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प्रभास खण्ड · अध्याय 272

त्रिपुर लिंगत्रय माहात्म्य वर्णन

अध्याय 271अध्याय-सूचीअध्याय 273

श्लोक 1 (skanda.7.272.1)

ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं पश्येत्प्राची देव्यास्तु संनिधौ। लिंगत्रयं समाख्यातं त्रिपुराणां महात्मनाम्॥

īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ paśyetprācī devyāstu saṁnidhau| liṅgatrayaṁ samākhyātaṁ tripurāṇāṁ mahātmanām||

ईश्वर ने कहा—वहीं, प्राची देवी (सरस्वती) के समीप, तीन महात्मा त्रिपुरों के नाम से प्रसिद्ध लिंगत्रय की स्थापना देखनी चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.272.2)

विद्युन्माली तारकाख्यः कपोलाख्यस्तथैव च। तैश्च प्रतिष्ठितं लिंगं दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते॥

vidyunmālī tārakākhyaḥ kapolākhyastathaiva ca| taiśca pratiṣṭhitaṁ liṅgaṁ dṛṣṭvā pāpaiḥ pramucyate||

विद्युन्माली, तारकाख्य तथा कपोलाख्य—इन तीनों के द्वारा प्रतिष्ठित लिंग का दर्शन करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

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