Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 353

कर्द्दमालमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 352अध्याय-सूचीअध्याय 354

श्लोक 1 (skanda.7.353.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि कर्दमालमनुत्तमम्। तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं सर्वपातकनाशनम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi kardamālam anuttamam| tīrthaṁ trailokyavikhyātaṁ sarvapātakanāśanam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर अनुपम कर्दमाल के पास जाना चाहिए—यह तीर्थ त्रैलोक्य में विख्यात, सम्पूर्ण पापों का नाशक है।

श्लोक 2 (skanda.7.353.2)

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजंगमे। चन्द्रार्कतपने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते

tasminnekārṇave ghore naṣṭe sthāvarajaṅgame| candrārkatapane naṣṭe jyotiṣi pralayaṁ gate

जब उस भयंकर एकार्णव में चराचर सब नष्ट हो गया, चन्द्र, सूर्य और अग्नि नष्ट हो गये, तथा ज्योतिर्गण प्रलय को प्राप्त हो गये—

श्लोक 3 (skanda.7.353.3)

रसातलगतामुर्वीं दृष्ट्वा देवो जनार्दनः। वाराहं रूपमास्थाय दंष्ट्राग्रेण वरानने। उत्क्षिप्य धरणीं मूर्ध्ना स्वस्थाने संन्यवेशयत्

rasātalagatāmurvīṁ dṛṣṭvā devo janārdanaḥ| vārāhaṁ rūpamāsthāya daṁṣṭrāgreṇa varānane| utkṣipya dharaṇīṁ mūrdhnā svasthāne saṁnyaveśayat

पृथ्वी को रसातल में डूबी हुई देखकर, हे वरानने, देव जनार्दन ने वराह रूप धारण करके, दाढ़ के अग्रभाग से उसे उठाकर, अपने मस्तक से उसे उसके स्थान पर पुनः स्थापित कर दिया।

श्लोक 4 (skanda.7.353.4)

उद्धृत्य भगवान्विष्णुर्वाक्यमेतदुवाच ह

uddhṛtya bhagavānviṣṇurvākyametaduvāca ha

उसे उठाकर भगवान् विष्णु ने यह वचन कहा।

श्लोक 5 (skanda.7.353.5)

अत्र स्थाने स्थितेनैव मया त्वं देवि चोद्धृता। ममात्र नियतं वासः सदैवायं भविष्यति

atra sthāne sthitenaiva mayā tvaṁ devi coddhṛtā| mamātra niyataṁ vāsaḥ sadaivāyaṁ bhaviṣyati

'इसी स्थान पर स्थित रहकर, हे देवि, मैंने तुम्हें उठाया है। मेरा यहाँ यह नियत निवास सदैव बना रहेगा।'

श्लोक 6 (skanda.7.353.6)

ये पितॄंस्तर्पयिष्यंति कर्दमाले वरानने। आकल्पं तर्पितास्तेन भविष्यंति न संशयः

ye pitṝṁstarpayiṣyanti kardamāle varānane| ākalpaṁ tarpitāstena bhaviṣyanti na saṁśayaḥ

'हे वरानने, जो लोग कर्दमाल में पितरों को तर्पण देंगे, उससे वे कल्प के अन्त तक तृप्त रहेंगे, इसमें संशय नहीं।'

श्लोक 7 (skanda.7.353.7)

तत्र श्राद्धं करिष्यंति शाकैर्मूलफलेन वा। भविष्यति कृतं श्राद्धं सर्वतीर्थेषु वै शुभे

tatra śrāddhaṁ kariṣyanti śākairmūlaphalena vā| bhaviṣyati kṛtaṁ śrāddhaṁ sarvatīrtheṣu vai śubhe

'वहाँ जो शाक, मूल या फल से श्राद्ध करेंगे—हे शुभे, वह किया गया श्राद्ध समस्त तीर्थों में किये गये श्राद्ध के तुल्य होगा।'

श्लोक 8 (skanda.7.353.8)

