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प्रभास खण्ड · अध्याय 316

क्षेमादित्यमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 315अध्याय-सूचीअध्याय 317

श्लोक 1 (skanda.7.316.1)

ईश्वर उवाच। अथ देवकुलात्पूर्वे पंचगव्यूतिमात्रतः। शंबरस्थान मध्ये तु क्षेमादित्येति विश्रुतः

īśvara uvāca| atha devakulātpūrve paṁcagavyūtimātrataḥ| śaṁbarasthāna madhye tu kṣemādityeti viśrutaḥ

ईश्वर ने कहा—अब देवकुल से पूर्व में पाँच गव्यूति की दूरी पर, शम्बरस्थान के मध्य में, 'क्षेमादित्य' नाम से विख्यात तीर्थ है।

श्लोक 2 (skanda.7.316.2)

तं दृष्ट्वा मानवो देवि भवेत्क्षेमार्थसिद्धिभाक्। सप्तम्यां रविवारेण पूजितः सर्वकामदः

taṁ dṛṣṭvā mānavo devi bhavetkṣemārthasiddhibhāk| saptamyāṁ ravivāreṇa pūjitaḥ sarvakāmadaḥ

उसे देखकर, हे देवि, मनुष्य क्षेम-सिद्धि का भागी होता है। रविवार को पड़ने वाली सप्तमी के दिन पूजित होने पर वह सब कामनाएँ देता है।

श्लोक 3 (skanda.7.316.3)

इति देवकुलस्थाने कथिता तीर्थसंस्थितिः

iti devakulasthāne kathitā tīrthasaṁsthitiḥ

इस प्रकार देवकुल के स्थान में तीर्थों की व्यवस्था कही गई।

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