प्रभास खण्ड · अध्याय 308
मूलचण्डीशोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.308.1)
ईश्वर उवाच। तस्मान्नारायणात्पूर्वे किंचिदीशानसंस्थितम्। मूलचण्डीशनाम्ना तु विख्यातं भुवनत्रयं
īśvara uvāca| tasmānnārāyaṇātpūrve kiṁcidīśānasaṁsthitam| mūlacaṇḍīśanāmnā tu vikhyātaṁ bhuvanatrayaṁ
ईश्वर ने कहा—उस नारायण से पूर्व दिशा में, कुछ ईशान (उत्तर-पूर्व) कोण की ओर स्थित, मूलचण्डीश नाम से तीनों लोकों में विख्यात स्थान है।
श्लोक 2 (skanda.7.308.2)
यत्र लिंगं पुराऽस्माकं पातितं त्वृषिभिः प्रिये। क्रोधरक्तेक्षणैर्देवि मूलचण्डीशतां गतम्
yatra liṁgaṁ purā'smākaṁ pātitaṁ tvṛṣibhiḥ priye| krodharaktekṣaṇairdevi mūlacaṇḍīśatāṁ gatam
हे प्रिये, वहाँ हमारा लिंग प्राचीन काल में क्रोध से लाल नेत्रों वाले ऋषियों द्वारा गिरा दिया गया था, और हे देवि, वह मूलचण्डीश नाम को प्राप्त हुआ।
श्लोक 3 (skanda.7.308.3)
आद्यं लिंगोद्भवं देवि ऋषिकोपान्निपातितम्। ये केचिदृषयस्तत्र देवदारुवने स्थिताः
ādyaṁ liṁgodbhavaṁ devi ṛṣikopānnipātitam| ye kecidṛṣayastatra devadāruvane sthitāḥ
हे देवि, वह आदि स्वयंभू लिंग उन ऋषियों के क्रोध से गिराया गया, जो वहाँ देवदारु वन में निवास करते थे।
श्लोक 4 (skanda.7.308.4)
कालांतरे महादेवि अहं तत्र समागतः। तेषां जिज्ञासया देवि ततस्ते रोषिता भवन्। शप्तस्ततोऽहं देवेशि चक्रुर्मे लिंगपातनम्
kālāṁtare mahādevi ahaṁ tatra samāgataḥ| teṣāṁ jijñāsayā devi tataste roṣitā bhavan| śaptastato'haṁ deveśi cakrurme liṁgapātanam
हे महादेवि, कुछ समय बाद मैं वहाँ आया; हे देवि, उनके प्रति जिज्ञासा के कारण वे रुष्ट हो गए। हे देवेशि, तब मैं शापित हुआ, और उन्होंने मेरा लिंग गिरा दिया।
श्लोक 5 (skanda.7.308.5)
देव्युवाच। रोषोपहतसद्भावाः कथमेते द्विजातयः। संजाता एतदाख्याहि परं कौतूहलं मम
devyuvāca| roṣopahatasadbhāvāḥ kathamete dvijātayaḥ| saṁjātā etadākhyāhi paraṁ kautūhalaṁ mama
देवी ने कहा—ये द्विजगण किस प्रकार क्रोध से अपने सद्भाव को खोकर ऐसे हुए? यह मुझे बताइए, मुझे इसमें बड़ी जिज्ञासा है।
श्लोक 6 (skanda.7.308.6)
ईश्वर उवाच। डिंडिरूपः पुरा देवि भूत्वाऽहं दारुके वने। ऋषीणामाश्रमे पुण्ये नग्नो भिक्षाचरोऽभवम्। भिक्षंतमाश्रमे दृष्ट्वा ताः सर्वा ऋषियोषितः
īśvara uvāca| ḍiṁḍirūpaḥ purā devi bhūtvā'haṁ dāruke vane| ṛṣīṇāmāśrame puṇye nagno bhikṣācaro'bhavam| bhikṣaṁtamāśrame dṛṣṭvā tāḥ sarvā ṛṣiyoṣitaḥ
ईश्वर ने कहा—हे देवि, पूर्वकाल में दारुक वन में डिण्डि (नग्न भिक्षुक) का रूप धारण करके मैं ऋषियों के पवित्र आश्रम में नग्न भिक्षाचारी बन गया। आश्रम में भिक्षा माँगते हुए मुझे देखकर ऋषियों की वे सब पत्नियाँ—
श्लोक 7 (skanda.7.308.7)
कामस्य वशमापन्नाः प्रियमुत्सृज्य सर्वतः। तमूर्ध्वलिंगमालोक्य जटामुकुटधारिणम्
kāmasya vaśamāpannāḥ priyamutsṛjya sarvataḥ| tamūrdhvaliṁgamālokya jaṭāmukuṭadhāriṇam
—समस्त मर्यादा त्यागकर, जटाओं का मुकुट धारण किए हुए तथा ऊर्ध्वलिंग उस रूप को देखकर काम के वशीभूत हो गईं।
श्लोक 8 (skanda.7.308.8)
भिक्षंतं भस्मदिग्धांगं झषकेतुमिवापरम्। विक्षोभिताश्च नः सर्वे दारा एतेन डिंडिना