अत्र तीर्थे नरः स्नात्वा यो मां पश्यति मानवः। अपि कीटपतंगा ये निधनं यांति मानवाः। ते मृतास्त्रिदिवं यान्ति सुकृतेन यथा द्विजाः

atra tīrthe naraḥ snātvā yo māṁ paśyati mānavaḥ| api kīṭapataṅgā ye nidhanaṁ yānti mānavāḥ| te mṛtāstridivaṁ yānti sukṛtena yathā dvijāḥ

'इस तीर्थ में स्नान करके जो मनुष्य मुझे देखता है—यहाँ तक कि जो कीट-पतंग भी यहाँ मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे मरकर पुण्य के प्रभाव से द्विजों के समान स्वर्ग को जाते हैं।'

श्लोक 9 (skanda.7.353.9)

ततो द्वीपेषु जायन्ते धनाढ्याश्चोत्तमे कुले। दंष्ट्राभेदेन यत्तोयं निर्गतं ते शरीरतः

tato dvīpeṣu jāyante dhanāḍhyāścottame kule| daṁṣṭrābhedena yattoyaṁ nirgataṁ te śarīrataḥ

'फिर वे द्वीपों में, धनाढ्य होकर, उत्तम कुल में जन्म लेते हैं—उस जल के प्रभाव से जो दाढ़ के छेदन से उनके शरीर से निकला था।'

श्लोक 10 (skanda.7.353.10)

तत्र स्नात्वा नरो देवि तिर्यग्योनौ न जायते

tatra snātvā naro devi tiryagyonau na jāyate

'वहाँ स्नान करके मनुष्य, हे देवि, पशु-योनि में जन्म नहीं लेता।'

श्लोक 11 (skanda.7.353.11)

ईश्वर उवाच। शृणु देवि यथावृत्तमाश्चर्यं तत्र वै पुरा। मृगयूथं सुसन्त्रस्तं लुब्धकैः परिपीडितम्। प्रविष्टं कर्दमाले तु सद्यो मानुषतां गतम्

īśvara uvāca| śṛṇu devi yathāvṛttamāścaryaṁ tatra vai purā| mṛgayūthaṁ susantrastaṁ lubdhakaiḥ paripīḍitam| praviṣṭaṁ kardamāle tu sadyo mānuṣatāṁ gatam

ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, पूर्वकाल में वहाँ जैसा आश्चर्य घटित हुआ। हिरणों का एक झुंड, जो व्याधों द्वारा अत्यन्त त्रस्त और पीड़ित था, कर्दमाल में प्रविष्ट होकर तत्क्षण मनुष्यत्व को प्राप्त हो गया।

श्लोक 12 (skanda.7.353.12)

अथ ते लुब्धका दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनाः। अपृच्छंत च संभ्रातास्तान्मर्त्यान्वरवर्णिनि

atha te lubdhakā dṛṣṭvā vismayotphullalocanāḥ| apṛcchanta ca sambhrātāstānmartyānvaravarṇini

तब वे व्याध यह देखकर, आश्चर्य से नेत्र फैलाकर, घबराते हुए उन मनुष्यों से पूछने लगे, हे वरवर्णिनि।

श्लोक 13 (skanda.7.353.13)

मृगयूथमनुप्राप्तं केन मार्गेण निर्गतम्। अथोचुस्ते वयं प्राप्ता मानुषं मृगरूपिणः

mṛgayūthamanuprāptaṁ kena mārgeṇa nirgatam| athocuste vayaṁ prāptā mānuṣaṁ mṛgarūpiṇaḥ

'जिस मृगयूथ का हम पीछा कर रहे थे, वह किस मार्ग से निकल गया?' तब उन्होंने कहा—'हम मृगरूपधारी थे, अब मनुष्यत्व को प्राप्त हुए हैं।'

श्लोक 14 (skanda.7.353.14)

एतत्तीर्थप्रभावोऽयं न विद्मो ह्यात्मकारणम्। ततस्ते लुब्धकास्त्यक्त्वा धनूंषि सशराणि च। तत्र स्नात्वा महाभागे मुक्ताश्च सर्वपातकैः

etattīrthaprabhāvo'yaṁ na vidmo hyātmakāraṇam| tataste lubdhakāstyaktvā dhanūṁṣi saśarāṇi ca| tatra snātvā mahābhāge muktāśca sarvapātakaiḥ

