प्रभास खण्ड · अध्याय 289
पाताल-गंगेश्वर, विश्वामित्रेश्वर एवं बालेश्वर त्रय-लिंग माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.289.1)
ईश्वर उवाच। तस्यैव दक्षिणे देवि तस्माद्गव्यूतिमात्रतः। पातालगामिनी गंगा संस्थिता पापनाशिनी
īśvara uvāca| tasyaiva dakṣiṇe devi tasmādgavyūtimātrataḥ| pātālagāminī gaṁgā saṁsthitā pāpanāśinī
ईश्वर ने कहा—हे देवी, उसी के दक्षिण में, वहाँ से एक गव्यूति की दूरी पर, पापनाशिनी गंगा पाताल की ओर जाती हुई स्थित हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.289.2)
विश्वामित्रेण चाहूता स्नानार्थं वरवर्णिनि। तत्र स्नात्वा महादेवि मुच्यते सर्वपातकैः
viśvāmitreṇa cāhūtā snānārthaṁ varavarṇini| tatra snātvā mahādevi mucyate sarvapātakaiḥ
हे वरवर्णिनी, स्नान के लिए विश्वामित्र द्वारा उनका आवाहन किया गया था। हे महादेवी, वहाँ स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.289.3)
तत्र गंगेश्वरं दृष्ट्वा विश्वामित्रेश्वरं तथा। बालेश्वरं च संप्रेक्ष्य सर्वान्कामानवाप्नुयात्
tatra gaṁgeśvaraṁ dṛṣṭvā viśvāmitreśvaraṁ tathā| bāleśvaraṁ ca saṁprekṣya sarvānkāmānavāpnuyāt
वहाँ गंगेश्वर के दर्शन करके, तथा उसी प्रकार विश्वामित्रेश्वर के, और बालेश्वर का भी दर्शन करके मनुष्य अपनी सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।