प्रभास खण्ड · अध्याय 301
सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.301.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि सिद्धेश्वरमनुत्तमम्। तस्यैव पूर्वदिग्भागे नातिदूरे व्यवस्थितम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi siddheśvaramanuttamam| tasyaiva pūrvadigbhāge nātidūre vyavasthitam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, फिर उसी के पूर्व भाग में, न अधिक दूर स्थित अनुपम सिद्धेश्वर को जाओ।
श्लोक 2 (skanda.7.301.2)
यदा देवैः समेत्याशु शिवलिंगं प्रतिष्ठितम्। संगालेश्वर नामाढ्यं सर्वपापहरं शुभम्
yadā devaiḥ sametyāśu śivaliṁgaṁ pratiṣṭhitam| saṁgāleśvara nāmāḍhyaṁ sarvapāpaharaṁ śubham
जब देवताओं द्वारा शीघ्र मिलकर संगालेश्वर नाम से युक्त, शुभ, सर्वपापहर शिवलिंग की प्रतिष्ठा की गई,
श्लोक 3 (skanda.7.301.3)
तदा सिद्धगणाः सर्वे समाराध्य वृषध्वजम्। स्थापयांचक्रिरे लिंगं सर्वसिद्धिप्रदायकम्
tadā siddhagaṇāḥ sarve samārādhya vṛṣadhvajam| sthāpayāṁcakrire liṁgaṁ sarvasiddhipradāyakam
तब सिद्धगणों ने वृषभध्वज की भलीभाँति आराधना करके सर्वसिद्धिप्रदायक लिंग की स्थापना की।
श्लोक 4 (skanda.7.301.4)
तत्सिद्धेश्वर नामाढ्यं महापातकनाशनम्। तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैस्तदा सिद्धगणाः शिवम्
tatsiddheśvara nāmāḍhyaṁ mahāpātakanāśanam| tuṣṭuvurvividhaiḥ stotraistadā siddhagaṇāḥ śivam
सिद्धेश्वर नाम से युक्त, महापातकनाशक उस [लिंग] की सिद्धगणों ने तब विविध स्तोत्रों से शिव की स्तुति करते हुए पूजा की।
श्लोक 5 (skanda.7.301.5)
ततस्तुष्टो महादेवो याच्यतां वरमुत्तमम्। नमस्कृत्य ततः सर्वे प्रोचुश्च शशिशेखरम्
tatastuṣṭo mahādevo yācyatāṁ varamuttamam| namaskṛtya tataḥ sarve procuśca śaśiśekharam
तब प्रसन्न महादेव ने कहा—'श्रेष्ठ वर माँगो'; तब सभी ने नमस्कार करके चंद्रशेखर से कहा—
श्लोक 6 (skanda.7.301.6)
इहागत्य नरो यस्तु स्नात्वा च विधिपूर्वकम्। अर्चयेत्सिद्धनाथं च जपेच्च शतरुद्रियम्
ihāgatya naro yastu snātvā ca vidhipūrvakam| arcayetsiddhanāthaṁ ca japecca śatarudriyam
'जो मनुष्य यहाँ आकर विधिपूर्वक स्नान करके सिद्धनाथ की अर्चना करे और शतरुद्रिय का जप करे,
श्लोक 7 (skanda.7.301.7)
अघोरं वा जपेन्मन्त्रं गायत्र्यं च महेश्वरम्। षण्मासाभ्यन्तरेणैव जपेच्च मुनिसत्तमाः। अणिमादिगुणैश्वर्यं संसिद्धिं प्राप्नुयाद्ध्रुवम्
aghoraṁ vā japenmantraṁ gāyatryaṁ ca maheśvaram| ṣaṇmāsābhyantareṇaiva japecca munisattamāḥ| aṇimādiguṇaiśvaryaṁ saṁsiddhiṁ prāpnuyāddhruvam
अथवा अघोर मंत्र का, और महेश्वर की गायत्री का जप करे—हे श्रेष्ठ मुनियो, छह महीनों के भीतर ही जप करने वाला निश्चय ही अणिमा आदि ऐश्वर्यों की सिद्धि पाएगा।'
श्लोक 8 (skanda.7.301.8)
ईश्वर उवाच। एवं भविष्यतीत्युक्त्वा ह्यंतर्धानं गतो हरः। सिद्धेश्वरं तु संपूज्य ह्यघोरं च जपेन्नरः
īśvara uvāca| evaṁ bhaviṣyatītyuktvā hyaṁtardhānaṁ gato haraḥ| siddheśvaraṁ tu saṁpūjya hyaghoraṁ ca japennaraḥ
ईश्वर ने कहा—ऐसा होगा, यह कहकर हर अंतर्धान हो गए; और मनुष्य सिद्धेश्वर की पूजा करके अघोर का जप करता है—
श्लोक 9 (skanda.7.301.9)
आश्वयुक्कृष्णपक्षे तु चतुर्दश्यां महानिशि। धैर्यमालंब्य निर्भीकः स सिद्धिं प्राप्नुयान्नरः
āśvayukkṛṣṇapakṣe tu caturdaśyāṁ mahāniśi| dhairyamālaṁbya nirbhīkaḥ sa siddhiṁ prāpnuyānnaraḥ
आश्विन के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को, महानिशा में, धैर्य धारण कर निर्भय होकर, वह मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (skanda.7.301.10)
इत्येतत्कथितं देवि माहात्म्यं पापनाशनम्। सिद्धेश्वरस्य देवस्य सर्वकामफलप्रदम्
ityetatkathitaṁ devi māhātmyaṁ pāpanāśanam| siddheśvarasya devasya sarvakāmaphalapradam
हे देवी, इस प्रकार सिद्धेश्वर देव का यह पापनाशक, मनुष्यों की सब कामनाओं का फल देने वाला माहात्म्य कहा गया।