42 (skanda.7.237.42)
त्रयोदशीं ह्यमावास्यां तां दृष्ट्वा प्राब्रवीदिदम्। त्रयोदशी पंचदशी कृतेयं राहुणा पुनः
trayodaśīṁ hyamāvāsyāṁ tāṁ dṛṣṭvā prābravīdidam| trayodaśī paṁcadaśī kṛteyaṁ rāhuṇā punaḥ
—उस त्रयोदशी को अमावस्या के रूप में देखकर यह बोले—'राहु ने इस पूर्णिमा (पंचदशी) को पुनः त्रयोदशी बना दिया है।'
श्लोक 43 (skanda.7.237.43)
तदा च भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयाय नः। धिग्धिगित्येवकालं तं परिचिंत्य जनार्दनः
tadā ca bhārate yuddhe prāptā cādya kṣayāya naḥ| dhigdhigityevakālaṁ taṁ pariciṁtya janārdanaḥ
'यही योग भारत-युद्ध के समय भी हुआ था, और अब वह हमारे विनाश के लिए पुनः आया है। धिक्कार है, धिक्कार है!' इस प्रकार उस काल का चिन्तन करके जनार्दन ने,
श्लोक 44 (skanda.7.237.44)
मेने प्राप्तं स षट्त्रिंशं वर्षं केशिनिषूदनः। पुत्रशोकाभिसंतप्ता गांधारी यदुवाच ह
mene prāptaṁ sa ṣaṭtriṁśaṁ varṣaṁ keśiniṣūdanaḥ| putraśokābhisaṁtaptā gāṁdhārī yaduvāca ha
—केशिनिषूदन (कृष्ण) ने समझ लिया कि वह छत्तीसवाँ वर्ष आ पहुँचा है, जो पुत्रशोक से संतप्त गांधारी ने पूर्वकाल में कहा था—
श्लोक 45 (skanda.7.237.45)
एवं पश्यन्हृषीकेशस्तदिदं समुपस्थितम्। इदं च समनुप्राप्तमब्रवीद्यद्युधिष्ठिरः
evaṁ paśyanhṛṣīkeśastadidaṁ samupasthitam| idaṁ ca samanuprāptamabravīdyadyudhiṣṭhiraḥ
इस प्रकार हृषीकेश यह देखते हुए कि वह (शाप) अब उपस्थित हो गया है, उन्हें युधिष्ठिर का वह कथन स्मरण हो आया, जो अब सत्य हो गया था—
श्लोक 46 (skanda.7.237.46)
पुरा व्यूढेष्वनीकेषु दृष्ट्वोत्पातान्सुदारुणान्। पुण्यग्रन्थस्य श्रवणाच्छांतिहोमाद्विशोधनात्
purā vyūḍheṣvanīkeṣu dṛṣṭvotpātānsudāruṇān| puṇyagranthasya śravaṇācchāṁtihomādviśodhanāt
—पूर्वकाल में जब सेनाएँ व्यूहबद्ध थीं, तब अत्यन्त भयंकर अपशकुनों को देखकर उन्होंने कहा था—'पुण्य ग्रन्थों के श्रवण से, शान्तिहोम से, विशोधन से,'
श्लोक 47 (skanda.7.237.47)
पूततीर्थाभिषेकांच्च नान्यच्छ्रेयो भवेदिति। इत्युक्त्वा वासुदेवस्तच्चिकीर्षन्सत्यमेव च
pūtatīrthābhiṣekāṁcca nānyacchreyo bhavediti| ityuktvā vāsudevastaccikīrṣansatyameva ca
'—तथा पवित्र तीर्थों में स्नान करने से ही कल्याण होता है, अन्य कोई उपाय नहीं है।' यह कहकर वासुदेव ने सचमुच वैसा ही करने की इच्छा से,
श्लोक 48 (skanda.7.237.48)
आज्ञापयामास तदा तीर्थयात्रामरिंदमः। अघोषयंत पुरुषास्तत्र केशवशासनात्
ājñāpayāmāsa tadā tīrthayātrāmariṁdamaḥ| aghoṣayaṁta puruṣāstatra keśavaśāsanāt
—शत्रुदमन कृष्ण ने तब तीर्थयात्रा की आज्ञा दी। केशव के आदेश से वहाँ पुरुषों ने घोषणा की—
श्लोक 49 (skanda.7.237.49)
तीर्थयात्रा प्रभासे वै कार्येति वरवर्णिनि। अथारिष्टानि वक्ष्यामि पुरीं द्वारवतीं प्रति
tīrthayātrā prabhāse vai kāryeti varavarṇini| athāriṣṭāni vakṣyāmi purīṁ dvāravatīṁ prati
'—प्रभास में तीर्थयात्रा की जानी चाहिए।' हे वरवर्णिनि, अब मैं द्वारवती नगरी में हुए अपशकुनों का वर्णन करता हूँ—
