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प्रभास खण्ड · अध्याय 242

कुमारी माहात्म्य वर्णन

अध्याय 241अध्याय-सूचीअध्याय 243

श्लोक 1 (skanda.7.242.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि यत्र देवीकुमारिका। तस्यैव पूर्वदिग्भागे स्थिता रक्षार्थमेव हि

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi yatra devīkumārikā| tasyaiva pūrvadigbhāge sthitā rakṣārthameva hi

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् वहाँ जाना चाहिए जहाँ देवी कुमारिका, उसी के पूर्व दिशा भाग में, रक्षा के लिए ही स्थित हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.242.2)

पुरा रथंतरे कल्पे रुरुर्नाम महासुरः। उत्पन्नः स महाकायः सर्वलोकभयावहः

purā rathaṁtare kalpe rururnāma mahāsuraḥ| utpannaḥ sa mahākāyaḥ sarvalokabhayāvahaḥ

पूर्वकाल में रथंतर कल्प में रुरु नामक एक महान असुर उत्पन्न हुआ, जो विशालकाय था और समस्त लोकों में भय उत्पन्न करने वाला था।

श्लोक 3 (skanda.7.242.3)

तेन देवाः सगन्धर्वास्त्रासितास्त्रिदशा लयात्। तस्य भीत्या ततः सर्वे ब्रह्मलोकमधिस्थिताः

tena devāḥ sagandharvāstrāsitāstridaśā layāt| tasya bhītyā tataḥ sarve brahmalokamadhisthitāḥ

उसके द्वारा गंधर्वों सहित सभी देवता विनाश की आशंका से भयभीत हो गए, और उसके भय से वे सभी ब्रह्मलोक में जा बसे।

श्लोक 4 (skanda.7.242.4)

तथा भूमितले विप्रान्यज्वनोऽथ तपस्विनः। निजघान स दुष्टात्मा ये चान्ये धर्मचारिणः

tathā bhūmitale viprānyajvano'tha tapasvinaḥ| nijaghāna sa duṣṭātmā ye cānye dharmacāriṇaḥ

उस दुरात्मा ने पृथ्वीतल पर स्थित यज्ञकर्ता ब्राह्मणों, तपस्वियों और अन्य जो भी धर्माचरण करने वाले थे, उन सबका वध कर दिया।

श्लोक 5 (skanda.7.242.5)

निःस्वाध्यायवषट्कारं तदाऽऽसीद्धरणीतलम्। नष्टयज्ञोत्सवं सर्वं रुरोर्भयनिपीडितम्

niḥsvādhyāyavaṣaṭkāraṁ tadāsīddharaṇītalam| naṣṭayajñotsavaṁ sarvaṁ ruror bhayanipīḍitam

उस समय समस्त पृथ्वीतल स्वाध्याय और वषट्कार से रहित हो गया; यज्ञ-उत्सव पूरी तरह लुप्त हो गए और सब कुछ रुरु के भय से पीड़ित हो उठा।

श्लोक 6 (skanda.7.242.6)

ततः प्रव्यथिता देवास्तथा सर्वे महर्षयः। समेत्यामंत्रयन्मंत्रं वधार्थं तस्य दुर्मतेः

tataḥ pravyathitā devāstathā sarve maharṣayaḥ| sametyāmaṁtrayanmaṁtraṁ vadhārthaṁ tasya durmateḥ

तब व्याकुल हुए देवता तथा सभी महर्षि एक साथ मिलकर उस दुर्बुद्धि के वध के उपाय पर विचार-विमर्श करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.7.242.7)

ततः कायोद्भवः स्वेदः सर्वेषां समजायत। तेषां चिंतयतां देवि निरोधाज्जगृहुश्च तम्

tataḥ kāyodbhavaḥ svedaḥ sarveṣāṁ samajāyata| teṣāṁ ciṁtayatāṁ devi nirodhājjagṛhuśca tam

तब उन सबके शरीर से पसीना उत्पन्न हुआ; हे देवी, चिंतन करते हुए उन्होंने उस पसीने को संयमपूर्वक संगृहीत कर लिया।

श्लोक 8 (skanda.7.242.8)

तत्र कन्या समुत्पन्ना दिव्या कमललोचना। व्यापयंती दिशः सर्वाः सर्वेषां पुरतः स्थिता

tatra kanyā samutpannā divyā kamalalocanā| vyāpayaṁtī diśaḥ sarvāḥ sarveṣāṁ purataḥ sthitā

उससे एक दिव्य कमल-नेत्री कन्या प्रकट हुई, जो समस्त दिशाओं को व्याप्त करती हुई सबके सामने खड़ी हो गई।

श्लोक 9 (skanda.7.242.9)

