प्रभास खण्ड · अध्याय 273
शण्डतीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.273.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि शंडतीर्थमनुत्तमम्। सर्वपापोपशमनं सर्वकामफलप्रदम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi śaṁḍatīrthamanuttamam| sarvapāpopaśamanaṁ sarvakāmaphalapradam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, फिर उस अत्यन्त उत्तम शण्डतीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त पापों को शान्त करने वाला और सभी कामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.273.2)
तस्योत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रिये। पुरा पंचशिरा आसीद्ब्रह्मा लोकपितामहः
tasyotpattiṁ pravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanāḥ priye| purā paṁcaśirā āsīdbrahmā lokapitāmahaḥ
अब मैं उसकी उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ, हे प्रिये, एकाग्रचित्त होकर सुनो। प्राचीन काल में लोकपितामह ब्रह्मा के पाँच सिर थे।
श्लोक 3 (skanda.7.273.3)
शिरस्तस्य मया छिन्नं कस्मिंश्चित्कारणांतरे। तत्र गंधवती जाता ब्रह्मणः सा च शोणितैः
śirastasya mayā chinnaṁ kasmiṁścitkāraṇāṁtare| tatra gaṁdhavatī jātā brahmaṇaḥ sā ca śoṇitaiḥ
किसी कारणवश मैंने उनका एक सिर काट डाला। वहाँ ब्रह्मा के उस रक्त से गन्धवती नामक नदी उत्पन्न हुई।
श्लोक 4 (skanda.7.273.4)
तत्रोद्गता महातालास्तेन तालवनं स्मृतम्। अथ करतले लग्नं कपालं ब्रह्मणो मम
tatrodgatā mahātālāstena tālavanaṁ smṛtam| atha karatale lagnaṁ kapālaṁ brahmaṇo mama
वहाँ बड़े-बड़े ताड़ के वृक्ष उग आए, इसीलिए वह स्थान 'तालवन' कहलाया। तत्पश्चात् ब्रह्मा की वह खोपड़ी मेरी हथेली से चिपक गई।
श्लोक 5 (skanda.7.273.5)
शरीरं कृष्णतां यातं मम चैव वृषस्य च। अथ तीर्थान्यनेकानि गतोहं पापशंकया
śarīraṁ kṛṣṇatāṁ yātaṁ mama caiva vṛṣasya ca| atha tīrthānyanekāni gatohaṁ pāpaśaṁkayā
मेरा तथा मेरे वृषभ का शरीर काला पड़ गया। तब उस हत्या के भय से मैं अनेक तीर्थों में भटकने लगा।
श्लोक 6 (skanda.7.273.6)
न क्वचिद्व्रजते पापं ततः प्रभासमागतः। क्षेत्रे तत्र मया दृष्टा प्राची देवी सरस्वती
na kvacidvrajate pāpaṁ tataḥ prabhāsamāgataḥ| kṣetre tatra mayā dṛṣṭā prācī devī sarasvatī
कहीं भी वह पाप दूर नहीं हुआ। अन्त में मैं प्रभास आया, और वहाँ उस क्षेत्र में मैंने प्राची देवी सरस्वती के दर्शन किए।
श्लोक 7 (skanda.7.273.7)
तत्र मे वृषभः स्नातुं प्रविष्टो जलमध्यतः। तत्क्षणाच्छ्वेतता प्राप्तो मुक्तोहमपि हत्यया
tatra me vṛṣabhaḥ snātuṁ praviṣṭo jalamadhyataḥ| tatkṣaṇācchvetatā prāpto muktohamapi hatyayā
वहाँ मेरा वृषभ स्नान करने के लिए जल के बीच में घुसा और उसी क्षण श्वेत हो गया; मैं भी उस ब्रह्महत्या से मुक्त हो गया।
श्लोक 8 (skanda.7.273.8)
करमध्ये च मे लग्नं कपालं पतितं तदा। कपालमोचनश्चासौ लिंगरूपी स्थितोऽभवत्
karamadhye ca me lagnaṁ kapālaṁ patitaṁ tadā| kapālamocanaścāsau liṁgarūpī sthito'bhavat
और उसी समय मेरे हाथ में चिपकी हुई वह खोपड़ी गिर पड़ी। वही स्थान कपालमोचन के नाम से लिंगरूप में स्थित हुआ।
श्लोक 9 (skanda.7.273.9)
तत्रापि यो ददेच्छ्राद्धं प्राचीदेव्यास्तु संनिधौ। मातृकं पैतृकं चैव तृप्तं कुलशतं तथा
tatrāpi yo dadecchrāddhaṁ prācīdevyāstu saṁnidhau| mātṛkaṁ paitṛkaṁ caiva tṛptaṁ kulaśataṁ tathā
वहाँ भी जो कोई प्राची देवी के समीप श्राद्ध करता है, वह मातृ-पक्ष और पितृ-पक्ष के सौ कुलों को तृप्त कर देता है।
श्लोक 10 (skanda.7.273.10)
भवेच्च तस्य तृप्तिस्तु यावत्कल्पास्तु सप्ततिः। मास आश्वयुजे देवि कृष्णपक्षे चतुर्दशी। तत्र दद्यात्तु यः श्राद्धं दक्षिणामूर्तिमाश्रितः
bhavecca tasya tṛptistu yāvatkalpāstu saptatiḥ| māsa āśvayuje devi kṛṣṇapakṣe caturdaśī| tatra dadyāttu yaḥ śrāddhaṁ dakṣiṇāmūrtimāśritaḥ
उसकी वह तृप्ति सत्तर कल्पों तक बनी रहती है। हे देवी, आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को जो वहाँ दक्षिणामूर्ति का आश्रय लेकर श्राद्ध करता है,
श्लोक 11 (skanda.7.273.11)
यथावित्तोपचारेण सुपात्रे च यथाविधि। यावद्युगसहस्रं तु तृप्ताः स्युस्ते पितामहाः
yathāvittopacāreṇa supātre ca yathāvidhi| yāvadyugasahasraṁ tu tṛptāḥ syuste pitāmahāḥ
अपनी सामर्थ्य के अनुसार उचित उपचार से, सुयोग्य पात्र को यथाविधि दान देकर—तो उसके पितर एक हजार युगों तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.273.12)
अन्नसुवर्णदानं च दधिकंबलमेव च। तत्र देयं विधानेन सर्वपापोपशुद्धये
annasuvarṇadānaṁ ca dadhikaṁbalameva ca| tatra deyaṁ vidhānena sarvapāpopaśuddhaye
वहाँ अन्न और सुवर्ण का दान, तथा दही और कम्बल का दान भी विधिपूर्वक करना चाहिए, जिससे सभी पापों की शुद्धि हो जाती है।
श्लोक 13 (skanda.7.273.13)
कृष्णरूपी वृषो देवि यदा श्वेतत्वमागतः। शंडतीर्थमितिख्यातं तेन त्रैलोक्यपूजितम्
kṛṣṇarūpī vṛṣo devi yadā śvetatvamāgataḥ| śaṁḍatīrthamitikhyātaṁ tena trailokyapūjitam
हे देवी, चूँकि वह काले रंग का वृषभ वहाँ श्वेत हो गया था, इसीलिए वह शण्डतीर्थ के नाम से विख्यात हुआ और तीनों लोकों में पूजित है।