प्रभास खण्ड · अध्याय 309
चतुर्मुखविनायकमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.309.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि विनायकमनुत्तमम्। चतुर्मुखेति विख्यातं चण्डीशादुत्तरे स्थितम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi vināyakamanuttamam| caturmukheti vikhyātaṁ caṇḍīśāduttare sthitam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर चण्डीश से उत्तर दिशा में स्थित, 'चतुर्मुख' नाम से विख्यात उस सर्वश्रेष्ठ विनायक के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.309.2)
किञ्चिदीशानदिग्भागे धनुषां च चतुष्टये। तं प्रयत्नाच्च संपूज्य सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते
kiñcidīśānadigbhāge dhanuṣāṁ ca catuṣṭaye| taṁ prayatnācca saṁpūjya sarvavighnaiḥ pramucyate
कुछ ईशान दिशा की ओर, चार धनुष की दूरी पर। प्रयत्नपूर्वक उसका पूजन करके मनुष्य सब विघ्नों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.309.3)
गन्धपुष्पादिभिस्तत्र भक्ष्यैर्भोज्यैः समोदकैः। चतुर्मुखं चतुर्थ्यां तु संपूज्य सिद्धिभाग्भवेत्
gandhapuṣpādibhistatra bhakṣyairbhojyaiḥ samodakaiḥ| caturmukhaṁ caturthyāṁ tu saṁpūjya siddhibhāgbhavet
वहाँ गन्ध, पुष्प आदि से, भक्ष्य-भोज्य पदार्थों और मोदकों सहित, चतुर्थी के दिन चतुर्मुख का पूजन करके मनुष्य सिद्धि का भागी होता है।