bhikṣaṁtaṁ bhasmadigdhāṁgaṁ jhaṣaketumivāparam| vikṣobhitāśca naḥ sarve dārā etena ḍiṁḍinā
भस्म से लिप्त अंगों वाले, मानो दूसरे कामदेव के समान भिक्षा माँगते हुए, इस डिण्डि के द्वारा हम सबकी पत्नियाँ विचलित कर दी गईं।
श्लोक 9 (skanda.7.308.9)
तस्माच्छापं च दास्याम ऋषयस्ते तदाऽब्रुवन्। ततः शापोदकं गृह्य संध्यात्वाऽथ तपोधनाः
tasmācchāpaṁ ca dāsyāma ṛṣayaste tadā'bruvan| tataḥ śāpodakaṁ gṛhya saṁdhyātvā'tha tapodhanāḥ
'इसलिए हम इसे शाप देंगे' — ऐसा उन ऋषियों ने तब कहा। फिर शाप का जल लेकर और संध्या-वंदन करके वे तपोधन—
श्लोक 10 (skanda.7.308.10)
अस्य लिंगमधो यातु दृश्यते यत्सदोन्नतम्। इत्युक्ते पतितं लिंगं तत्र देवकुले मम
asya liṁgamadho yātu dṛśyate yatsadonnatam| ityukte patitaṁ liṁgaṁ tatra devakule mama
—'इसका लिंग, जो सदा उन्नत दिखता है, नीचे गिर जाए' — ऐसा कहने पर वहाँ उस देवकुल में मेरा लिंग गिर पड़ा।
श्लोक 11 (skanda.7.308.11)
मूलचण्डीशनाम्ना तु विख्यातं भुवनत्रये। तल्लिंगं पतितं दृष्ट्वा कोपोपहतचेतसः। पुनर्हंतुं समारब्धा डिंडिनं ते तपोधनाः
mūlacaṇḍīśanāmnā tu vikhyātaṁ bhuvanatraye| talliṁgaṁ patitaṁ dṛṣṭvā kopopahatacetasaḥ| punarhaṁtuṁ samārabdhā ḍiṁḍinaṁ te tapodhanāḥ
वह मूलचण्डीश नाम से तीनों लोकों में विख्यात हुआ। उस गिरे हुए लिंग को देखकर, क्रोध से आविष्ट चित्त वाले उन तपस्वियों ने पुनः उस डिण्डि को मारने का प्रयत्न आरम्भ किया।
श्लोक 12 (skanda.7.308.12)
वृसिकापाणयः केचित्कमंडलुधराः परे। गृहीत्वा पादुकाश्चान्ये तस्य धावंति पृष्ठतः
vṛsikāpāṇayaḥ kecitkamaṁḍaludharāḥ pare| gṛhītvā pādukāścānye tasya dhāvaṁti pṛṣṭhataḥ
कुछ हाथों में डंडे लिए, कुछ कमण्डलु धारण किए, और अन्य खड़ाऊँ लेकर उसके पीछे दौड़ने लगे।
श्लोक 13 (skanda.7.308.13)
डिंडिश्चांतर्हितो भूत्वा त्वामुवाच सुमध्यमाम्। रोषोपहतचेतस्कान्पश्यैतांस्त्वं तपोधनान्
ḍiṁḍiścāṁtarhito bhūtvā tvāmuvāca sumadhyamām| roṣopahatacetaskānpaśyaitāṁstvaṁ tapodhanān
तब डिण्डि अन्तर्धान होकर, हे सुमध्यमे, तुमसे बोला—'देखो इन तपस्वियों को, जिनका चित्त क्रोध से आविष्ट हो गया है।'
श्लोक 14 (skanda.7.308.14)
एतस्मात्कारणाद्देवि तव वाक्यान्मयाऽनघे। न कृतोऽनुग्रहस्तेषां सरोषाणां तपस्विनाम्
etasmātkāraṇāddevi tava vākyānmayā'naghe| na kṛto'nugrahasteṣāṁ saroṣāṇāṁ tapasvinām
हे देवि, हे निष्पाप, इस कारण तुम्हारे वचन से मैंने उन क्रोधित तपस्वियों पर अनुग्रह नहीं किया।
श्लोक 15 (skanda.7.308.15)
अत्रांतरे ते मुनयो ह्यपश्यंतो हि डिंडिनम्। निरानंदं गताः सर्वे द्रष्टुं देवं पितामहम्
atrāṁtare te munayo hyapaśyaṁto hi ḍiṁḍinam| nirānaṁdaṁ gatāḥ sarve draṣṭuṁ devaṁ pitāmaham
इसी बीच वे मुनि डिण्डि को न पाकर सब आनन्दरहित हो गए और देव पितामह (ब्रह्मा) के दर्शन हेतु चले गए।
श्लोक 16 (skanda.7.308.16)
तं दृष्ट्वा विबुधेशानं विरंचिं विगतज्वरम्। प्रणम्य शिरसा सर्व ऋषयः प्राहुरंजसा
taṁ dṛṣṭvā vibudheśānaṁ viraṁciṁ vigatajvaram| praṇamya śirasā sarva ṛṣayaḥ prāhuraṁjasā
उस विद्वानों के स्वामी, संतापरहित विरंचि (ब्रह्मा) को देखकर, सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए सभी ऋषियों ने स्पष्ट रूप से कहा—
