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प्रभास खण्ड · अध्याय 306

सांबादित्यमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 305अध्याय-सूचीअध्याय 307

श्लोक 1 (skanda.7.306.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि सांबादित्यमनुत्तमम्। तस्मादुत्तरभागे तु सर्वपातकनाशनम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi sāṁbādityamanuttamam| tasmāduttarabhāge tu sarvapātakanāśanam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, फिर उससे उत्तर भाग में स्थित, समस्त पातकों के नाशक, अनुपम सांबादित्य को जाओ।

श्लोक 2 (skanda.7.306.2)

यत्र सांबस्तपस्तप्त्वा ह्याराध्य च दिवाकरम्। प्राप्तवान्सुन्दरं देहं सहस्रांशुप्रसादतः

yatra sāṁbastapastaptvā hyārādhya ca divākaram| prāptavānsundaraṁ dehaṁ sahasrāṁśuprasādataḥ

जहाँ सांब ने तप करके और दिवाकर की आराधना करके, सहस्रांशु की कृपा से सुंदर देह प्राप्त की।

श्लोक 3 (skanda.7.306.3)

यदा रोषेण संशप्तः पित्रा जांबवतीसुतः। आराधयामास तदा विष्णुं कमललोचनम्

yadā roṣeṇa saṁśaptaḥ pitrā jāṁbavatīsutaḥ| ārādhayāmāsa tadā viṣṇuṁ kamalalocanam

जब जांबवती के पुत्र [सांब] को उसके पिता ने क्रोधवश शाप दिया, तब उसने कमललोचन विष्णु की आराधना की।

श्लोक 4 (skanda.7.306.4)

अनुग्रहार्थं शापस्य सांबो जांबवतीसुतः। प्रसन्नवदनो भूत्वा विष्णुः प्रोवाच तं प्रति

anugrahārthaṁ śāpasya sāṁbo jāṁbavatīsutaḥ| prasannavadano bhūtvā viṣṇuḥ provāca taṁ prati

शाप के निवारण के लिए जांबवती-पुत्र सांब [की प्रार्थना पर], प्रसन्नमुख होकर विष्णु ने उससे कहा—

श्लोक 5 (skanda.7.306.5)

गच्छ प्राभासिके क्षेत्रे ब्रह्मभागमनुत्तमम्। ऋषितोयातटे रम्ये ब्राह्मणैरुपशोभिते

gaccha prābhāsike kṣetre brahmabhāgamanuttamam| ṛṣitoyātaṭe ramye brāhmaṇairupaśobhite

'प्रभासक्षेत्र में ब्रह्मा के अनुपम भाग में जाओ, ब्राह्मणों से सुशोभित ऋषितोया के रम्य तट पर।

श्लोक 6 (skanda.7.306.6)

तत्राऽहं सूर्यरूपेण वरं दास्यामि पुत्रक। इत्युक्तः स तदा सांबो विष्णुना प्रभविष्णुना

tatrā'haṁ sūryarūpeṇa varaṁ dāsyāmi putraka| ityuktaḥ sa tadā sāṁbo viṣṇunā prabhaviṣṇunā

वहाँ मैं सूर्यरूप से तुझे वर दूँगा, हे पुत्र।' प्रभावशाली विष्णु द्वारा ऐसा कहे जाने पर सांब तब—

श्लोक 7 (skanda.7.306.7)

गतः प्राभासिके क्षेत्रे रम्ये शिवपुरे शिवे। तत्राराध्य परं देवं भास्करं वारितस्करम्

gataḥ prābhāsike kṣetre ramye śivapure śive| tatrārādhya paraṁ devaṁ bhāskaraṁ vāritaskaram

रम्य, शिवमय प्रभासक्षेत्र में गया; वहाँ जल के हरने वाले परम देव भास्कर की आराधना करके,

श्लोक 8 (skanda.7.306.8)

प्रसादयामास तदा स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकधा

prasādayāmāsa tadā stutvā stotrairanekadhā

उसने तब अनेक स्तोत्रों से स्तुति करते हुए उन्हें प्रसन्न किया।

श्लोक 9 (skanda.7.306.9)

प्रत्युवाच रविः सांबं प्रसन्नस्ते स्तवेन वै। शीघ्रं गच्छ नरश्रेष्ठ ऋषितोयातटे शुभे

pratyuvāca raviḥ sāṁbaṁ prasannaste stavena vai| śīghraṁ gaccha naraśreṣṭha ṛṣitoyātaṭe śubhe

