प्रभास खण्ड · अध्याय 290
कुबेरनगरोत्पत्तिकुबेरस्थापितसोमनाथमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.290.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि कुबेरस्थानमुत्तमम्। यत्र सिद्धः पुरा देवि कुबेरो धनदोऽभवत्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi kuberasthānamuttamam| yatra siddhaḥ purā devi kubero dhanado'bhavat
ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, फिर तुम कुबेर के उत्तम स्थान को जाओ, जहाँ पूर्वकाल में सिद्ध कुबेर धनद (धन देने वाला) बना था।
श्लोक 2 (skanda.7.290.2)
ब्राह्मणश्चौररूपेण तत्र स्थानेऽवसत्पुरा। स च मे भक्तियोगेन पुरा वै धनदः कृतः
brāhmaṇaścaurarūpeṇa tatra sthāne'vasatpurā| sa ca me bhaktiyogena purā vai dhanadaḥ kṛtaḥ
एक ब्राह्मण, चोर के रूप में, पूर्वकाल में उस स्थान पर रहता था; और भक्तियोग के द्वारा मैंने ही उसे धनद बनाया।
श्लोक 3 (skanda.7.290.3)
देव्युवाच। कथं स ब्राह्मणो भूत्वा चौररूपो नराधमः। तन्मे कथय देवेश धनदः स यथाऽभवत्
devyuvāca| kathaṁ sa brāhmaṇo bhūtvā caurarūpo narādhamaḥ| tanme kathaya deveśa dhanadaḥ sa yathā'bhavat
देवी ने कहा—हे देवेश, वह ब्राह्मण चोर के रूप वाला नराधम होकर धनद कैसे बना? वह मुझे बताइए।
श्लोक 4 (skanda.7.290.4)
ईश्वर उवाच। तस्मिन्नर्थे महादेवि यद्वृत्तं चौत्तमेंऽतरे। कथयिष्यामि तत्सर्वं शिवमाहात्म्यसूचकम्
īśvara uvāca| tasminnarthe mahādevi yadvṛttaṁ cauttameṁ'tare| kathayiṣyāmi tatsarvaṁ śivamāhātmyasūcakam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, उस विषय में पूर्वकाल में जो कुछ हुआ था, वह शिव-माहात्म्य को सूचित करने वाला सब वृत्तांत मैं कहूँगा।
श्लोक 5 (skanda.7.290.5)
कश्चिदासीद्द्विजो देवि देवशर्मेति विश्रुतः। प्रभासक्षेत्रनिलयो न्यंकुमत्यास्तटेऽवसत्
kaścidāsīddvijo devi devaśarmeti viśrutaḥ| prabhāsakṣetranilayo nyaṁkumatyāstaṭe'vasat
हे देवी, देवशर्मा नाम से विख्यात कोई ब्राह्मण था, जो प्रभासक्षेत्र में रहने वाला न्यंकुमती के तट पर वास करता था।
श्लोक 6 (skanda.7.290.6)
पुत्रक्षेत्रकलत्रादिव्यापारैकरतः सदा। विहायाथ स गार्हस्थ्यं धनार्थं लोभमोहितः। प्रचचार महीमेतां सग्रामनगरांतराम्
putrakṣetrakalatrādivyāpāraikarataḥ sadā| vihāyātha sa gārhasthyaṁ dhanārthaṁ lobhamohitaḥ| pracacāra mahīmetāṁ sagrāmanagarāṁtarām