श्लोक 17 (skanda.7.308.17)
भगवन्डिंडिरूपेण कश्चिदस्ति तपोधनः। विध्वंसनाय दाराणां प्रविष्टः किल भिक्षितुम्
bhagavanḍiṁḍirūpeṇa kaścidasti tapodhanaḥ| vidhvaṁsanāya dārāṇāṁ praviṣṭaḥ kila bhikṣitum
—'भगवन्, डिण्डि के रूप में कोई तपस्वी था, जो कि हमारी पत्नियों के विनाश के लिए भिक्षा माँगने के बहाने प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 18 (skanda.7.308.18)
शप्तोऽस्माभिस्तु दुर्वृत्तस्तस्य लिंगं निपातितम्। तस्मिन्निपतितेऽस्माकं तथैव पतितानि च
śapto'smābhistu durvṛttastasya liṁgaṁ nipātitam| tasminnipatite'smākaṁ tathaiva patitāni ca
उस दुराचारी को हमने शाप दिया, और उसका लिंग गिरा दिया गया। वह गिरते ही हमारे भी वैसे ही तेज गिर गए।
श्लोक 19 (skanda.7.308.19)
गतोऽसौ कारणात्तस्मात्तल्लिंगे पतिते वयम्। निरानंदाः स्थिताः सर्व आचक्ष्वैतद्धि कारणम्
gato'sau kāraṇāttasmāttalliṁge patite vayam| nirānaṁdāḥ sthitāḥ sarva ācakṣvaitaddhi kāraṇam
उस कारण से वह चला गया; उस लिंग के गिरने पर हम सब आनन्दरहित हो गए हैं। कृपया इसका कारण बताइए।'
श्लोक 20 (skanda.7.308.20)
ब्रह्मोवाच। अशोभनमिदं कार्यं युष्माभिर्यत्कृतं महत्। रुद्रस्यातिसुरूपस्य सेर्ष्या ये हन्तुमुद्यताः
brahmovāca| aśobhanamidaṁ kāryaṁ yuṣmābhiryatkṛtaṁ mahat| rudrasyātisurūpasya seryā ye hantumudyatāḥ
ब्रह्मा ने कहा—यह महान् कार्य जो तुमने किया, अशोभन है, कि अत्यन्त सुरूप रुद्र को ईर्ष्यावश मारने के लिए तुम उद्यत हुए।
श्लोक 21 (skanda.7.308.21)
आसुरीं दानवीं दैवीं यक्षिणीं किंनरीं तथा। विद्याधरीं च गन्धर्वीं नागकन्यां मनोरमाम्। एता वरस्त्रियस्त्यक्त्वा युष्मदीयासु तास्वपि
āsurīṁ dānavīṁ daivīṁ yakṣiṇīṁ kiṁnarīṁ tathā| vidyādharīṁ ca gandharvīṁ nāgakanyāṁ manoramām| etā varastriyastyaktvā yuṣmadīyāsu tāsvapi
आसुरी, दानवी, दैवी, यक्षिणी, किन्नरी, विद्याधरी, गन्धर्वी तथा मनोहर नागकन्या—इन श्रेष्ठ स्त्रियों को छोड़कर वह तुम्हारी पत्नियों में भी—
श्लोक 22 (skanda.7.308.22)
आह्लादं कुरुते सर्वे नैव जानीत भो द्विजाः। त्रैलोक्यनायिकां सर्वां रूपातिशयसंयुताम्
āhlādaṁ kurute sarve naiva jānīta bho dvijāḥ| trailokyanāyikāṁ sarvāṁ rūpātiśayasaṁyutām
—वह सबको आनन्द देता है, हे द्विजो, तुम इसे बिलकुल नहीं समझते। त्रैलोक्य की स्वामिनी, जो असाधारण रूप से युक्त है—
श्लोक 23 (skanda.7.308.23)
तां त्यक्त्वा मुनिपत्नीनामाह्लादं कुरुते कथम्। तया रुद्रो हि विज्ञप्त ऋषीणां कुर्वनुग्रहम्
tāṁ tyaktvā munipatnīnāmāhlādaṁ kurute katham| tayā rudro hi vijñapta ṛṣīṇāṁ kurvanugraham
—उसे छोड़कर मुनि-पत्नियों में आनन्द कैसे लेगा? पार्वती ने ही रुद्र से ऋषियों पर अनुग्रह करने की प्रार्थना की थी।
श्लोक 24 (skanda.7.308.24)
तेन वाक्येन पार्वत्या जिज्ञासार्थं कृतं मनः। चतुर्द्दशविधस्यापि भूतग्रामस्य यः प्रभुः
tena vākyena pārvatyā jijñāsārthaṁ kṛtaṁ manaḥ| caturddaśavidhasyāpi bhūtagrāmasya yaḥ prabhuḥ
उसी वचन से पार्वती का मन जिज्ञासा के लिए प्रेरित हुआ। जो चौदह प्रकार के भूतसमूह का स्वामी है—
श्लोक 25 (skanda.7.308.25)