सर्वान्देवांस्ततः प्राह किमर्थं निर्मितास्म्य हम्। तद्वः कार्यं करिष्यामि श्रुत्वा तस्यास्तदा गिरम्

sarvāndevāṁstataḥ prāha kimarthaṁ nirmitāsmyaham| tadvaḥ kāryaṁ kariṣyāmi śrutvā tasyāstadā giram

उसने सभी देवताओं से पूछा—'मैं किस प्रयोजन के लिए उत्पन्न की गई हूँ? मैं तुम्हारा वह कार्य पूरा करूँगी।' उसकी यह वाणी सुनकर—

श्लोक 10 (skanda.7.242.10)

आचख्युः संकटं तस्यास्ते देवा रुरुचेष्टितम्। श्रुत्वा जहास सा देवी देवानां कार्य सिद्धये

ācakhyuḥ saṁkaṭaṁ tasyāste devā rurucaṣṭitam| śrutvā jahāsa sā devī devānāṁ kārya siddhaye

उन देवताओं ने उसे अपनी विपत्ति और रुरु की करतूतें बता दीं। यह सुनकर, देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के लिए वह देवी हँस पड़ी।

श्लोक 11 (skanda.7.242.11)

तस्या हसंत्या निश्चेरुर्वरांगाः कन्यकाः पुनः। पाशांकुशधराः सर्वाः पीनश्रोणिपयोधराः

tasyā hasaṁtyā niścerurvarāṁgāḥ kanyakāḥ punaḥ| pāśāṁkuśadharāḥ sarvāḥ pīnaśroṇipayodharāḥ

उसके हँसने से पुनः सुंदर अंगों वाली अनेक कन्याएँ प्रकट हुईं, जो सभी पाश और अंकुश धारण किए हुए थीं तथा भरे हुए नितंब और स्तनों से युक्त थीं।

श्लोक 12 (skanda.7.242.12)

फेत्कारारावमात्रेण त्रास यंत्यश्चराचरम्। अन्वगात्सा रुरुर्यत्र ताभिः सार्द्धं यशस्विनी

phetkārārāvamātreṇa trāsayaṁtyaścarācaram| anvagātsā rururyatra tābhiḥ sārddhaṁ yaśasvinī

वे केवल अपनी फूत्कार की ध्वनि मात्र से ही चराचर जगत को भयभीत कर देती थीं। वह यशस्विनी देवी उन कन्याओं के साथ उसी ओर गई, जहाँ रुरु था।

श्लोक 13 (skanda.7.242.13)

अथाभूत्तुमुलं तासां युद्धं घोरं तु तैः सह। शस्त्रास्त्रैर्विविधैर्घोरैः शत्रुपक्षक्षयंकरैः

athābhūttumulaṁ tāsāṁ yuddhaṁ ghoraṁ tu taiḥ saha| śastrāstrairvividhairghoraiḥ śatrupakṣakṣayaṁkaraiḥ

फिर उनका और उन दैत्यों का घोर तुमुल युद्ध हुआ, जिसमें विविध भयानक शस्त्रास्त्रों के प्रयोग से शत्रुपक्ष का संहार होने लगा।

श्लोक 14 (skanda.7.242.14)

ताभिस्तदनुगाः सर्वे प्रहारैर्जर्जरीकृताः। पराङ्मुखाः क्षणेनैव जाताः केचिन्निपातिताः

tābhistadanugāḥ sarve prahārairjarjarīkṛtāḥ| parāṅmukhāḥ kṣaṇenaiva jātāḥ kecinnipātitāḥ

उन कन्याओं ने रुरु के सभी अनुयायियों को प्रहारों से चूर-चूर कर दिया; कुछ क्षणभर में ही पीठ दिखाकर भाग गए और कुछ धराशायी हो गए।

श्लोक 15 (skanda.7.242.15)

ततो हतं बलं दृष्ट्वा रुरुर्मायामथाऽसृजत्। तामसींनाम देवेशि तयामुह्यत नैव सा

tato hataṁ balaṁ dṛṣṭvā rururmāyāmathāsṛjat| tāmasīṁ nāma deveśi tayā muhyata naiva sā

अपनी सेना का संहार देखकर रुरु ने तब 'तामसी' नामक माया का प्रयोग किया, किंतु हे देवेशी, उससे वह देवी मोहित नहीं हुई।

श्लोक 16 (skanda.7.242.16)

तमोभूते ततस्तत्र देवी दैत्यं तदा रुरुम्। शक्त्या बिभेद हृदये ततो मूर्छां जगाम ह

tamobhūte tatastatra devī daityaṁ tadā rurum| śaktyā bibheda hṛdaye tato mūrchāṁ jagāma ha

जब चारों ओर अंधकार छा गया, तब देवी ने उस दैत्य रुरु के हृदय को शक्ति से बींध दिया, जिससे वह मूर्छित हो गया।