वह सदा पुत्र, खेत, पत्नी आदि के व्यापार में ही रत रहता था; फिर धन के लोभ से मोहित होकर गृहस्थी को त्याग कर ग्राम-नगरों में इस पृथ्वी पर भटकने लगा।
श्लोक 7 (skanda.7.290.7)
भार्या तस्य विलोलाक्षी तस्य गेहाद्विनिर्गता। स्वच्छंदचारिणी नित्यं नित्यं चानंगमोहिता
bhāryā tasya vilolākṣī tasya gehādvinirgatā| svacchaṁdacāriṇī nityaṁ nityaṁ cānaṁgamohitā
उसकी चंचल-नेत्रा पत्नी उसके घर से निकल गई, सदा स्वच्छंद विचरने वाली और सदा कामदेव से मोहित रहने वाली।
श्लोक 8 (skanda.7.290.8)
तस्यां कदाचित्पुत्रस्तु शूद्राज्जातो विधेर्वशात्। दुष्टात्माऽतीव निर्मुक्तो नाम्ना दुःसह इत्यतः
tasyāṁ kadācitputrastu śūdrājjāto vidhervaśāt| duṣṭātmā'tīva nirmukto nāmnā duḥsaha ityataḥ
उससे विधि के वशीभूत होकर एक शूद्र से पुत्र उत्पन्न हुआ—अत्यंत दुष्टात्मा, सर्वथा लज्जाहीन, जिसका नाम दुःसह पड़ा।
श्लोक 9 (skanda.7.290.9)
सोऽथ कालेन महता नामकर्मप्रवर्तितः। व्यसनोपहतः पापस्त्यक्तो बन्धुजनैस्तथा
so'tha kālena mahatā nāmakarmapravartitaḥ| vyasanopahataḥ pāpastyakto bandhujanaistathā
फिर बहुत काल बीतने पर वह अपने नाम के अनुरूप कर्म में प्रवृत्त हुआ, व्यसनों से पीड़ित पापी अपने बंधुजनों द्वारा भी त्याग दिया गया।
श्लोक 10 (skanda.7.290.10)
पूजोपकरणं द्रव्यं स कस्मिंश्चिच्छिवालये। बहुदोषामुखे दृष्ट्वा हर्तुकामोऽविशत्ततः
pūjopakaraṇaṁ dravyaṁ sa kasmiṁścicchivālaye| bahudoṣāmukhe dṛṣṭvā hartukāmo'viśattataḥ
किसी शिवालय में पूजा की सामग्री और द्रव्य देखकर, बहुत दोषों वाले उस अंधकारपूर्ण स्थान में हरण की इच्छा से वह भीतर घुस गया।
श्लोक 11 (skanda.7.290.11)
यावद्दीपो गतप्रायो वर्त्तिच्छेदोऽभवत्किल। तावत्तेन दशा दत्ता द्रव्यान्वेषणकारणात्
yāvaddīpo gataprāyo vartticchedo'bhavatkila| tāvattena daśā dattā dravyānveṣaṇakāraṇāt
ज्यों ही दीपक बुझने को था और उसकी बत्ती कट गई, त्यों ही उसने द्रव्य की खोज के लिए हाथ बढ़ाया।
श्लोक 12 (skanda.7.290.12)
प्रबुद्धश्चोत्थितस्तत्र देवपूजाकरो नरः। कोऽयं कोयमिति प्रोच्चैर्व्याहरत्परिघायुधः
prabuddhaścotthitastatra devapūjākaro naraḥ| ko'yaṁ koyamiti proccairvyāharatparighāyudhaḥ
वहाँ देव-पूजा करने वाला जागा हुआ पुरुष उठकर गदा लिए हुए जोर से पुकार उठा—'यह कौन है, यह कौन है?'
