प्रभास खण्ड · अध्याय 304
संगालेश्वरसमीपवर्तिगंगामाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.304.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि गंगां त्रिपथगामिनीम्। संगालेशादथैशान्यां धनुषां सप्तके स्थिताम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi gaṁgāṁ tripathagāminīm| saṁgāleśādathaiśānyāṁ dhanuṣāṁ saptake sthitām
ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, फिर संगालेश से ईशान दिशा में, सात धनुष की दूरी पर स्थित, त्रिपथगामिनी गंगा को जाओ।
श्लोक 2 (skanda.7.304.2)
तस्यां त्रिनेत्रा मत्स्याः स्युर्नित्यमांभसिकाः प्रिये। कलौयुगेऽपि दृश्यंते सत्यंसत्यं मयोदितम्
tasyāṁ trinetrā matsyāḥ syurnityamāṁbhasikāḥ priye| kalauyuge'pi dṛśyaṁte satyaṁsatyaṁ mayoditam
हे प्रिये, उसमें सदा जल में रहने वाली त्रिनेत्र मछलियाँ हैं; कलियुग में भी वे दिखाई देती हैं—यह मैंने सत्य-सत्य कहा है।
श्लोक 3 (skanda.7.304.3)
तस्यां स्नात्वा महादेवि मुच्यते पञ्चपातकैः
tasyāṁ snātvā mahādevi mucyate pañcapātakaiḥ
हे महादेवी, उसमें स्नान करने से मनुष्य पाँच महापातकों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.7.304.4)
सूत उवाच। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विस्मिता गिरिजा सती। उवाच तं द्विजश्रेष्ठाः प्रचलच्चंद्रशेखरम्
sūta uvāca| tasya tadvacanaṁ śrutvā vismitā girijā satī| uvāca taṁ dvijaśreṣṭhāḥ pracalaccaṁdraśekharam
सूत ने कहा—उनके उस वचन को सुनकर, विस्मित हुई सती गिरिजा ने द्विजश्रेष्ठो, चंचल चंद्रशेखर से कहा।
श्लोक 5 (skanda.7.304.5)
पार्वत्युवाच। कथं तत्र समायाता गंगा त्रिपथगामिनी। कथं त्रिनेत्राः संजाता मत्स्या आंभसिकाः शिव
pārvatyuvāca| kathaṁ tatra samāyātā gaṁgā tripathagāminī| kathaṁ trinetrāḥ saṁjātā matsyā āṁbhasikāḥ śiva
पार्वती ने कहा—हे शिव, वहाँ त्रिपथगामिनी गंगा कैसे आईं? और जल में रहने वाली मछलियाँ त्रिनेत्र कैसे हुईं?
श्लोक 6 (skanda.7.304.6)
एतद्विस्तरतो ब्रूहि यद्यहं ते प्रिया विभो
etadvistarato brūhi yadyahaṁ te priyā vibho
हे विभु, यदि मैं आपकी प्रिया हूँ, तो यह मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 7 (skanda.7.304.7)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यदि पृच्छसि मां शुभे। आस्तिकाः श्रद्दधानाश्च भवंतीति मतिर्मम
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi yadi pṛcchasi māṁ śubhe| āstikāḥ śraddadhānāśca bhavaṁtīti matirmama
ईश्वर ने कहा—हे शुभे, सुनो, चूँकि तुम मुझसे पूछती हो, मैं कहूँगा; मेरा मत है कि इससे आस्तिक जन श्रद्धावान होते हैं।
श्लोक 8 (skanda.7.304.8)
यदा शप्तो महादेवो ह्यज्ञानतिमिरावृतैः। ऋषिभिः कोपयुक्तैश्च कस्मिंश्चित्कारणांतरे
yadā śapto mahādevo hyajñānatimirāvṛtaiḥ| ṛṣibhiḥ kopayuktaiśca kasmiṁścitkāraṇāṁtare
जब महादेव किसी अन्य कारण से, अज्ञान के अंधकार से घिरे और क्रोध से युक्त ऋषियों द्वारा शापित हुए,
श्लोक 9 (skanda.7.304.9)