स शप्तो डिंडिरूपस्तु भवद्भिः करणेश्वरः। तच्छापाच्छप्तमेवैतत्समस्तं तद्गुणास्पदम्। देवतिर्यङ्मनुष्याणां निरानंदमिति स्थितम्
sa śapto ḍiṁḍirūpastu bhavadbhiḥ karaṇeśvaraḥ| tacchāpācchaptamevaitatsamastaṁ tadguṇāspadam| devatiryaṅmanuṣyāṇāṁ nirānaṁdamiti sthitam
—वही, इन्द्रियों का स्वामी, डिण्डि के रूप में तुमने शापित किया। उस शाप से उसके गुणों का यह सारा आश्रय शापित हो गया, इसी से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यों में आनन्दरहितता व्याप्त हो गई है।
श्लोक 26 (skanda.7.308.26)
शापेनानेन भवतां महान् दोषः प्रजायते। आराध्यं नान्यथा लिंगमुन्नतिं यात्यधोगतम्
śāpenānena bhavatāṁ mahān doṣaḥ prajāyate| ārādhyaṁ nānyathā liṁgamunnatiṁ yātyadhogatam
इस शाप से तुम्हें महान् दोष उत्पन्न हो रहा है। आराधना के बिना गिरा हुआ यह लिंग किसी अन्य उपाय से उन्नत नहीं होगा।
श्लोक 27 (skanda.7.308.27)
एवमुक्तेऽथ देवेन विप्रा ऊचुः पितामहम्। द्रष्टव्यः कुत्र सोऽस्माभिः कथयस्व यथास्थितम्
evamukte'tha devena viprā ūcuḥ pitāmaham| draṣṭavyaḥ kutra so'smābhiḥ kathayasva yathāsthitam
देव के ऐसा कहने पर विप्रों ने पितामह से कहा—'वह हमें कहाँ दिखाई देगा? यथावत् बताइए।'
श्लोक 28 (skanda.7.308.28)
ब्रह्मोवाच। आस्ते गजस्वरूपेण कुबेराश्रमसंस्थितः। तत्र गत्वा तमासाद्य तोषयध्वं पिनाकिनम्
brahmovāca| āste gajasvarūpeṇa kuberāśramasaṁsthitaḥ| tatra gatvā tamāsādya toṣayadhvaṁ pinākinam
ब्रह्मा ने कहा—वह गज के रूप में कुबेर के आश्रम में स्थित है। वहाँ जाकर उसे पाकर पिनाकधारी को संतुष्ट करो।
श्लोक 29 (skanda.7.308.29)
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य सर्वे ते हृष्टमानसाः। गंतुं प्रवृत्ताः सहसा कोटिसंख्यास्तपोधनाः
etacchrutvā vacastasya sarve te hṛṣṭamānasāḥ| gaṁtuṁ pravṛttāḥ sahasā koṭisaṁkhyāstapodhanāḥ
उसका यह वचन सुनकर वे सब हर्षित मन वाले करोड़ों तपस्वी तत्काल जाने के लिए प्रवृत्त हुए।
श्लोक 30 (skanda.7.308.30)
चिंतयंतः शुभं देशं द्रष्टुं तं गजरूपिणम्। रुद्रं पितामहाख्यातं कुबेराश्रमवासिनम्
ciṁtayaṁtaḥ śubhaṁ deśaṁ draṣṭuṁ taṁ gajarūpiṇam| rudraṁ pitāmahākhyātaṁ kuberāśramavāsinam
उस शुभ स्थान का चिन्तन करते हुए, गजरूपधारी रुद्र को, जिसका पितामह ने वर्णन किया था और जो कुबेर के आश्रम में वास करता था, देखने के लिए।
श्लोक 31 (skanda.7.308.31)
क्षुत्कामकंठास्तृषितान्गौरी मत्वा तपोधनान्। आदाय गोरसं तेषां कारुण्यात्सा पुरः स्थिता
kṣutkāmakaṁṭhāstṛṣitāngaurī matvā tapodhanān| ādāya gorasaṁ teṣāṁ kāruṇyātsā puraḥ sthitā
उन तपस्वियों को भूख से पीड़ित कण्ठ वाला और प्यासा जानकर गौरी करुणावश उनके लिए दूध लेकर उनके सामने खड़ी हो गई।
श्लोक 32 (skanda.7.308.32)
असितां कुटिलां स्निग्धामायतां भुजगीमिव। वेणीं शिरसि बिभ्राणा गौरी गोरससंयुता
asitāṁ kuṭilāṁ snigdhāmāyatāṁ bhujagīmiva| veṇīṁ śirasi bibhrāṇā gaurī gorasasaṁyutā
अपने सिर पर एक काली, घुँघराली, चिकनी और लम्बी वेणी को, मानो सर्पिणी के समान, धारण किए हुए गौरी दुग्ध लिए हुए—
श्लोक 33 (skanda.7.308.33)
