प्रभास खण्ड · अध्याय 328
संगमेश्वर माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.328.1)
ईश्वर उवाच। तस्माद्वायव्यदिग्भागे स्थितं पापप्रणाशनम्। संगमेश्वरनामाढ्यमृषयो यत्र संगताः
īśvara uvāca| tasmādvāyavyadigbhāge sthitaṁ pāpapraṇāśanam| saṁgameśvaranāmāḍhyamṛṣayo yatra saṁgatāḥ
ईश्वर ने कहा—उससे वायव्य दिशा में पापनाशक संगमेश्वर नामक तीर्थ स्थित है, जहाँ ऋषिगण एकत्र हुए थे।
श्लोक 2 (skanda.7.328.2)
तस्यैव पूर्वदिग्भागे कुण्डिका पापनाशिनी। वडवानलसंयुक्ता यत्रायाता सरस्वती
tasyaiva pūrvadigbhāge kuṇḍikā pāpanāśinī| vaḍavānalasaṁyuktā yatrāyātā sarasvatī
उसी के पूर्व दिशा में पापनाशिनी कुण्डिका है, जहाँ वडवानल से युक्त सरस्वती आ पहुँची थी।
श्लोक 3 (skanda.7.328.3)
कुंडिकायां नरः स्नात्वा संगमेश्वरमर्चयेत्। तस्य जन्मसहस्राणि लक्ष्म्याः पुत्रै प्रियैः सह। असंगमं महादेवि न कदाचित्प्रजायते
kuṁḍikāyāṁ naraḥ snātvā saṁgameśvaramarcayet| tasya janmasahasrāṇi lakṣmyāḥ putrai priyaiḥ saha| asaṁgamaṁ mahādevi na kadācitprajāyate
कुण्डिका में स्नान कर जो मनुष्य संगमेश्वर की पूजा करता है, उसे हे महादेवि, हजारों जन्मों तक प्रिय पुत्रों सहित लक्ष्मी का वियोग कभी नहीं होता।
श्लोक 4 (skanda.7.328.4)
मुच्यते पातकैः सर्वैराजन्म मरणांतिकैः
mucyate pātakaiḥ sarvairājanma maraṇāṁtikaiḥ
वह जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत के सभी पापों से मुक्त हो जाता है।