सूर्य ने सांब से कहा—'तेरी स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ; हे नरश्रेष्ठ, शीघ्र ऋषितोया के शुभ तट पर जा।'

श्लोक 10 (skanda.7.306.10)

इत्युक्तः स तदाऽऽगत्य ऋषितोयातटं शुभम्। नारदो यत्र ब्रह्मर्षिस्तपस्तप्यति चैव हि

ityuktaḥ sa tadā''gatya ṛṣitoyātaṭaṁ śubham| nārado yatra brahmarṣistapastapyati caiva hi

ऐसा कहे जाने पर वह तब ऋषितोया के शुभ तट पर आया, जहाँ ब्रह्मर्षि नारद भी तप कर रहे थे।

श्लोक 11 (skanda.7.306.11)

तत्र गत्वा हरेः सूनुरुन्नतस्थानवासिनः। आसन्ये ब्राह्मणास्तान्स इदं वचनमब्रवीत्

tatra gatvā hareḥ sūnurunnatasthānavāsinaḥ| āsanye brāhmaṇāstānsa idaṁ vacanamabravīt

वहाँ जाकर हरि के पुत्र [सांब] ने उस उन्नत स्थान में निवास करने वाले उन ब्राह्मणों के समीप जाकर यह वचन कहा—

श्लोक 12 (skanda.7.306.12)

सांब उवाच। एष वै ब्रह्मणो भागः प्रभासे क्षेत्र उत्तमे। अत्र वै ब्राह्मणा ये तु ते वै श्रेष्ठाः स्मृता भुवि

sāṁba uvāca| eṣa vai brahmaṇo bhāgaḥ prabhāse kṣetra uttame| atra vai brāhmaṇā ye tu te vai śreṣṭhāḥ smṛtā bhuvi

सांब ने कहा—'यह निश्चय ही उत्तम प्रभासक्षेत्र में ब्रह्मा का भाग है; यहाँ जो ब्राह्मण हैं, वे ही पृथ्वी पर श्रेष्ठ माने गए हैं।

श्लोक 13 (skanda.7.306.13)

भवतां वचनाद्विप्राः सूर्यमाराधयाम्यहम्। मम वै पूर्वमादिष्टं स्थानमेतच्च विष्णुना

bhavatāṁ vacanādviprāḥ sūryamārādhayāmyaham| mama vai pūrvamādiṣṭaṁ sthānametacca viṣṇunā

आपके वचन से, हे विप्रो, मैं सूर्य की आराधना करूँगा; यह स्थान तो पहले ही विष्णु द्वारा मेरे लिए निर्दिष्ट किया गया था।'

श्लोक 14 (skanda.7.306.14)

विप्रा ऊचुः। सिद्धिस्ते भविता सांब आराधय दिवाकरम्। इत्युक्तः स तदा विप्रैः प्रविष्टोऽथ प्रभाकरम्

viprā ūcuḥ| siddhiste bhavitā sāṁba ārādhaya divākaram| ityuktaḥ sa tadā vipraiḥ praviṣṭo'tha prabhākaram

ब्राह्मणों ने कहा—'हे सांब, तुझे सिद्धि प्राप्त होगी; सूर्य की आराधना कर।' ब्राह्मणों द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह तब प्रभाकर की उपासना में लीन हो गया।

श्लोक 15 (skanda.7.306.15)

नित्यमाराधयामास सांबो जांबवतीसुतः। तपोनिष्ठं च तं दृष्ट्वा विष्णुः कारुणिको महान्

nityamārādhayāmāsa sāṁbo jāṁbavatīsutaḥ| taponiṣṭhaṁ ca taṁ dṛṣṭvā viṣṇuḥ kāruṇiko mahān

जांबवती-पुत्र सांब उसकी नित्य आराधना करता रहा; और तपोनिष्ठ उसे देखकर महाकरुणामय विष्णु ने—

श्लोक 16 (skanda.7.306.16)

इदं वै चिन्तयामास पुत्रवात्सल्यसंयुतः। यथैश्वर्यप्रदो रुद्रो यथा विष्णुश्च मुक्तिदः

idaṁ vai cintayāmāsa putravātsalyasaṁyutaḥ| yathaiśvaryaprado rudro yathā viṣṇuśca muktidaḥ