सा तानाह मुनीन्सर्वान्यन्मया पर्वताहृतम्। कपित्थफलसंगंधं गोरसं त्वमृतोपमम्
sā tānāha munīnsarvānyanmayā parvatāhṛtam| kapitthaphalasaṁgaṁdhaṁ gorasaṁ tvamṛtopamam
—उसने उन सब मुनियों से कहा—'यह मेरे द्वारा पर्वत से लाया गया, कैथ के फल की सुगन्ध वाला दूध, अमृत के समान है।'
श्लोक 34 (skanda.7.308.34)
तयैवमुक्ता विप्रास्तु आहुस्तां विपुलेक्षणाम्। स्नात्वा च सर्वे पास्यामो गोरसं तु त्वयाहृतम्
tayaivamuktā viprāstu āhustāṁ vipulekṣaṇām| snātvā ca sarve pāsyāmo gorasaṁ tu tvayāhṛtam
उसके ऐसा कहने पर विप्रों ने उस विशाल नेत्रों वाली से कहा—'स्नान करके हम सब तुम्हारे द्वारा लाया गया दूध पिएँगे।'
श्लोक 35 (skanda.7.308.35)
ततः श्रुत्वा तथा देव्या स्नानार्थं तीर्थमुत्तमम्। तप्तोदकेन संपूर्णं कृतं कुण्डं मनोरमम्
tataḥ śrutvā tathā devyā snānārthaṁ tīrthamuttamam| taptodakena saṁpūrṇaṁ kṛtaṁ kuṇḍaṁ manoramam
यह सुनकर देवी ने उनके स्नान के लिए एक उत्तम तीर्थ—गर्म जल से परिपूर्ण एक मनोहर कुण्ड—बनाया।
श्लोक 36 (skanda.7.308.36)
तत्र ते संप्लुताः सर्वे विमुक्ता विपुलाच्छ्रमात्। कृताऽऽह्ना गोरसस्यैव पानार्थं समुपस्थिताः
tatra te saṁplutāḥ sarve vimuktā vipulācchramāt| kṛtā'hnā gorasasyaiva pānārthaṁ samupasthitāḥ
वहाँ स्नान करके वे सब अपने अत्यधिक श्रम से मुक्त हो गए। अपने दैनिक नियम पूर्ण करके फिर दूध पीने के लिए उपस्थित हुए।
श्लोक 37 (skanda.7.308.37)
पत्रैर्दिवाकरतरोर्विधाय पुटकाञ्छुभान्। उपविश्य क्रमात्सर्वे ते पिबंति स्म गोरसम्
patrairdivākarataror vidhāya puṭakāñchubhān| upaviśya kramātsarve te pibaṁti sma gorasam
अर्क वृक्ष (सूर्य-तरु) के पत्तों से शुभ दोने बनाकर, क्रमशः बैठकर वे सब दूध पीने लगे।
श्लोक 38 (skanda.7.308.38)
गोरसेन तदा तेषाममृतेनेव पूरितान्। बुभुक्षितानां पुटकान्मुनीनां तृप्तिकारणात्
gorasena tadā teṣāmamṛteneva pūritān| bubhukṣitānāṁ puṭakānmunīnāṁ tṛptikāraṇāt
उस दूध से, मानो अमृत से ही, उन भूखे मुनियों के दोने तृप्ति के लिए बार-बार भर दिए गए।
श्लोक 39 (skanda.7.308.39)
पुनः पूरयते गौरी पीत्वा ते तृप्तिमागताः। क्षुत्तृषाश्रमनिर्मुक्ताः पुनर्जाता इव स्थिताः
punaḥ pūrayate gaurī pītvā te tṛptimāgatāḥ| kṣuttṛṣāśramanirmuktāḥ punarjātā iva sthitāḥ
गौरी बार-बार भरती रहीं; पीकर वे तृप्त हो गए। भूख, प्यास और श्रम से मुक्त होकर वे मानो पुनर्जन्म पाए हुए के समान खड़े रहे।
श्लोक 40 (skanda.7.308.40)
स्वस्थचित्तैस्ततो ज्ञात्वा नेयं गोपालिसंज्ञिका। अनुग्रहार्थमस्माकं गौरीयं समुपागता
svasthacittaistato jñātvā neyaṁ gopālisaṁjñikā| anugrahārthamasmākaṁ gaurīyaṁ samupāgatā
तब स्वस्थ चित्त वाले उन्होंने जान लिया—'यह कोई साधारण गोपालिका नहीं है, यह तो हम पर अनुग्रह करने के लिए स्वयं गौरी आई है।'
श्लोक 41 (skanda.7.308.41)
प्रणम्य शिरसा सर्वे तामूचुस्ते सुमध्यमाम्। उमे कथय कुत्रस्थं द्रक्ष्यामो रुद्रमेकदा
praṇamya śirasā sarve tāmūcuste sumadhyamām| ume kathaya kutrasthaṁ drakṣyāmo rudramekadā
सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए उन सबने उस सुमध्यमा से कहा—'हे उमे, बताइए, कहाँ जाकर हम कभी रुद्र के दर्शन करेंगे?'
