प्रभास खण्ड · अध्याय 331
कालमेघ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.331.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि कालमेघेति विश्रुतम्। तस्मात्तं पूर्वदिग्भागे क्षेत्रपं लिंगरूपिणम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi kālamegheti viśrutam| tasmāttaṁ pūrvadigbhāge kṣetrapaṁ liṁgarūpiṇam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर उससे पूर्व दिशा में कालमेघ नाम से विख्यात, लिंगरूपधारी क्षेत्रपाल के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.331.2)
अष्टम्यां वा चतुर्द्दश्यां पूज्योऽसौ बलिभिर्नरैः। वांछितार्थप्रदः सम्यक्स कलौ कल्पपादपः
aṣṭamyāṁ vā caturddaśyāṁ pūjyo'sau balibhirnaraiḥ| vāṁchitārthapradaḥ samyaksa kalau kalpapādapaḥ
अष्टमी अथवा चतुर्दशी को मनुष्यों द्वारा बलियों से पूजनीय वे इच्छित अर्थ को भलीभाँति प्रदान करते हैं; वे कलियुग में कल्पवृक्ष के समान हैं।