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प्रभास खण्ड · अध्याय 342

चंद्रेश्वरकलाकुण्डतीर्थमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 341अध्याय-सूचीअध्याय 343

श्लोक 1 (skanda.7.342.1)

ईश्वर उवाच। तस्य दक्षिणनैर्ऋत्ये नातिदूरे व्यवस्थितम्। लिंगं पापहरं देवि स्वयं सोमप्रतिष्ठितम्

īśvara uvāca| tasya dakṣiṇanairṛtye nātidūre vyavasthitam| liṅgaṁ pāpaharaṁ devi svayaṁ somapratiṣṭhitam

ईश्वर ने कहा—उसके (आशापूर के) दक्षिण-नैर्ऋत्य कोण में, न अधिक दूर, हे देवि, पापनाशक लिंग स्वयं सोम (चन्द्रमा) द्वारा प्रतिष्ठित है।

श्लोक 2 (skanda.7.342.2)

तत्रैवामृतकुण्डं तु कलाकुण्डं तु तत्स्मृतम्। तत्र स्नात्वा तु चंद्रेशं यो नरः पूजयिष्यति

tatraivāmṛtakuṇḍaṁ tu kalākuṇḍaṁ tu tatsmṛtam| tatra snātvā tu candreśaṁ yo naraḥ pūjayiṣyati

वहीं अमृतकुण्ड है, जो कलाकुण्ड नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान करके जो मनुष्य चन्द्रेश का पूजन करेगा,

श्लोक 3 (skanda.7.342.3)

स तु वर्षसहस्रस्य तपःफलमवाप्स्यति। तत्रैव संस्थितं देवि तडागं चंद्रनिर्मितम्

sa tu varṣasahasrasya tapaḥphalam avāpsyati| tatraiva saṁsthitaṁ devi taḍāgaṁ candranirmitam

वह एक सहस्र वर्षों की तपस्या का फल प्राप्त करेगा। वहीं, हे देवि, चन्द्रमा द्वारा निर्मित तडाग (सरोवर) स्थित है।

श्लोक 4 (skanda.7.342.4)

धनुःषोडशविस्तारं चंद्रेशात्पूर्वपश्चिमे। तत्पूर्वं ते समाख्यातं मुक्तिदानादिपूर्वकम्

dhanuḥṣoḍaśavistāraṁ candreśāt pūrvapaścime| tat pūrvaṁ te samākhyātaṁ muktidānādipūrvakam

चन्द्रेश के पूर्व-पश्चिम में सोलह धनुष विस्तार वाला वह तडाग है। मुक्ति और दान आदि देने वाला वह पहले ही तुम्हें बताया जा चुका है।

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