प्रभास खण्ड · अध्याय 317
कण्टकशोषिणीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.317.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि देवीं कंटकशोषिणीम्। उत्तरेण देवकुलाद्दक्षिणेनोन्नतात्स्थितात्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi devīṁ kaṁtakaśoṣiṇīm| uttareṇa devakulāddakṣiṇenonnatātsthitāt
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर देवकुल से उत्तर में और उन्नत स्थान से दक्षिण में स्थित देवी कण्टकशोषिणी के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.317.2)
तस्योत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु ह्येकमनाः प्रिये। उन्नताद्दक्षिणे भागे यजंते द्विजसत्तमाः
tasyotpattiṁ pravakṣyāmi śṛṇu hyekamanāḥ priye| unnatāddakṣiṇe bhāge yajaṁte dvijasattamāḥ
मैं उसकी उत्पत्ति कहूँगा, हे प्रिये, एकाग्रचित्त होकर सुनो। उन्नत स्थान से दक्षिण भाग में द्विजश्रेष्ठ यज्ञ करते हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.317.3)
भृगुरत्रिर्मरीचिश्च भरद्वाजोऽथ कश्यपः। कण्वो मंकिश्च सावर्णिर्जातूकर्ण्यस्तथैव च
bhṛguratrirmarīciśca bharadvājo'tha kaśyapaḥ| kaṇvo maṁkiśca sāvarṇirjātūkarṇyastathaiva ca
भृगु, अत्रि, मरीचि, भरद्वाज, कश्यप, कण्व, मंकि, सावर्णि तथा जातूकर्ण्य—
श्लोक 4 (skanda.7.317.4)
वत्सश्चैव वसिष्ठश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। मनुर्यमोऽङ्गिरा विष्णुः शातातपपराशरौ
vatsaścaiva vasiṣṭhaśca pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ| manuryamo'ṅgirā viṣṇuḥ śātātapaparāśarau
वत्स, वसिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मनु, यम, अंगिरा, विष्णु, शातातप और पराशर—
श्लोक 5 (skanda.7.317.5)
शांडिल्यः कौशिकश्चैव गौतमो गार्ग्य एव च। दाल्भ्यश्च शौनकश्चैव शाकल्यो गालवस्तथा
śāṁḍilyaḥ kauśikaścaiva gautamo gārgya eva ca| dālbhyaśca śaunakaścaiva śākalyo gālavastathā
शाण्डिल्य, कौशिक, गौतम, गार्ग्य, दाल्भ्य, शौनक, शाकल्य तथा गालव—
श्लोक 6 (skanda.7.317.6)
जाबालिर्मुद्गलश्चैव ऋष्यशृंगो विभांडकः। विश्वामित्रः शतानंदो जह्नुर्विश्वावसुस्तथा
jābālirmudgalaścaiva ṛṣyaśṛṁgo vibhāṁḍakaḥ| viśvāmitraḥ śatānaṁdo jahnurviśvāvasustathā
जाबालि, मुद्गल, ऋष्यशृंग, विभाण्डक, विश्वामित्र, शतानन्द, जह्नु तथा विश्वावसु—
श्लोक 7 (skanda.7.317.7)
एते चान्ये च मुनयो यजंते विविधैर्मखैः। यज्ञवाटं च निर्माय ऋषितोयातटे शुभे
ete cānye ca munayo yajaṁte vividhairmakhaiḥ| yajñavāṭaṁ ca nirmāya ṛṣitoyātaṭe śubhe
—ये और अन्य मुनि, ऋषितोया के शुभ तट पर यज्ञशाला बनाकर, विविध यज्ञों द्वारा यजन करते हैं।
श्लोक 8 (skanda.7.317.8)
देवगन्धर्वनृत्यैश्च वेणुवीणानिनादितम्। वेदध्वनितघोषेण यज्ञहोमाग्निहोत्रजैः
devagandharvanṛtyaiśca veṇuvīṇānināditam| vedadhvanitaghoṣeṇa yajñahomāgnihotrajaiḥ
