प्रभास खण्ड · अध्याय 241
शेष माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.241.1)
ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं पश्येद्बलभद्रकलेवरम्। शेषरूपेण यत्रासौ प्रात्यजत्स्वकलेवरम्
īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ paśyedbalabhadrakalevaram| śeṣarūpeṇa yatrāsau prātyajatsvakalevaram
ईश्वर ने कहा—वहीं बलभद्र के शरीर को देखना चाहिए, उसी स्थान पर जहाँ उन्होंने शेषरूप में अपने शरीर का त्याग किया था।
श्लोक 2 (skanda.7.241.2)
गतस्त्रैसंगमे तीर्थे तत्र पातालवर्त्मना। अस्मिन्मित्रवने देवि गव्यूतिद्वयविस्तृते
gatastraisaṁgame tīrthe tatra pātālavartmanā| asminmitravane devi gavyūtidvayavistṛte
वे त्रिसंगम तीर्थ में जाकर वहाँ से पाताल-मार्ग द्वारा इस मित्रवन में पहुँचे, हे देवी, जो दो गव्यूति में विस्तृत है।
श्लोक 3 (skanda.7.241.3)
कलेवरं स्थितं देवि लिंगाकारं महाप्रभम्। रेवत्या सहितं तत्र शेषनामेति विश्रुतम्
kalevaraṁ sthitaṁ devi liṅgākāraṁ mahāprabham| revatyā sahitaṁ tatra śeṣanāmeti viśrutam
हे देवी, वहाँ रेवती सहित लिंग के आकार में महान तेजस्वी शरीर स्थित है, जो 'शेष' नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 4 (skanda.7.241.4)
यत्र सिद्धः पुरा देवि जरानामा तु कौलिकः। विष्णुहंता भल्लतीर्थे सोऽस्मिन्स्थाने लयं गतः
yatra siddhaḥ purā devi jarānāmā tu kaulikaḥ| viṣṇuhaṁtā bhallatīrthe so'sminsthāne layaṁ gataḥ
जहाँ पूर्वकाल में जरा नामक कौलिक (व्याध) सिद्ध हुआ था—भल्लतीर्थ में विष्णु को मारने वाला वही व्याध इस स्थान में लीन हो गया।
श्लोक 5 (skanda.7.241.5)
तत्प्रभृत्येव सकले शेष इत्यभिविश्रुतः। चैत्रे शुक्लत्रयोदश्यां यस्तं पूजयते नरः। स पुत्रपौत्रपशुमान्वर्षं क्षेमेण गच्छति
tatprabhṛtyeva sakale śeṣa ityabhiviśrutaḥ| caitre śuklatrayodaśyāṁ yastaṁ pūjayate naraḥ| sa putrapautrapaśumānvarṣaṁ kṣemeṇa gacchati
तभी से यह पूरा स्थान 'शेष' नाम से प्रसिद्ध हुआ। चैत्र मास की शुक्ल त्रयोदशी को जो मनुष्य उसकी पूजा करता है, वह पुत्र-पौत्र और पशुओं से युक्त होकर वर्षभर कुशलतापूर्वक रहता है।
श्लोक 6 (skanda.7.241.6)
मसूरिकादिरोगेभ्यः शिशूनां न भयं भवेत्। विस्फोटकादिरोगेभ्यो न भयं जायते क्वचित्
masūrikādirogebhyaḥ śiśūnāṁ na bhayaṁ bhavet| visphoṭakādirogebhyo na bhayaṁ jāyate kvacit
उसकी पूजा से बच्चों को चेचक आदि रोगों का भय नहीं रहता, और विस्फोटक आदि रोगों का भय भी कभी उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 7 (skanda.7.241.7)
अस्मिन्क्षेत्रे महासिद्धे सिद्धयज्ञस्तु यः स्मृतः। वर्णानां सांतरालानां सर्वेषां चातिवल्लभः
asminkṣetre mahāsiddhe siddhayajñastu yaḥ smṛtaḥ| varṇānāṁ sāṁtarālānāṁ sarveṣāṁ cātivallabhaḥ
इस महासिद्ध क्षेत्र में जो सिद्धयज्ञ कहा गया है, वह सभी वर्णों और अंतरालीय जातियों को अत्यंत प्रिय है।
श्लोक 8 (skanda.7.241.8)
पशुपुष्पोपहारैश्च बलिदानैः पृथग्विधैः। संतुष्टिं शीघ्रमायाति शेषोऽशेषाघनाशनः
paśupuṣpopahāraiśca balidānaiḥ pṛthagvidhaiḥ| saṁtuṣṭiṁ śīghramāyāti śeṣo'śeṣāghanāśanaḥ
पशु, पुष्प और विविध प्रकार के बलिदानों के उपहार से शेष, जो समस्त पापों का नाशक है, शीघ्र ही संतुष्ट हो जाता है।