तदा ते मुनयः सर्वे शप्तं ज्ञात्वा महेश्वरम्। निरानंदं जगत्सर्वं दृष्ट्वा चात्मानमेव च
tadā te munayaḥ sarve śaptaṁ jñātvā maheśvaram| nirānaṁdaṁ jagatsarvaṁ dṛṣṭvā cātmānameva ca
तब वे सभी मुनि, महेश्वर के शापित होने को जानकर, समस्त जगत को और स्वयं को भी आनंदरहित देखकर,
श्लोक 10 (skanda.7.304.10)
आराध्य परमेशानं दधतं गजरूपकम्। उन्नतं स्थानमानीय सानंदं चक्रिरे द्विजाः
ārādhya parameśānaṁ dadhataṁ gajarūpakam| unnataṁ sthānamānīya sānaṁdaṁ cakrire dvijāḥ
गजरूप धारण करने वाले परमेश की आराधना करके, उन्नत स्थान पर लाकर, द्विजों ने आनंदपूर्वक [उनकी स्थापना] की।
श्लोक 11 (skanda.7.304.11)
ततः प्रभृति सर्वे ते शिवद्रोहकरं परम्। आत्मानं मेनिरे नित्यं प्रसन्नेऽपि महेश्वरे
tataḥ prabhṛti sarve te śivadrohakaraṁ param| ātmānaṁ menire nityaṁ prasanne'pi maheśvare
तब से लेकर, महेश्वर के प्रसन्न हो जाने पर भी, वे सब सदा स्वयं को शिव के प्रति महान अपराधी ही मानते रहे।
श्लोक 12 (skanda.7.304.12)
महोदयान्महातीर्थं सर्व आगत्य सत्वरम्। तपस्तेपुर्महाघोरं संगालेश्वरसन्निधौ
mahodayānmahātīrthaṁ sarva āgatya satvaram| tapastepurmahāghoraṁ saṁgāleśvarasannidhau
महोदय नामक महातीर्थ से शीघ्र ही आकर, वे सब संगालेश्वर के समीप अत्यंत घोर तप करने लगे।
श्लोक 13 (skanda.7.304.13)
संगालेश्वरनामानं सर्वे पूज्य यथाविधि। भृगुरत्रिस्तथा मंकिः कश्यपः कण्व एव च
saṁgāleśvaranāmānaṁ sarve pūjya yathāvidhi| bhṛguratristathā maṁkiḥ kaśyapaḥ kaṇva eva ca
संगालेश्वर नाम वाले देव की विधिपूर्वक पूजा करके सब—भृगु, अत्रि, मंकि, कश्यप और कण्व भी,
श्लोक 14 (skanda.7.304.14)
गौतमः कौशिकश्चैव कुशिकश्च महातपाः। शूकरोऽथ भरद्वाजो भार्गविश्च महातपाः
gautamaḥ kauśikaścaiva kuśikaśca mahātapāḥ| śūkaro'tha bharadvājo bhārgaviśca mahātapāḥ
गौतम, कौशिक, और महातपस्वी कुशिक, शूकर, भरद्वाज, और महातपस्वी भार्गव,
श्लोक 15 (skanda.7.304.15)
जातूकर्ण्यो वसिष्ठश्च सावर्णिश्च पराशरः। शांडिल्यश्च पुलस्त्यश्च वत्सश्चैव महातपाः
jātūkarṇyo vasiṣṭhaśca sāvarṇiśca parāśaraḥ| śāṁḍilyaśca pulastyaśca vatsaścaiva mahātapāḥ
जातूकर्ण्य, वसिष्ठ, सावर्णि, पराशर, शांडिल्य, पुलस्त्य, और महातपस्वी वत्स भी—
श्लोक 16 (skanda.7.304.16)
एते चान्ये च बहवो ह्यसंख्याता महर्षयः
ete cānye ca bahavo hyasaṁkhyātā maharṣayaḥ
ये और अन्य भी अनेक असंख्य महर्षि,
श्लोक 17 (skanda.7.304.17)
संगालेश्वरमासाद्य प्रभासे पापनाशने। तपः कुर्वंति सततं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्
saṁgāleśvaramāsādya prabhāse pāpanāśane| tapaḥ kurvaṁti satataṁ pratiṣṭhāpya maheśvaram
पापनाशक प्रभास में संगालेश्वर के पास आकर, महेश्वर को प्रतिष्ठित कर निरंतर तप करने लगे।
श्लोक 18 (skanda.7.304.18)
ततः कालेन महता ते सर्वे मुनिपुंगवाः। ध्यानात्त्रिलोचनस्यैव अदृष्टे तु महेश्वरे
tataḥ kālena mahatā te sarve munipuṁgavāḥ| dhyānāttrilocanasyaiva adṛṣṭe tu maheśvare