पुत्र-वात्सल्य से युक्त होकर यह विचार किया—'जैसे रुद्र ऐश्वर्य के दाता हैं और विष्णु मुक्ति के दाता,

श्लोक 17 (skanda.7.306.17)

यज्ञैरिष्टो हि देवेन्द्रो यथा स्वर्गप्रदः स्मृतः। शुद्धिकर्तृ यथा तोयं मृत्तिकाभस्मसंयुतम्। दहनात्मा यथा वह्निर्विघ्नहर्त्ता गणेश्वरः

yajñairiṣṭo hi devendro yathā svargapradaḥ smṛtaḥ| śuddhikartṛ yathā toyaṁ mṛttikābhasmasaṁyutam| dahanātmā yathā vahnirvighnaharttā gaṇeśvaraḥ

जैसे यज्ञों से पूजित देवेंद्र स्वर्ग के दाता माने जाते हैं; जैसे मिट्टी और भस्म के साथ जल शुद्धि करने वाला है; जैसे दहनस्वरूप अग्नि [शुद्ध करने वाली है]; जैसे गणेश्वर विघ्नों के हरने वाले हैं;

श्लोक 18 (skanda.7.306.18)

स्वच्छंदभारतीदाने यथा ब्रह्मसुता नृणाम्। तथाऽऽरोग्यप्रदाता च नान्यो देवो दिवाकरात्

svacchaṁdabhāratīdāne yathā brahmasutā nṛṇām| tathā''rogyapradātā ca nānyo devo divākarāt

जैसे ब्रह्मा की पुत्री [सरस्वती] मनुष्यों को स्वच्छंद वाणी देने में [उपकारी] हैं—उसी प्रकार आरोग्य देने वाला सूर्य के अतिरिक्त अन्य कोई देवता नहीं है।'

श्लोक 19 (skanda.7.306.19)

अनेकधाऽऽराधितोऽपि स देवो भास्करः शुचिः। न ददाति वरं यत्तु तन्मे शापस्य कारणात्

anekadhā''rādhito'pi sa devo bhāskaraḥ śuciḥ| na dadāti varaṁ yattu tanme śāpasya kāraṇāt

'वह पवित्र देव भास्कर अनेक प्रकार से आराधित होने पर भी जो वर नहीं देता, वह मेरे ही शाप के कारण है।'

श्लोक 20 (skanda.7.306.20)

एवं संचिन्त्य भगवान्विष्णुः कमललोचनः। सूर्यरूपं समाश्रित्य तस्य तुष्टो जनार्दनः

evaṁ saṁcintya bhagavānviṣṇuḥ kamalalocanaḥ| sūryarūpaṁ samāśritya tasya tuṣṭo janārdanaḥ

इस प्रकार विचार करके भगवान कमललोचन विष्णु जनार्दन, सूर्यरूप का आश्रय लेकर, उस पर प्रसन्न होकर—

श्लोक 21 (skanda.7.306.21)

योऽपरनारायणख्यस्तस्यैव सन्निधौ स्थितः। प्रत्यक्षः स ततो विष्णुः सूर्यरूपी दिवाकरः। उवाच परमप्रीतो वरदः पुण्यकर्मणाम्

yo'paranārāyaṇakhyastasyaiva sannidhau sthitaḥ| pratyakṣaḥ sa tato viṣṇuḥ sūryarūpī divākaraḥ| uvāca paramaprīto varadaḥ puṇyakarmaṇām

जो अपरनारायण नाम से प्रसिद्ध हैं, उन्हीं की सन्निधि में स्थित होकर, वे विष्णु सूर्यरूपधारी दिवाकर होकर प्रत्यक्ष प्रकट हुए, और परम प्रसन्न, वरदाता होकर पुण्यकर्मी सांब से बोले—

श्लोक 22 (skanda.7.306.22)

अलं क्लेशेन ते सांब किमर्थं तप्यसे तपः। प्रसन्नोऽहं हरेः सूनो वरं वरय सुव्रत

alaṁ kleśena te sāṁba kimarthaṁ tapyase tapaḥ| prasanno'haṁ hareḥ sūno varaṁ varaya suvrata

'हे सांब, तेरे इस क्लेश से बस हो; किसलिए तू तप करता है? हे हरिपुत्र, मैं प्रसन्न हूँ; हे सुव्रत, वर माँग।'

श्लोक 23 (skanda.7.306.23)