श्लोक 42 (skanda.7.308.42)
तथोक्तास्ते महात्मानस्तं पश्यत महागजम्। गजतां च समासाद्य संचरंतं महाबलम्
tathoktāste mahātmānastaṁ paśyata mahāgajam| gajatāṁ ca samāsādya saṁcaraṁtaṁ mahābalam
इस प्रकार कहे जाने पर उन महात्माओं से उसने कहा—'गजरूप धारण करके विचरण करते हुए उस महाबली महागज को देखो।
श्लोक 43 (skanda.7.308.43)
भवद्भिर्निजभक्त्यायं संग्राह्यो हि यथासुखम्। ते तद्वचनमासाद्य समेत्यैकत्र च द्विजाः
bhavadbhirnijabhaktyāyaṁ saṁgrāhyo hi yathāsukham| te tadvacanamāsādya sametyaikatra ca dvijāḥ
—उसे तुम्हें अपनी भक्ति से यथासुख वश में करना है।' उस वचन को पाकर वे द्विज सब एक स्थान पर एकत्र हुए।
श्लोक 44 (skanda.7.308.44)
पवित्रास्तं गजं द्रष्टुं भावितेनांतरात्मना। यत्रैकत्र स्थिता विप्रास्तत्र तीर्थं महोदयम्। संगमेश्वरसंज्ञं तु पूर्वं सर्वत्र विश्रुतम्
pavitrāstaṁ gajaṁ draṣṭuṁ bhāvitenāṁtarātmanā| yatraikatra sthitā viprāstatra tīrthaṁ mahodayam| saṁgameśvarasaṁjñaṁ tu pūrvaṁ sarvatra viśrutam
पवित्र होकर, भावित अन्तरात्मा से उस गज को देखने के लिए—जिस स्थान पर वे विप्र एकत्र हुए, वहाँ एक महान् तीर्थ बना, जो पूर्वकाल से संगमेश्वर नाम से सर्वत्र विख्यात है।
श्लोक 45 (skanda.7.308.45)
ततस्तस्मात्प्रवृत्तास्ते द्रष्टुकामा महागजम्। कुंडिकाः संपरित्यज्य संनह्यात्मानमात्मना
tatastasmātpravṛttāste draṣṭukāmā mahāgajam| kuṁḍikāḥ saṁparityajya saṁnahyātmānamātmanā
फिर वहाँ से उस महागज को देखने की इच्छा से चले, अपने कमण्डलुओं को त्यागकर स्वयं को अपने ही प्रयत्न से तैयार करते हुए।
श्लोक 46 (skanda.7.308.46)
यत्र ताः कुंडिकास्त्यक्तास्तत्तीर्थं कुंडिकाह्वयम्। सर्वपापहरं पुंसां दृष्टाऽदृष्टफलप्रदम्
yatra tāḥ kuṁḍikāstyaktāstattīrthaṁ kuṁḍikāhvayam| sarvapāpaharaṁ puṁsāṁ dṛṣṭā'dṛṣṭaphalapradam
जहाँ वे कमण्डलु त्यागे गए, वह तीर्थ कुण्डिका नाम से जाना गया, जो पुरुषों के समस्त पाप हरने वाला और दृष्ट-अदृष्ट फल देने वाला है।
श्लोक 47 (skanda.7.308.47)
कुबेरस्याश्रमं प्राप्य ततस्ते मुनिसत्तमाः। नालिकेरवनीसंस्थं ददृशुस्तं द्विपं तदा
kuberasyāśramaṁ prāpya tataste munisattamāḥ| nālikeravanīsaṁsthaṁ dadṛśustaṁ dvipaṁ tadā
तब कुबेर के आश्रम में पहुँचकर उन श्रेष्ठ मुनियों ने नारियल के वन में स्थित उस हाथी को देखा।
श्लोक 48 (skanda.7.308.48)
करे ग्रहीतुमारब्धाः स्वकरैर्हृष्टमानसाः। गजस्तान्करसंलग्नान्विचिक्षेप तपोधनान्
kare grahītumārabdhāḥ svakairhṛṣṭamānasāḥ| gajastānkarasaṁlagnānvicikṣepa tapodhanān
हर्षित मन से अपने हाथों से उसे सूँड़ से पकड़ने का प्रयत्न करने लगे; उस हाथी ने अपनी सूँड़ से चिपटे उन तपस्वियों को दूर फेंक दिया।
श्लोक 49 (skanda.7.308.49)
काश्चिदंगसमालग्नान्समंताद्भयवर्जितान्। एवं स तैः पुनः सर्वैर्मशकैरिव चेष्टितम्
kāścidaṁgasamālagnānsamaṁtādbhayavarjitān| evaṁ sa taiḥ punaḥ sarvairmaśakairiva ceṣṭitam
कुछ भय रहित होकर चारों ओर से उसके शरीर से चिपट गए। इस प्रकार वे सब उसके साथ मानो मच्छरों के समान क्रीड़ा करने लगे।
श्लोक 50 (skanda.7.308.50)
क्रीडां करोति विविधां वनसंस्थो हरद्विपः। तद्रूपं संपरित्यज्य रुद्रो रौद्रगजात्मकम्
krīḍāṁ karoti vividhāṁ vanasaṁstho haradvipaḥ| tadrūpaṁ saṁparityajya rudro raudragajātmakam
वन में स्थित हरद्विप (हर का हाथी-रूप) विविध प्रकार की क्रीड़ा करता रहा। फिर उस भयानक गज-रूप को त्यागकर रुद्र ने—
श्लोक 51 (skanda.7.308.51)
पुनरन्यच्चकारासौ डिंडिरूपं मनोरमम्। जयशब्दप्रघोषेण वेदमङ्गलगीतकैः