श्लोक 13 (skanda.7.290.13)
स च प्राणभयान्नष्टः शूद्रजश्चापि मूढधीः। विनिन्दन्नात्मनो जन्म कर्म चापि सुदुःखितः
sa ca prāṇabhayānnaṣṭaḥ śūdrajaścāpi mūḍhadhīḥ| vinindannātmano janma karma cāpi suduḥkhitaḥ
वह शूद्रजात मूढ़बुद्धि प्राणभय से भाग खड़ा हुआ, अपने जन्म और कर्म की निंदा करता हुआ अत्यंत दुःखी हुआ।
श्लोक 14 (skanda.7.290.14)
पुरपालैर्हतोऽवन्यां मृतः कालादभूच्च सः। गंधारविषये राजा ख्यातो नाम्ना सुदुर्मुखः
purapālairhato'vanyāṁ mṛtaḥ kālādabhūcca saḥ| gaṁdhāraviṣaye rājā khyāto nāmnā sudurmukhaḥ
नगररक्षकों द्वारा मार डाला जाकर वह भूमि पर मर गया; और काल के प्रभाव से वही गांधार देश में सुदुर्मुख नाम से विख्यात राजा हुआ।
श्लोक 15 (skanda.7.290.15)
गीतवाद्यरतस्तत्र वेश्यासु निरतो भृशम्। प्रजोपद्रवकृन्मूर्खः सर्वधर्मबहिष्कृतः
gītavādyaratastatra veśyāsu nirato bhṛśam| prajopadravakṛnmūrkhaḥ sarvadharmabahiṣkṛtaḥ
वहाँ वह गीत-वाद्य में रत, वेश्याओं में अत्यंत आसक्त, प्रजा को कष्ट देने वाला मूर्ख और सब धर्मों से बहिष्कृत था।
श्लोक 16 (skanda.7.290.16)
किन्त्वर्चयन्सदैवासौ लिंगं राज्यक्रमागतम्। पुष्पस्रग्धूपनैवेद्यगंधादिभिरमन्त्रवत्
kintvarcayansadaivāsau liṁgaṁ rājyakramāgatam| puṣpasragdhūpanaivedyagaṁdhādibhiramantravat
फिर भी वह राजवंश-परंपरा से प्राप्त शिवलिंग की सदा पूजा करता था—पुष्प, माला, धूप, नैवेद्य, गंध आदि से, यद्यपि मंत्रविहीन होकर।
श्लोक 17 (skanda.7.290.17)
मुख्येषु च सदा काले देवतायतनेषु च। दद्यात्स बहुलान्दीपान्वर्तिभिश्च समुज्ज्वलान्
mukhyeṣu ca sadā kāle devatāyataneṣu ca| dadyātsa bahulāndīpānvartibhiśca samujjvalān
और सदा प्रमुख कालों में देवताओं के मंदिरों में वह बत्तियों से जगमगाते अनेक दीपक अर्पित करता था।
श्लोक 18 (skanda.7.290.18)
कदाचिन्मृगयासक्तो बभ्राम स च वीर्यवान्। प्रभासक्षेत्रमागात्य पूर्वसंस्कारभावितः
kadācinmṛgayāsakto babhrāma sa ca vīryavān| prabhāsakṣetramāgātya pūrvasaṁskārabhāvitaḥ
एक बार वह पराक्रमी राजा शिकार में आसक्त होकर घूमते हुए पूर्वजन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर प्रभासक्षेत्र में आ गया।
श्लोक 19 (skanda.7.290.19)
परैरभिहतो युद्धे न्यंकुमत्यास्तटे शुभे। शिवपूजाविधानेन विध्वस्ताशेषपातकः
parairabhihato yuddhe nyaṁkumatyāstaṭe śubhe| śivapūjāvidhānena vidhvastāśeṣapātakaḥ
न्यंकुमती के शुभ तट पर शत्रुओं द्वारा युद्ध में मारा जाकर, उसके किए हुए शिवपूजा-विधान से उसके समस्त पाप नष्ट हो गए।
श्लोक 20 (skanda.7.290.20)