वह स्थान देवों और गन्धर्वों के नृत्य से, वेणु-वीणा के निनाद से, वेदध्वनि के घोष से तथा यज्ञ, होम और अग्निहोत्र से उत्पन्न ध्वनियों से गूँज रहा था।
श्लोक 9 (skanda.7.317.9)
धूपैः समावृतं सर्वमाज्यगंधिभिरर्चितम्। शोभितं मुनिभिर्दिव्यैश्चातुर्वेद्यैर्द्विजोत्तमैः
dhūpaiḥ samāvṛtaṁ sarvamājyagaṁdhibhirarcitam| śobhitaṁ munibhirdivyaiścāturvedyairdvijottamaiḥ
वह सम्पूर्ण स्थान धूप से आच्छादित, घृत की सुगन्ध से पूजित, तथा चारों वेदों में पारंगत दिव्य द्विजश्रेष्ठ मुनियों से सुशोभित था।
श्लोक 10 (skanda.7.317.10)
एवंविधं प्रदेशं तु दृष्ट्वा दैत्या महाबलाः। समुद्रमध्यादायाता यज्ञविध्वंसहेतवे
evaṁvidhaṁ pradeśaṁ tu dṛṣṭvā daityā mahābalāḥ| samudramadhyādāyātā yajñavidhvaṁsahetave
ऐसे उस प्रदेश को देखकर, समुद्र के मध्य से महाबली दैत्य यज्ञ का विध्वंस करने के लिए आए।
श्लोक 11 (skanda.7.317.11)
मायाविनो महाकायाः श्यामवर्णा महोदराः। लंबभ्रूश्मश्रुनासाग्रा रक्ताक्षा रक्तमूर्धजाः
māyāvino mahākāyāḥ śyāmavarṇā mahodarāḥ| laṁbabhrūśmaśrunāsāgrā raktākṣā raktamūrdhajāḥ
वे मायावी, विशाल शरीर वाले, श्याम वर्ण के, बड़े उदर वाले, लम्बी भौंहों, दाढ़ी और नासिका के अग्रभाग वाले, लाल नेत्रों और लाल केशों वाले थे।
श्लोक 12 (skanda.7.317.12)
यज्ञं समागताः सर्वे दैत्याश्चैव वरानने। तान्दृष्ट्वा मुनयः सर्वे रौद्ररूपान्भयंकरान्
yajñaṁ samāgatāḥ sarve daityāścaiva varānane| tāndṛṣṭvā munayaḥ sarve raudrarūpānbhayaṁkarān
हे वरानने, वे सब दैत्य यज्ञ में आ पहुँचे। उन भयंकर, रौद्र रूप वाले दैत्यों को देखकर सभी मुनि—
श्लोक 13 (skanda.7.317.13)
केचिन्निपतिता भूमौ तथान्ये ऽग्नौ स्रुचीकराः। पत्नीशालां समाविष्टा हविर्धानं तथा परे
kecinnipatitā bhūmau tathānye'gnau srucīkarāḥ| patnīśālāṁ samāviṣṭā havirdhānaṁ tathā pare
—कुछ भूमि पर गिर पड़े, कुछ हाथों में स्रुक लिए अग्निशाला में जा घुसे, कुछ पत्नीशाला में प्रविष्ट हो गए, तथा अन्य हविर्धान में।
श्लोक 14 (skanda.7.317.14)
ऋत्विजस्तु सदोमध्ये स्थिता वाचंयमास्तथा
ṛtvijastu sadomadhye sthitā vācaṁyamāstathā
किन्तु ऋत्विजगण सभा के मध्य में, मौन धारण किए हुए, स्थिर बने रहे।
श्लोक 15 (skanda.7.317.15)
एवं देवि यदा वृत्तं मुनीनां च महात्मनाम्। तदाध्वर्युर्महातेजा धैर्यमालम्ब्य सादरः
evaṁ devi yadā vṛttaṁ munīnāṁ ca mahātmanām| tadādhvaryurmahātejā dhairyamālambya sādaraḥ
हे देवि, जब उन महात्मा मुनियों की यह स्थिति हुई, तब महातेजस्वी अध्वर्यु धैर्य धारण करके सादर—
श्लोक 16 (skanda.7.317.16)
अग्निहोत्रं हविष्यं च हविर्विन्यस्य मन्त्रवित्। सुसमिद्धं जुहावाग्निं रक्षसां नाशहेतवे
agnihotraṁ haviṣyaṁ ca havirvinyasya mantravit| susamiddhaṁ juhāvāgniṁ rakṣasāṁ nāśahetave