फिर बहुत काल बीतने पर, वे सभी श्रेष्ठ मुनि, त्रिलोचन के ध्यान से ही—यद्यपि महेश्वर अदृश्य ही रहे—
श्लोक 19 (skanda.7.304.19)
त्रिनेत्रत्वमनुप्राप्तास्तपोनिष्ठास्तपोधनाः। परस्परं वीक्षमाणास्त्रिनेत्रस्याभिशंकया
trinetratvamanuprāptāstaponiṣṭhāstapodhanāḥ| parasparaṁ vīkṣamāṇāstrinetrasyābhiśaṁkayā
स्वयं त्रिनेत्रता को प्राप्त हो गए, वे तपोनिष्ठ, तपोधन; त्रिनेत्रता की आशंका से एक-दूसरे को देखते हुए,
श्लोक 20 (skanda.7.304.20)
स्तुवंति विविधैः स्तोत्रैर्मन्यमाना महेश्वरम्। ज्ञात्वा ध्यानेन देवस्य त्रिनेत्रत्वमुपागताः
stuvaṁti vividhaiḥ stotrairmanyamānā maheśvaram| jñātvā dhyānena devasya trinetratvamupāgatāḥ
विविध स्तोत्रों से महेश्वर की स्तुति करने लगे, उन्हें ही आदरणीय मानते हुए; ध्यान से यह जानकर कि उन्हें देव की त्रिनेत्रता प्राप्त हुई है,
श्लोक 21 (skanda.7.304.21)
चकुरुग्रं तपस्ते तु पूजां देवस्य शूलिनः। तेषु वै तप्यमानेषु कृपाविष्टो महेश्वरः
cakurugraṁ tapaste tu pūjāṁ devasya śūlinaḥ| teṣu vai tapyamāneṣu kṛpāviṣṭo maheśvaraḥ
उन्होंने उग्र तप और शूलपाणि देव की पूजा की। उनके इस प्रकार तप करते रहने पर, कृपा से भरे महेश्वर ने—
श्लोक 22 (skanda.7.304.22)
उवाच तान्मुनीन्सर्वाञ्छृणुध्वं वरमुत्तमम्। प्रसन्नोऽहं मुनिश्रेष्ठास्तपसा पूजयापि च
uvāca tānmunīnsarvāñchṛṇudhvaṁ varamuttamam| prasanno'haṁ muniśreṣṭhāstapasā pūjayāpi ca
उन सभी मुनियों से कहा—'सुनो, श्रेष्ठ वर [माँगो]; हे मुनिश्रेष्ठो, मैं तप से और पूजा से भी प्रसन्न हूँ।'
श्लोक 23 (skanda.7.304.23)
ऋषय ऊचुः। यदि प्रसन्नो देवेश वरं नो दातुमर्हसि। गंगामानय वेगेन ह्यभिषेकाय नो हर
ṛṣaya ūcuḥ| yadi prasanno deveśa varaṁ no dātumarhasi| gaṁgāmānaya vegena hyabhiṣekāya no hara
ऋषियों ने कहा—'हे देवेश, यदि आप प्रसन्न हैं तो हमें वर देने योग्य हैं; हे हर, हमारे अभिषेक के लिए वेगपूर्वक गंगा को लाइए।'
श्लोक 24 (skanda.7.304.24)
तस्यां कृताभिषेकास्तु तव द्रोहकरा वयम्। अज्ञानभावात्पूतत्वं यास्यामः पृथिवीतले
tasyāṁ kṛtābhiṣekāstu tava drohakarā vayam| ajñānabhāvātpūtatvaṁ yāsyāmaḥ pṛthivītale
'उसमें अभिषेक करके हम, जो अज्ञानवश आपके प्रति अपराधी हुए हैं, पृथ्वीतल पर पवित्रता को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 25 (skanda.7.304.25)
ईश्वर उवाच। यूयं पवित्रकरणाः पावनानां च पावनाः। गंगां चैवानयिष्यामि युष्माकं चित्ततुष्टये
īśvara uvāca| yūyaṁ pavitrakaraṇāḥ pāvanānāṁ ca pāvanāḥ| gaṁgāṁ caivānayiṣyāmi yuṣmākaṁ cittatuṣṭaye
ईश्वर ने कहा—'तुम पवित्रता करने वाले और पवित्रों के भी पावन हो; तुम्हारे चित्त की तुष्टि के लिए मैं गंगा को अवश्य लाऊँगा।'
श्लोक 26 (skanda.7.304.26)
पावित्र्याद्भवतां जातं त्रैनेत्र्यं मुनिसत्तमाः। एवमुक्त्वा ततः शंभुर्ध्यानस्तिमितलोचनः। सस्मार क्षणमात्रेण गंगां मीनकुलावृताम्
pāvitryādbhavatāṁ jātaṁ trainetryaṁ munisattamāḥ| evamuktvā tataḥ śaṁbhurdhyānastimitalocanaḥ| sasmāra kṣaṇamātreṇa gaṁgāṁ mīnakulāvṛtām
