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प्रभास खण्ड · अध्याय 322

दुर्गादित्यमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 321अध्याय-सूचीअध्याय 323

श्लोक 1 (skanda.7.322.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तस्य दक्षिणसंस्थितम्। दुर्गादित्येतिनामानं सर्वपापप्रणाशनम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tasya dakṣiṇasaṁsthitam| durgādityetināmānaṁ sarvapāpapraṇāśanam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर उससे दक्षिण में स्थित, सब पापों का नाशक 'दुर्गादित्य' नामक तीर्थ के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.322.2)

यदा दुःखमनुप्राप्ता दुर्गा दुःखविनाशिनी। सूर्यमाराधयामास तदा दुःखविनुत्तये

yadā duḥkhamanuprāptā durgā duḥkhavināśinī| sūryamārādhayāmāsa tadā duḥkhavinuttaye

जब दुःखविनाशिनी दुर्गा भी दुःख को प्राप्त हुई, तब उस दुःख को दूर करने के लिए उन्होंने सूर्य की आराधना की।

श्लोक 3 (skanda.7.322.3)

ततः कालेन बहुना तस्यास्तुष्टो दिवाकरः। उवाच मधुरं वाक्यं दुर्गां देवो महाप्रभाम्। वरं वरय देवेशि तपसा तुष्टवानहम्

tataḥ kālena bahunā tasyāstuṣṭo divākaraḥ| uvāca madhuraṁ vākyaṁ durgāṁ devo mahāprabhām| varaṁ varaya deveśi tapasā tuṣṭavānaham

तब बहुत समय पश्चात्, उससे प्रसन्न हुए सूर्यदेव ने महाप्रभावशाली दुर्गा से मधुर वचन कहा—'हे देवेशि, वर माँगो, मैं तुम्हारे तप से संतुष्ट हुआ हूँ।'

श्लोक 4 (skanda.7.322.4)

दुर्गोवाच। यदि तुष्टो दिवानाथ दुःखसंघं विनाशय

durgovāca| yadi tuṣṭo divānātha duḥkhasaṁghaṁ vināśaya

दुर्गा ने कहा—हे दिवानाथ, यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे दुःखों के समूह का नाश कीजिए।

श्लोक 5 (skanda.7.322.5)

सूर्य उवाच। अचिरेणैव कालेन भगवांस्त्रिपुरांतकः। संप्राप्स्यत्युत्तमं लिंगमुन्नते स्थान उत्तमे

sūrya uvāca| acireṇaiva kālena bhagavāṁstripurāṁtakaḥ| saṁprāpsyatyuttamaṁ liṁgamunnate sthāna uttame

सूर्य ने कहा—शीघ्र ही, भगवान् त्रिपुरान्तक उत्तम उन्नतस्थान में उत्तम लिंग को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 6 (skanda.7.322.6)

दुर्गादित्येति मे नाम इह देवि भविष्यति। एवमुक्त्वा महादेवि तत्रैवान्तर्दधे रविः। सप्तम्यां रविवारेण दुर्गादित्यं प्रपूजयेत्

durgādityeti me nāma iha devi bhaviṣyati| evamuktvā mahādevi tatraivāntardadhe raviḥ| saptamyāṁ ravivāreṇa durgādityaṁ prapūjayet

हे देवि, यहाँ मेरा नाम 'दुर्गादित्य' होगा। ऐसा कहकर, हे महादेवि, सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गए। जो रविवार को पड़ने वाली सप्तमी के दिन दुर्गादित्य का पूजन करता है—

श्लोक 7 (skanda.7.322.7)

तस्य दुःखानि सर्वाणि कुष्ठानि विविधानि च। विलयं यांति देवेशि दुर्गादित्यप्रपूजनात्

tasya duḥkhāni sarvāṇi kuṣṭhāni vividhāni ca| vilayaṁ yāṁti deveśi durgādityaprapūjanāt

हे देवेशि, दुर्गादित्य के पूजन से उसके सब दुःख तथा विविध प्रकार के कुष्ठरोग नष्ट हो जाते हैं।

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