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प्रभास खण्ड · अध्याय 293

कुबेरस्थानोत्पत्तौ कुबेरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 292अध्याय-सूचीअध्याय 294

श्लोक 1 (skanda.7.293.1)

ईश्वर उवाच। तस्माद्वैश्रवणस्थानान्नैर्ऋत्यां वरवर्णिनि। स्वयं स्थितः कुबेरस्तु सर्वदारिद्र्यनाशनः

īśvara uvāca| tasmādvaiśravaṇasthānānnairṛtyāṁ varavarṇini| svayaṁ sthitaḥ kuberastu sarvadāridryanāśanaḥ

ईश्वर ने कहा—हे वरवर्णिनी, उस वैश्रवण-स्थान से नैऋत्य दिशा में कुबेर स्वयं विराजमान हैं, जो समस्त दरिद्रता के नाशक हैं,

श्लोक 2 (skanda.7.293.2)

मकरादिनिधानैस्तु अष्टाभिः परिभूषितः। पञ्चम्यां पूजयेद्भक्त्या गन्धपुष्पानुलेपनैः। निधानप्राप्तिरतुला निर्विघ्ना तस्य जायते

makarādinidhānaistu aṣṭābhiḥ paribhūṣitaḥ| pañcamyāṁ pūjayedbhaktyā gandhapuṣpānulepanaiḥ| nidhānaprāptiratulā nirvighnā tasya jāyate

मकर आदि आठ निधियों से सुशोभित। जो पंचमी को गंध, पुष्प और अनुलेपन से भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, उसे निर्विघ्न और अतुल निधि की प्राप्ति होती है।

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