श्लोक 50 (skanda.7.237.50)
काली स्त्री पांडुरैर्दंतैः प्रविश्य नगरीं निशि। स्त्रियः स्वप्नेषु मुष्णन्ती द्वारकां प्रति धावति
kālī strī pāṁḍurairdaṁtaiḥ praviśya nagarīṁ niśi| striyaḥ svapneṣu muṣṇantī dvārakāṁ prati dhāvati
एक काली स्त्री, सफेद दाँतों वाली, रात में नगरी में प्रवेश करके, स्त्रियों को स्वप्न में चुराती हुई द्वारका की ओर से बाहर भागती हुई दिखाई देती थी।
श्लोक 51 (skanda.7.237.51)
अग्निहोत्रनिकेतं च सुमेध्येषु च वेश्मसु। वृष्ण्यंधकांश्च खादंती स्वप्ने दृष्टा भयानका
agnihotraniketaṁ ca sumedhyeṣu ca veśmasu| vṛṣṇyaṁdhakāṁśca khādaṁtī svapne dṛṣṭā bhayānakā
वह भयानक स्त्री अग्निहोत्र के गृहों को, अत्यन्त पवित्र भवनों को तथा वृष्णि-अन्धकों को खाती हुई स्वप्न में देखी गई,
श्लोक 52 (skanda.7.237.52)
कुर्वंती भीषणं नादं कुर्कुटश्वानसंयुता। तथा सहस्रशो रौद्राश्चतुर्बाहव एव च
kurvaṁtī bhīṣaṇaṁ nādaṁ kurkuṭaśvānasaṁyutā| tathā sahasraśo raudrāścaturbāhava eva ca
—भयंकर शब्द करती हुई, मुर्गों और कुत्तों के साथ; और इसी प्रकार हजारों की संख्या में भयंकर चतुर्भुज,
श्लोक 53 (skanda.7.237.53)
स्त्रीणां गर्भेष्वजायंत राक्षसा गुह्यकास्तथा। अलंकाराश्च च्छत्राणि ध्वजाश्च कवचानि च
strīṇāṁ garbheṣvajāyaṁta rākṣasā guhyakāstathā| alaṁkārāśca cchatrāṇi dhvajāśca kavacāni ca
—राक्षस और गुह्यक स्त्रियों के गर्भ में उत्पन्न होने लगे। आभूषण, छत्र, ध्वज तथा कवच
श्लोक 54 (skanda.7.237.54)
ह्रियमाणानि दृश्यंते रक्षोभिस्तु भयानकैः। यच्चाग्निदत्तं कृष्णस्य वज्रनाभमयस्मयम्
hriyamāṇāni dṛśyaṁte rakṣobhistu bhayānakaiḥ| yaccāgnidattaṁ kṛṣṇasya vajranābhamayasmayam
—भयंकर राक्षसों द्वारा हरे जाते हुए दिखाई देते थे। तथा अग्नि द्वारा कृष्ण को दिया गया वज्रनाभ नामक लौह चक्र,
श्लोक 55 (skanda.7.237.55)
दिवमाचक्रमे चक्रं वृष्णीनां पश्यतां तदा। युक्तं रथं दिव्यमादित्यवर्णं भयावहं पश्यतो दारुकस्य
divamācakrame cakraṁ vṛṣṇīnāṁ paśyatāṁ tadā| yuktaṁ rathaṁ divyamādityavarṇaṁ bhayāvahaṁ paśyato dārukasya
—वृष्णियों के देखते-देखते वह चक्र आकाश में उड़ गया। तथा सारथी दारुक के देखते-देखते सूर्यवर्ण दिव्य रथ भी जुता हुआ भयावह प्रतीत होने लगा—
श्लोक 56 (skanda.7.237.56)
ते सागरस्योपरिष्टाद्वर्तमानान्मनोजवांश्चतुरो वाजिमुख्यान्। तालः सुपर्णश्च महाध्वजौ तौ सुपूजितौ रामजनार्दनाभ्याम्
te sāgarasyopariṣṭādvartamānānmanojavāṁścaturo vājimukhyān| tālaḥ suparṇaśca mahādhvajau tau supūjitau rāmajanārdanābhyām
—मनोवेगी वे चार श्रेष्ठ अश्व समुद्र के ऊपर विचरण करते हुए दिखाई दिए। तथा राम और जनार्दन द्वारा सुपूजित ताल और सुपर्ण नामक वे दोनों महाध्वज—
श्लोक 57 (skanda.7.237.57)
उच्चैर्जगुः स्वप्सरसो दिवानिशं वाचं चोचुर्गम्यतां तीर्थयात्राम्। ततो जिगमिषंतस्ते वृष्ण्यंधकमहारथाः
uccairjaguḥ svapsaraso divāniśaṁ vācaṁ cocurgamyatāṁ tīrthayātrām| tato jigamiṣaṁtaste vṛṣṇyaṁdhakamahārathāḥ