'यह इस तीर्थ का प्रभाव है; हमें स्वयं इसका कारण ज्ञात नहीं है।' तब उन व्याधों ने धनुष-बाणों को त्यागकर, वहाँ स्नान किया, हे महाभागे, और वे सभी पापों से मुक्त हो गये।

श्लोक 15 (skanda.7.353.15)

पार्वत्युवाच। भगवन्विस्तरं ब्रूहि कर्दमालमहोदयम्। उत्पत्तिं च विधानं च क्षेत्रसीमादिकं क्रमात्

pārvatyuvāca| bhagavanvistaraṁ brūhi kardamālamahodayam| utpattiṁ ca vidhānaṁ ca kṣetrasīmādikaṁ kramāt

पार्वती ने कहा—हे भगवन्, कर्दमाल के महोदय (महान् माहात्म्य) को विस्तार से बताइए—उसकी उत्पत्ति, विधि और क्षेत्र की सीमा आदि को क्रमशः।

श्लोक 16 (skanda.7.353.16)

ईश्वर उवाच। शृणु देवि रहस्यं तु कर्दमालसमुद्भवम्। गूढं ब्रह्मर्षिसर्वस्वं न देयं कस्यचित्त्वया

īśvara uvāca| śṛṇu devi rahasyaṁ tu kardamālasamudbhavam| gūḍhaṁ brahmarṣisarvasvaṁ na deyaṁ kasyacittvayā

ईश्वर ने कहा—हे देवि, कर्दमाल की उत्पत्ति का रहस्य सुनो। यह गूढ़ ज्ञान ब्रह्मर्षियों का सर्वस्व है; तुम्हें यह किसी को नहीं देना चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.7.353.17)

पूर्वमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजंगमे। चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते

pūrvamekārṇave ghore naṣṭe sthāvarajaṅgame| candrārkapavane naṣṭe jyotiṣi pralayaṁ gate

पूर्वकाल में उस भयंकर एकार्णव में चराचर सब नष्ट हो गया था; चन्द्र, सूर्य और पवन नष्ट हो गये थे, तथा ज्योतिर्गण प्रलय को प्राप्त हो गये थे।

श्लोक 18 (skanda.7.353.18)

एकार्णवं जगदिदं ब्रह्मापश्यदशेषतः। तस्मिन्वसुमती मग्ना पातालतलमागता

ekārṇavaṁ jagadidaṁ brahmāpaśyadaśeṣataḥ| tasminvasumatī magnā pātālatalamāgatā

ब्रह्मा ने इस सम्पूर्ण जगत् को एक अर्णव (सागर) के रूप में देखा। उसमें पृथ्वी डूबी हुई पाताल-तल में जा पहुँची थी।

श्लोक 19 (skanda.7.353.19)

ततो यज्ञवराहोऽसौ कृत्वा यज्ञमयं वपुः। उद्दधार महीं कृत्स्नां दंष्ट्राग्रेण वरानने

tato yajñavarāho'sau kṛtvā yajñamayaṁ vapuḥ| uddadhāra mahīṁ kṛtsnāṁ daṁṣṭrāgreṇa varānane

तब उस यज्ञवराह ने यज्ञमय शरीर धारण करके, हे वरानने, दाढ़ के अग्रभाग से सम्पूर्ण पृथ्वी को उठा लिया।

श्लोक 20 (skanda.7.353.20)

ईश्वर उवाच। वेदपादो यूपदंष्ट्रः क्रतुदंतःस्रुचीमुखः। अग्निजिह्वो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षा महातपाः

īśvara uvāca| vedapādo yūpadaṁṣṭraḥ kratudantaḥsrucīmukhaḥ| agnijihvo darbharomā brahmaśīrṣā mahātapāḥ