—मन्त्रवेत्ता उस अध्वर्यु ने आहुति का हविष्य अग्निहोत्र में रखकर, राक्षसों के विनाश के लिए भलीभाँति प्रज्वलित अग्नि में हवन किया।
श्लोक 17 (skanda.7.317.17)
हुते हविषि देवेशि तत्क्षणादेव चोत्थिता। शक्तिः शक्तित्रिशूलाढ्या चर्महस्ता महोज्ज्वला
hute haviṣi deveśi tatkṣaṇādeva cotthitā| śaktiḥ śaktitriśūlāḍhyā carmahastā mahojjvalā
हे देवेशि, आहुति दिए जाने पर उसी क्षण, शक्ति और त्रिशूल से युक्त, हाथ में ढाल लिए, महातेजस्विनी शक्ति देवी प्रकट हुई।
श्लोक 18 (skanda.7.317.18)
तया ते निहता दैत्या यज्ञविध्वंसकारिणः। ततस्तां विविधैः स्तोत्रैर्मुनयस्तुष्टुवुस्तदा
tayā te nihatā daityā yajñavidhvaṁsakāriṇaḥ| tatastāṁ vividhaiḥ stotrairmunayastuṣṭuvustadā
उसके द्वारा वे यज्ञ का विध्वंस करने वाले दैत्य मारे गए। फिर मुनियों ने विविध स्तोत्रों से उसकी स्तुति की।
श्लोक 19 (skanda.7.317.19)
प्रसन्ना भूयसी देवी तानृषीन्प्रत्युवाच ह। वरं वृणुध्वं मुनयो दास्यामि वरमुत्तमम्
prasannā bhūyasī devī tānṛṣīnpratyuvāca ha| varaṁ vṛṇudhvaṁ munayo dāsyāmi varamuttamam
अत्यन्त प्रसन्न हुई देवी ने उन ऋषियों से कहा—'हे मुनियो, वर माँगो, मैं तुम्हें उत्तम वर दूँगी।'
श्लोक 20 (skanda.7.317.20)
ऋषय ऊचुः। कृतं वै सकलं कार्यं यज्ञा नो रक्षितास्त्वया। यदि देयो वरोऽस्माकं त्वया चासुरमर्द्दिनि
ṛṣaya ūcuḥ| kṛtaṁ vai sakalaṁ kāryaṁ yajñā no rakṣitāstvayā| yadi deyo varo'smākaṁ tvayā cāsuramarddini
ऋषियों ने कहा—समस्त कार्य सिद्ध हो गया; हमारे यज्ञ की तुमने रक्षा कर दी। हे असुरमर्दिनि, यदि हमें वर देना ही है, तो—
श्लोक 21 (skanda.7.317.21)
अस्मिन्स्थाने सदा तिष्ठ मुनीनां हितकाम्यया। कंटकाः शोषिता दैत्यास्तेन कंटकशोषिणी। अद्यप्रभृति नामास्तु तेन देवि सदा त्विह
asminsthāne sadā tiṣṭha munīnāṁ hitakāmyayā| kaṁtakāḥ śoṣitā daityāstena kaṁtakaśoṣiṇī| adyaprabhṛti nāmāstu tena devi sadā tviha
—इस स्थान पर सदा मुनियों के हित की कामना से निवास करो। चूँकि काँटों के समान दैत्य तुमने शोषित कर दिए, इसलिए हे देवि, आज से यहाँ तुम्हारा नाम सदा 'कण्टकशोषिणी' हो।
श्लोक 22 (skanda.7.317.22)
ईश्वर उवाच। एवं भविष्यतीत्युक्त्वा सा देव्यन्तर्हिता तदा। अष्टम्यां वा नवम्यां वा पूजयिष्यति मानवः
īśvara uvāca| evaṁ bhaviṣyatītyuktvā sā devyantarhitā tadā| aṣṭamyāṁ vā navamyāṁ vā pūjayiṣyati mānavaḥ
ईश्वर ने कहा—'ऐसा ही होगा' यह कहकर वह देवी उसी क्षण अन्तर्धान हो गई। जो मनुष्य अष्टमी अथवा नवमी को उसका पूजन करेगा—
श्लोक 23 (skanda.7.317.23)
राक्षसेभ्यः पिशाचेभ्यो भयं तस्य न जायते। प्राप्नुयात्परमां सिद्धिं मानवो नात्र संशयः
rākṣasebhyaḥ piśācebhyo bhayaṁ tasya na jāyate| prāpnuyātparamāṁ siddhiṁ mānavo nātra saṁśayaḥ
—उसे राक्षसों और पिशाचों से भय उत्पन्न नहीं होता। वह मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।