—अप्सराएँ दिन-रात ऊँचे स्वर में गाती रहीं तथा यह वचन बोलती रहीं—'तीर्थयात्रा पर जाया जाए।' तब वृष्णि-अन्धकों के वे महारथी जाने की इच्छा से,
श्लोक 58 (skanda.7.237.58)
सांतःपुरास्तीर्थयात्रामीहंते स्म नरर्षभाः। ततो मांसपरा हृष्टाः पेयं वेश्मसु वृष्णयः
sāṁtaḥpurāstīrthayātrāmīhaṁte sma nararṣabhāḥ| tato māṁsaparā hṛṣṭāḥ peyaṁ veśmasu vṛṣṇayaḥ
—अपने अन्तःपुर सहित उन नरश्रेष्ठों ने तीर्थयात्रा की तैयारी की। तब वृष्णिजन प्रसन्न होकर, मांस और पेय में रत होकर घरों में,
श्लोक 59 (skanda.7.237.59)
बहु नानाविधं चक्रुर्मांसानि विविधानि च। तथा सीधुषु बद्धेषु निर्ययुर्नगराद्बहिः
bahu nānāvidhaṁ cakrurmāṁsāni vividhāni ca| tathā sīdhuṣu baddheṣu niryayurnagarādbahiḥ
—अनेक प्रकार के बहुत से मांस बनवाए; तथा सुरा को भी तैयार करके वे नगर से बाहर निकल पड़े,
श्लोक 60 (skanda.7.237.60)
यानैरश्वैर्गजैश्चैव श्रीमंतस्तिग्मतेजसः। ततः प्रभासे न्यवसन्यथोद्देशं यथागृहम्
yānairaśvairgajaiścaiva śrīmaṁtastigmatejasaḥ| tataḥ prabhāse nyavasanyathoddeśaṁ yathāgṛham
—वाहनों, अश्वों और हाथियों पर सवार होकर वे तेजस्वी श्रीमान् (यादव) चल पड़े। तब वे प्रभास में अपने-अपने स्थान के अनुसार, मानो अपने घर के समान निवास करने लगे।
श्लोक 61 (skanda.7.237.61)
प्रभूतभक्ष्यपेयास्ते सदारा यादवास्तदा। निर्विष्टांस्तान्निशम्याथ समुद्रांते स योगवित्
prabhūtabhakṣyapeyāste sadārā yādavāstadā| nirviṣṭāṁstānniśamyātha samudrāṁte sa yogavit
तब पत्नियों सहित यादवगण प्रचुर भोज्य और पेय पदार्थों के साथ (वहाँ ठहरे)। और यह सुनकर कि वे समुद्र के तट पर बस गए हैं, योगवेत्ता उद्धव,
श्लोक 62 (skanda.7.237.62)
जगामामंत्र्य तान्वीरानुद्धवोर्थविशारदः। प्रस्थितं तं महात्मानमभिवाद्य कृतांजलिम्
jagāmāmaṁtrya tānvīrānuddhavorthaviśāradaḥ| prasthitaṁ taṁ mahātmānamabhivādya kṛtāṁjalim
—अर्थविशारद उद्धव उन वीरों से विदा लेकर चले गए। जाते हुए उस महात्मा को हाथ जोड़कर प्रणाम करके,
श्लोक 63 (skanda.7.237.63)
जानन्विनाशं भोजानां नैच्छद्वारयितुं हरिः। ततः कालपरीतास्ते वृष्ण्यंधकमहारथाः
jānanvināśaṁ bhojānāṁ naicchadvārayituṁ hariḥ| tataḥ kālaparītāste vṛṣṇyaṁdhakamahārathāḥ
—हरि ने भोजों के विनाश को जानते हुए भी उसे रोकना नहीं चाहा। तब काल से घिरे हुए वृष्णि-अन्धकों के वे महारथी,
श्लोक 64 (skanda.7.237.64)
अपश्यन्नुद्धवं यांतं तेजसाऽऽदीप्य रोदसी। ब्राह्मणार्थेषु यत्क्लृप्तमन्नं तेषां वरानने
apaśyannuddhavaṁ yāṁtaṁ tejasā''dīpya rodasī| brāhmaṇārtheṣu yatklṛptamannaṁ teṣāṁ varānane
—उद्धव को अपने तेज से आकाश और पृथ्वी को प्रकाशित करते हुए जाते देखा। हे वरानने, ब्राह्मणों के लिए जो अन्न निर्धारित किया गया था,
श्लोक 65 (skanda.7.237.65)
तद्वाहनेभ्यः प्रददुः सुरागंधरसान्वितम्। ततस्तूर्यशताकीर्णं नटनर्त्तकसंकुलम्
tadvāhanebhyaḥ pradaduḥ surāgaṁdharasānvitam| tatastūryaśatākīrṇaṁ naṭanarttakasaṁkulam