ईश्वर ने कहा—उसके चरण वेद थे, दाढ़ें यूप (यज्ञस्तम्भ) थीं, दाँत क्रतु (यज्ञ) थे, मुख स्रुची (हविष्पात्र) था; जिह्वा अग्नि थी, रोम दर्भ थे, और मस्तक ब्रह्म (वेद) था—वह महातपस्वी था।

श्लोक 21 (skanda.7.353.21)

ईश्वर उवाच। अहोरात्रेक्षणपरो वेदांगश्रुतिभूषणः। आज्यनासः स्रुवतुण्डः सामघोषस्वनो महान्

īśvara uvāca| ahorātrekṣaṇaparo vedāṅgaśrutibhūṣaṇaḥ| ājyanāsaḥ sruvatuṇḍaḥ sāmaghoṣasvano mahān

ईश्वर ने कहा—वह दिन-रात्रि को देखने में तत्पर था, वेदांगों और श्रुति से विभूषित था; उसकी नासिका घृत थी, थूथन स्रुव (हविष्पात्र) था, और उसकी विशाल गर्जना सामगान की ध्वनि थी।

श्लोक 22 (skanda.7.353.22)

प्राग्वंशकायो द्युतिमान्मात्रादीक्षाभिरावृतः। दक्षिणा हृदयो योगी महासत्रमहो महान्

prāgvaṁśakāyo dyutimānmātrādīkṣābhirāvṛtaḥ| dakṣiṇā hṛdayo yogī mahāsatramaho mahān

उसका शरीर प्राग्वंश (पूर्वाभिमुख यज्ञशाला) के आकार का था, वह द्युतिमान् और दीक्षाओं से आवृत था; उसका हृदय दक्षिणा था, वह योगी था, महासत्र का महान् आश्चर्यकारी स्वरूप था।

श्लोक 23 (skanda.7.353.23)

उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषणः। नानाच्छन्दोगतिपथो ब्रह्मोक्तक्रमविक्रमः

upākarmoṣṭharucakaḥ pravargyāvartabhūṣaṇaḥ| nānācchandogatipatho brahmoktakramavikramaḥ

उसके ओष्ठ उपाकर्म (यज्ञारम्भ-संस्कार) की शोभा से युक्त थे, प्रवर्ग्य के आवर्तनों से अलंकृत था; उसका मार्ग नाना छन्द थे, उसका पराक्रम वेदोक्त क्रम था।

श्लोक 24 (skanda.7.353.24)

भूत्वा यज्ञवराहोऽसावुद्दधार महीं ततः। तस्योद्धृतवतः पृथ्वीं दंष्ट्राग्रं निर्गतं बहिः

bhūtvā yajñavarāho'sāvuddadhāra mahīṁ tataḥ| tasyoddhṛtavataḥ pṛthvīṁ daṁṣṭrāgraṁ nirgataṁ bahiḥ

इस प्रकार यज्ञवराह बनकर उसने पृथ्वी को उठाया। पृथ्वी को उठाते समय उसकी दाढ़ का अग्रभाग बाहर निकल आया।

श्लोक 25 (skanda.7.353.25)

तस्मिन्प्राभासिके क्षेत्रे कर्द्दमेन विलेपितम्। तद्दंष्ट्राग्रं यतो देवि कर्द्दमालं ततः स्मृतम्

tasminprābhāsike kṣetre karddamena vilepitam| taddaṁṣṭrāgraṁ yato devi karddamālaṁ tataḥ smṛtam

उस प्राभासिक क्षेत्र में, वह दाढ़ का अग्रभाग कीचड़ (कर्दम) से लिप्त हो गया। इसीलिए, हे देवि, यह कर्दमाल नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 26 (skanda.7.353.26)

दण्डोद्भेदं महाकुण्डं यत्र दंष्ट्रा सुसंस्थिता। तद्दंष्ट्रयोद्धृतं तोयं कोटिगंगाभिषेकवत्

daṇḍodbhedaṁ mahākuṇḍaṁ yatra daṁṣṭrā susaṁsthitā| taddaṁṣṭrayoddhṛtaṁ toyaṁ koṭigaṅgābhiṣekavat