श्लोक 17 (skanda.7.242.17)

मुहूर्त्ताल्लब्धसंज्ञोऽथ ज्ञात्वा तस्याः पराक्रमम्। पलायनकृतोत्साहः समुद्राभिमुखो ययौ

muhūrttāllabdhasaṁjño'tha jñātvā tasyāḥ parākramam| palāyanakṛtotsāhaḥ samudrābhimukho yayau

क्षणभर बाद होश में आकर और उस देवी के पराक्रम को जानकर, उसने भागने का प्रयत्न किया और समुद्र की ओर चल दिया।

श्लोक 18 (skanda.7.242.18)

साऽपि देवी जगामाथ पृष्ठतोऽस्य दुरात्मनः। स्तूयमाना सुरगणैः किंनरैः समहोरगैः

sā'pi devī jagāmātha pṛṣṭhato'sya durātmanaḥ| stūyamānā suragaṇaiḥ kiṁnaraiḥ samahoragaiḥ

वह देवी भी उस दुरात्मा के पीछे-पीछे चल पड़ी, और देवगणों, किन्नरों तथा महानागों द्वारा उसकी स्तुति की जाने लगी।

श्लोक 19 (skanda.7.242.19)

ततः प्रविश्य जलधिं तं दृष्ट्वा दानवं रुषा। खङ्गाग्रेण शिरश्छित्त्वा चर्ममुण्डधरा ततः

tataḥ praviśya jaladhiṁ taṁ dṛṣṭvā dānavaṁ ruṣā| khaṅgāgreṇa śiraśchittvā carmamuṇḍadharā tataḥ

फिर समुद्र में प्रवेश करके उस दानव को देखकर, क्रोधपूर्वक उसने तलवार की धार से उसका सिर काट दिया, और फिर उसकी खाल तथा कटा हुआ मस्तक धारण कर लिया।

श्लोक 20 (skanda.7.242.20)

निश्चक्राम पुनस्तस्मात्प्रभासं क्षेत्रमागता। कन्या सैन्येन संयुक्ता बहुरूपेण भास्वता

niścakrāma punastasmātprabhāsaṁ kṣetramāgatā| kanyā sainyena saṁyuktā bahurūpeṇa bhāsvatā

वह कन्या फिर वहाँ से निकलकर, अपनी विविध रूपधारी तेजस्वी सेना के साथ, प्रभासक्षेत्र में आई।

श्लोक 21 (skanda.7.242.21)

देवैः सुविस्मितैर्दृष्टा चर्ममुण्डधरा वरा। ततो देवाः स्तुतिं चक्रुः कृतांजलिपुटाः स्थिताः

devaiḥ suvismitairdṛṣṭā carmamuṇḍadharā varā| tato devāḥ stutiṁ cakruḥ kṛtāṁjaliputāḥ sthitāḥ

देवताओं ने अत्यंत विस्मित होकर उस श्रेष्ठ देवी को, जो चर्म और मुण्ड धारण किए हुए थी, देखा। तब देवता हाथ जोड़कर खड़े होकर उसकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 22 (skanda.7.242.22)

देवा ऊचुः। जय त्वं देवि चामुंडे जय भूतापहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते

devā ūcuḥ| jaya tvaṁ devi cāmuṁḍe jaya bhūtāpahāriṇi| jaya sarvagate devi kālarātri namo'stu te

देवताओं ने कहा—हे देवी चामुण्डे, तुम्हारी जय हो! हे भूतों को हरने वाली, तुम्हारी जय हो! हे सर्वव्यापिनी देवी कालरात्रि, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 23 (skanda.7.242.23)

भीमरूपे शिवे विद्ये महामाये महोदये। महाभागे जये जृम्भे भीमाक्षि भीमदर्शने

bhīmarūpe śive vidye mahāmāye mahodaye| mahābhāge jaye jṛmbhe bhīmākṣi bhīmadarśane

हे भयंकर रूप वाली, हे शिवा, हे विद्या, हे महामाया, हे महोदया, हे महाभागा, हे जया, हे जृम्भा, हे भयंकर नेत्रों वाली, हे भयंकर दर्शन वाली—

श्लोक 24 (skanda.7.242.24)

महामाये विचित्रांगि गेयनृत्यप्रिये शुभे। विकरालि महाकालि कालिके कालरूपिणि

mahāmāye vicitrāṁgi geyanṛtyapriye śubhe| vikarāli mahākāli kālike kālarūpiṇi

हे महामाया, हे विचित्र अंगों वाली, हे गीत-नृत्य प्रिय, हे शुभा, हे विकराला, हे महाकाली, हे कालिके, हे कालस्वरूपिणी—

श्लोक 25 (skanda.7.242.25)