—उसे उन्होंने सुरा की गन्ध और रस से युक्त करके अपने वाहनों (पशुओं) को खिला दिया। तब सैकड़ों वाद्यों से गुंजायमान, नट-नर्तकों से भरा हुआ,
श्लोक 66 (skanda.7.237.66)
प्रावर्त्तत महापानं प्रभासे तिग्मतेजसाम्। कृष्णस्य संनिधौ रामः सहितः कृतवर्मणा
prāvarttata mahāpānaṁ prabhāse tigmatejasām| kṛṣṇasya saṁnidhau rāmaḥ sahitaḥ kṛtavarmaṇā
—प्रभास में उन तेजस्वी यादवों का महापान आरम्भ हो गया। कृष्ण की उपस्थिति में राम, कृतवर्मा के साथ,
श्लोक 67 (skanda.7.237.67)
अपिबद्युयुधानश्च गदो बभ्रुस्तथैव च। ततः परिषदो मध्ये युयुधानो मदोत्कटः
apibadyuyudhānaśca gado babhrustathaiva ca| tataḥ pariṣado madhye yuyudhāno madotkaṭaḥ
—मद्यपान करने लगे; तथा युयुधान, गद और बभ्रु भी। तब सभा के बीच मद से उन्मत्त हुए युयुधान ने,
श्लोक 68 (skanda.7.237.68)
अब्रवीत्कृतवर्माणमवहस्यावमन्य च। कः क्षत्रियो मन्यमानः सुप्तान्हन्यान्मृतानिव
abravītkṛtavarmāṇamavahasyāvamanya ca| kaḥ kṣatriyo manyamānaḥ suptānhanyānmṛtāniva
—कृतवर्मा से हँसते हुए और उनका अपमान करते हुए कहा—'कौन-सा क्षत्रिय, अपने को सच्चा क्षत्रिय मानते हुए, सोए हुए लोगों को मृतकों के समान मार डालेगा?'
श्लोक 69 (skanda.7.237.69)
न तन्मृष्यत हार्दिक्यस्त्वया तत्साधु यत्कृतम्। इत्युक्ते युयुधानेन पूजयामास तद्वचः
na tanmṛṣyata hārdikyastvayā tatsādhu yatkṛtam| ityukte yuyudhānena pūjayāmāsa tadvacaḥ
'हे हार्दिक्य (कृतवर्मा), मैं उसे क्षमा नहीं करूँगा; तुमने जो किया वह उचित नहीं था।' युयुधान के ऐसा कहने पर सभा ने उसके इस वचन का समर्थन किया।
श्लोक 70 (skanda.7.237.70)
प्रद्युम्नो रथिनां श्रेष्ठो हार्दिक्यमथ भर्त्सयन्। ततः पुनरपि क्रुद्धः कृतवर्मा तमब्रवीत्
pradyumno rathināṁ śreṣṭho hārdikyamatha bhartsayan| tataḥ punarapi kruddhaḥ kṛtavarmā tamabravīt
—प्रद्युम्न, रथियों में श्रेष्ठ, हार्दिक्य की भर्त्सना करने लगे। तब पुनः क्रोधित हुए कृतवर्मा ने उनसे कहा—
श्लोक 71 (skanda.7.237.71)
निर्विशन्निव सावज्ञं तदा सव्येन पाणिना। भूरिश्रवाश्छिन्नबाहुर्युद्धे प्रायोगतस्त्वया
nirviśanniva sāvajñaṁ tadā savyena pāṇinā| bhūriśravāśchinnabāhuryuddhe prāyogatastvayā
'—मानो अवज्ञापूर्वक बाएँ हाथ से; युद्ध में प्रायोपवेशन में बैठे हुए, बाँह कटे हुए भूरिश्रवा को तुमने—'
श्लोक 72 (skanda.7.237.72)
व्याधेनेव नृशंसेन कथं वैरेण घातितः। इति तस्य वचः श्रुत्वा केशवः परवीरहा
vyādheneva nṛśaṁsena kathaṁ vaireṇa ghātitaḥ| iti tasya vacaḥ śrutvā keśavaḥ paravīrahā
'—एक क्रूर व्याध के समान, वैरवश, कैसे मार डाला?' उसकी यह बात सुनकर, शत्रुवीरों का नाशक केशव,
श्लोक 73 (skanda.7.237.73)
तिर्यक्सरोषया दृष्ट्या वीक्षांचक्रे समः पुमान्। मणिं स्यमंतकं चैव यः स सत्राजितोऽभवत्
tiryaksaroṣayā dṛṣṭyā vīkṣāṁcakre samaḥ pumān| maṇiṁ syamaṁtakaṁ caiva yaḥ sa satrājito'bhavat
—उस निष्पक्ष पुरुष ने तिरछी और क्रोधयुक्त दृष्टि से देखा। और स्यमन्तक मणि, जो सत्राजित की थी,
श्लोक 74 (skanda.7.237.74)