वहाँ दण्डोद्भेद नामक महाकुण्ड है, जहाँ वह दाढ़ भलीभाँति स्थित है। उस दाढ़ द्वारा प्रकट किया गया जल करोड़ों गंगा-स्नानों के समान है।

श्लोक 27 (skanda.7.353.27)

तत्र गव्यूतिमात्रं तु विष्णुक्षेत्रं सनातनम्। देशांतरं गता ये च दण्डोद्भेदे म्रियंति वै। यावत्कल्पसहस्राणि विष्णुलोकं व्रजंति ते

tatra gavyūtimātraṁ tu viṣṇukṣetraṁ sanātanam| deśāntaraṁ gatā ye ca daṇḍodbhede mriyanti vai| yāvatkalpasahasrāṇi viṣṇulokaṁ vrajanti te

वहाँ एक गव्यूति (लगभग दो मील) तक का विस्तार सनातन विष्णुक्षेत्र है। जो अन्यत्र गये हुए भी दण्डोद्भेद में मरते हैं, वे सहस्रों कल्पों तक विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 28 (skanda.7.353.28)

यस्तु पश्येन्महादेवि कर्दमाले तु सूकरम्। कोटिहिंसायुतो वापि स प्राप्स्यति परां गतिम्

yastu paśyenmahādevi kardamāle tu sūkaram| koṭihiṁsāyuto vāpi sa prāpsyati parāṁ gatim

हे महादेवि, जो कर्दमाल में सूकर (वराह) का दर्शन करता है—चाहे वह करोड़ों हिंसाओं से युक्त ही क्यों न हो—वह परमगति को प्राप्त करेगा।

श्लोक 29 (skanda.7.353.29)

दशजन्मकृतं पापं नश्येत्तद्दर्शनात्प्रिये। जन्मान्तरसहस्रेषु यत्कृतं पापसंचयम्

daśajanmakṛtaṁ pāpaṁ naśyettaddarśanātpriye| janmāntarasahasreṣu yatkṛtaṁ pāpasaṁcayam

दस जन्मों में किया गया पाप उस दर्शन से नष्ट हो जाता है, हे प्रिये। सहस्रों अन्य जन्मों में जो पापसंचय किया गया हो,

श्लोक 30 (skanda.7.353.30)

कर्दमाले तु वाराहं दृष्ट्वा तन्नाशमेष्यति। हेमकोटिसहस्राणि गवां कोटिशतानि च

kardamāle tu varāhaṁ dṛṣṭvā tannāśameṣyati| hemakoṭisahasrāṇi gavāṁ koṭiśatāni ca

कर्दमाल में वराह का दर्शन करने से वह सब नष्ट हो जाता है। हजारों करोड़ स्वर्ण और सैकड़ों करोड़ गौओं का—

श्लोक 31 (skanda.7.353.31)

दत्त्वा यल्लभते पुण्यं सकृद्वाराहदर्शनात्। कलौ युगे महारौद्रे प्राणिनां च भयावहे। नान्यत्र जायते मुक्तिर्मुक्त्वा क्षेत्रं तु सौकरम्

dattvā yallabhate puṇyaṁ sakṛdvārāhadarśanāt| kalau yuge mahāraudre prāṇināṁ ca bhayāvahe| nānyatra jāyate muktirmuktvā kṣetraṁ tu saukaram

गौओं और स्वर्ण के दान से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य एक बार वराह के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। इस महाभयंकर कलियुग में, जो प्राणियों के लिए अत्यन्त भयावह है, सौकर-क्षेत्र के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं मुक्ति नहीं मिलती।

श्लोक 32 (skanda.7.353.32)

एतत्सारतरं देवि प्रोक्तमुद्देशतस्तव। कर्द्दमालस्य माहात्म्यं सर्वपातकनाशनम्

etatsārataraṁ devi proktamuddeśatastava| karddamālasya māhātmyaṁ sarvapātakanāśanam

हे देवि, यह सारभूत माहात्म्य संक्षेप में तुम्हें बताया गया—कर्दमाल का माहात्म्य, जो सम्पूर्ण पापों का नाशक है।

अध्याय 352अध्याय-सूचीअध्याय 354