ततो विश्रवसश्चासौ पुत्रोऽभूद्भुवि विश्रुतः। यः स एव महातेजाः सर्वयज्ञाधिपो बली
tato viśravasaścāsau putro'bhūdbhuvi viśrutaḥ| yaḥ sa eva mahātejāḥ sarvayajñādhipo balī
फिर वह विश्रवा का पुत्र होकर पृथ्वी पर विख्यात हुआ—वही महातेजस्वी, समस्त यज्ञों का अधिपति, बलवान,
श्लोक 21 (skanda.7.290.21)
कुबेर इति धर्मात्मा श्रुतशीलसमन्वितः। लिंगं प्रतिष्ठयामास न्यंकुमत्याश्च पूर्वतः
kubera iti dharmātmā śrutaśīlasamanvitaḥ| liṁgaṁ pratiṣṭhayāmāsa nyaṁkumatyāśca pūrvataḥ
कुबेर नाम से धर्मात्मा, शास्त्रज्ञान और सुशीलता से संपन्न; उसने न्यंकुमती के पूर्व में एक लिंग की प्रतिष्ठा की।
श्लोक 22 (skanda.7.290.22)
कौबेरात्पश्चिमे भागे सोमनाथेति विश्रुतम्। संपूज्य च यथेशानं न्यंकुमत्यास्तटे शुभे। स्तोत्रेणानेन चास्तौषीद्भक्त्या तं सर्वकामदम्
kauberātpaścime bhāge somanātheti viśrutam| saṁpūjya ca yatheśānaṁ nyaṁkumatyāstaṭe śubhe| stotreṇānena cāstauṣīdbhaktyā taṁ sarvakāmadam
कौबेर स्थान के पश्चिम भाग में सोमनाथ नाम से विख्यात लिंग की स्थापना कर, न्यंकुमती के शुभ तट पर विधिपूर्वक ईशान की पूजा करके, उसने भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र से सर्वकामद शिव की स्तुति की।
श्लोक 23 (skanda.7.290.23)
मूर्तिः क्वापि महेश्वरस्य महती यज्ञस्य मूलोदया तुम्बी तुंगफलावती च शतशो ब्रह्माण्डकोटिस्तथा। यन्मानं न पितामहो न च हरिर्ब्रह्माण्डमध्यस्थितो जानात्यन्यसुरेषु का च गणना सा संततं वोऽवतात्
mūrtiḥ kvāpi maheśvarasya mahatī yajñasya mūlodayā tumbī tuṁgaphalāvatī ca śataśo brahmāṇḍakoṭistathā| yanmānaṁ na pitāmaho na ca harirbrahmāṇḍamadhyasthito jānātyanyasureṣu kā ca gaṇanā sā saṁtataṁ vo'vatāt
महेश्वर की मूर्ति कहीं यज्ञ के समान विशाल है, जिसका उद्गम फल से लदी हुई ऊँची तुंबी के समान है और जिसमें सैकड़ों ब्रह्मांड-कोटियाँ समाई हैं; जिसका परिमाण ब्रह्मांड के मध्य स्थित ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं जानते, फिर अन्य देवताओं की तो गणना ही क्या—वह सदा हमारी रक्षा करे।
श्लोक 24 (skanda.7.290.24)
नमाम्यहं देवमजं पुराणमुपेन्द्रमिन्द्रावरराजजुष्टम्। शशांकसूर्याग्निसमाननेत्रं वृषेन्द्रचिह्नं प्रलयादिहेतुम्
namāmyahaṁ devamajaṁ purāṇamupendramindrāvararājajuṣṭam| śaśāṁkasūryāgnisamānanetraṁ vṛṣendracihnaṁ pralayādihetum
मैं उस अजन्मा, पुराण, उपेंद्र और श्रेष्ठ इंद्रों से सेवित देव को नमस्कार करता हूँ, जिसके नेत्र चंद्र, सूर्य और अग्नि के समान हैं, जिसका चिह्न वृषभ है, जो प्रलय आदि का कारण है।