punaranyaccakārāsau ḍiṁḍirūpaṁ manoramam| jayaśabdapraghoṣeṇa vedamaṅgalagītakaiḥ
—पुनः विजय-घोष और वेद के मंगल गीतों के साथ, एक अन्य मनोहर डिण्डि-रूप धारण किया।
श्लोक 52 (skanda.7.308.52)
उन्नामितं पुनस्तेन यत्र लिंगं महोदयम्। तदुन्नतमिति प्रोक्तं स्थानं स्थानवतां वरम्
unnāmitaṁ punastena yatra liṁgaṁ mahodayam| tadunnatamiti proktaṁ sthānaṁ sthānavatāṁ varam
जिस स्थान पर उस महान् लिंग को उसने पुनः उन्नत किया, वह स्थान 'उन्नत' कहलाया, जो सभी स्थानों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 53 (skanda.7.308.53)
गजरूपधरस्तत्र स्थितः स्थाने महाबलः। गणनाथस्वरूपेण ह्युन्नतो जगति स्थितः
gajarūpadharastatra sthitaḥ sthāne mahābalaḥ| gaṇanāthasvarūpeṇa hyunnato jagati sthitaḥ
गज-रूप धारण किए वह महाबली उस स्थान पर स्थित रहा; गणनाथ (गणेश) के स्वरूप में वह जगत् में उन्नत होकर स्थित है।
श्लोक 54 (skanda.7.308.54)
डिंडिरूपधरो भूत्वा रुद्रः प्राह तपोधनान्। यन्मया भवतां कार्यं कर्तव्यं तदिहोच्यताम्
ḍiṁḍirūpadharo bhūtvā rudraḥ prāha tapodhanān| yanmayā bhavatāṁ kāryaṁ kartavyaṁ tadihocyatām
डिण्डि का रूप धारण करके रुद्र ने तपस्वियों से कहा—'मुझे तुम्हारे लिए जो कार्य करना है, वह यहाँ बताओ।'
श्लोक 55 (skanda.7.308.55)
एवमुक्तस्तु तैरुक्तः सर्वज्ञानक्रियापरैः। सानन्दाः प्राणिनः संतु त्वत्प्रसादात्पुरा यथा
evamuktastu tairuktaḥ sarvajñānakriyāparaiḥ| sānandāḥ prāṇinaḥ saṁtu tvatprasādātpurā yathā
ऐसा कहे जाने पर सर्वज्ञान और क्रिया में निपुण उन ऋषियों ने कहा—'आपके प्रसाद से समस्त प्राणी पूर्ववत् आनन्दित हों।
श्लोक 56 (skanda.7.308.56)
क्षंतव्यं देवदेवेश कृतं यन्मूढमानसैः। त्वत्प्रसादात्सुरेशान तत्त्वं सानुग्रहो भव
kṣaṁtavyaṁ devadeveśa kṛtaṁ yanmūḍhamānasaiḥ| tvatprasādātsureśāna tattvaṁ sānugraho bhava
—हे देवदेवेश, हम मूढ़चित्त लोगों द्वारा जो किया गया, उसे क्षमा कीजिए। हे सुरेश, अपने प्रसाद से आप हम पर अनुग्रह करें।'
श्लोक 57 (skanda.7.308.57)
एवमस्त्विति तेनोक्तास्ते सर्वे विगतज्वराः। तल्लिंगानुकृतिं लिंगमीजिरे मुनयस्तथा। चक्रुस्ते मुनयः सर्वे स्तुतिं विगतमत्सराः
evamastviti tenoktāste sarve vigatajvarāḥ| talliṁgānukṛtiṁ liṁgamījire munayastathā| cakruste munayaḥ sarve stutiṁ vigatamatsarāḥ
'ऐसा ही हो' — उसके ऐसा कहने पर वे सब संतापरहित हो गए। फिर उन मुनियों ने उस लिंग की प्रतिकृति स्वरूप लिंग का पूजन किया, और मत्सर रहित होकर सभी मुनियों ने स्तुति की।
श्लोक 58 (skanda.7.308.58)
क्षमस्व देवदेवेश कुर्वस्माकमनुग्रहम्। अस्मिँल्लिंगे लयं गच्छ मूलचण्डीशसंज्ञके। त्रिकालं देवदेवेश ग्राह्या ह्यत्र कला त्वया
kṣamasva devadeveśa kurvasmākamanugraham| asmiṁlliṁge layaṁ gaccha mūlacaṇḍīśasaṁjñake| trikālaṁ devadeveśa grāhyā hyatra kalā tvayā
'हे देवदेवेश, क्षमा कीजिए, हम पर अनुग्रह कीजिए। इस मूलचण्डीश नामक लिंग में लीन हो जाइए। हे देवदेवेश, यहाँ त्रिकाल आपकी कला ग्रहण की जाए।'
श्लोक 59 (skanda.7.308.59)
ईश्वर उवाच। चण्डी तु प्रोच्यते देवी तस्या ईशस्त्वहं स्मृतः। तस्य मूलं स्मृतं लिंगं तदत्र पतितं यतः
īśvara uvāca| caṇḍī tu procyate devī tasyā īśastvahaṁ smṛtaḥ| tasya mūlaṁ smṛtaṁ liṁgaṁ tadatra patitaṁ yataḥ
ईश्वर ने कहा—देवी चण्डी कहलाती है, और मैं उसका ईश माना जाता हूँ। चूँकि जो लिंग यहाँ गिरा, वह उसका मूल माना गया है—
श्लोक 60 (skanda.7.308.60)