सांब उवाच। निर्मलस्त्वत्प्रसादेन कुष्ठमुक्तकलेवरः। भवानि देवदेवेश प्रत्यक्षाऽम्बरभूषण। अस्मिन्स्थाने स्थितो रम्ये नित्यं सन्निहितो भव

sāṁba uvāca| nirmalastvatprasādena kuṣṭhamuktakalevaraḥ| bhavāni devadeveśa pratyakṣā'mbarabhūṣaṇa| asminsthāne sthito ramye nityaṁ sannihito bhava

सांब ने कहा—'आपकी कृपा से मैं निर्मल, कुष्ठरोग से मुक्त शरीर वाला हो जाऊँ, हे देवदेवेश, हे आकाश से अलंकृत प्रत्यक्ष देव; इस रम्य स्थान में स्थित होकर सदा यहीं सन्निहित रहिए।'

श्लोक 24 (skanda.7.306.24)

सूर्य उवाच। अधुना निर्मलो देहस्तव सांब भविष्यति। इहागत्य नरो यस्तु सप्तम्यां रविवासरे। उपवासपरो भूत्वा रात्रौ जागरणे स्थितः

sūrya uvāca| adhunā nirmalo dehastava sāṁba bhaviṣyati| ihāgatya naro yastu saptamyāṁ ravivāsare| upavāsaparo bhūtvā rātrau jāgaraṇe sthitaḥ

सूर्य ने कहा—'हे सांब, अब तेरा शरीर निर्मल हो जाएगा। जो मनुष्य यहाँ आकर रविवार को सप्तमी के दिन उपवासपरायण होकर रात्रि में जागरण करता है,

श्लोक 25 (skanda.7.306.25)

अष्टादशानि कुष्ठानि पापरोगास्तथैव च। कदाचिन्न भविष्यन्ति कुले तस्य महात्मनः

aṣṭādaśāni kuṣṭhāni pāparogāstathaiva ca| kadācinna bhaviṣyanti kule tasya mahātmanaḥ

उस महात्मा के कुल में अठारह प्रकार के कुष्ठ रोग तथा पापजनित रोग कभी नहीं होंगे।'

श्लोक 26 (skanda.7.306.26)

कृत्वा स्नानं नरो यस्तु भक्तियुक्तो जितेन्द्रियः। पूजयेद्रविवारेण सांबादित्यं महाप्रभम्। स रोगहीनो धनवान्पुत्रवाञ्जायते नरः

kṛtvā snānaṁ naro yastu bhaktiyukto jitendriyaḥ| pūjayedravivāreṇa sāṁbādityaṁ mahāprabham| sa rogahīno dhanavānputravāñjāyate naraḥ

जो मनुष्य स्नान करके, भक्तियुक्त और जितेंद्रिय होकर, रविवार को महाप्रभावशाली सांबादित्य की पूजा करता है, वह मनुष्य रोगरहित, धनवान और पुत्रवान होता है।

श्लोक 27 (skanda.7.306.27)

तस्यैव पूर्वदिग्भागे किञ्चिदीशानमाश्रितम्। कुंडं पापहरं पुण्यं स्वच्छोदपरि पूरितम्

tasyaiva pūrvadigbhāge kiñcidīśānamāśritam| kuṁḍaṁ pāpaharaṁ puṇyaṁ svacchodapari pūritam

उसी के पूर्व दिशा में, कुछ ईशान की ओर आश्रित, स्वच्छ जल से भरा हुआ पापहर, पवित्र कुण्ड है।

श्लोक 28 (skanda.7.306.28)

तत्र स्नात्वा च विधिवत्कुर्याच्छ्राद्धं विचक्षणः। भोजयेद्ब्राह्मणान्यस्तु सांबादित्यं प्रपूजयेत्

tatra snātvā ca vidhivatkuryācchrāddhaṁ vicakṣaṇaḥ| bhojayedbrāhmaṇānyastu sāṁbādityaṁ prapūjayet

वहाँ स्नान करके विवेकी पुरुष विधिपूर्वक श्राद्ध करे; जो ब्राह्मणों को भोजन कराता है और सांबादित्य की पूजा करता है,

श्लोक 29 (skanda.7.306.29)

सर्वकामसमृद्धात्मा सूर्यलोके महीयते

sarvakāmasamṛddhātmā sūryaloke mahīyate

वह सब कामनाओं से समृद्ध आत्मा वाला होकर सूर्यलोक में महिमामंडित होता है।

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