स कथं स्मारयामास सात्यकिर्मधुसूदनम्। तच्छ्रुत्वा केशवस्यांकमगमद्रुदती सती
sa kathaṁ smārayāmāsa sātyakirmadhusūdanam| tacchrutvā keśavasyāṁkamagamadrudatī satī
—सात्यकि ने इस विषय में मधुसूदन को किस प्रकार स्मरण कराया, यह भी स्मरण हो आया। यह सुनकर वह सती (सत्यभामा) रोती हुई केशव की गोद में जा बैठी,
श्लोक 75 (skanda.7.237.75)
सत्यभामा प्रक्षुभिता कोपयन्ती जनार्द्दनम्। तत उत्थाय स क्रोधात्सात्यकिर्वाक्यमब्रवीत्
satyabhāmā prakṣubhitā kopayantī janārddanam| tata utthāya sa krodhātsātyakirvākyamabravīt
—सत्यभामा अत्यन्त क्षुब्ध होकर जनार्दन को कुपित करने लगी। तब सात्यकि क्रोधपूर्वक उठकर यह वचन बोले—
श्लोक 76 (skanda.7.237.76)
पंचानां द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नशिखंडिनः। एष गच्छामि पदवीं सत्ये तव पथे सदा
paṁcānāṁ draupadeyānāṁ dhṛṣṭadyumnaśikhaṁḍinaḥ| eṣa gacchāmi padavīṁ satye tava pathe sadā
'द्रौपदी के पाँचों पुत्रों के लिए, धृष्टद्युम्न और शिखण्डी के लिए—मैं अब यह मार्ग अपनाता हूँ; हे सत्यवादी, मैं सदा तुम्हारे ही मार्ग पर चलता हूँ।'
श्लोक 77 (skanda.7.237.77)
सौप्तिके निहता ये च सुप्तास्तेन दुरात्मना। द्रोणपुत्रसहायेन पापेन कृतवर्मणा
sauptike nihatā ye ca suptāstena durātmanā| droṇaputrasahāyena pāpena kṛtavarmaṇā
'—सौप्तिक पर्व में जो सोए हुए लोग उस दुरात्मा, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) के सहायक, पापी कृतवर्मा द्वारा मारे गए थे—'
श्लोक 78 (skanda.7.237.78)
समाप्तं चायुरस्याद्य यशश्चापि सुमध्यमे। इतीदमुक्त्वा खङ्गेन केशवस्य समीपतः
samāptaṁ cāyurasyādya yaśaścāpi sumadhyame| itīdamuktvā khaṅgena keśavasya samīpataḥ
'—हे सुमध्यमे, उसकी आयु और यश आज समाप्त हो गए।' यह कहकर, तलवार से, केशव के निकट ही,
श्लोक 79 (skanda.7.237.79)
अभिहत्य शिरः क्रुद्धश्चिच्छेद कृतवर्मणः। तथान्यानपि निघ्नंतं युयुधानं समंततः
abhihatya śiraḥ kruddhaściccheda kṛtavarmaṇaḥ| tathānyānapi nighnaṁtaṁ yuyudhānaṁ samaṁtataḥ
—क्रोधित होकर उसने कृतवर्मा के सिर पर प्रहार करके उसे काट डाला। इस प्रकार युयुधान को चारों ओर अन्य लोगों का भी वध करते देखकर,
श्लोक 80 (skanda.7.237.80)
अन्वधावद्धृषीकेशो विनिवारयिषुस्तथा। एकीभूतास्ततस्तस्य कालपर्यायप्रेरिताः
anvadhāvaddhṛṣīkeśo vinivārayiṣustathā| ekībhūtāstatastasya kālaparyāyapreritāḥ
—हृषीकेश उसे रोकने की इच्छा से उसके पीछे दौड़े। तब काल के परिवर्तन से प्रेरित होकर वे सब एक होकर,
श्लोक 81 (skanda.7.237.81)
भोजांधका महाराजं शैनेयं पर्यवारयन्। तान्दृष्ट्वाऽऽपततस्तूर्णमभिक्रुद्धाञ्जनार्द्दनः
bhojāṁdhakā mahārājaṁ śaineyaṁ paryavārayan| tāndṛṣṭvā''patatastūrṇamabhikruddhāñjanārddanaḥ
—भोज और अन्धकगण, हे महाराज, शिनि-पुत्र (सात्यकि) को घेर लिया। जनार्दन ने उन्हें अत्यन्त क्रोधित होकर तेजी से आक्रमण करते देखा,
श्लोक 82 (skanda.7.237.82)
न चुक्रोध महातेजा जानन्कालस्य पर्ययम्। ते च पानमदाविष्टाश्चोदिताश्चैव मन्युना
