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प्रभास खण्ड · अध्याय 27

गन्धर्वसेनेश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (skanda.7.27.1)

ईश्वर उवाच। अथ तत्रैव देवेशि लिंगं गन्धर्वसेनया। स्थापितं घनवाहस्य पुत्र्या गौरीसमीपतः

īśvara uvāca| atha tatraiva deveśi liṁgaṁ gandharvasenayā| sthāpitaṁ ghanavāhasya putryā gaurīsamīpataḥ

ईश्वर ने कहा—हे देवेशि! इसके बाद वहीं पर मेघवाहन (गंधर्व) की पुत्री गंधर्वसेना ने गौरी के समीप एक लिंग की स्थापना की।

श्लोक 2 (skanda.7.27.2)

धनुषां त्रितये तत्र स्थितं पूर्वविभागतः। विमलेश्वरनामानं सर्वरोगविनाशनम्

dhanuṣāṁ tritaye tatra sthitaṁ pūrvavibhāgataḥ| vimaleśvaranāmānaṁ sarvarogavināśanam

वह वहाँ पूर्व भाग में, तीन धनुष की दूरी पर स्थित है, जिसका नाम विमलेश्वर है और जो समस्त रोगों का नाश करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.7.27.3)

पूजयित्वा तृतीयायां दौर्भाग्यैर्मुच्यतेऽङ्गना। सर्वान्कामानवाप्नोति पुत्रपौत्रप्रतिष्ठिता

pūjayitvā tṛtīyāyāṁ daurbhāgyairmucyate'ṅganā| sarvānkāmānavāpnoti putrapautrapratiṣṭhitā

तृतीया तिथि को उसकी पूजा करने से स्त्री दुर्भाग्य से मुक्त हो जाती है, वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करती है और पुत्र-पौत्रों से प्रतिष्ठित होती है।

श्लोक 4 (skanda.7.27.4)

इति व्रतं महादेवि त्रेतासंध्यांशके गते। गन्धर्वस्यैवमाख्यातं श्रुतं पातकनाशनम्

iti vrataṁ mahādevi tretāsaṁdhyāṁśake gate| gandharvasyaivamākhyātaṁ śrutaṁ pātakanāśanam

हे महादेवि! त्रेता के संध्यांश में यह गंधर्व से संबंधित व्रत इस प्रकार कहा गया, जो सुनने मात्र से पापों का नाश करने वाला है।

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