'हे श्रेष्ठ मुनियो, तुम्हारी पवित्रता से ही त्रिनेत्रता उत्पन्न हुई है।' ऐसा कहकर शंभु ने, ध्यान में स्थिर नेत्रों से, क्षणमात्र में मीनों के समूह से घिरी गंगा का स्मरण किया।
श्लोक 27 (skanda.7.304.27)
स्मृतमात्रा तदा देवी गंगा त्रिपथगामिनी। भित्वा भूमितलं प्राप्ता तत्र मीनकुलावृता
smṛtamātrā tadā devī gaṁgā tripathagāminī| bhitvā bhūmitalaṁ prāptā tatra mīnakulāvṛtā
स्मरण करते ही वह देवी त्रिपथगामिनी गंगा, पृथ्वीतल को भेदकर वहाँ प्रकट हुई, मीनों के समूह से घिरी हुई।
श्लोक 28 (skanda.7.304.28)
ऋषिभिश्च यदा दृष्टा गंगा मीनयुता शुभा। दृष्टमात्रास्तु ते मत्स्यास्त्रिनेत्रत्वमुपागताः
ṛṣibhiśca yadā dṛṣṭā gaṁgā mīnayutā śubhā| dṛṣṭamātrāstu te matsyāstrinetratvamupāgatāḥ
और जब ऋषियों ने मीनयुक्त शुभ गंगा को देखा, तब देखते ही वे मछलियाँ त्रिनेत्रता को प्राप्त हो गईं।
श्लोक 29 (skanda.7.304.29)
ईश्वर उवाच। युष्माकं दर्शनाद्विप्रास्त्रिनेत्रत्वमुपागताः। एतन्निदर्शनं सर्वं लोकानां च प्रदर्शनम्
īśvara uvāca| yuṣmākaṁ darśanādviprāstrinetratvamupāgatāḥ| etannidarśanaṁ sarvaṁ lokānāṁ ca pradarśanam
ईश्वर ने कहा—'हे विप्रो, तुम्हारे दर्शन से ही उन्होंने त्रिनेत्रता प्राप्त की; यह सारा दृष्टांत लोकों के लिए प्रदर्शन है।'
श्लोक 30 (skanda.7.304.30)
ऋषय ऊचुः। अस्मिन्कुंडे महादेव मत्स्यानां संततिः सदा। त्रिनेत्रा त्वत्प्रसादेन भूयात्सर्वा युगेयुगे
ṛṣaya ūcuḥ| asminkuṁḍe mahādeva matsyānāṁ saṁtatiḥ sadā| trinetrā tvatprasādena bhūyātsarvā yugeyuge
ऋषियों ने कहा—'हे महादेव, इस कुण्ड में मछलियों की संतति सदा आपकी कृपा से युग-युग में त्रिनेत्र ही बनी रहे।'
श्लोक 31 (skanda.7.304.31)
अस्मिन्कुंडे समागत्य नरः स्नानं करोति यः। ददाति हेम विप्राय गाश्च वस्त्रं तथा तिलान्
asminkuṁḍe samāgatya naraḥ snānaṁ karoti yaḥ| dadāti hema viprāya gāśca vastraṁ tathā tilān
जो मनुष्य इस कुण्ड में आकर स्नान करता है, और ब्राह्मण को स्वर्ण, गाय, वस्त्र तथा तिल देता है,
श्लोक 32 (skanda.7.304.32)
अमावास्यां विशेषेण त्रिनेत्रः स प्रजायताम्। एवं भविष्यतीत्युक्त्वा ह्यन्तर्धानं गतो हरः
amāvāsyāṁ viśeṣeṇa trinetraḥ sa prajāyatām| evaṁ bhaviṣyatītyuktvā hyantardhānaṁ gato haraḥ
विशेषकर अमावस्या को, वह त्रिनेत्र [के समान पुण्यशाली] हो जाए।' ऐसा होगा, यह कहकर हर अंतर्धान हो गए।
श्लोक 33 (skanda.7.304.33)
ब्राह्मणास्तुष्टिसंयुक्ता गताः सर्वे महोदयम्
brāhmaṇāstuṣṭisaṁyuktā gatāḥ sarve mahodayam
संतोष से युक्त होकर वे सब ब्राह्मण महोदय को चले गए।
श्लोक 34 (skanda.7.304.34)
एतत्ते कथितं देवि गंगामाहात्म्यमुत्तमम्। श्रुतं पापप्रशमनं सर्वकामफलप्रदम्
etatte kathitaṁ devi gaṁgāmāhātmyamuttamam| śrutaṁ pāpapraśamanaṁ sarvakāmaphalapradam
हे देवी, यह तुम्हें गंगा का उत्तम माहात्म्य बताया गया, जिसे सुनना पापों को शांत करने वाला और सब कामनाओं का फल देने वाला है।