na cukrodha mahātejā jānankālasya paryayam| te ca pānamadāviṣṭāścoditāścaiva manyunā
—फिर भी वे महातेजस्वी कृष्ण काल के परिवर्तन को जानते हुए क्रोधित नहीं हुए। और वे मद्यपान के मद से युक्त तथा क्रोध से प्रेरित होकर,
श्लोक 83 (skanda.7.237.83)
युयुधानमथाजघ्नुरुच्छिष्टै र्भोजनैस्तथा। हन्यमाने तु शैनेये कुद्धो रुक्मिणिनंदनः
yuyudhānamathājaghnurucchiṣṭai rbhojanaistathā| hanyamāne tu śaineye kuddho rukmiṇinaṁdanaḥ
—युयुधान पर जूठे भोजन आदि से प्रहार करने लगे। शिनि-पुत्र के इस प्रकार आहत होने पर, रुक्मिणी-नन्दन (प्रद्युम्न) क्रोधित होकर,
श्लोक 84 (skanda.7.237.84)
तदंतरमथाधावन्मोक्षयिष्यञ्छिनेः सुतम्। स भोजैः सह संयुक्तः सात्यकिश्चांधकैः सह
tadaṁtaramathādhāvanmokṣayiṣyañchineḥ sutam| sa bhojaiḥ saha saṁyuktaḥ sātyakiścāṁdhakaiḥ saha
—शिनि-पुत्र को छुड़ाने की इच्छा से उस संघर्ष में कूद पड़े। वे (प्रद्युम्न) भोजों से और सात्यकि अन्धकों से जूझने लगे—
श्लोक 85 (skanda.7.237.85)
बहुत्वात्तु हतौ वीरावुभौ कृष्णस्य पश्यतः। हतं दृष्ट्वा तु शैनेयं पुत्रं च यदुनंदनः
bahutvāttu hatau vīrāvubhau kṛṣṇasya paśyataḥ| hataṁ dṛṣṭvā tu śaineyaṁ putraṁ ca yadunaṁdanaḥ
—शत्रुओं की अधिकता के कारण कृष्ण के देखते-देखते दोनों वीर मारे गए। शिनि-पुत्र तथा अपने पुत्र (प्रद्युम्न) को मारा गया देखकर यदुनन्दन (कृष्ण) ने,
श्लोक 86 (skanda.7.237.86)
एरकाणां तदा मुष्टिं कोपाज्जग्राह केशवः। तदभून्मुशलं घोरं वज्रकल्पमयस्मयम्
erakāṇāṁ tadā muṣṭiṁ kopājjagrāha keśavaḥ| tadabhūnmuśalaṁ ghoraṁ vajrakalpamayasmayam
—क्रोधित होकर केशव ने एरका घास की एक मुट्ठी उठाई। वह घास एक भयंकर, वज्र के समान कठोर, लौह मूसल बन गई,
श्लोक 87 (skanda.7.237.87)
जघान तेन कृष्णोपि ये तस्य प्रमुखे स्थिताः। ततोंऽधकाश्च भोजाश्च शिनयो वृष्णयस्तदा
jaghāna tena kṛṣṇopi ye tasya pramukhe sthitāḥ| tatoṁ'dhakāśca bhojāśca śinayo vṛṣṇayastadā
—जिससे कृष्ण ने भी अपने सामने खड़े लोगों का वध किया। तब अन्धक, भोज, शिनिवंशी तथा वृष्णि सब,
श्लोक 88 (skanda.7.237.88)
न्यघ्नन्नन्योन्यमाक्रन्दैर्मुशलैः कालप्रेरिताः। यश्चैकामेरकां कश्चिज्जग्राह रुषितो नरः
nyaghnannanyonyamākrandairmuśalaiḥ kālapreritāḥ| yaścaikāmerakāṁ kaścijjagrāha ruṣito naraḥ
—काल से प्रेरित होकर चीत्कार करते हुए परस्पर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। और जिस किसी भी क्रोधित पुरुष ने एक भी एरका घास पकड़ी—
श्लोक 89 (skanda.7.237.89)
वज्रभूता च सा देवि ह्यदृश्यत तदा प्रिये। तृणं च मुशलीभूतमण्वपि तत्र दृश्यते
vajrabhūtā ca sā devi hyadṛśyata tadā priye| tṛṇaṁ ca muśalībhūtamaṇvapi tatra dṛśyate
—हे देवि, हे प्रिये, वह तब वज्र के समान दिखाई देने लगी। और वहाँ एक तिनका भी मूसल बना हुआ दिखाई देता था।
श्लोक 90 (skanda.7.237.90)
ब्रह्मदंडकृतं सर्वमिति तद्विद्धि भामिनि। आविध्याविध्य देवेशि प्रहरंति स्म सायकान्
brahmadaṁḍakṛtaṁ sarvamiti tadviddhi bhāmini| āvidhyāvidhya deveśi praharaṁti sma sāyakān
