प्रभास खण्ड · अध्याय 354
गुप्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.354.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि देवगुप्तेश्वरं प्रिये। तत्र पश्चिमवायव्ये यत्र सोमोऽकरोत्तपः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi devagupteśvaraṁ priye| tatra paścimavāyavye yatra somo'karottapaḥ
ईश्वर ने कहा—हे प्रिये, तदनन्तर देवगुप्तेश्वर के पास जाना चाहिए, जो पश्चिम-वायव्य में स्थित है, जहाँ सोम ने तप किया था।
श्लोक 2 (skanda.7.354.2)
गुप्तो भूत्वा कुष्ठरोगाल्लज्जयाधोमुखः स्थितः। दिव्यं वर्षसहस्रं तु प्रभासक्षेत्र उत्तमे
gupto bhūtvā kuṣṭharogāllajjayādhomukhaḥ sthitaḥ| divyaṁ varṣasahasraṁ tu prabhāsakṣetra uttame
कुष्ठरोग के कारण लज्जावश छिपकर, नीचे मुख किये हुए, दिव्य सहस्र वर्षों तक उत्तम प्रभासक्षेत्र में स्थित रहे।
श्लोक 3 (skanda.7.354.3)
ततः प्रत्यक्षतां यातः सर्वदेवपतिः शिवः। तुष्टो बभूव चंद्रस्य क्षयनाशं तथाऽकरोत्
tataḥ pratyakṣatāṁ yātaḥ sarvadevapatiḥ śivaḥ| tuṣṭo babhūva candrasya kṣayanāśaṁ tathā'karot
तब सर्वदेवपति शिव प्रत्यक्ष हुए। प्रसन्न होकर उन्होंने चन्द्रमा के क्षयरोग का नाश किया।
श्लोक 4 (skanda.7.354.4)
क्षयरोगविनिर्मुक्तस्ततोऽभून्मृगलांछनः। प्रतिष्ठाप्य महालिंगं सुरासुरनमस्कृतम्
kṣayarogavinirmuktastato'bhūnmṛgalāñchanaḥ| pratiṣṭhāpya mahāliṅgaṁ surāsuranamaskṛtam
क्षयरोग से मुक्त होकर वे मृगलांछन (चन्द्रमा) बन गये, और महालिंग की स्थापना की, जो सुर-असुरों द्वारा नमस्कृत है।
श्लोक 5 (skanda.7.354.5)
गुप्तस्तेपे तपो यस्मात्तस्माद्गुप्तेश्वरः स्मृतः। सर्वकुष्ठहरो देवो दर्शनात्स्पर्शनादपि
guptastepe tapo yasmāttasmādgupteśvaraḥ smṛtaḥ| sarvakuṣṭharo devo darśanātsparśanādapi
चूँकि वे छिपकर तप करते रहे, इसलिए वे गुप्तेश्वर कहलाये; वह देव दर्शन मात्र से या स्पर्श मात्र से ही सम्पूर्ण कुष्ठ का हरण करते हैं।
श्लोक 6 (skanda.7.354.6)
सोमवारे विशेषेण यस्तल्लिंगं प्रपूजयेत्। तस्यान्वयेऽपि देवेशि कुष्ठी कश्चिन्न जायते
somavāre viśeṣeṇa yastalliṅgaṁ prapūjayet| tasyānvaye'pi deveśi kuṣṭhī kaścinna jāyate
जो विशेषकर सोमवार को उस लिंग का भलीभाँति पूजन करता है, हे देवेशि, उसके वंश में भी कोई कुष्ठी उत्पन्न नहीं होता।