प्रासहस्ते दण्डहस्ते भीमहस्ते भयानने। चामुण्डे ज्वलमानास्ये तीक्ष्णदंष्ट्रे महाबले। शवयानस्थिते देवि प्रेतसंघनिषेविते

prāsahaste daṇḍahaste bhīmahaste bhayānane| cāmuṇḍe jvalamānāsye tīkṣṇadaṁṣṭre mahābale| śavayānasthite devi pretasaṁghaniṣevite

हे प्रास (भाला) धारण करने वाली, हे दण्डधारिणी, हे भयंकर हाथों वाली, हे भयानक मुख वाली, हे चामुण्डे, हे प्रज्वलित मुख वाली, हे तीक्ष्ण दाढ़ों वाली, हे महाबला, हे शव-वाहन पर स्थित, हे प्रेत-समूहों से सेवित देवी।

श्लोक 26 (skanda.7.242.26)

एवं स्तुता तदा देवी सर्वैः शक्रपुरोगमैः। प्रहृष्टवदना भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह

evaṁ stutā tadā devī sarvaiḥ śakrapurogamaiḥ| prahṛṣṭavadanā bhūtvā vākyametaduvāca ha

इस प्रकार इन्द्र सहित सभी देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर, वह देवी प्रसन्नमुखी होकर यह वचन बोलीं—

श्लोक 27 (skanda.7.242.27)

वरं वृणुध्वं भद्रं वो नित्यं यन्मनसि स्थितम्। अहं दास्यामि तत्सर्वं यद्यपि स्यात्सुदुर्ल्लभम्

varaṁ vṛṇudhvaṁ bhadraṁ vo nityaṁ yanmanasi sthitam| ahaṁ dāsyāmi tatsarvaṁ yadyapi syātsudurllabham

'हे मंगलकामी देवताओ, जो भी सदा तुम्हारे मन में स्थित है, वह वर माँग लो। मैं तुम्हें वह सब दूँगी, चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो।'

श्लोक 28 (skanda.7.242.28)

देवा ऊचुः। कृतकृत्यास्त्वया भद्रे दानवस्य निषूदनात्

devā ūcuḥ| kṛtakṛtyāstvayā bhadre dānavasya niṣūdanāt

देवताओं ने कहा—हे भद्रे, इस दानव के वध से ही हम कृतकृत्य हो गए हैं।

श्लोक 29 (skanda.7.242.29)

स्तोत्रेणानेन यो देवि त्वां वै स्तौति वरानने। तस्य त्वं वरदा देवि भव सर्वगता सती

stotreṇānena yo devi tvāṁ vai stauti varānane| tasya tvaṁ varadā devi bhava sarvagatā satī

हे देवी वरानने, जो कोई इस स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति करेगा, हे सती देवी, तुम सर्वव्यापिनी होकर उसे वर देने वाली बनो।

श्लोक 30 (skanda.7.242.30)

यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या तव देवि समुद्भवम्। सर्वपापविनिर्मुक्तः स प्राप्नोतु परां गतिम्

yaścedaṁ śṛṇuyādbhaktyā tava devi samudbhavam| sarvapāpavinirmuktaḥ sa prāpnotu parāṁ gatim

हे देवी, जो कोई भक्तिपूर्वक तुम्हारे इस प्राकट्य की कथा को सुने, वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करे।

श्लोक 31 (skanda.7.242.31)

अस्मिन्क्षेत्रे त्वया देवि स्थितिः कार्या सदा शुभे

asminkṣetre tvayā devi sthitiḥ kāryā sadā śubhe

हे शुभे, इस क्षेत्र में तुम्हें सदा निवास करना चाहिए।

श्लोक 32 (skanda.7.242.32)

अत्र त्वां पूजयेद्यस्तु शुक्लपक्षे समाहितः। नवम्यामाश्विने मासि तस्य कार्यं सदा शुभम्

atra tvāṁ pūjayedyastu śuklapakṣe samāhitaḥ| navamyāmāśvine māsi tasya kāryaṁ sadā śubham

जो कोई भी आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को समाहित चित्त से यहाँ तुम्हारी पूजा करेगा, उसका कार्य सदा शुभ होगा।

श्लोक 33 (skanda.7.242.33)

ईश्वर उवाच। एवमुक्ता महादेवी तत्रैव निरताऽभवत्। देवास्त्रिविष्टपं जग्मुः प्रहृष्टा हतशत्रवः

īśvara uvāca| evamuktā mahādevī tatraiva niratā'bhavat| devāstriviṣṭapaṁ jagmuḥ prahṛṣṭā hataśatravaḥ

ईश्वर ने कहा—यह कहे जाने पर वह महादेवी वहीं स्थिर होकर निवास करने लगीं, और शत्रु के मारे जाने से प्रसन्न होकर देवता स्वर्गलोक को चले गए।

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