हे भामिनि, यह जान लो कि यह सब ब्रह्मदण्ड (ब्राह्मण के शाप) से हुआ था। हे देवेशि, वे बार-बार घुमा-घुमाकर उन बाणों से प्रहार करने लगे।
श्लोक 91 (skanda.7.237.91)
तद्वज्रभूतं मुशलमपश्यंत तदा दृढम्। अवधीत्पितरं पुत्रः पिता पुत्रं च भामिनि
tadvajrabhūtaṁ muśalamapaśyaṁta tadā dṛḍham| avadhītpitaraṁ putraḥ pitā putraṁ ca bhāmini
उन्होंने तब उस मूसल को वज्र के समान दृढ़ देखा। हे भामिनि, पुत्र ने पिता का वध किया और पिता ने पुत्र का,
श्लोक 92 (skanda.7.237.92)
मत्तास्ते पर्यटंति स्म योधमानाः परस्परम्। पतंगा इव चाग्नौ तु न्यपतन्यदुपुंगवाः
mattāste paryaṭaṁti sma yodhamānāḥ parasparam| pataṁgā iva cāgnau tu nyapatanyadupuṁgavāḥ
—मत्त होकर वे परस्पर युद्ध करते हुए घूमने लगे; तथा पतंगों के समान अग्नि में गिरने लगे, वे यदुश्रेष्ठ भी उसी प्रकार गिर पड़े।
श्लोक 93 (skanda.7.237.93)
नासीत्पलायने बुद्धिर्वध्यमानस्य कस्यचित्। तं तु पश्यन्महाबाहुर्जानन्कालस्यपर्ययम्
nāsītpalāyane buddhirvadhyamānasya kasyacit| taṁ tu paśyanmahābāhurjānankālasyaparyayam
मारे जाते हुए किसी को भी भागने की बुद्धि नहीं हुई। किन्तु महाबाहु कृष्ण यह सब देखते हुए, काल के परिवर्तन को जानते हुए,
श्लोक 94 (skanda.7.237.94)
मुशलं समवष्टभ्य तस्थौ स मधुसूदनः। सांबं च निहतं दृष्ट्वा चारुदेष्णं च माधवः
muśalaṁ samavaṣṭabhya tasthau sa madhusūdanaḥ| sāṁbaṁ ca nihataṁ dṛṣṭvā cārudeṣṇaṁ ca mādhavaḥ
—मूसल को दृढ़तापूर्वक थामकर वह मधुसूदन खड़े रहे। और साम्ब को तथा चारुदेष्ण को मारा गया देखकर माधव,
श्लोक 95 (skanda.7.237.95)
प्रद्युम्नमनिरुद्धं च ततश्चुक्रोध भामिनि। यादवान्क्ष्माशयानांश्च भृशं कोपसमन्वितः
pradyumnamaniruddhaṁ ca tataścukrodha bhāmini| yādavānkṣmāśayānāṁśca bhṛśaṁ kopasamanvitaḥ
—तथा प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को देखकर, हे भामिनि, वे अत्यन्त क्रोधित हो गए। पृथ्वी पर पड़े हुए यादवों के प्रति अत्यन्त क्रोध से युक्त होकर,
श्लोक 96 (skanda.7.237.96)
स निःशेषं तदा चक्रे शार्ङ्गचक्रगदाधरः। एवं तत्र महादेवि अभवद्यादव स्थलम्
sa niḥśeṣaṁ tadā cakre śārṅgacakragadādharaḥ| evaṁ tatra mahādevi abhavadyādava sthalam
—शार्ङ्गधनुष, चक्र और गदा धारण करने वाले उन कृष्ण ने तब उन सबका पूर्णतः संहार कर दिया। हे महादेवि, इस प्रकार वहाँ यादवस्थल की उत्पत्ति हुई।
श्लोक 97 (skanda.7.237.97)
गव्यूतिमात्रं तद्देवि यादवानां चिताः स्मृताः। तेषां किलास्थिनिचयैः स्थलरूपं बभूव तत्
gavyūtimātraṁ taddevi yādavānāṁ citāḥ smṛtāḥ| teṣāṁ kilāsthinicayaiḥ sthalarūpaṁ babhūva tat
हे देवि, वह एक गव्यूति परिमाण का स्थान यादवों की चिताओं के रूप में स्मरण किया जाता है; उनके अस्थि-समूहों से ही वह स्थान एक टीले के रूप में परिणत हो गया।
श्लोक 98 (skanda.7.237.98)
भस्मपुंजनिभाकारं तेनाभूद्यादव स्थलम्। दिव्यरत्नसमायुक्तं मणिमाणिक्यपूरितम्