श्लोक 25 (skanda.7.290.25)
सर्वेश्वरैकत्रिबलैकबन्धुं योगाधिगम्यं जगतोऽधिवासम्। तं विस्मयाधारमनंतशक्तिं ज्ञानोद्भवं धैर्यगुणाधिकं च
sarveśvaraikatribalaikabandhuṁ yogādhigamyaṁ jagato'dhivāsam| taṁ vismayādhāramanaṁtaśaktiṁ jñānodbhavaṁ dhairyaguṇādhikaṁ ca
समस्त ईश्वरों की त्रिशक्तियों के एकमात्र बंधु, योग से जानने योग्य, जगत के आश्रय, आश्चर्य के आधार, अनंत शक्तिशाली, ज्ञान के उद्गम, धैर्यगुण में अद्वितीय उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 26 (skanda.7.290.26)
पिनाकपाशांकुशशूलहस्तं कपर्दिनं मेघसमानघोषम्। सकालकण्ठं स्फटिकावभासं नमामि शंभुं भुवनैकनाथम्
pinākapāśāṁkuśaśūlahastaṁ kapardinaṁ meghasamānaghoṣam| sakālakaṇṭhaṁ sphaṭikāvabhāsaṁ namāmi śaṁbhuṁ bhuvanaikanātham
पिनाक, पाश, अंकुश और शूल जिनके हाथों में हैं, जटाधारी, मेघ के समान गंभीर घोष वाले, नीलकंठ, स्फटिक के समान कांतिमान शंभु को, भुवन के एकमात्र स्वामी को, मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 27 (skanda.7.290.27)
कपालिनं मालिनमादिदेवं जटाधरं भीमभुजंगहारम्। प्रभासितारं च सहस्रमूर्तिं सहस्रशीर्षं पुरुषं विशिष्टम्
kapālinaṁ mālinamādidevaṁ jaṭādharaṁ bhīmabhujaṁgahāram| prabhāsitāraṁ ca sahasramūrtiṁ sahasraśīrṣaṁ puruṣaṁ viśiṣṭam
कपाल धारण करने वाले, मालाधारी, आदिदेव, जटाधर, भयंकर सर्पों की माला पहनने वाले, प्रकाशक, सहस्ररूप, सहस्रशीर्ष, विशिष्ट पुरुष को नमस्कार है।
श्लोक 28 (skanda.7.290.28)
यदक्षरं निर्गुणमप्रमेयं सज्योतिरेकं प्रवदंति संतः। दूरंगमं वेद्यमनिंद्यवन्द्यं सर्वेषु हृत्स्थं परमं पवित्रम्
yadakṣaraṁ nirguṇamaprameyaṁ sajyotirekaṁ pravadaṁti saṁtaḥ| dūraṁgamaṁ vedyamaniṁdyavandyaṁ sarveṣu hṛtsthaṁ paramaṁ pavitram
जो अक्षर, निर्गुण, अप्रमेय और स्वयंज्योति एक हैं, ऐसा संत कहते हैं; जो दूरगामी, ज्ञेय, निंदारहित, वंदनीय, सबके हृदय में स्थित परम पवित्र हैं।
श्लोक 29 (skanda.7.290.29)
तेजोनिभं बालमृगांकमौलिं नमामि रुद्रं स्फुरदुग्रवक्त्रम्। कालेन्धनं कामदमस्तसंगं धर्मासनस्थं प्रकृतिद्वयस्थम्
tejonibhaṁ bālamṛgāṁkamauliṁ namāmi rudraṁ sphuradugravaktram| kālendhanaṁ kāmadamastasaṁgaṁ dharmāsanasthaṁ prakṛtidvayastham
तेज के समान कांतिवाले, बालचंद्र से मंडित मस्तक वाले, प्रचंड उग्र मुख वाले रुद्र को मैं नमस्कार करता हूँ, जो काल के ईंधन हैं, इच्छाओं के दाता हैं, आसक्तिरहित हैं, धर्म के आसन पर स्थित हैं, प्रकृति के दोनों रूपों में स्थित हैं।