तस्मात्तन्मूलचण्डीश इति ख्यातिं गमिष्यति। वापीकूपतडागानां शतैस्तु विपुलैरपि
tasmāttanmūlacaṇḍīśa iti khyātiṁ gamiṣyati| vāpīkūpataḍāgānāṁ śataistu vipulairapi
—इसलिए यह मूलचण्डीश नाम से प्रसिद्धि पाएगा। सैकड़ों विशाल बावड़ियों, कुओं और तालाबों के—
श्लोक 61 (skanda.7.308.61)
कृतैर्यज्जायते पुण्यं तत्पुण्यं लिंगदर्शनात्। ब्रह्माण्डं सकलं दत्त्वा यत्पुण्यफलमाप्नुयात्
kṛtairyajjāyate puṇyaṁ tatpuṇyaṁ liṁgadarśanāt| brahmāṇḍaṁ sakalaṁ dattvā yatpuṇyaphalamāpnuyāt
—निर्माण से जो पुण्य उत्पन्न होता है, वही पुण्य इस लिंग के दर्शन से प्राप्त होता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को दान करके जो पुण्यफल प्राप्त होता है—
श्लोक 62 (skanda.7.308.62)
तत्पुण्यं लभते देवि मूलचण्डीशदर्शनात्। तत्र दानानि देयानि षोडशैव नरोत्तमैः
tatpuṇyaṁ labhate devi mūlacaṇḍīśadarśanāt| tatra dānāni deyāni ṣoḍaśaiva narottamaiḥ
—वही पुण्य, हे देवि, मूलचण्डीश के दर्शन से प्राप्त होता है। वहाँ श्रेष्ठ पुरुषों को सोलह दान देने चाहिए।
श्लोक 63 (skanda.7.308.63)
एवं तद्भविता सर्वं यन्मयोक्तं द्विजोत्तमाः। यात दारुवनं विप्राः सर्वे यूयं तपोधनाः। मया सर्वे समादिष्टा यात दारुवनं द्विजाः
evaṁ tadbhavitā sarvaṁ yanmayoktaṁ dvijottamāḥ| yāta dāruvanaṁ viprāḥ sarve yūyaṁ tapodhanāḥ| mayā sarve samādiṣṭā yāta dāruvanaṁ dvijāḥ
'हे द्विजोत्तमो, जो मैंने कहा, वह सब इसी प्रकार होगा। हे विप्रो, तुम सब तपस्वी दारुवन को जाओ। मेरे द्वारा आज्ञा दिए गए तुम सब, हे द्विजो, दारुवन को जाओ।'
श्लोक 64 (skanda.7.308.64)
ततस्तु संप्राप्य महद्वचो मम सर्वे प्रहृष्टा मुनयो महोदयम्। गत्वा च तद्दारुवनं महेश्वरि पुनश्च चेरुः सुतपस्तपोधनाः
tatastu saṁprāpya mahadvaco mama sarve prahṛṣṭā munayo mahodayam| gatvā ca taddāruvanaṁ maheśvari punaśca ceruḥ sutapastapodhanāḥ
तब मेरा यह महान् और शुभ वचन पाकर वे सब मुनि अत्यन्त हर्षित होकर, हे महेश्वरि, उस दारुवन को जाकर पुनः उत्तम तप में तपस्वी लीन हो गए।
श्लोक 65 (skanda.7.308.65)
एतस्मात्कारणाद्देवि मूलचण्डीशसंज्ञितम्। लिंगं पापहरं नृणामर्धचन्द्रेण भूषितम्
etasmātkāraṇāddevi mūlacaṇḍīśasaṁjñitam| liṁgaṁ pāpaharaṁ nṛṇāmardhacandreṇa bhūṣitam
इस कारण, हे देवि, मूलचण्डीश नामक, अर्धचन्द्र से सुशोभित वह लिंग मनुष्यों के पापों का नाशक है।
श्लोक 66 (skanda.7.308.66)
दोहनी दुग्धदानेन मुनीनां तृषितात्मनाम्। श्रमापहारं यद्देवि त्वया कृतमनुत्तमम्। तत्तप्तोदकनाम्ना वा अभूत्कुण्डं धरातले
dohanī dugdhadānena munīnāṁ tṛṣitātmanām| śramāpahāraṁ yaddevi tvayā kṛtamanuttamam| tattaptodakanāmnā vā abhūtkuṇḍaṁ dharātale
प्यासे मुनियों को दुग्ध देकर, हे देवि, उनके श्रम को हरने वाला जो अनुपम कार्य आपने किया, वह धरातल पर 'तप्तोदक' नाम से कुण्ड हो गया।
श्लोक 67 (skanda.7.308.67)
ऋषितोयाजले स्नात्वा चण्डीशं यः प्रपूजयेत्। स प्रचण्डो भवेद्भूमौ भुवनानामधीश्वरः
ṛṣitoyājale snātvā caṇḍīśaṁ yaḥ prapūjayet| sa pracaṇḍo bhavedbhūmau bhuvanānāmadhīśvaraḥ
उस ऋषितोय के जल में स्नान करके जो चण्डीश का पूजन करता है, वह पृथ्वी पर प्रचण्ड और लोकों का अधीश्वर होता है।
श्लोक 68 (skanda.7.308.68)
एतत्संक्षेपतो देवि माहात्म्यं कीर्तितं तव। मूलचण्डीशदेवस्य श्रुतं पातकनाशनम्
etatsaṁkṣepato devi māhātmyaṁ kīrtitaṁ tava| mūlacaṇḍīśadevasya śrutaṁ pātakanāśanam
हे देवि, इस प्रकार यह मूलचण्डीश देव की महिमा तुमसे संक्षेप में कही गई; इसे सुनना ही पापों का नाशक है।