bhasmapuṁjanibhākāraṁ tenābhūdyādava sthalam| divyaratnasamāyuktaṁ maṇimāṇikyapūritam
इसीलिए वह यादवस्थल भस्मपुंज के समान आकार वाला हो गया—फिर भी वह दिव्य रत्नों से युक्त, मणि-माणिक्यों से परिपूर्ण,
श्लोक 99 (skanda.7.237.99)
यादवानां किरीटैश्च दिव्यगन्धैः सुपूरितम्। तेषां रक्षानिमित्तं हि गंगा गणपतिस्तथा
yādavānāṁ kirīṭaiśca divyagandhaiḥ supūritam| teṣāṁ rakṣānimittaṁ hi gaṁgā gaṇapatistathā
—यादवों के मुकुटों से तथा दिव्य सुगन्धों से सुसज्जित हो गया। और उनकी रक्षा के लिए गंगा तथा गणपति भी,
श्लोक 100 (skanda.7.237.100)
यादवानां तु सर्वेषां जीवितो वज्र एव हि। वयसोंते ततः सोऽपि प्रभासं क्षेत्रमागतः
yādavānāṁ tu sarveṣāṁ jīvito vajra eva hi| vayasoṁte tataḥ so'pi prabhāsaṁ kṣetramāgataḥ
—(वहाँ रहे)। सम्पूर्ण यादवों में से केवल वज्र ही जीवित बचा। फिर आयु के अन्त में वह भी प्रभास क्षेत्र में आया,
श्लोक 101 (skanda.7.237.101)
निषिच्य स्वसुतं राज्ये नाम्ना ख्यातं महद्बलम्। तेनापि स्थापितं लिंगं यादवेन्द्रेण धीमता
niṣicya svasutaṁ rājye nāmnā khyātaṁ mahadbalam| tenāpi sthāpitaṁ liṅgaṁ yādavendreṇa dhīmatā
—अपने पुत्र, जो महद्बल नाम से प्रसिद्ध था, को राज्य पर अभिषिक्त करके। उस बुद्धिमान् यादवेन्द्र (वज्र) ने भी एक लिंग स्थापित किया,
श्लोक 102 (skanda.7.237.102)
वज्रेश्वरमिति ख्यातं तत्स्थितं यादवस्थले। तत्रैव सुचिरं कालं तपस्तप्तं सुपुष्कलम्
vajreśvaramiti khyātaṁ tatsthitaṁ yādavasthale| tatraiva suciraṁ kālaṁ tapastaptaṁ supuṣkalam
—जो वज्रेश्वर नाम से विख्यात हुआ और यादवस्थल में स्थित है। वहीं दीर्घकाल तक प्रचुर तप किया गया,
श्लोक 103 (skanda.7.237.103)
नारदस्योपदेशेन प्रभासे पापनाशने। प्राप्तवान्परमां सिद्धिं स राजा यादवोत्तमः
nāradasyopadeśena prabhāse pāpanāśane| prāptavānparamāṁ siddhiṁ sa rājā yādavottamaḥ
—नारद के उपदेश से, पापनाशक प्रभास में; और उस यादवश्रेष्ठ राजा (वज्र) ने परम सिद्धि को प्राप्त किया।
श्लोक 104 (skanda.7.237.104)
तत्रैव यो नरः सम्यक्स्नात्वा जांबवती जले। वज्रेश्वरं तु संपूज्य ब्राह्मणांस्तत्र भोजयेत्
tatraiva yo naraḥ samyaksnātvā jāṁbavatī jale| vajreśvaraṁ tu saṁpūjya brāhmaṇāṁstatra bhojayet
जो मनुष्य वहीं जांबवती नदी के जल में भलीभाँति स्नान करके, वज्रेश्वर की पूजा करके, वहाँ ब्राह्मणों को भोजन कराता है,
श्लोक 105 (skanda.7.237.105)
यादवस्थलसामीप्ये गोसहस्रफलं लभेत्। षट्कोणं तत्र दातव्यमंगुल्या यादवस्थले
yādavasthalasāmīpye gosahasraphalaṁ labhet| ṣaṭkoṇaṁ tatra dātavyamaṁgulyā yādavasthale
—यादवस्थल के समीप उसे सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त होता है। वहाँ यादवस्थल में अंगुलिमात्र षट्कोण (भूमि) का दान करना चाहिए,
श्लोक 106 (skanda.7.237.106)
यात्राफलमवाप्नोति सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः
yātrāphalamavāpnoti samyakchraddhāsamanvitaḥ
—इस प्रकार भलीभाँति श्रद्धायुक्त होने पर मनुष्य यात्रा का फल प्राप्त करता है।