प्रभास खण्ड · अध्याय 325
उन्नतस्वामी माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.325.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि विनायकमनुत्तमम्। ऋषितोयातटे रम्ये सर्वविघ्ननिवारणम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi vināyakamanuttamam| ṛṣitoyātaṭe ramye sarvavighnanivāraṇam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर सुरम्य ऋषितोया के तट पर स्थित, सर्वविघ्ननिवारक अनुत्तम विनायक के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.325.2)
योऽसौ देवगणाध्यक्षः साक्षाच्च त्रिपुरान्तकः। गजरूपं समाश्रित्य ह्युन्नते जगति स्थितः। प्राभासिके महाक्षेत्रे गणानां कोटिभिर्वृतः
yo'sau devagaṇādhyakṣaḥ sākṣācca tripurāntakaḥ| gajarūpaṁ samāśritya hyunnate jagati sthitaḥ| prābhāsike mahākṣetre gaṇānāṁ koṭibhirvṛtaḥ
जो गणों के अध्यक्ष और साक्षात् त्रिपुरान्तक (शिव) ही हैं, वे गजरूप धारण कर उन्नत होकर इस जगत् में, प्राभासिक महाक्षेत्र में करोड़ों गणों से घिरे हुए स्थित हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.325.3)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यात्रा निर्विघ्नहेतवे। आराध्यो गणनाथश्च पुष्पधूपादिभिः सदा
tasmātsarvaprayatnena yātrā nirvighnahetave| ārādhyo gaṇanāthaśca puṣpadhūpādibhiḥ sadā
इसलिए, यात्रा को निर्विघ्न बनाने के हेतु, सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक पुष्प-धूप आदि से सदा गणनाथ की आराधना करनी चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.7.325.4)
चतुर्थ्यां च चतुर्थ्यां च सर्वैर्नगरवासिभिः। तस्मिन्महोत्सवः कार्यो राष्ट्रक्षेमार्थ सिद्धये
caturthyāṁ ca caturthyāṁ ca sarvairnagaravāsibhiḥ| tasminmahotsavaḥ kāryo rāṣṭrakṣemārtha siddhaye
प्रत्येक चतुर्थी को नगरवासियों द्वारा वहाँ राष्ट्र के कल्याण और सिद्धि हेतु महोत्सव करना चाहिए।