प्रभास खण्ड · अध्याय 330
तलस्वामी माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.330.1)
ईश्वर उवाच। तस्मात्तदुन्नतस्थानादुत्तरे योजनत्रयात्। तत्र तप्तोदकस्वामी तलो यत्र हतः पुरा
īśvara uvāca| tasmāttadunnatasthānāduttare yojanatrayāt| tatra taptodakasvāmī talo yatra hataḥ purā
ईश्वर ने कहा—उस उन्नत स्थान से उत्तर में तीन योजन की दूरी पर तप्तोदकस्वामी हैं, जहाँ पूर्वकाल में तल (दैत्य) मारा गया था।
श्लोक 2 (skanda.7.330.2)
दैत्यानामधिपो देवि विष्णुना प्रभविष्णुना। कृत्वा वर्षशतं युद्धं तलस्वामी ततोऽभवत्
daityānāmadhipo devi viṣṇunā prabhaviṣṇunā| kṛtvā varṣaśataṁ yuddhaṁ talasvāmī tato'bhavat
हे देवि, दैत्यों का वह अधिपति सर्वशक्तिमान विष्णु के साथ सौ वर्षों तक युद्ध करने के बाद तलस्वामी कहलाया।
श्लोक 3 (skanda.7.330.3)
तप्तकुण्डे नरः स्नात्वा तलस्वामिनमर्चयेत्। हृत्वा पिंडप्रदानं तु कोटियात्राफलं लभेत्
taptakuṇḍe naraḥ snātvā talasvāminamarcayet| hṛtvā piṁḍapradānaṁ tu koṭiyātrāphalaṁ labhet
तप्तकुण्ड में स्नान कर जो मनुष्य तलस्वामी की पूजा करता है और पिण्डदान करता है, उसे करोड़ों यात्राओं का फल प्राप्त होता है।