श्लोक 30 (skanda.7.290.30)
अतीन्द्रियं विश्वभुजं जितारिं गुणत्रयातीतमजं निरीहम्। तमोमयं वेदमयं चिदंशं प्रजापतीशं पुरुहूतमिन्द्रम्। अनागतैकध्वनिरूपमाद्यं ध्यायंति यं योगविदो यतीन्द्राः
atīndriyaṁ viśvabhujaṁ jitāriṁ guṇatrayātītamajaṁ nirīham| tamomayaṁ vedamayaṁ cidaṁśaṁ prajāpatīśaṁ puruhūtamindram| anāgataikadhvanirūpamādyaṁ dhyāyaṁti yaṁ yogavido yatīndrāḥ
इंद्रियों से परे, विश्व को धारण करने वाले, शत्रुओं पर विजयी, तीनों गुणों से परे, अजन्मा, इच्छारहित, तमोमय, वेदमय, चैतन्य के अंश, प्रजापतियों के स्वामी, पुरुहूत इंद्ररूप, अनाहत नाद जैसे आद्य स्वरूप वाले जिनका योगी और यतीश्वर ध्यान करते हैं।
श्लोक 31 (skanda.7.290.31)
संसारपाशच्छिदुरं विमुक्तः पुनः पुनस्त्वां प्रणमामि देवम्
saṁsārapāśacchiduraṁ vimuktaḥ punaḥ punastvāṁ praṇamāmi devam
संसार के पाश को काटने वाले उस देव को, मुक्त होकर, मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 32 (skanda.7.290.32)
निरूपमास्यं च बलप्रभावं न च स्वभावं परमस्य पुंसः। विज्ञायते विष्णुपितामहाद्यैस्तं वामदेवं प्रणमाम्यचिंत्यम्
nirūpamāsyaṁ ca balaprabhāvaṁ na ca svabhāvaṁ paramasya puṁsaḥ| vijñāyate viṣṇupitāmahādyaistaṁ vāmadevaṁ praṇamāmyaciṁtyam
जिसका अनुपम स्वरूप, बल और प्रभाव तथा परम पुरुष का स्वभाव विष्णु, ब्रह्मा आदि भी नहीं जान पाते, उस अचिंत्य वामदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 33 (skanda.7.290.33)
शिवं समाराध्य तमुग्रमूर्त्तिं पपौ समुद्रं भगवानगस्त्यः। लेभे दिलीपोऽप्यखिलांश्च कामांस्तं विश्वयोनिं शरणं प्रपद्ये
śivaṁ samārādhya tamugramūrttiṁ papau samudraṁ bhagavānagastyaḥ| lebhe dilīpo'pyakhilāṁśca kāmāṁstaṁ viśvayoniṁ śaraṇaṁ prapadye
उस उग्रमूर्ति शिव की आराधना करके भगवान अगस्त्य ने समुद्र पी लिया; राजा दिलीप ने भी सभी कामनाएँ पाईं—उस विश्वयोनि की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 34 (skanda.7.290.34)
देवेन्द्रवन्द्योद्धर मामनाथं शम्भो कृपाकारुणिकः किल त्वम्। दुःखाऽर्णवे मग्नमुमेश दीनं समुद्धर त्वं भव शंकरोऽसि
devendravandyoddhara māmanāthaṁ śambho kṛpākāruṇikaḥ kila tvam| duḥkhā'rṇave magnamumeśa dīnaṁ samuddhara tvaṁ bhava śaṁkaro'si
हे शंभो, देवेंद्र से वंदित, मुझ अनाथ का उद्धार करो, आप तो कृपालु और करुणामय हैं; हे उमेश, दुःख के सागर में डूबे हुए इस दीन को उबार लो—आप शंकर (कल्याणकारी) हैं।
श्लोक 35 (skanda.7.290.35)
संपूजयन्तो दिवि देवसंघा ब्रह्मेन्द्ररुद्रा विहरंति कामम्। तं स्तौमि नौमीह जपामि शर्वं वन्देऽभिवंद्यं शरणं प्रपन्नः
