प्रभास खण्ड · अध्याय 315
मरुदार्यादेवीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.315.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि मरुदार्यां महाप्रभाम्। तस्मात्पश्चिमदिग्भागे क्रोशार्द्धेन व्यवस्थिताम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi marudāryāṁ mahāprabhām| tasmātpaścimadigbhāge krośārddhena vyavasthitām
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर वहाँ से पश्चिम दिशा में आधे क्रोश पर स्थित, महाप्रभावशाली मरुदार्या के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.315.2)
मरुद्भिः पूजितां देवीं सर्वकामफलप्रदाम्। महानवम्यां यत्नेन सप्तम्यां पूजयेन्नरः। गंधपुष्पादिविधिना सर्वकामप्रसिद्धये
marudbhiḥ pūjitāṁ devīṁ sarvakāmaphalapradām| mahānavamyāṁ yatnena saptamyāṁ pūjayennaraḥ| gaṁdhapuṣpādividhinā sarvakāmaprasiddhaye
मरुद्गणों द्वारा पूजित वह देवी सब कामनाओं का फल देने वाली है। महानवमी और सप्तमी को मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक, गन्ध-पुष्प आदि की विधि से, सब कामनाओं की सिद्धि के लिए उसका पूजन करना चाहिए।