saṁpūjayanto divi devasaṁghā brahmendrarudrā viharaṁti kāmam| taṁ staumi naumīha japāmi śarvaṁ vande'bhivaṁdyaṁ śaraṇaṁ prapannaḥ
स्वर्ग में देवताओं के समूह, ब्रह्मा, इंद्र और रुद्र, पूजा करते हुए सुखपूर्वक विचरण करते हैं; उसी की मैं स्तुति करता हूँ, वंदना करता हूँ, यहाँ जप करता हूँ—शर्व को, वंदनीय को, शरणागत होकर नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 36 (skanda.7.290.36)
स्तुत्वैवमीशं विरराम यावत्तावत्स रुद्रोऽर्कसहस्रतेजाः। ददौ च तस्मै वरदोंऽधकारिर्वरत्रयं वैश्रवणाय देवः। सख्यं च दिक्पालपदं चतुर्थं धनाधिपत्यं च दिवौकसां च
stutvaivamīśaṁ virarāma yāvattāvatsa rudro'rkasahasratejāḥ| dadau ca tasmai varadoṁ'dhakārirvaratrayaṁ vaiśravaṇāya devaḥ| sakhyaṁ ca dikpālapadaṁ caturthaṁ dhanādhipatyaṁ ca divaukasāṁ ca
इस प्रकार ईश की स्तुति करते हुए जब वह रुक गया, तब सहस्र सूर्यों के तेज वाले, अंधकासुर के शत्रु उस रुद्र देव ने उसे वैश्रवण के लिए तीन वर दिए—सख्य, दिक्पालों में चौथा पद, और स्वर्गवासियों में धनाधिपत्य।
श्लोक 37 (skanda.7.290.37)
यस्मादत्र त्वया सम्यङ्न्यंकुमत्यास्तटे शुभे। आराधितोऽहं विधिवत्कृत्वा मूर्त्तिं महीमयीम्
yasmādatra tvayā samyaṅnyaṁkumatyāstaṭe śubhe| ārādhito'haṁ vidhivatkṛtvā mūrttiṁ mahīmayīm
'क्योंकि यहाँ, न्यंकुमती के शुभ तट पर, तुमने मेरी मिट्टी की मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक मेरी आराधना की है,
श्लोक 38 (skanda.7.290.38)
तस्मात्तवैव नाम्ना तत्स्थानं ख्यातं भविष्यति। कुबेरनगरेत्येवं मम प्रीतिप्रदायकम्
tasmāttavaiva nāmnā tatsthānaṁ khyātaṁ bhaviṣyati| kuberanagaretyevaṁ mama prītipradāyakam
इसलिए तुम्हारे ही नाम से वह स्थान विख्यात होगा—कुबेरनगर इस नाम से, जो मुझे प्रिय है।
श्लोक 39 (skanda.7.290.39)
त्वया प्रतिष्ठितं लिंगमस्मात्स्थानाच्च पश्चिमे। उमानाथस्य विधिवत्सोमनाथेति तत्स्मृतम्
tvayā pratiṣṭhitaṁ liṁgamasmātsthānācca paścime| umānāthasya vidhivatsomanātheti tatsmṛtam
तुमने इस स्थान से पश्चिम में जो लिंग स्थापित किया है, वह उमानाथ का लिंग विधिपूर्वक सोमनाथ नाम से स्मृत होगा।
श्लोक 40 (skanda.7.290.40)
श्रीपंचम्यां विधानेन यस्तच्च पूजयिष्यति। सप्तपुरुषावधिर्यावत्तस्य लक्ष्मीर्भविष्यति
śrīpaṁcamyāṁ vidhānena yastacca pūjayiṣyati| saptapuruṣāvadhiryāvattasya lakṣmīrbhaviṣyati
जो कोई श्रीपंचमी के दिन विधिपूर्वक उसकी पूजा करेगा, उसकी लक्ष्मी सात पीढ़ियों तक बनी रहेगी।